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Tag: स्त्री

Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
पत्थर या पानी *******  मेरे अस्तित्व का प्रश्न है -   मैं पत्थर बन चुकी या पानी हूँ?   पत्थरों से घिरी मैं, जीवन भूल चुकी हूँ   शायद पत्थर बन चुकी हूँ   फिर हर पीड़ा, मुझे रूलाती क्यो है?   हर बार पत्थरों को धकेलकर   जिधर राह मिले, बह जाती हूँ   शायद पानी ब... Read more
clicks 118 View   Vote 0 Like   6:46pm 12 Dec 2020 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
स्त्री हूँ (10 क्षणिकाएँ) ******* 1. अकेली   *** रह जाती हूँ   बार-बार   हर बार   बस अपने साथ   मैं, नितांत अकेली!   2. भूल जाओ *** सपने तो बहुत देखे   पर उसे उगाने के लिए   न ज़मीन मिली   न मैंने माँगी   सपने तो सपने हैं   सच कहाँ होते ... Read more
clicks 175 View   Vote 0 Like   6:11pm 2 Dec 2020 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
दागते सवाल ******* यही तो कमाल है   सात समंदर पार किया, साथ समय को मात दी   फिर भी कहते हो -   हम साथ नहीं चलते हैं।   हर स्वप्न को, बड़े जतन से ज़मींदोज़ किया   टूटने की हद तक, ख़ुद को लुटा दिया   फिर भी कहते हो -   हम साथ नहीं देते हैं।   अविश्वास की नदी, अविर... Read more
clicks 109 View   Vote 0 Like   3:32pm 25 Nov 2020 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
दड़बा ******* ऐ लड़कियों!   तुम सब जाओ अपने-अपने दड़बों में   अपने-अपने परों को सम्हालो   एक दूसरे को अपने-अपने चोंचों से लहूलुहान करो!   कटना तो तुम सबको है, एक न एक दिन   अपनों द्वारा या गैरों द्वारा   सीख लो लड़ना, ख़ुद को बचाना, दूसरों को मात देना   तुम सी... Read more
clicks 118 View   Vote 0 Like   1:18pm 24 Oct 2020 #स्त्री
Blogger: shikha kaushik at भारतीय नारी...
कल इंंडिया टीवी पर अनायास ही शाहीन बाग दिख गया. अनायास यूँ कि आजकल समाचार चैनल , अखबार आदि विशेष स्थिति में ही देखती हूँ. फेसबूक के पत्रकारों की संगति में उसकी अधिक आवश्यकता भी नहीं होती क्योंकि यहाँ पक्ष / विपक्ष दोनों ही प्रभावी रूप से उपस्थित एवं मुखर भी हैं. अधिकांश व... Read more
clicks 137 View   Vote 0 Like   5:56am 8 Mar 2020 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
परम्परा   *******     मैं उदासी नहीं चाहती थी   मैं तो खिलखिलाना चाहती थी   आजाद पंक्षियों-सा उड़ना चाहती थी   हर रोज नई धुन गुनगुनाना चाहती थी   और यह सब अनकहा भी न था   हर अरमान चादर-सा बिछा दिया था तुम्हारे सामने   तुमने सहमति भी जताई थी कि तुम साथ ... Read more
clicks 249 View   Vote 0 Like   11:46am 24 Mar 2019 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
पायदान...  *******  सीढ़ी की पहली पायदान हूँ मैं  जिसपर चढ़कर  समय ने छलाँग मारी  और चढ़ गया आसमान पर  मैं ठिठक कर तब से खड़ी  काल चक्र को बदलते देख रही हूँ,  कोई जिरह करना नहीं चाहती  न कोई बात कहना चाहती हूँ  न हक़ की न ईमान की  न तब की न अब की।  ... Read more
clicks 232 View   Vote 0 Like   8:09pm 7 Mar 2018 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at साझा संसार...
'हमें चाहिए आज़ादी', 'हम लेकर रहेंगे आज़ादी', किसे नहीं चाहिए आज़ादी? हम सभी को चाहिए आज़ादी। सोचने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, विचार की आज़ादी, प्रथाओं से आज़ादी, परम्पराओं से आज़ादी, मान्यताओं से आज़ादी, काम में आज़ादी, हँसने की आज़ादी, रोने की आज़ादी, प्रेम करने के आज़ादी, जीने की आज़ाद... Read more
clicks 343 View   Vote 0 Like   7:47pm 7 Mar 2018 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
मर गई गुड़िया...  *******  गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया  ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया  ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया  क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया  तितली-सी उड़ती थी गुड़िया !  ना-ना ये नही है मेरी गुड़िया  इसके तो पंख है नुचे  कोमल चेहरे पर ज़ख़्म भरे  सारे बदन स... Read more
clicks 247 View   Vote 0 Like   9:31am 1 Jun 2017 #स्त्री
Blogger: shikha kaushik at भारतीय नारी...
                             ..------पुनर्मूषकोभव --आलेख --स्त्री-पुरुष विमर्श ----------मैं अपने मित्रों से जब कभी भी अपना यह विचित्र सा लगने वाला मत या तर्क प्रस्तुत करता हूँ कि-- \ -- ‘आज की विभिन्न सामाजिक व नारी-पुरुष समस्याओं का कारण स्त्रियो... Read more
clicks 157 View   Vote 0 Like   12:08pm 15 Apr 2017 #स्त्री
Blogger: vijay kumar sappatti at बस यूँ ही..........WR...
स्त्री का कोई एक दिन ही नहीं होता है. मनुष्य के इतिहास में जन्म से लेकर मरण तक स्त्री की कई रूपों में भूमिका रही है और हमेशा ही रहेंगी .हर दिन ही स्त्री का है . जीवन ही स्त्री का है . स्त्री ,परमात्मा का परम अंश है . स्त्री है तो हम सब है . संसार की सभी नारियों को मेरे प्रणाम !विज... Read more
clicks 204 View   Vote 0 Like   2:58am 8 Mar 2017 #स्त्री
Blogger: डॉ. जेन्नी शबनम at लम्हों का सफ़...
क्या हुक्म है मेरे आका..........अक्सर सोचती हूँकिस ग्रह से मैं आई हूँजिसका ठिकानान कोख मेंन घर मेंन गाँव शहर मेंमुमकिन हैउस खुदा के घर में भी नहींअन्यथा क्रूरता के इस जंगल मेंबार-बार मुझे भेजा न गया होताचाहे जन्मूँ चाहे क़त्ल होउँचाहे जियूँ चाहे मरूँचाहे तमाम दर्द के साथ ... Read more
clicks 214 View   Vote 0 Like   4:52pm 8 Mar 2015 #स्त्री
Blogger: vineet verma at मेरा संघर्ष...
हर सपना कुछ-न कुछ कहता है। कुछ सपने निराशा देते हैं, तो कुछ जीवन में खुशियों की लहर भर देते हैं। जब व्यक्ति निद्रावस्था में होता है तो उसकी पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ उसका मन और उसकी पाँचों कर्मेंद्रियाँ अपनी-अपनी क्रियाएँ करना बंद कर देती हैं और व्यक्ति का मस्तिष्क पूरी त... Read more
clicks 72 View   Vote 0 Like   11:43am 27 Aug 2013 #स्त्री
Blogger: vineet verma at मेरा संघर्ष...
सपनों का हमारे जीवन काफी गहरा महत्व है। हर सपना कुछ-न कुछ कहता है। कुछ सपने निराशा देते हैं, तो कुछ जीवन में खुशियों की लहर भर देते हैं। जब व्यक्ति निद्रावस्था में होता है तो उसकी पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ उसका मन और उसकी पाँचों कर्मेंद्रियाँ अपनी-अपनी क्रियाएँ करना बंद क... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   9:29am 24 Aug 2013 #स्त्री
Blogger: ऋषभ देव शर्मा at ऋषभ उवाच...
भास्वर भारत / मार्च 2013 / पृष्ठ 14-15-द्रष्टव्य-http://rishabhuvach.blogspot.in/2013/03/blog-post.html... Read more
clicks 110 View   Vote 0 Like   5:50pm 13 Jun 2013 #स्त्री
Blogger: vijay kumar sappatti at बस यूँ ही..........WR...
दोस्तों , मुझे तो समझ में नहीं आता कि हम किस तरह के sick society में जी रहे है. आखिरकार , हमें हो क्या गया है , क्या हमारे नैतिक मूल्य इतने नीचे गिर गए है .एक छोटी सी बच्ची ! मुझे याद नहीं आता है कि पिछले १५-२० सालो में हमने  इस तरह की हैवानियत नहीं देखि है ... बीतते समय के साथ हम जानवर से भ... Read more
clicks 198 View   Vote 0 Like   2:45am 21 Apr 2013 #स्त्री
Blogger: ऋषभ देव शर्मा at ऋषभ उवाच...
कविता का समकाल/ आलोचना/ऋषभ देव शर्मा/2011/लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/500 रुपये/ 140 पृष्ठ/ISBN 9788192082745कविता के सामाजिक सरोकार का दायरा बड़ा व्यापक है। वह मानवजाति के प्रत्येक प्राणी की चिंता करती है। ऐसे में वह किसी समूह को हाशिए पर छोड़कर नहीं चल सकती। बल्कि हाशिए पर छूटे हुओं को फोकस म... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   1:33pm 29 Mar 2013 #स्त्री
Blogger: ऋषभ देव शर्मा at ऋषभ उवाच...
-    डॉ. ऋषभ देव शर्माया श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः Iश्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वं नताः स्म परिपालय देवि विश्वं IIभारतीय वाङ्मय में स्त्री और स्त्रीत्व को चरम गरिमा प्रदान की गई है और यह समझा जाता है कि सभ्य ... Read more
clicks 111 View   Vote 0 Like   6:09pm 14 Mar 2013 #स्त्री
Blogger: Vibha Rani at chhammakchhallo kahis...
कि हम हैं केवल और केवल-मंडी- रंडी, देह -दुकान....!सबकी मौत का एक मुअईन हैलेकिन मैं.....मरती हूँ हर रात... (प्रतिमा सिन्हा)(इसमें अपनी बात जोड़ रही हूँ- )घर -बाहर, दुकान दफ्तर-चौराहा-पार्कहर जगह हम हैं केवल मंडी- रंडी, देह -दुकान....!हम कहते रहें की हमने उन्हें देखामित्रवत, पुत्रवत, भतृ... Read more
clicks 133 View   Vote 0 Like   5:14am 8 Dec 2012 #स्त्री
Blogger: मृणाल वल्लरी at वल्लरी...
अभीतक हमारे जेहन में पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार की उस भारत यात्रा की यादें ताजा हैं, जब भारतीय मीडिया ने उन्हें खूबसूरती, तन पर पहने कपड़ों, गहनों और उनके पर्स तक ही समेट दिया था। इसके पहले किसी विदेशी महिला नेता के कपड़ों पर मीडिया ने ऐसी हाय-तौबा नहीं मच... Read more
clicks 190 View   Vote 0 Like   7:48am 12 Nov 2012 #स्त्री
Blogger: संतोष त्रिवेदी at बैसवारी baiswari...
आज  हर क्षेत्र में हो रहे नैतिक-मूल्यों के ह्रास का परिणाम  अब  समाज को ख़बरदार  करने वालों पर भी दिखने लगा है।देश की जानी-मानी पत्रिका इंडिया टुडे  के ताज़ा अंक में स्त्रियों के वक्ष-उभार को लेकर नकली चिंता जताई गई है,जबकि इस बहाने पत्रिका ने 'प्लेबॉय' और... Read more
clicks 97 View   Vote 0 Like   4:20am 26 Apr 2012 #स्त्री
Blogger: Vibha Rani at chhammakchhallo kahis...
'लमही' के अप्रैल-जून, 2012 के कथा समग्र के तहत पढ़े कहानी- सुजाता की रोटियां।आपकी राय और विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। ऐ सुजाता! चल रोटी पका। तेरा नाम पता, तेरा काम पता, तेरा धाम पता। तेरी जात पता, तेरा मान पता,तेरे कुल खानदान का पता। तो क्‍या मुश्किल है रोटी पकाना!चल सुजाता,रोटी ... Read more
clicks 140 View   Vote 0 Like   7:40am 23 Apr 2012 #स्त्री
Blogger: मृणाल वल्लरी at वल्लरी...
जिसेमुख्यधारा की पत्रकारिता कहा जाता है, वह आज पूरी तरह बाजार पर निर्भर हो चुका है और खुले रूप में बाजार-व्यवस्था का पोषण करता है। वह इस पर बारीक निगाह रखता है कि समाज में जो चल रहा है, उसे कैसे उत्पाद के रूप में पेश किया जाए। वह हर चीज को बेचना जानता है। भावनाओं या संवेदन... Read more
clicks 203 View   Vote 0 Like   2:37pm 26 Mar 2011 #स्त्री
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