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Tag: आदमी

Blogger: अपर्णा त्रिपाठी at palash "पलाश"...
 पूरा दिन चिलचिलाती धूप में काम करने के बाद, ऐसा कौन सा ऐसा मजूर होगा जो मजदूरी पा कर खुश ना होता हो। एक मजदूर सुबह से शाम तक हाड तोड मेहनत यही सोचते सोचते करता है कि जब दिन ढले वह आटा, नमक, तेल और चार पैसे हाथ में ले घर में जायगा, तभी तो उसकी घरवाली चूल्हा जलायेगी,  उसका और ... Read more
clicks 55 View   Vote 0 Like   6:06am 30 Jan 2021 #आदमी
Blogger: डा. सुशील कुमार जोशी at उलूक टाइम्स...
अच्छा हुआ भगवान अल्ला ईसा किसी ने देखा नहीं कभी सोचता आदमी आता जाता है आदमी को गली का भगवान बना कर यहाँ कितनी आसानी से सस्ते में बेच दिया जाता है एक आदमी को बना कर भगवान जमीन का पता नहीं उसका आदमी क्या करना चाहता है आदमी एक आदमी के साथ मिल कर खून को आज लाल से सफेद मगर करना च... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   3:00pm 12 Mar 2019 #आदमी
Blogger: डा. सुशील कुमार जोशी at उलूक टाइम्स...
एकदम अचानक अनायसपरिपक्व हो जाते हैं कुछ मासूम चेहरे अपने आस पास के फूलों के पौंधों को गुलाब के पेड़ में बदलता देखना कुछ देर के लिये अचम्भित जरूर करता है जिंदगी रोज ही सिखाती है कुछ ना कुछ इतना कुछ जितना याद रह ही नहीं सकता है फिर कहीं किसी एक मोड़ पर चुभता है एक और काँटा नि... Read more
clicks 120 View   Vote 0 Like   2:19pm 8 Feb 2017 #आदमी
Blogger: Anita nihalani at मन पाए विश्रा...
 कविता झुलस रही है  कविता झुलस रही है उस आग में लगा रहा है जो कोई सिरफिरा अनगिनत स्वप्न और निशान नन्हे कदमों के  दफन हो गये जिसकी राख में उन कक्षाओं की चहकती आवाजें खो गयीं जैसे बियाबान में स्कूल की घंटी से बढ़ क्या हो सकता है कोई गीत किसी बच्चे के लिए जिसमें गाता है ... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   7:35am 3 Nov 2016 #आदमी
Blogger: mahendra verma at शाश्वत शिल्प ...
आदमी को आदमी-सा फिर बना दे देवता,काल का पहिया ज़रा उल्टा घुमा दे देवता।लोग सदियों से तुम्हारे नाम पर हैं लड़ रहे,अक़्ल के दो दाँत उनके फिर उगा दे देवता।हर जगह मौज़ूद पर सुनते कहाँ हो इसलिए,लिख रखी है एक अर्ज़ी कुछ पता दे देवता।शौक से तुमने गढ़े हैं आदमी जिस ख़ाक से,और थोड... Read more
clicks 217 View   Vote 0 Like   3:03pm 27 Mar 2015 #आदमी
Blogger: Anita nihalani at मन पाए विश्रा...
आदमी फिर भी भटकता है राहबर आये हजारों इस जहाँ में आदमी फिर भी भटकता है ! जरा सी बात पर भौहें चढ़ाता यह फिर शांति की राह तकता है ! आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर मुक्तियों के गीत गढ़ता है ! खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं ही मांगता जाने कितने स्वांग भरता है ! इस हिमाकत पर न सदके जा... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   9:07am 21 Feb 2014 #आदमी
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at सृजन मंच ऑनला...
कविता को साफ-साफ पढ़ने के लिएकृपया फ्रेम पर क्लिक कर लें।... Read more
clicks 138 View   Vote 0 Like   2:11am 27 Aug 2013 #आदमी
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