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clicks 118 View   Vote 0 Like   12:26pm 7 Sep 2012   Catogery:   
Blogger:  at My Poems/मेरी रचना...
दफ्तर का खेल दिखाता हूँ दफ्तर का खेल दिखाता हूँ तुमको सबसे मिलवाता हूँये रजनी कान्त ब्रह्मचारी इनके ऊपर शनि है भारी ये कुढ़ते रहते हैं दिन भर कुछ गुनते रहते हैं दिन भर आते हैं दफ्तर सोने को जीवन की समस्या रोने को शादी है अब तक हुई नहीं कहते हैं लडकी छुई नहीं ये ढूंढ रहे ...
 
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