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clicks 49 View   Vote 0 Like   12:43pm 11 May 2021   Catogery: स्वप्नमेरे  
Blogger: दिगम्बर नासवा at स्वप्न मेरे...
लुप्त हो जाते हें जब इस रात के बोझिल पहर.मंदिरों की घंटियों के साथ आती है सहर.शाम की लाली है या फिर श्याम की लीला कोई,गेरुए से वस्त्र ओढ़े लग रहा है ये शहर. पूर्णिमा का चाँद हो के हो अमावस की निशा,प्रेम के सागर में उठती है निरंतर इक लहर. एक पल पर्दा उठा, नज़रें मिलीं, उफ़ क्या...
 
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