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clicks 22 View   Vote 0 Like   8:26am 20 Aug 2020   Catogery:   
Blogger:  दिवाकर पाण्‍डेय at पनघट (PANGHAT)...
एक शाम जब मैं उदास थामैं रो रहा थालेकिन तब मेरे आश्‍चर्य की कोई सीमा न रहीजब मैंने देखा, मेरे आंसू मुझ पर ही हंस रहे हैं।मैं रो रहा था और आंसू हंस रहे थे।कैसी विंडबना है ये जो जिसके लिए रोता हैवही उस पर हंसता है।मैं यही झुठलाने के लिएरो रहा था।परंतु असफल रहा।मैं न...
 
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