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Blog: भावनायें...

Blogger: Reetesh Gupta
जीवन कठिन डगर हैजो साँसें नहीं हैं गहरीकैसे प्रभु मिलेगेंमन जो रहेगा लहरी~~~~~~~~~~मैनें धर्म को अधर्म के साथचुपचाप खड़े देखा हैमैं अधर्म की अट्टाहस से नहींधर्म की खामोशी से हैरान हूँ~~~~~~~~~~जहाँ छोड़ रख्खा हो उजालासबने भरोसे सूर्य केवहाँ जलता हुआ एक दीप भीकिसी सूरज से कम नहीं... Read more
clicks 240 View   Vote 0 Like   1:30pm 12 Apr 2008 #
Blogger: Reetesh Gupta
तेरी इस दुनियाँ में प्रभु जीरंग-बिरंगे मौसम इतनेक्यों फ़िर सूखे-फ़ीके लोगथोड़ा खुद हँसने की खातिरकितना रोज रुलाते लोगबोतल पर बोतल खुलती यहाँरहते फ़िर भी प्यासे लोगपर ऎसे ही घोर तिमिर मेंमेधा जैसे भी हैं लोगसत्य, न्याय और धर्म की खातिरलड़ते राह दिखाते लोगएक राम थे जिनने ह... Read more
clicks 226 View   Vote 0 Like   5:50pm 6 Apr 2008 #
Blogger: Reetesh Gupta
मैनें देखा है रौशनी कोहाथों में अंधकार लियेअंधकार से लड़ते हुयेनिरंतर चल रहेइस संघर्ष मेंरौशनी को थकते हुएअंत में नहीं रही रौशनीहमारे बीचअंधकार आज भीवैसा ही खड़ा है~~~~~~~~~~~~~~~~~मैनें देखा है रौशनी कोहाथों में रौशनी लियेअंधकार से लड़ते हुयेनिरंतर चल रहेइस संघर्ष मेंअंधकार... Read more
clicks 173 View   Vote 0 Like   12:00pm 5 Apr 2008 #
Blogger: Reetesh Gupta
आँसू यह अब झरता नहींकिसी को चुप करता नहींबस गाँठों पर गाँठेंयहाँ कसता है आदमीएक पल में प्राण गयेतो मुर्दा है आदमीकहता है तो रूकता नहींखुद की भी यह सुनता नहींबस छोड़कर यहाँ खुदकोसब जानता है आदमीएक पल में प्राण गयेतो मुर्दा है आदमीदेह तर्पण में लगाक्यूँ मन को यह गुनता न... Read more
clicks 167 View   Vote 0 Like   10:36pm 23 Feb 2008 #
Blogger: Reetesh Gupta
अभिव्यक्ति से बढ़कर रखी थीअव्यक्त से आशाइंसानियत को मानकरसही धर्म की परिभाषाउसने पहलेजितना सहा जा सकता थाउतना सहाफ़िरजितना कहा जा सकता थाउतना कहापर धीरे-धीरे उसने जानागर अकेले चल पड़ातो भी मंजिलें मिल जायेंगीपर अकेले व्यक्त इनकोक्या मैं भला कर पाऊँगायह सही यहाँ मैं... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   3:03pm 10 Feb 2008 #
Blogger: Reetesh Gupta
हे केशव तुमने ज्ञान,कर्म और भक्तियोग समझाकरअर्जुन का विषाद हर लिया थापर इस कलयुग मेंतुम्हारी कोई जरूरत नहींनिज स्वार्थ में डूबे पार्थों कोयहाँ कोई विषाद नहींइस युग में तुम्हारा कर्मयोगअब सैनिक नहीं पैदा करतानाई, पंडित और शिक्षक मेंयह क्यों ओज नहीं भरताभ्रष्ट व्य... Read more
clicks 160 View   Vote 0 Like   12:05am 5 Feb 2008 #
Blogger: Reetesh Gupta
रात हो चुकी थीदिन भर के थके पंछीसंतुष्ट एवं आनंदमग्नचहचहा रहे थे अपने घोंसलों मेंपेड़-पोधे भी अपार संतोष लियेसो रहे थे गहरी नींद मेंवहीं दूसरी ओरइंसानों की बस्ती मेंछाई हुई थी गहरी उदासीसब सोच रहे थेएक और दिन चला गया यूँ हीबाकी दिनों की ही तरहभरपूर रोशनी के साथ आया था ... Read more
clicks 141 View   Vote 0 Like   1:29am 19 Dec 2007 #
Blogger: Reetesh Gupta
बिन्देश्वरी दुबे शहर के बड़े लोकप्रिय नेता माने जाते थे । उनके कद का कोई दूजा नेता पूरे नगर में ना था । जनता उन्हें गरीबों का मसीहा मानती थी । कालेज में छात्रों के बीच उनकी बड़ी चर्चा हुआ करती थी । राकेश भी उन्हीं छात्रों में एक था । राकेश के दादा स्वर्गीय पन्नालाल जी स्वत... Read more
clicks 182 View   Vote 0 Like   12:25am 16 Dec 2007 #
Blogger: Reetesh Gupta
संस्कारों से मिली थीउर्वरा धरती मुझेस्नेह का स्पर्श पाकरबाग पुष्पित हो गयाभावनाओं से पिरोयासूत में हर पुष्प कोमाला ना फ़िर भी बन सकीअर्पण जिसे मैं कर सकूँहे ईश सविनय आज तुमको----प्रयास भगीरथ का यहाँहमसे यही तो कह रहाअसंभव कुछ भी नहींसत्कर्म पर निष्ठा रखेगर आदमी चलता ... Read more
clicks 154 View   Vote 0 Like   10:04pm 29 Sep 2007 #
Blogger: Reetesh Gupta
अभी कुछ दिन पहलेकिसी अपने ने मुझसे कहाअरे अब तो आप भी हो गयेरीतेश होशंगाबादीमैं सोचने लगाअब कहाँ होती हैव्यक्ति की पहचान उसकेगाँव या शहर सेउसकी पहचानअब सिर्फ़ इससे हैकी वह आदमी है या औरतऔर हाँ उसकी उम्र क्या हैमेरा शहर जोसमय से पहले हीजवान हो गया हैमुझे बूढ़ा घोषित कर ... Read more
clicks 111 View   Vote 0 Like   3:09am 19 Sep 2007 #
Blogger: Reetesh Gupta
कुछ देर पहले ही की तो बात हैहर तरफ़ लगा हुआ था मेलाकोई भी नहीं था मेरे अंदर अकेलामिल रही थी ह्रदय को पर्याप्त वायुमन आश्वस्थ थाऔर कान भूल गये थे सन्नाटे की आवाजफ़िर रूक रूककर आने लगीं गहरी साँसेंरह रहकर आने लगी सन्नाटे की आहटजैसे जा रहा हो कोई दूर मुझसेअचानक यह सिलसिला भ... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   9:33pm 14 Sep 2007 #
Blogger: Reetesh Gupta
मेरी रागिनी मनभावनीमेरी कामिनी गजगामिनीजीवन के पतझड़ में मेरेतू है बनी मेरी सावनीशब्द सब खामोश थेबेरंग थी मन भावनासंगीतमय जीवन बनाजो तू बनी मेरी रागिनीआँखों को जो अच्छा लगेसुंदर कहे दुनियाँ उसेसिर्फ़ सुंदर तुम्हें कैसे कहूँजो तू तो है मनमोहिनीतू है कहीं कोई डगरमैं... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   8:05pm 26 Aug 2007 #
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