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Blog: मन के पाखी

Blogger: Sweta sinha
मुंडेर परदाना चुगने आतीचिडियों के टूटे पंखइकट्ठा करती,नभ में उड़ते देखउनके कलरव परआनंदित होतीमैं चिड़िया हो जानाचाहती हूँ,मुझे चिड़िया पसंद हैक्योंकि अबूझ भाषा मेंमुझसे बिना कोई प्रश्न कियेवो करती हैं मुझसे संवाद।मखमली,कोमल,खिलती कलियों, फूलों कीपंखुड़ियों को छूकर ... Read more
clicks 1 View   Vote 0 Like   2:46pm 28 Jul 2021 #
Blogger: Sweta sinha
आत्मा को ललकारतीचीत्कारों को अनसुनाकरना आसान नहीं होता ...इन दिनों सोचने लगी हूँएक दिन मेरे कर्मों काहिसाब करतीप्रकृति ने पूछा कि-महामारी के भयावह समय मेंतुम्हें बचाये रखा मैंनेतुमने हृदयविदारक, करूण पुकारों,साँसों के लिए तड़प-तड़पकर मरतेबेबसों जरूरतमंदों की क्या... Read more
clicks 27 View   Vote 0 Like   11:23am 24 Apr 2021 #
Blogger: Sweta sinha
वक़्त के अजायबघर मेंअतीत और वर्तमान प्रदर्शनी में साथ लगाये गये हैं-ऐसे वक़्त मेंजब नब्ज़ ज़िंदगी कीटटोलने पर मिलती नहीं,साँसें डरी-सहमीहादसों की तमाशबीन-सीदर्शक दीर्घा में टिकती नहीं,ज़िंदगी का हर स्वादखारेपन में तबदील होने लगामुस्कान होंठो पर दिखती नहीं,नींद के इं... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   3:21am 18 Apr 2021 #
Blogger: Sweta sinha
निर्लज्ज निमग्न होकर मनदेता है तुम्हें मूक निमंत्रणऔर तुम निर्विकार,शब्द प्रहारकरझटक जाते हो प्रेम अनदेखा करजब तुम्हारा मन नहीं होता...।घनीभूत आसक्ति में डूबाअपनी मर्यादा भूलप्रणय निवेदन करता मन तुम्हारे  दर्शन बखान परअपनी दुर्बलताओं के भान परलजाकर सोचता हैत... Read more
clicks 31 View   Vote 0 Like   3:52pm 9 Apr 2021 #
Blogger: Sweta sinha
१)बिना जाने-सोचे उंगलियाँ उठा देते हैं लोगबातों से बात की चिंगारियाँ उड़ा देते हैं लोगअख़बार कोई पढ़ता नहीं चाय में डालकरकिसी के दर्द को सुर्खियाँ बना देते हैं लोग२)चलन से बाहर हो गयी चवन्नियों की तरह,समान पर लिपटी बेरंग पन्नियों की तरह,कुछ यादें ज़ेहन में फड़फड़ाती हैं अक्... Read more
clicks 75 View   Vote 0 Like   8:23am 3 Apr 2021 #
Blogger: Sweta sinha
कली केसरी पिचकारी मन अबीर लपटायो,सखि रे! गंध मतायो भीनीराग फाग का छायो। चटख कटोरी इंद्रधनुषीवसन वसुधा रंगवायो,सरसों पीली,नीली नदियाँसुमनों ने माँग सजायो।कचनारी रतनारी डाली  लचक मटक इतरायो, सारंग सुगंध सुधहीन भ्रमर बाट बटोही बिसरायो।सखि रे! गंध मतायो भीन... Read more
clicks 39 View   Vote 0 Like   12:23pm 27 Mar 2021 #
Blogger: Sweta sinha
मुझे ठहरी हुई हवाएँबेचैन करती हैंबर्फीली पहाड़ की कठिनाइयाँअसहज करती हैतीख़ी धूप की झुलसन सेरेत पर पड़ी मछलियों की भाँतिछटपटाने लगती हूँकिसानों की तरह जीवट नहींऋतुओं की तीक्ष्णता सह नहीं पातीमैं बीज भी तो नहींजो अंकुरित होकरधान की बालियाँ बनेऔर किसी का पेट भर सकेमै... Read more
clicks 65 View   Vote 0 Like   3:05am 3 Mar 2021 #
Blogger: Sweta sinha
गुन-गुन छेड़े पवन बसंतीधूप की झींसी हुलसाये रे, वसन हीन वन कानन मेंजोगिया टेसू मुस्काये रे।ऋतु फाग के स्वागत में धरणी झूमी पहन महावर, अधर हुए सेमल के रक्तिमसखुआ पाकड़ हो गये झांवर,फुनगी आम्र हिंडोले बैठीकोयलिया बिरहा गाये रे,निर्जन पठार की छाती परजोगिया टेसू मुस्... Read more
clicks 71 View   Vote 0 Like   5:20am 25 Feb 2021 #
Blogger: Sweta sinha
कुछ भी लिखने कहने का दौर नहीं हैं।अर्थहीन शब्द मात्र,भावों के छोर नहीं हैं।उम्मीद के धागों से भविष्य की चादर बुन लेते हैंविविध रंगों से भ्रमित कोई चटक चित्र चुन लेते हैंसमय की दीर्घा में बैठे गुज़रती नदी की धार गिनतेबेआवाज़ तड़पती मीनों को नियति की मार लिखतेभेड़ों में ह... Read more
clicks 115 View   Vote 0 Like   4:31pm 22 Feb 2021 #
Blogger: Sweta sinha
मैं प्रकृति के प्यार में हूँ...।किसी उजली छाँह की तलाश नहीं हैकिसी मीठे झील की अब प्यास नहीं है,नभ धरा के हाशिये के आस-पासधडक रही है धीमे-धीमे -साँस,उस मीत के सत्कार में हूँ।मैं प्रकृति के प्यार में हूँ...।सृष्टि की निभृत पीड़ाओं से मुक्त होदिशाओं के स्वर पाश से उन्मुक्त ... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   5:08am 11 Feb 2021 #
Blogger: Sweta sinha
शताब्दियों सेविश्व की तमाम सभ्यताओं केआत्ममुग्ध शासकों के द्वाराप्रजा के लिए बनाये नियमऔर निर्गत विशेषाधिकार के समीकरणों से असंतुष्ट,असहमति जीभ पर उठायेउद्धारक एवं प्रणेता...शोषित एव शासकों,छोटे-बड़े का वर्गीकरण करते समाजिक चेतना कीमहीन रेखाओं की गूढ शब्दा... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   5:18pm 6 Feb 2021 #
Blogger: Sweta sinha
 व्यक्ति से विचारऔर विचार से फिरवस्तु बनाकर भावनाओं के  थोक बाज़ार में ऊँचे दामों में में बेचते देख रही हूँ।चश्मा,चरखा,लाठी,धोती,टोपीखादी,बेच-बेचकर संत की वाणीव्यापारी बहेलियों कोशिकार टोहते देख रही हूँ।सत्य से आँखें फेर,आँख,कान,मुँह बंद किये आदर्शो... Read more
clicks 67 View   Vote 0 Like   4:31pm 30 Jan 2021 #
Blogger: Sweta sinha
उड़ती गर्द मेंदृश्यों को साफ देखने की चाहत मेंचढ़ाये चश्मों सेपरावर्तित होकरबनने वाले परिदृश्यअब समझ में नहीं आते तस्वीरें धुंधली हो चली हैनिकट दृष्टि में आकृतियों कीभावों की वीभत्सता सेपलकें घबराहट सेस्वतः मूँद जाती हैं,दूर दृष्टि मेंविभिन्न रंग केसारे चेहर... Read more
clicks 59 View   Vote 0 Like   5:32pm 28 Jan 2021 #
Blogger: Sweta sinha
राष्ट्रीय त्योहार पर कर अर्पित सुमनअनाम बलिदानियों को नमन करती है,धन्य धरा,माँ नमन तुम्हें करती हैधन्य कोख,सैनिक जो जन्म करती है।-----शपथ लेते, वर्दी देह पर धरते ही साधारण से असाधारण हो जातेबेटा,भाई,दोस्त या पति से पहले,माटी के रंग में रंगकर रक्त संबंध,रिश्ते स... Read more
clicks 123 View   Vote 0 Like   5:34am 26 Jan 2021 #
Blogger: Sweta sinha
(१)सर्द रातगर्म लिहाफ़ मेंकुनमुनाती,करवट बदलतीछटपटाती नींदपलकों से बगावत करबेख़ौफ़ निकल पड़ती हैकल्पनाओं के गलियारों में,दबे पाँव चुपके से खोलते हीसपनों की सिटकनीआँगन में कोहरा ओढ़े चाँद माथे को चूमकरमुस्कुराता हैऔर नींद मचलकरमाँगती है दुआकाश!!पीठ पर उग आए रेश... Read more
clicks 68 View   Vote 0 Like   4:29pm 23 Jan 2021 #
Blogger: Sweta sinha
धरती की गहराई कोमौसम की चतुराई कोभांप लेती है नन्ही चिड़ियाआगत की परछाई को।तरू की हस्त रेखाओं कीसरिता की रेतील बाहों कीबाँच लेती है पाती चिड़ियाबादल और हवाओं की।कानन की सीली गंध लिएतितली-सी स्वप्निल पंख लिएनाप लेती है दुनिया चिड़ियामिसरी कलरव गुलकंद  लिए।सृष्टि मे... Read more
clicks 97 View   Vote 0 Like   2:19pm 19 Jan 2021 #प्रकृति कविता
Blogger: Sweta sinha
हरी-भूरी छापेवालीवर्दियों में जँचताकठोर प्रशिक्षण से बनालोहे के जिस्म मेंधड़कता दिल,सरहद की बंकरों मेंप्रतीक्षा करता होगामेंहदी की सुगंध में लिपटे कागज़ों की,शब्द-शब्दबौराये एहसासों कीअंतर्देशीय, लिफ़ाफ़ों की।उंगलियां छूती होंगी रह-रहकरमाँ की हाथों से बँधी ताबी... Read more
clicks 89 View   Vote 0 Like   8:43am 15 Jan 2021 #
Blogger: Sweta sinha
कभीपूछना अंतर्मन सेचमड़ी के रंग के लिएनिर्धारित मापदंड काशाब्दिक विरोधीहैंं हम भी शायद...?आँखों के नाखून सेचमड़ी खुरचने के बादबहती चिपचिपी नदी कारंग श्वेत है या अश्वेत...? नस्लों के आधार परमनुष्य की परिभाषातय करते श्रेष्ठता के खोखले आवरण में बंदघोंघों को अपनी आ... Read more
clicks 122 View   Vote 0 Like   9:57am 11 Jan 2021 #
Blogger: Sweta sinha
बुहारकर फेंके गयेतिनकों के ढेर चोंच में भरकर चिड़ियाउत्साह से दुबारा बुनती हैघरौंदा। कतारबद्ध,अनुशासित नन्हीं चीटियाँ बिलों के ध्वस्त होने के बादगिड़गिड़ाती नहीं,दुबारा देखी जा सकती हैं निःशब्द गढ़ते हुएजिजीविषा की परिभाषा।  नन्ही मछलियाँ भीपहचानती है... Read more
clicks 235 View   Vote 0 Like   6:30pm 31 Dec 2020 #
Blogger: Sweta sinha
मन पर मढ़ीख़्यालों की जिल्दस्मृतियों की उंगलियों केछूते ही नयी हो जाती है,डायरी के पन्नों पर जहाँ-तहाँबेख़्याली में लिखे गयेआधे-पूरे नाम पढ़-पढ़कर ख़्वाब बुनतीअधपकी नींद, एहसास की खुशबू सेछटपटायी बेसुध-सीमतायी तितलियों की तरह जम चुके झील के  एकांत तट परउग आती ... Read more
Blogger: Sweta sinha
चित्र:मनस्वीसदियों से एक छविबनायी गयी है,चलचित्र हो या कहानियांहाथ जोड़े,मरियल, मजबूरज़मींदारों की चौखट पर मिमयाते,भूख से संघर्षरतकिसानों के रेखाचित्र...और सहानुभूति जताते दर्शक  अन्नदाताओं कोबेचारा-सा देखना कीआदत हो गयी है शायद...!!अपनी खेत का समृद्ध मालिकपढ़ा-लि... Read more
clicks 104 View   Vote 0 Like   4:41am 16 Dec 2020 #
Blogger: Sweta sinha
कोहरे की रजाई मेंलिपटा दिसंबर,जमते पहाड़ों परसर्दियाँ तो हैंपर, पहले जैसी नहीं...।कोयल की पुकार परउतरता है बसंत आम की फुनगी सेमनचले भौंरे महुआ पीकरफूलों को छेड़ते तो हैंपर, पहले जैसा नहीं...।पसीने से लथपथ,धूप से झुलसता बदनगुलमोहर की छाँव देखसुकून पाता तो हैपर,पहले जैसा... Read more
Blogger: Sweta sinha
पकड़ती हूँ कसकर उम्र की उंगलियों मेंऔर फेंक देती हूँ गहरे समंदर में ज़िंदगी के जाल एक खाली इच्छाओं से बुनी..तलाश मेंकुछ खुशियों की।भारी हुई-सी जाल  निकालती हूँ जब उत्सुकतावश,आह्लाद से भर  अक़्सर जाने क्योंकरफिसल जाती हैं सारी खुशियाँ।और .. रह जाती है... Read more
clicks 163 View   Vote 0 Like   12:27pm 9 Dec 2020 #
Blogger: Sweta sinha
चित्र: मनस्वी प्रांजलधान ,गेहूँ,दलहन,तिलहनकपास के फसलों के लिएबीज की गुणवत्ताउचित तापमान,पानी की मापमिट्टी के प्रकार,खाद की मात्रानिराई,गुड़ाई या कटाई कासही समयमौसम और मानसून का प्रभावभूगोल की किताब मेंपढ़ा था मैंने भीपर गमलों में पनपतेबोनसाईकी तरह जीने कीविवशता न... Read more
clicks 101 View   Vote 0 Like   3:40pm 6 Dec 2020 #
Blogger: Sweta sinha
ठिठुरती रात,झरती ओस कीचुनरी लपेटेखटखटा रही हैबंद द्वार कासाँकल।साँझ से हीछत की अलगनीसे टँगाझाँक रहा हैशीशे के झरोखे सेउदास चाँदतन्हाई का दुशाला ओढ़े।नभ केनील आँचल सेछुप-छुपकरझाँकता आँखों कीख़्वाबभरी अधखुलीकटोरियों कीसारी अनकही चिट्ठियों की स्याही पीकर बौर... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   4:41pm 30 Nov 2020 #प्रकृति की कविताएँ
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