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Blog: ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद - Zindagi Zindabad

Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
नमस्कार मित्रो, इधर आपसे बातचीत किये लम्बा समय हो गया. दुर्घटना के बाद से आप सभी के स्नेह के साथ चलते हुए एलिम्को तक पहुँच गए थे. वहाँ डॉक्टर ने पैर की, उस पर आई नई त्वचा की स्थिति देखकर पैर बनाने से इंकार कर दिया. यह इंकार स्थायी या दीर्घकालिक नहीं था बल्कि कुछ दिनों के लि... Read more
clicks 13 View   Vote 0 Like   11:17am 7 Jul 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
यह किसी भी व्यक्ति का सौभाग्य ही होता है कि वह जिस संस्था में अध्ययन करे उसी में उसको अध्यापन करने का अवसर मिले. यह उसके लिए आशीर्वाद ही होता है कि जिन गुरुजनों का आशीर्वाद उसे मिला, उन्हीं के साथ उसे अध्यापन करने का मौका मिले. हमें ये सौभाग्य अर्थशास्त्र और हिन्दी साहि... Read more
clicks 17 View   Vote 0 Like   4:43pm 18 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
कभी-कभी समय भी परिस्थितियों के वशीभूत अच्छे-बुरे का खेल खेलता रहता है. अनेक मिश्रित स्मृतियों का संजाल दिल-दिमाग पर हावी रहता है. सुखद घटनाओं की स्मृतियाँ क्षणिक रूप में याद रहकर विस्मृत हो जाती हैं वहीं दुखद घटनाएँ लम्बे समय तक अपनी टीस देती रहती हैं. मनुष्य का स्वभाव ... Read more
clicks 8 View   Vote 0 Like   6:33am 13 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
सब दिन न होत एकसमान, यह बात जिसने भी कही है अपने अनुभव से ही कही होगी. वाकई ऐसा होता है कि सभी दिन एक जैसे नहीं रहते हैं. समय का चक्र तो अपनी गति से ही चलता है पर हम मनुष्यों को प्रयास करने चाहिए कि अपने कार्यों से, अपनी जिजीविषा से बुरे दिनों के प्रभाव को कम से कम कर सकें. उन द... Read more
clicks 9 View   Vote 0 Like   3:35pm 7 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
उन दिनों में आराम जितना हो सकता था किया जा रहा था क्योंकि घावों के भर जाने के बाद उनकी त्वचा की कोमलता दूर होने के बाद ही कृत्रिम पैर लगने वाली प्रक्रिया शुरू की जा सकती थी. चलने की, अपने पैरों पर खड़े होने की जल्दी थी मगर जल्दबाजी में किसी तरह की हड़बड़ी करना नहीं चाहते थे. न... Read more
clicks 19 View   Vote 0 Like   5:07pm 2 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां पार जाने की,ये वे दो पंक्तियाँ हैं जिन्हें उरई में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में नवम्बर 2005 में पढ़ा था. ये दो पंक्तियाँ बाद में हमारी पहचान बन कर हमारे साथ चलने लगीं. स्थानीय दयानंद वैदिक महाविद्यालय में हिन्दी साहित्य विष... Read more
clicks 44 View   Vote 0 Like   3:46pm 29 May 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
घर आने के बाद समय का अकेलापन महसूस नहीं हो रहा था. अब समूचा परिदृश्य सामने दिख रहा था. कानपुर रहने के दौरान सिर्फ स्वास्थ्य लाभ लिया जा रहा था. घर के किसी सदस्य के उरई कई दिन रुकने की स्थिति भी नहीं बन सकती थी. इसके चलते गाँव के, खेती के, पिताजी के देहांत पश्चात् तमाम कानूनी ... Read more
clicks 12 View   Vote 0 Like   5:06pm 24 May 2020 #आत्मकथा
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