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Tag: संस्मरण

Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
 बात सत्तावन साल पुरानी है हमारे पड़ोस में एक वृद्ध महिला रहती थी। जिसको पूरा मुहल्ला अम्मा के नाम से पुकारता था, लेकिन उनका नाम हरदेई था।    उन दिनों हमने एक गइया पाली हुई थी। घर में हम लोग सुबह गुड़ के साथ मट्ठा पी लिया करते थे। और माता जी उसके लिए घास लेने चली जात... Read more
clicks 27 View   Vote 0 Like   8:30pm 5 Jan 2020 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
एक पुराना संस्मरण--       बात लगभग 60 वर्ष पुरानी है। श्री रामचन्द्र आर्य मेरे मामा जी थे जो आर्य समाज के अनुयायी थे। उनके मन में एक ही लगन थी कि परिवार के सभी बच्चें पढ़-लिख जायें और उनमें आर्य समाज के संस्कार भी आ जायें। बिल्कुल यही विचारधारा मेरे पूज्य पिता जी की ... Read more
clicks 14 View   Vote 0 Like   8:30pm 4 Jan 2020 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
"संस्मरण-बाबा नागार्जुन"स्कूटर से यात्रा करते हुए डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', बाबा नागार्जुन और वाचस्पति शर्मा।     बाबा नागार्जुन की तो इतनी स्मृतियाँ मेरे मन व मस्तिष्क में भरी पड़ी हैं कि एक संस्मरण लिखता हूँ तो दूसरा याद हो आता है। मेरे व वाचस्पति जी (... Read more
clicks 11 View   Vote 0 Like   12:30pm 3 Jan 2020 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
पहले सुबह होती थी, शाम होती थी, अब लोहे के घर में, पूरी रात होती है। वे दिन, रोज वाले थे। ये रातें, साप्ताहिक हैं। बनारस से जौनपुर की तुलना में, बनारस से लखनऊ की दूरी लंबी है। रोज आना जाना सम्भव नहीं है। ये रास्ते सुबह/शाम नहीं, पूरी रात निगल जाते हैं और उफ्फ तक नहीं करते!लखनऊ ... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   5:59am 21 Sep 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, अनचाहे प्लेटफार्म पर, कोई युवा रुक जाता है। ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। मैं बाहर उतरकर देखने लगा..माजरा क्या है? कब होगा हरा सिगनल?मेरे इ... Read more
clicks 133 View   Vote 0 Like   7:03am 12 Jul 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
गरमी के तांडव से घबराकर घुस गए ए. सी. बोगी में। दम साधकर बैठे हैं लोअर बर्थ पर। बाहर प्रचण्ड गर्मी, यहाँ इतनी ठंडी कि यात्री चादर ओढ़े लेटे हैं बर्थ पर! ए. सी.बोगी में गरमी तांडव नहीं कर पाती, गेट के बाहर चौकीदार की तरह खड़ी हो, झुनझुना बजाती है। पैसा वह द्वारपाल है जो हर मौसम क... Read more
clicks 66 View   Vote 0 Like   5:28am 18 Jun 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
अच्छा हैबनारस कीपूरी एक युवा पीढ़ीदेखे बिनाजवान हो गई लेकिनअपने किशोरावस्था मेंहमने खूब देखेकर्फ्यू।गंगा तट के ऊपर फैलेपक्के महाल की तंग गलियों मेंकर्फ्यू का लगनाबुजुर्गों के लिएचिंता का विषय,बच्चों/किशोरों/युवाओं के लिएउत्सव के शुरू होने काआगाज़ होता था!स्कूलों... Read more
clicks 126 View   Vote 0 Like   2:43pm 27 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
बनारस की एक गलीगली में चबूतराचबूतरे पर खुलतीबड़े से कमरे की खिड़कीखिड़की से झाँकोकमरे में टी.वी.टी.वी. में दूरदर्शनएक से बढ़कर एकसीरियलहम लोग, बुनियाद, नीम का पेड़सन्डे की रंगोली, चित्रहार, रामायण..सुबह हो या शामतिल रखने की खाली जगह भी न होती थीचबूतरे से कमरे तकजब शुरू होते ... Read more
clicks 199 View   Vote 0 Like   7:09am 25 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
लोहे के घर की खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं एक वृद्ध। सामने की खिड़की पर उनकी श्रीमती जी बैठी हैं। वे भी देख रही हैं तेजी से पीछे छूटते खेत, घर, मकान, वृक्ष....। ढल रहे हैं सुरुज नारायण। तिरछी होकर सीधे खिड़की से घर में घुस रही हैं सूरज की किरणें। जल्दी-जल्दी, बाय-बाय, हाय-हैलो कर ल... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   6:28am 24 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
गली मेंबच्चे खेलते थेक्रिकेटबड़ेपान की दुकान के पासखड़े-खड़ेदेर तकसुनते रहते थे कमेंट्रीबूढ़ेचबूतरे पर बैठ करकोसते रहते थे..क्रिकेट ने बरबाद कर दियादेश को।देश कितना बर्बाद हुआ, नहीं पता!टेस्ट, वन डे, ट्वेंटी-ट्वेन्टीघरेलू, विश्वकप, आई.पी.यलक्रिकेट का इतना फैला बाजा... Read more
clicks 50 View   Vote 0 Like   6:19am 24 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
ढूँढ रहा था अपने ही शहर की गलियों में भटकते हुए बचपन का कोई मित्र जिसके साथ खेले थे हमने आइस-पाइस, विष-अमृत या लीलो लीलो पहाड़िया. हार कर बैठ गया पान की एक दुकान के सामने चबूतरे पर. बड़ी देर बाद एक बुढ्ढा नजर आया. बाल सफ़ेद लेकिन चेहरे में वही चमक. ध्यान से देखा तो वही बचानू था! ज... Read more
clicks 54 View   Vote 0 Like   7:27am 21 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
वो पतला सा शॉल      आज से ठीक अट्ठारह साल पुरानी बात है। उत्तराखण्ड को जन्मे हुए उस समय एक मास ही हुआ था और उसके पहले मनोनीत मुख्यमन्त्री थे नित्यानन्द स्वामी। मा. नित्यानन्द स्वामी से मेरा बहुत पुराना सम्बन्ध था। उस समय मैं खटीमा में पूर्व माध्यमिक विद्यालय ... Read more
clicks 63 View   Vote 0 Like   8:12am 9 Dec 2018 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
‘‘आर्य समाज:बाबा नागार्जुन की दृष्टि में’’ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')        राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में हिन्दी के विभागाध्यक्ष वाचस्पति शर्मा थे । बाबा नागार्जुन अक्सर उनके यहाँ प्रवास किया करते थे । इस बार भी जून के अन्तिम सप्ताह में बाबा का प्रवास खटी... Read more
clicks 121 View   Vote 0 Like   6:45am 17 Nov 2018 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
मेरी पुस्तक "स्मृति उपवन"से एक संस्मरण-"तू से आप और सर"(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') --     लगभग तैंतालीस साल पुरानी बात है। उस समय उत्तराखण्ड राज्य नही बना था। विशाल उत्तर-प्रदेश था। मेरा निवास उन दिनों नेपाल सीमा पर बसे छोटे से स्थान बनबसा में हुआ करता था। बन... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   4:56am 10 Nov 2018 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
बाबा नागार्जुन के साथ बागों की सैरइसी वर्ष प्रकाशित मेरी पुस्तक "स्मृति उपवन” से एक संस्मरण-       बाबा नागार्जुन ने अपने यायावर स्वभाव को अन्त तक जी भरके जिया। इसका जीता जागता प्रमाण मुझे बाबा के साथ बिताये गये कुछ दिनों में मिला।      बाबा को आम ... Read more
clicks 179 View   Vote 0 Like   7:23am 3 Nov 2018 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
गोधूली बेला थी। दून अपने निर्धारित समय से लेट थी मगर अपने काम से छुट्टी के बाद अनुकूल समय पर मिल गई थी और हवा से बातें कर रही थी। हमेशा की तरह खाली खिड़की ढूंढ कर मैं खिड़की के पास बैठ चुका था और खिड़की से बाहर का नजारा लेने में मशगूल था। सई नदी के ऊपर से जब ट्रेन गुजरी तो न... Read more
clicks 102 View   Vote 0 Like   7:40am 30 Oct 2018 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
कोटा पटना का लेट होने का कोटा अभी पूरा नहीं हुआ है। लेट, और लेट, और और लेट होती चली जा रही है।  कोटा से चलकर रात में आनी थी मथुरा, भोर में आई। सुबह, दिन में बदलने जा रहा है लेकिन यह रुक रुक, छुक छुक चल रही है। भाप का इंजन होता तो इसकी छुक छुक कर्ण प्रिय होती। बिजली का इंजन है, छ... Read more
clicks 70 View   Vote 0 Like   11:46am 22 Oct 2018 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
संस्मरणगुरू सहाय भटनागर बदनाम नहीं रहेसम्बन्धों में हों जहाँ, छोटी-बड़ी दरार।धरती पर कैसे कहें, उसे सुखी परिवार।।जिस प्रकार दुनिया में आने का कोई मुहूर्त नहीं होता, उसी प्रकार दुनिया से जाने का भी कोई समय नहीं होता। मेरे अभिन्न मित्र श्रीगुरू सहाय भटनागर के बारे... Read more
clicks 173 View   Vote 0 Like   1:59am 1 Aug 2018 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
मित्रों!स्व. गोपालदास नीरज से जुड़ी एक स्मृति प्रस्तुत कर रहा हूँ। जब मैं अन्तिम बार “नीरज” जी से मिला था।     दिनांक 27 मई, 2013 को खटीमा में एक आलइण्डिया मुशायरा एवं कविसम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसका उद्घाटन उत्तराखण्ड के महामहिम राज्यपाल श्री अजीज कुरैशी ने क... Read more
clicks 129 View   Vote 0 Like   10:27am 20 Jul 2018 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
वो फर्स्ट अप्रैलवाकया 2013 का है। उस समय मेरे पिता श्री घासीराम जी की आयु 90 वर्ष की है। 90 साल की उम्र में भी वे अपने दैनिक कार्य स्वयं ही करते हैं। यों तो उनके लिए निचली मंजिल पर भी स्नानगृह बना है। मगर उसमें गीजर नही लगा है। इसलिए पूरे जाड़ों-भर वह प्रति दिन सुबह 10 बजे स्न... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   3:09am 1 Apr 2018 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा...
गंगा किनारे फैले बनारस की गलियों में जिसे पक्का महाल कहते हैं, प्रायः घर घर में मन्दिर है। मेरे घर में भी मन्दिर था, मेरे मित्र के घर में भी। मेरे राम काले थे। मेरे मित्र के गोरे। मेरे काले संगमरमर से बने, मित्र के सफेद संगमरमर वाले। बचपन में जब हम दोनों में झगड़ा होता तो ... Read more
clicks 114 View   Vote 0 Like   3:22pm 25 Mar 2018 #संस्मरण
Blogger: अरविन्दनाभ शुक्ल at चरैवेति...
घर के सामने एक कटहल का पेड़ है; भरा-भरा, घना-घना, चमकदार पत्तों वाला| पेड़ के डालियों पर कुछ मिट्टी के बर्तन टंगे हुए हैं जिनमें पानी और कुछ दाना मुसलसल पड़ा रहता है| सुबह के समय तोते आते हैं, टें-टें करते हुए दाना चुगते हैं| उनके बाद गौरैय्या, कौए और जंगली फाख्ता आसपास मंडराते ... Read more
clicks 116 View   Vote 0 Like   1:57pm 4 Dec 2016 #संस्मरण
Blogger: jyoti dehliwal at आपकी सहेली ज्...
                                 बेटी ने नया-नया दुपहिया वाहन चलाना सीखा था। मैं जब भी उसके साथ कहीं जाती, तो मन में हमेशा एक संशय बना रहता कि वह गाड़ी ठीक से चला पाएगी या नहीं, कहीं किसी से टकरा तो नहीं जाएगी? हालांकि उसकी ड्रायविंग अच्छी थी, फिर भी मैं गाड़ी पर प... Read more
clicks 104 View   Vote 0 Like   4:45am 28 Aug 2016 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
      मुझे पालतू जानवरों का बचपन से ही शौक रहा है। 65 साल की जिन्दगी में लगभग दो दर्जन से अधिक पिल्ले पाले होंगे। दो बार तोते पाले, 3 बार खरगोश और आधादर्जन बिल्लियाँ पाली ही होंगी।     मगर इनमें मुझे सफेद रंग की मादा कुतिया जूली, उसका बच्चा पिल्लू, मिंकू, टॉम, फिरंग... Read more
clicks 111 View   Vote 0 Like   5:21am 4 May 2016 #संस्मरण
Blogger: डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" at उच्चारण...
पहाड़ में मामा-मामी उपहार में मिले   यह बात 1966की है। उन दिनों मैं कक्षा 11में पढ़ रहा था। परीक्षा हो गईं थी और पूरे जून महीने की छुट्टी पड़ गई थी। इसलिए सोचा कि कहीं घूम आया जाए। तभी संयोगवश् मेरे मामा जी हमारे घर आ गये। वो उन दिनों जिला पिथौरागढ़ में ठेकेदारी करते थे... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   2:33am 27 Nov 2015 #संस्मरण
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