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Tag: विविध कविता

Blogger: NEERAJ KUMAR at KAVYASUDHA ( का...
राजा ने कहा :जनता को विकास चाहिएआओ खेलेंविकास-विकासपर सरकार ! कुछ दिनों के बादजनता मांगेगीविकास का प्रमाण ...तो फिर खेलेंगेधर्म–धर्म / मजहब-मजहबजनता मजहब की भूखी हैपर सरकार! कुछ दिनों के बादजनता मांगेगीमंदिर/मस्जिद.........तो फिर खेलेंगेदेश-देशजनता देश-भक्ति की भूखी हैपर ... Read more
clicks 104 View   Vote 0 Like   4:56am 3 Apr 2016 #विविध कविता
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मैं एक काफिर हूँहां! तुम्हारे लिए मैं एक काफिर हूँ,यद्यपि कि मैं मानता नहीं किसी कोसिवा एक ईश्वर केमैने कभी सर नहीं झुकायाकिसी बुत के सामनेमैं नहीं मानता बराबर किसी कोउस ईश्वर केमैंने कभी झूठ नहीं बोलाहिंसा नहीं कीचौबीसों घंटे ईश्वर की अराधना करता हूँमानव तो मानवकर... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   2:27pm 6 Jan 2016 #विविध कविता
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मैं एक काफिर हूँहां! तुम्हारे लिए मैं एक काफिर हूँ,यद्यपि कि मैं मानता नहीं किसी कोसिवा एक ईश्वर केमैने कभी सर नहीं झुकायाकिसी बुत के सामनेमैं नहीं मानता बराबर किसी कोउस ईश्वर केमैंने कभी झूठ नहीं बोलाहिंसा नहीं कीचौबीसों घंटे ईश्वर की अराधना करता हूँमानव तो मानवकर... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   2:27pm 6 Jan 2016 #विविध कविता
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मैं जिंदगी बांटता  हूँपर इसके तलबगार मुर्दे नहीं हो सकतेलहलहाते हरियायेहँसते खिलखिलाते पौधेजिनमे फल की उम्मीद हैजल उन्हीं में डालूँगासूख चुके /सड़ चुके  पौधों मेंजल व्यर्थ ही जाएगामैं ढूँढता हू आनंद और ऊर्जा की खोज में रतस्वाभिमानीस्थायी जड़ता से ऊबेपरिवर्तन क... Read more
clicks 127 View   Vote 0 Like   1:50pm 2 Dec 2015 #विविध कविता
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परिकथा के जनवरी-फरवरी 2015 के अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें ::::: जंगल मे पागल हाथी और ढ़ोल -----------------पेट भर रोटी के नाम पर छिन ली गयी हमसे हमारे पुरखों की जमीन कहा जमीन बंजर है. शिक्षा के नाम पर छिन लिया गया हमसे हमारा धर्म कहा धर्म खराब है . आधुनिकता के नाम पर... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   2:48am 10 Feb 2015 #विविध कविता
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सितारों से सजे बड़े बड़े होटलों में,नरम नरम गद्दियों वाली कुर्सियां,करीने से सजी मेजें, मद्धिम प्रकाश, अदब से खड़े वेटर,खूबसूरत मेन्यू पर दर्ज,तरह तरह के नामों वाले व्यंजन,खाते हुए फिर भी स्वाद में कुछ कमी सी रहती है.याद आता है माँ  के हाथों  का खाना खाने के साथ माँ परोसत... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   8:12am 25 Dec 2014 #विविध कविता
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चलती अहर्निशरूकती नहीं है माँ है मेरी वो थकती नहीं है निष्काम लेती है मेरी हर  कष्ट हर किसी से कुछ भीकहती नहीं है चाँद डूबने से पहले चाँद चढ़ जाने तक खग के  उठने से पहलेसबके सो जाने तक रहती दौड़ती ठहरती नहीं है  खाना पीना  राशन वासन कपड़े लत्ते दीये दवाई शिक्षा दीक्... Read more
clicks 68 View   Vote 0 Like   1:37am 4 Dec 2014 #विविध कविता
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जालिम कैसे निबाहता है रस्म ए इश्क़पहले याद करता है फिर भुला देता है आता है कभी करीब फिर दूर जाता है देता है गम ए दिल और  रूला देता है रहती है जब उम्मीद तो आता ही नहीं  आता है रातों को और जगा देता हैरोशनी फैले भी तो कैसे हयात में  जलाता है इक दीया फिर बुझा देता है उनके अंद... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   4:52pm 21 Nov 2014 #विविध कविता
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