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Tag: महादेवी वर्मा

Blogger: kuldeep thakur at उजाले उनकी या...
जो तुम आ जाते एक बार ।कितनी करूणा कितने संदेशपथ में बिछ जाते बन परागगाता प्राणों का तार तारअनुराग भरा उन्माद रागआँसू लेते वे पथ पखारजो तुम आ जाते एक बार ।हंस उठते पल में आद्र नयनधुल जाता होठों से विषादछा जाता जीवन में बसंतलुट जाता चिर संचित विरागआँखें देतीं सर्वस्व व... Read more
clicks 300 View   Vote 0 Like   9:03am 21 Sep 2013 #महादेवी वर्मा
Blogger: kuldeep thakur at उजाले उनकी या...
था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश ... Read more
clicks 356 View   Vote 0 Like   11:00pm 16 Sep 2013 #महादेवी वर्मा
Blogger: Randhir Singh Suman at लो क सं घ र्ष !...
महादेवी वर्मा जी ने यह यात्रा बीसवी सदी के तीसरे दशक में की थी | तब से बहुत समय व्यतीत हो चुका है पर प्रस्तुत यात्रा - वृत्तांत के बहुतेरे अनुभव आज भी प्रासंगिक लगते है |मन्दिर अपनी प्रसिद्धि के अनुरूप नही है और भीतर द्वारों पर कटघरे से लगाकर मानो भगवान को भी बन्धन में ड... Read more
clicks 61 View   Vote 0 Like   1:12pm 24 Aug 2012 #महादेवी वर्मा
Blogger: Randhir Singh Suman at लो क सं घ र्ष !...
हमारे यहा लड़की जन्म लेते ही पराई हो जाती है | सब कहते है , अरे , लड़की हो गई, जो सुनता है , आह कर के रह जाता है और जब वह बड़ी होती है तो सब कहते है , पराए घर का धन है , याने वह धन है , सम्पत्ति है , जीवित व्यक्ति नही है , सामान है , और अगर किसी ने दहेज कम दिया तो उसे जला देते है , सो हमारे य... Read more
clicks 49 View   Vote 0 Like   8:51am 10 Aug 2012 #महादेवी वर्मा
Blogger: deepak at कविता कहानी च...
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!तारक में छवि, प्राणों में स्मृतिपलकों में नीरव पद की गतिलघु उर में पुलकों की संस्कृतिभर लाई हूँ तेरी चंचलऔर करूँ जग में संचय क्या?तेरा मुख सहास अरूणोदयपरछाई रजनी विषादमयवह जागृति वह नींद स्वप्नमय,खेल खेल थक थक सोने देमैं समझूँगी सृष्... Read more
clicks 165 View   Vote 0 Like   8:16pm 23 Sep 2011 #महादेवी वर्मा
Blogger: प्रकाश पंकज | Prakash Pankaj at 'भाव-तरंगिनी' -...
दीप मेरे जल अकम्पित,घुल अचंचल!सिन्धु का उच्छवास घन है,तड़ित, तम का विकल मन है,भीति क्या नभ है व्यथा काआंसुओं से सिक्त अंचल!स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,मीड़, सब भू की शिरायें,गा रहे आंधी-प्रलयतेरे लिये ही आज मंगलमोह क्या निशि के वरों का,शलभ के झुलसे परों कासाथ अक्षय ज्वाल क... Read more
clicks 200 View   Vote 0 Like   7:35am 15 Jan 2011 #महादेवी वर्मा
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