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Tag: काव्य

Blogger: PAWAN KUMAR at Journey...
नर-प्रगति ------------कर्मठों को व्याज न जँचते, स्वानुरूप काम की वस्तु कर ही लेते अन्वेषण प्रखर-ऋतु से भी न अति प्रभावित, कुछ उपाय ढूँढ़ लेते, निरंतरता न भंग। बाह्य-दृश्य अति-प्रिय, चहुँ ओर घने श्वेत कुहरे की चादर से नभ-भू आवरित  स्पष्ट दृष्टि तो कुछ दूर तक ही, तथापि प... Read more
clicks 10 View   Vote 0 Like   1:19pm 15 Mar 2020 #काव्य
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खुशहाल प्रजा ------------------एक गहन चिंतन वर्ग-उद्भव का, दमित भावना कुछ कर सी गई घर समाज में अन्यों प्रति अविश्वास दर्शित, सत्य में वे परस्पर-सशंकित। व्यक्तिगत स्तर पर नर विकास मननता, कुछ श्रम कर अग्र भी वर्धित सामाजिक तो न एकसम वृद्धि, अनेक विकास के निचले पायदान पर।&nb... Read more
clicks 55 View   Vote 0 Like   6:15pm 27 Jan 2020 #काव्य
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खुशहाल प्रजा ------------------एक गहन चिंतन वर्ग-उद्भव का, दमित भावना कुछ कर सी गई घर समाज में अन्यों प्रति अविश्वास दर्शित, सत्य में वे परस्पर-सशंकित। व्यक्तिगत स्तर पर नर विकास मननता, कुछ श्रम कर अग्र भी वर्धित सामाजिक तो न एकसम वृद्धि, अनेक विकास के निचले पायदान पर।&nb... Read more
clicks 7 View   Vote 0 Like   6:15pm 27 Jan 2020 #काव्य
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जीवन-कोष्टक----------------एक वृहद दृश्यमान समक्ष हो, मन के बंद कपाट सके पूर्ण खुल अनावश्यक बाधाओं से न ऊर्जा-क्षय, निपुणता अंततः जीवन-लक्ष्य। व्यवसायी-मन में अनेक गुत्थी स्थित, एक-२ कर कुरेदती रहती सब  मन तो सदैव चलायमान, पर आवश्यक तो न सब बाधा हों विजित। ... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   7:33pm 4 Jan 2020 #काव्य
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जीवन-कोष्टक----------------एक वृहद दृश्यमान समक्ष हो, मन के बंद कपाट सके पूर्ण खुल अनावश्यक बाधाओं से न ऊर्जा-क्षय, निपुणता अंततः जीवन-लक्ष्य। व्यवसायी-मन में अनेक गुत्थी स्थित, एक-२ कर कुरेदती रहती सब  मन तो सदैव चलायमान, पर आवश्यक तो न सब बाधा हों विजित। ... Read more
clicks 11 View   Vote 0 Like   7:33pm 4 Jan 2020 #काव्य
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जीवन-कोष्टक----------------एक वृहद दृश्यमान समक्ष हो, मन के बंद कपाट सके पूर्ण खुल अनावश्यक बाधाओं से न ऊर्जा-क्षय, निपुणता अंततः जीवन-लक्ष्य। व्यवसायी-मन में अनेक गुत्थी स्थित, एक-२ कर कुरेदती रहती सब  मन तो सदैव चलायमान, पर आवश्यक तो न सब बाधा हों विजित। ... Read more
clicks 12 View   Vote 0 Like   7:33pm 4 Jan 2020 #काव्य
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यह जग मेरा घर------------------हर पहलू का महद प्रयोजन, ऐसे ही तो जिंदगी में न कहीं बसते नव-व्यक्तित्वों से परिचय, नया परिवेश शनै निज-अंश बन जाता। कुछ लोग जैसे हमारे हेतु ही बने, मिलते ही माना प्राकृतिक मिलन जैसे अपना ही कुछ बिछुड़ा सा रूप, मात्र मिलन की प्रतीक्षा-चिर। ... Read more
clicks 67 View   Vote 0 Like   6:10pm 15 Sep 2019 #काव्य
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एकाकीपन --------------विशाल विश्व नर अकेला, बाह्य-शरण भी अल्प-अवधि तकतन्हाईयों में खुद ही डूबना, बहुदा प्रश्न कैसे काटें समय। कदाचित बोरियत-सीमा तक यह नितांत एकाकी पाता स्वयंकिसके पास जाकर व्यथा बाँटें, अपने में संसार जी रहें सब। अंतः-स्थिति सबकी एक सी, कुछ कह ल... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   3:03pm 21 Jul 2019 #काव्य
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एकाकीपन --------------विशाल विश्व नर अकेला, बाह्य-शरण भी अल्प-अवधि तकतन्हाईयों में खुद ही डूबना, बहुदा प्रश्न कैसे काटें समय। कदाचित बोरियत-सीमा तक यह नितांत एकाकी पाता स्वयंकिसके पास जाकर व्यथा बाँटें, अपने में संसार जी रहें सब। अंतः-स्थिति सबकी एक सी, कुछ कह ल... Read more
clicks 45 View   Vote 0 Like   3:03pm 21 Jul 2019 #काव्य
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आत्म-निरूपण ------------------क्या है आत्म-निरूपण जीव का, कालजयी सम संवाद सर्वांग-रोम हर्षोन्मादित हर विधा से सफल साक्षात्कार। पूर्ण-विकास मानस-पटल का, कैसे लघु जीवन में संभवसीमाऐं विजित हों, अश्वमेध-यज्ञ तुरंग सा स्वछंद विचरण। कोई सुबली पकड़ लेगा साहस से, प्रतिकार रा... Read more
clicks 102 View   Vote 0 Like   7:01pm 7 Jul 2019 #काव्य
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वहम-भग्न---------अद्भुतमन-प्रणाली, उत्तंगचेष्टा, चित्तिवृहत्कायाकास्वरूपज्ञानसक्षमसंभाव्य, सर्वब्रह्मांड-कणसमाहित, तबक्यूँअल्प-विकास।मन-विचारक्याक्षणोंमें, नरकासुंदररूपहोस्वयंमेंप्रादुर्भावनिम्नसेउच्चसभीइसीचेष्टामें, कैसेनिखरेरूप, होगर्वासक्त।सभीतोभरपू... Read more
clicks 127 View   Vote 0 Like   5:45pm 29 Jun 2019 #काव्य
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स्वतंत्र-विचरण-----------------स्वतंत्र मन-विचरण की, साइबेरिया हंस से दीर्घ डयन सी  सर्व-दिशा आत्मसात की, विद्युत्तरंगें सर्वत्र विकिरण की। मन-जिजीविषा उत्तंग करने की, सागर सम उछाल भरने की नदी सम लहरने-मटकने की, हिरणी सम कुलाँचे भरने की। कोयल सम नाद करने की, गायक सम राग ... Read more
clicks 111 View   Vote 0 Like   11:29am 2 Jun 2019 #काव्य
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लेखन-संस्मरण --------------------लेखन भी एक विचित्र विधा, बस बलात सा प्रारम्भ करना पड़ता कलम-कागद लेकर बैठ जाओ, क्या निकलेगा किसी को न पता। यह भी मंदता का शिकार होता, स्वतः तो न सक्रिय, करना पड़ता मस्तिष्क को क्रियाशीलता में जोड़ना, एकांत में ही कुछ बन पड़ता। बस हिम्मत करके ... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   5:08pm 22 Mar 2019 #काव्य
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लेखन-संस्मरण --------------------लेखन भी एक विचित्र विधा, बस बलात सा प्रारम्भ करना पड़ता कलम-कागद लेकर बैठ जाओ, क्या निकलेगा किसी को न पता। यह भी मंदता का शिकार होता, स्वतः तो न सक्रिय, करना पड़ता मस्तिष्क को क्रियाशीलता में जोड़ना, एकांत में ही कुछ बन पड़ता। बस हिम्मत करके ... Read more
clicks 93 View   Vote 0 Like   5:08pm 22 Mar 2019 #काव्य
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लेखन-संस्मरण --------------------लेखन भी एक विचित्र विधा, बस बलात सा प्रारम्भ करना पड़ता कलम-कागद लेकर बैठ जाओ, क्या निकलेगा किसी को न पता। यह भी मंदता का शिकार होता, स्वतः तो न सक्रिय, करना पड़ता मस्तिष्क को क्रियाशीलता में जोड़ना, एकांत में ही कुछ बन पड़ता। बस हिम्मत करके ... Read more
clicks 107 View   Vote 0 Like   5:08pm 22 Mar 2019 #काव्य
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श्रम-विचार--------------- हम किनके लिए काम कर रहें अपने या अन्यों के, या यूँ ही शरीरों को रहें थका  गधा-बैल-ऊँट-घोड़ा सारी वय मालिक हेतु भार ढ़ोते, बदले में पुण्य लब्ध कितना?क्या श्रम का जग में कुछ आदर है, भवन बनते ही मजदूर-मिस्त्री दिए जाते हटा फैक्ट्री में मजदूर दिन-र... Read more
clicks 135 View   Vote 0 Like   6:51pm 2 Mar 2019 #काव्य
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यक्ष-प्रश्न उत्तर ------------------मानव की क्या बुद्धिमता है, क्या समर्पित हो प्रदत्त कार्यों में रहे व्यस्तबस स्वामी-आदेश, कर्म ही अधिकार, अधिक अग्रिम-चेष्टा मत कर। जो काम दिए जाते निर्वाहार्थ, क्या वे ही हमारी व्यक्तित्व-पराकाष्टा  क्या प्रदत्त भृत्ति से न अग्र चर... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   6:34pm 22 Dec 2018 #काव्य
Blogger: Jagdanand Jha at Sanskritbhashi संस्कृ...
लौकिक काव्य की उत्पत्ति लौकिक संस्कृत साहित्य का आरंभ वाल्मीकि कृत रामायण से होता है। इसे आदि काव्य कहा गया है। क्रौंच वध की घटना से द्रवित हुए वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। जिसमें सरसता, स्वाभाविकता, विविध रसों का समन्वय, समास विहीन वाक्य प्राप्त होते हैं। रामायण ... Read more
clicks 72 View   Vote 0 Like   8:43am 28 Nov 2018 #काव्य
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आत्म-परिष्कार-------------------कौन उत्कृष्ट रूप स्व से संभव, मार्ग निज-उज्ज्वल करें दर्शित कैसे देह-मानस कायांतरित ही, क्या वृद्धि की सीमा किञ्चित? कैसे 'सुंदरतम मन'प्राप्ति, धरा भाँति सम-असम धारण सक्षम कैसे प्रमाद त्याग सुवृति हेतु, जीव चेष्टा पराकाष्टा करें ग्रहण। क... Read more
clicks 67 View   Vote 0 Like   5:03pm 1 Oct 2018 #काव्य
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वय-वृद्धि क्रम --------------------कालक्रम में जीवन भोला न रहता, बचपन के शौख-अंदाज उम्र संग नदारद मुस्काता, खिलता-हँसता चेहरा, जीवन की वीभत्स-युद्ध छाया में जाता छुप। 'भूल गए तानमान भूल गए जकड़ी, तीन चीजें याद रह गई नून-तेल-लकड़ी' प्रातः-जाग बाद दिवस संघर्ष में धकाया जाता, सा... Read more
clicks 79 View   Vote 0 Like   4:37pm 14 Jul 2018 #काव्य
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 कठिन मूल-भेदन-------------------सृष्टि-चलन एक महातंत्र, बहु कारक, सतत घटित है, अनेक रहस्य विस्मयी कौन जग को पूर्ण मनन में सक्षम, प्राणी क्षीण-चिंतक, विचार मात्र सतही। विशाल सृष्टि, बहुल-विस्तृत अवयव, चिर-दूरी मध्य, स्पष्ट संदर्भ भी न दर्शित सब अपनी जगह नन्हें जग में... Read more
clicks 71 View   Vote 0 Like   12:49pm 1 Jul 2018 #काव्य
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निकटस्थ - हित -------------------सभी निज संगठनों से जुड़े रहते, शांत रह समाज हेतु करते काम घर-कार्यालय माना प्रधान, पर यहीं नागरिक-दायित्व रूकता न। जिस परिवेश में हम जन्म लेते, उसके प्रति लगाव एक प्रवृत्ति सहज माना संपूर्ण ब्रह्मण्ड एक कुटुंब ही, निकटस्थों को समझते ... Read more
clicks 92 View   Vote 0 Like   6:38pm 19 May 2018 #काव्य
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मस्तिष्क-ग्रंथि प्रहेलिका---------------------------अन्वेषण प्रक्रिया से एक शब्द की यात्रा, प्राप्ति तो कुछ अग्र चरण  सकल जीवन यूँ चिंतन में बीतता, ठहरकर क्यूँ न उठाता अनुपम। चारों ओर ध्वनि-नाद गुंजायमान, मैं कर्ण होते भी न श्रव्य-सक्षम  अंदर से कुछ भी निकल न रहा, यूँ मूढ़... Read more
clicks 75 View   Vote 0 Like   1:44pm 6 May 2018 #काव्य
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विद्यानग-पथ ----------------कितना बना वह शिक्षित, इसका पैमाना है क्या कुछ उपाधियाँ एकत्रित भी, पर क्या वे पर्याप्त ?कितना शिक्षा-यत्न, कितना वास्तव में ही समझता  कितनी फिर स्मृति ही, कितना आचार में ला पाता ? कितने अल्प सतही ज्ञान पर, यूँ इतराता है फिरता स्वयं को फिर वि... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   1:01pm 25 Mar 2018 #काव्य
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सुवीर --------कुछ लघु ही किन्तु अनुपम, अल्प-शब्दों में आह्वानित भाव अति सूक्ष्म, अर्थ गूढ़ व पावन सुंदर का एकत्रण। पूर्ण मन का स्वामी और त्याग त्यज्य को हुआ सजग कुछ बुद्ध-दर्शन ग्रहण-प्रेरणित, कुछ अवस्था सुमधुर। लुप्त हुआ स्वान्वेषण में, पवित्र-पुष्कर में किया ... Read more
clicks 85 View   Vote 0 Like   5:40pm 10 Feb 2018 #काव्य
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