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clicks 201 View   Vote 0 Like   5:02pm 1 Jan 2013   Catogery: कविता  
Blogger: अनूप सेठी at अनूप सेठी...
साल का अंत आते आते सत्‍ता का चेहरा इतना पत्‍थर हो गयाकि पता नहीं वो पुलिस का था पाषाण का था तराशा हुआ राजसी ठाठ में लोग थे और भी लोग थे हाड़ मांस के जीते जागते आक्रोश और क्रोध से भरे हुए सत्‍ता ने बंद कर लिए अपने नेत्र जो वहां थे ही नहीं द्वार भी जो दरअसल कभी बने ही नहीं वहा...
 
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