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clicks 10 View   Vote 0 Like   4:32am 2 Jul 2021   Catogery: कविताएँ  
Blogger: Alpana at Vyom ke Paar...व्योम क...
 चक्रव्यूह बाह्य रुदन ,भीतर पीड़ा, अव्यवस्था की शमशीर सर आज,वक़्त डराता  है ,गिराता है ,बिखेर देने की धमकियाँ देता है ! सोचती हूँ , हम संभले ही कब थे जो लड़खड़ाने का डर  हो ,बँधे  ही कब थे जो बिखर जाने का डर हो !फिर भी मुस्कुराहटें ओढ़े रहते हैं जैसे  कुछ हुआ ही नहीं इन &n...
 
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