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clicks 18 View   Vote 0 Like   1:28pm 18 Oct 2020   Catogery:   
Blogger: Anshu Mali Rastogi at चिकोटी...
इन दिनों मैंने लिखना-पढ़ना, घूमना-फिरना एकदम बंद कर दिया है। दिनभर घर पर ही रहता हूं। दफ्तर से आदेश मिला है, घर से काम करें। इसीलिए ज्यादातर समय या तो हाथ धोता हूं या फिर मुंह पर मास्क चढ़ाए एकांत में बैठता हूं। जीवन में शायद ही पहले कभी इतनी दफा हाथ धोए हों, जितना अब धो रहा हूं। रात में सपने भी हाथ धोने के आने लगे हैं।

बीवी के छोड़िए, इधर कई दिनों से तो मैंने अपने हाथ भी न ढंग से देखे हैं न छुए हैं। हाथों को, किसी के भी, देखकर मन आशंका और भय से भर जाता है। यही ख्याल आता है कि पता नहीं हाथ धुले हुए भी हैं कि नहीं। कोई गलती से भी हाथ मिलाने को हाथ बढ़ा ले तो तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लेता हूं। उस व्यक्ति से छह फीट का फासला कर लेता हूं। आजकल तो मिलने-मिलाने का सामान्य शिष्टाचार तक लोगों ने टाल दिया है।

कोरोना ने न केवल मनुष्य-जाति पर बल्कि हाथों पर भी संकट ला दिया है। घर में ही हम आपस में एक-दूसरे के हाथों को देख सवाल करने लगे हैं। हाथों को बार-बार धोने पर जोर देने लगे हैं। हाथों से चेहरे व आंखों को छूने पर पाबंदी लगा दी है। हाथों को हमने इस हद तक मजबूर कर दिया है कि वे शरीर पर खुजली के लिए भी न उठें। अब कोई पुरुष किसी महिला से यह कहता हुआ नहीं दिखता कि आपके हाथ बहुत खूबसूरत हैं। मुझे तो डर है, आगे चलकर कहीं हाथ को हाथ में लेकर प्रपोज की परंपरा ही न लुप्त हो जाए। कहीं साथी हाथ बढ़ाना का जज्बा ही खत्म न हो जाए। कहीं हाथ पकड़कर जिंदगी भर साथ निभाने का वायदा करने पर ही ग्रहण न लग जाए। कहीं ज्योतिष को हाथ दिखाने का चलन ही खटाई में न पड़ जाए।

आज मुझे अपने ही हाथ दुश्मन नजर आ रहे हैं। टीवी और अखबार में भी लगातार हाथों पर केंद्रित विज्ञापन आ रहे हैं। क्या छोटा क्या बड़ा, क्या अमीर क्या गरीब, क्या मंत्री क्या सन्तरी हर कोई अपने हाथों को बचाने और धोते रहने में लगा है। उधर सेनिटाइजर बेचने वाले चांदी काट रहे हैं। अब हर हाथ में मोबाइल कम सेनिटाइजर ही अधिक नजर आता है। बाहरी किसी चीज को छूने के तुरंत बाद ही लोग अपने हाथों को सेनिटाइज करने लगते हैं। लोग जागरूक हो रहे हैं अच्छा है पर खुद से और अपनों के बीच से कटते भी जा रहे हैं। कोरोना जो न करवाए वो थोड़ा।

मैंने तो बीवी से भी फासले से मिलना शुरू कर दिया है। फासले के रहते हममें संवाद भी थोड़ा घट गया है। न मैं उसकी न वो मेरी कही बात सही से सुन पाते हैं। एक ही छत में हमने अपने-अपने कोने बना लिए हैं। या तो हमारे हाथों में मोबाइल होता है या फिर सेनिटाइजर। ऐसा मेरे साथ ही नहीं ज्यादातर घरों में अब यही हो रहा है। मैंने तो यह भी पढ़ा कि चीन में पति-पत्नी के लगातार घर में बने रहने से आपस में झगड़े और तलाक के मामले बढ़ गए हैं। यों भी, घर में खाली बैठा बंदा कुछ तो करेगा ही; चलो तलाक-तलाक ही खेल लें।

लाइफ में पहले ही शून्य क्या कम था, जो कोरोना ने अब और बढ़ा दिया है। मैं तो निरंतर अपने हाथों के शून्य को निहारता रहता हूं। हाथों को धो जरूर रहा हूं पर न जाने क्यों हाथों की लकीरें मुझे पहले से अधिक गंदी नजर आ रही हैं। उंगलियां अपने आकार में कुछ घट-सी गई हैं। मोह भी उनके प्रति कुछ कम-सा हो गया है। कुछ पकड़ने से पहले मन करता है पहले हाथ धो लूं। बार-बार हाथों को धोने के बाद भी ऐसा लगता है कि कुछ कीटाणु अब भी जमे रह गए हैं। कहीं मुझे हाथों का फोबिया तो नहीं हो गया है!

पहले कितना उन्मुक्त और स्वतंत्र रहते थे मेरे हाथ मगर अब वाश-वेसन के गुलाम बनकर रह गए हैं। जानता हूं, ऐसा एक मेरे साथ ही नहीं सबके साथ हो रहा होगा! हमारे ही हाथ हमसे पराए हो जाएंगे, शायद ही ऐसी कल्पना कभी किसी ने की हो!

साथ ही, मैं इस उम्मीद से भी हूं कि जल्द ही हम सब एक-दूसरे के हाथों को छू सकेंगे। तपाक से गले भी मिल सकेंगे। सोशल डिस्टेंसिंग भी हमारी कम होगी। फिलहाल अभी तो हम सब अपने-अपने हाथों के आगे मजबूर हैं।...
 
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