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clicks 140 View   Vote 0 Like   5:35pm 11 Jul 2011   Catogery:   
Blogger: vinay kumar at सुनेत्रा sunetra...
शाम जो सुर्ख परिंदे की तरह उड़ती हैमेरे मुस्ताक  नशेमन की तरफ मुड़ती हैपर सरे राह चटख रंग बिखर जाता हैगर्द-आलूद हवाओं में बिखर जाता हैनीमतारीक़ मनाजिर का असर क्या कहिएराख जाती है  निगाहों पे पसर क्या कहिएराख घुलती है लहू लाल नहीं रहता हैजान ओ दिल का वही हाल नहीं रहत...
 
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