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clicks 111 View   Vote 0 Like   6:11pm 14 Jul 2020   Catogery: Social  
Blogger: रेखा श्रीवास्तव at मेरी सोच...

लेखन : एक चिकित्सा विधि !



लेखन एक ऐसी विधा है , जो औषधि है - मन मष्तिष्क को शांत करने वाली एक प्रणाली है। मन और मष्तिष्क को तनाव से मुक्त करने का एक कारगर साधन भी है। कुछ लोग इसको हँसी में उड़ा देते हैं कि लिखना कोई दाल भात नहीं कि चढ़ाया और पका कर रख दिया। बिलकुल सच है लेकिन कौन कहता है कि आप साहित्य की रचना कीजिये। ये एक सवाल है कि हर कोई कहानी , कविता , आलेख लिखने की क्षमता नहीं रखता है , लेकिन कौन कहता है कि आप साहित्य रचिये - आप बस एक कलम और कॉपी लेकर बैठ जाइये बस थोड़ा सा स्वयं को संयत करने की जरूरत होती है। लिखना शुरू कीजिये जो भी मन में आये।



तनाव , अवसाद कभी भी किसी भी उम्र में हो सकता है और इसका निदान भी हमको उसी के अनुरूप खोजना पड़ता है। पुरुष, स्त्री , युवा या किशोर कोई भी हो सिर्फ एक कागज और कलम से अपने को तनाव और अवसाद से मुक्त हो सकते हो। कितनी परिस्थितियाँ ऐसी आती हैं कि बीमार को लेकर काउंसलर के पास जाना पड़ता है और वह फिर काउंसलिंग करके उनके लिए निदान खोजते हैं। सबसे पहले ऐसे लोगों से उनकी बात को उगलवानां थोड़ा सा टेढ़ा काम होता है। जो लोग अंतर्मुखी होते हैं वे ही अधिकतर इन सब चीजों के शिकार होते हैं क्योंकि वे अपने सुख दुःख तनाव और अवसाद खुद ही अकेले झेला करते हैं। दूसरों के साथ अपनी बात शेयर न करने की आदत ही उनको मानसिक समस्यायों से घेर देती हैं। यही लोग आत्महत्या तक के प्रयास करने लगते हैं। कभी सफल हो जाते हैं तो हम असफल हो जाते हैं और कभी हम सफल होकर उन्हें बचा लेते हैं.

सरिता के पति का निधन अचानक हो गया , सिर्फ पति पत्नी थे लेकिन संयुक्त परिवार के साये में थे। सरिता के मायके में भी कोई न था। बस वही दोनों का अपना काम था मिल कर करते थे। उसको समझने के लिए किसी के पास कोई शब्द न थे और उसके पास कोई दूसरा द्वार भी नहीं था कि वह जाकर कुछ दिन रह आती। घर वालों की तीव्र नजरें उस पर हमेशा लगी रहती थी क्योंकि उसके दुःख की दशा से वह वाकिफ थे। एक दिन रात में छत से नीचे कूदने की हालत में उसको बचाया गया। वह सदमें से निकल ही नहीं पा रही थी या कहें कि उसको कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। मिलने वाले आते और वापस उसके और पति के जीवन के बारे में बातें उकेर कर चले जाते। वह फिर अवसाद में घर जाती।

एक दिन उसकी ननद उसको काउंसलर के पास लेकर गयी और उसने पूरी जानकारी लेने के बाद उसको सलाह ही नहीं दी बल्कि अपनी तरफ से एक डायरी दी और एक कलम भी भेंट किया। उससे कहा कि वह इस में रोज कुछ न कुछ लिखा करेगी।

"मैं क्या लिखूंगी ?"

"कुछ भी। "

"मतलब मुझे तो कुछ भी नहीं आता कि लिखूं ?"

"कुछ शौक हैं तुम्हारे ? मेरा मतलब कहानी , कविता या लेख लिखना। "

"नहीं। "

"अच्छा तुम जब भी फुरसत मिले तो इसको खोल कर बैठ जाना और जो भी मन आये लिखना। कुछ वो बातें जो तुम किसी से कहना चाहती हो। अपनी पति की तस्वीर रखा कर जैसे तुम उनसे बातें करती थी उसी तरह की बातें इस डायरी में लिखना। दिन भर की अपनी दिनचर्या लिखना। किसने क्या कहा ? कौन घर में आया , उसकी क्या बात आपको अच्छी लगी या फिर बुरी लगी। आपके मन में उठा रहे विचार कुछ भी। इसको कोई भी नहीं देखेगा और पंद्रह दिन बाद आप मेरे पास आएँगी तो ये डायरी लेकर आएँगी। हर दिन के बाद आप लिखती जाएंगी कि आप का मन अब कैसा अनुभव करता है ? हर रोज की अपनी फीलिंग आप लिख लेंगी. "

"फिर आप क्या करेंगी उसका ?"

"मैं उससे ही आपको फिर आगे लिखना बताऊँगी और देखूँगी कि आपका अवसाद कितना कम हुआ है ?"

उसने सरिता की ननद को भी ये निर्देश दिया कि जब वह अकेली बैठी हो तो उसको लिखने के लिए प्रोत्साहित करे।

पंद्रह दिन बाद जब सरिता आयी तो उसने बीस पेज लिखे थे। उसमें उसने अपने दिल को खोल कर रख दिया था। उसको अभी पति के साथ मिल कर क्या क्या करना था ? अगर वह अभी रहता तो उसकी जिंदगी के दिन कैसे गुजर रहे होते ? अभी उसके रामेश्वरम जाने के वादे को पूरा करना भी अधूरा ही छोड़ कर चले गए।

वह सब लिखने के बाद वह अवसाद से काफी मुक्त दिख रही थी। उसकी ननद से जब पूछा गया तो उसने भी यही कहा कि अब पहले से बेहतर है।



किशोरावस्था की समस्या :-



बच्चों के जीवन का एक ऐसा दौर होता है कि वे एक असमंजस की स्थिति से गुजर रहे होते हैं। वह अपने माँ बाप से भी कभी शेयर करना पसंद नहीं करते हैं। अपने को बहुत परिपक्व समझने लगते हैं और कभी कभी इस उम्र में उनको माता पिता के निर्देश या फिर कुछ भी समझना गलत लगते लगता है और वे उसके ठीक विपरीत व्यवहार करने लगते हैं। इस समय यदि उनके पास अभिव्यक्ति का कोई साधन होता है तो वे अपनी बातों को उसमें लिख कर , चित्रों को बना कर , या दूसरे रचनात्मक कार्य करके अपने को व्यस्त रखते हैं तो उन्हें अपने भविष्य के प्रति एक दिशा दिखलाई देने लगती है। इसी समय उनकी संगति सही और गलत बनाने का समय होता है और वे अगर इस दिशा में मुड़ जाते हैं तो अपनी चर्या को लिपिबद्ध करके रखने में रूचि लेने लगते हैं तो वह बहुत सारी बातेंं जो कभी कभी अनजाने में माता पिता नहीं समझ पाते हैं या फिर व्यस्ततम जीवन में उन्हें समय नहीं दे पाते हैं तो वे अपना समय अन्य कार्यों में लगाने की बजाय इसमें लगा देते हैं। कई बार किशोर या किशोरी अपने अंतर्मन के द्वंद्व को अपने अभिभावकों से नहीं कह पाते हैं और अंदर अंदर घुट घुट कर गलत निर्णय ले बैठते हैं।

इसके लिए अभिभावकों को अपने बच्चों के स्वभाव को जो बचपन से ही जानते हैं। उनकी किशोरवस्था में प्रवेश करने से पूर्व ही उन्हें लिखने या अभिव्यक्ति का कोई रास्ता दिखा देना चाहिए। ऐसा नहीं बच्चे अपनी रूचि के अनुसार उसमें अधिक ध्यान देते हैं।



अभिभावकों को सिर्फ किशोरों के लिए ही नहीं बल्कि पति -पत्नी को एक दूसरे के प्रति परेशानी , अवसाद या तनाव को गम्भीरता से लेना चाहिए । आत्महत्या की ओर ऐसे ही मुड़ जाता है । सब समझें तो ऐसी घटनाओं में कमी आ सकती है ।

...
 
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