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Blog: साहित्यालोचन

Blogger: Bhaskar
यदि हम अपने समय के उपलब्ध मीडिया उत्पादों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि वे अधिक से अधिक व्यावसायिक लाभ कमाने, अधिक से अधिक लोकप्रिय होने और अत्यधिक सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विकसित हुए हैं | बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था किसी भी कीमत पर इन तीन उद्देश्यों को प्रा... Read more
clicks 217 View   Vote 0 Like   9:59am 11 Apr 2012 #
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ज यदि हम अपने समय के उपलब्ध मीडिया उत्पादों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि वे अधिक से अधिक व्यावसायिक लाभ कमाने, अधिक से अधिक लोकप्रिय होने और अत्यधिक सत्ता प्राप्त करने की प्रक्रिया में विकसित हुए हैं | बाज़ारवादी मीडिया व्यवस्था किसी भी कीमत पर इन तीन उद्देश्यों को प्र... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   9:59am 11 Apr 2012 #
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आज अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर निर्भर देश के अंदर बढ़ रहे आक्रामक पूंजीवाद की पृष्ठभूमि में बाजार समर्थक लेखकों की उपस्थिति चिंताजनक है। इसी आक्रामक पूंजीवाद के दौर में एक तरह का आक्रामक व्यक्तिवाद भी विकसित हो रहा है। हमारे यहाँ के मध्यवर्ग में उस विकृत चेतना ... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   10:58am 8 Apr 2012 #
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ज अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी पर निर्भर देश के अंदर बढ़ रहे आक्रामक पूंजीवाद की पृष्ठभूमि में बाजार समर्थक लेखकों की उपस्थिति चिंताजनक है। इसी आक्रामक पूंजीवाद के दौर में एक तरह का आक्रामक व्यक्तिवाद भी विकसित हो रहा है। हमारे यहाँ के मध्यवर्ग में उस विकृत चेतना क... Read more
clicks 82 View   Vote 0 Like   10:58am 8 Apr 2012 #
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हक़ अदा हुआ --- नामवर सिंह पंडित जी पर कई किताबें हैं। एक तो शिव प्रसाद सिंह ने संपादित की है ‘शांतिनिकेतन से शिवालिक तक’। लेकिन पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का जो सम्पूर्ण जीवन चरित्र है,जिसमें उनका जीवन संघर्ष और रचनात्मक संघर्ष शामिल है,साथ ही उनके अंतर्जगत की पी... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   6:54pm 7 Jul 2011 #
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हक़ अदा हुआ --- नामवर सिंह पंडित जी पर कई किताबें हैं। एक तो शिव प्रसाद सिंह ने संपादित की है ‘शांतिनिकेतन से शिवालिक तक’। लेकिन पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का जो सम्पूर्ण जीवन चरित्र है,जिसमें उनका जीवन संघर्ष और रचनात्मक संघर्ष शामिल है,साथ ही उनके अंतर्जगत की पीड़ा... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   6:54pm 7 Jul 2011 #
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राजेश जोशी की पुस्तक 'एक कवि की दूसरी नोटबुक' की समीक्षाएक कवि अपने लेखन में कितना सर्जनात्मक हो सकता है यह हमें उसके गद्य से पता चलता है। क्योंकि हम कवियों की कविताओं के तो आदी हो चुके होते हैं लेकिन उनका गद्य हमारी निगाह में थोड़ा संदेह के घेरे में रहता है। वरिष्ठ कवि ... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   6:35am 14 May 2011 #
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राजेश जोशी की पुस्तक 'एक कवि की दूसरी नोटबुक' की समीक्षाएक कवि अपने लेखन में कितना सर्जनात्मक हो सकता है यह हमें उसके गद्य से पता चलता है। क्योंकि हम कवियों की कविताओं के तो आदी हो चुके होते हैं लेकिन उनका गद्य हमारी निगाह में थोड़ा संदेह के घेरे में रहता है। वरिष्ठ कवि ... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   6:35am 14 May 2011 #
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 डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी  (वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी जी के 80वें जन्मवर्ष पर)म कबीर और तुलसी दोनों के इष्ट हैं. इनके रामों की तुलना हुई है. असमानता की ज़्यादा हुई है, समानता की कम. निराकार निर्गुण मत वाले संतों का विश्व-बोध अलग है. वे जैसे सबकुछ छोड़ते जाते हु... Read more
clicks 101 View   Vote 0 Like   10:27am 18 Mar 2011 #
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 डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी   (वरिष्ठ साहित्यकार डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी जी के 80वें जन्मवर्ष पर)राम कबीर और तुलसी दोनों के इष्ट हैं. इनके रामों की तुलना हुई है. असमानता की ज़्यादा हुई है, समानता की कम. निराकार निर्गुण मत वाले संतों का विश्व-बोध अलग है. वे जैसे सबकुछ छोड़ते जाते ह... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   10:27am 18 Mar 2011 #
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बोधिसत्व के कविता संग्रह ‘ख़त्म नहीं होती बात’ की समीक्षा‘दुख तंत्र’ के बाद बोधिसत्व का यह चौथा कविता संग्रह है। पहला संग्रह 1991 में आया था तो इस तरह बोधिसत्व के कवि का लगभग उन्नीस वर्षों का लम्बा सफ़र है। ‘दुख तंत्र’ 2004 में प्रकाशित हुआ था और यह नया संग्रह ‘खत्म नहीं हो... Read more
clicks 72 View   Vote 0 Like   6:14pm 5 Feb 2011 #
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बोधिसत्व के कविता संग्रह ‘ख़त्म नहीं होती बात’ की समीक्षा‘दुख तंत्र’ के बाद बोधिसत्व का यह चौथा कविता संग्रह है। पहला संग्रह 1991 में आया था तो इस तरह बोधिसत्व के कवि का लगभग उन्नीस वर्षों का लम्बा सफ़र है। ‘दुख तंत्र’ 2004 में प्रकाशित हुआ था और यह नया संग्रह ‘खत्म नहीं होती... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   6:14pm 5 Feb 2011 #
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चना का समाजशास्त्र एकपक्षीय नहीं होता और उसका वैविध्य उसको रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। भक्तिकाव्य का प्रत्येक कवि अपनी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषता लिए हुए है। 'भक्तिकाव्य एक प्रकार से मध्यकालीन भारत की आंदोलित चेतना का प्रतीक है, इसीलिए यह साहित्य तक सीमित न... Read more
clicks 129 View   Vote 0 Like   11:47am 10 Jan 2011 #
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रचना का समाजशास्त्र एकपक्षीय नहीं होता और उसका वैविध्य उसको रचनात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। भक्तिकाव्य का प्रत्येक कवि अपनी अलग सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषता लिए हुए है। 'भक्तिकाव्य एक प्रकार से मध्यकालीन भारत की आंदोलित चेतना का प्रतीक है, इसीलिए यह साहित्य तक सीमित ... Read more
clicks 171 View   Vote 0 Like   11:47am 10 Jan 2011 #
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ज इस पर बल देना बहुत ज़रूरी है कि किसी काल के साहित्य में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं होता जो अतीत और भविष्य से पूर्णतः विच्छिन्न हो। रचनात्मक प्रवृत्तियों, चिन्ताधाराओं, सौन्दर्यबोधीय मूल्यों और साहित्य मूल्यों की विकासशील परम्परा में परिवर्तन और निरन्तरता का, द्वन्द्व... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   4:52pm 15 Oct 2010 #
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किसी काल के साहित्य में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं होता जो अतीत और भविष्य से पूर्णतः विच्छिन्न हो। रचनात्मक प्रवृत्तियों, चिन्ताधाराओं, सौन्दर्यबोधीय मूल्यों और साहित्य मूल्यों की विकासशील परम्परा में परिवर्तन और निरन्तरता का, द्वन्द्वात्मक गतिशील सम्बन्धा होता है। ... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   4:52pm 15 Oct 2010 #
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सहजता अगर मनुष्य का गुण है तो शमशेर बहादुर सिंह का जीवन और काव्य उसका उदाहरण है। न औपचारिकता, न पाखंड। जैसा जीवन, वैसा लेखन। उनके अनुभव का सूत्र पकड में आ जाये तो दुरूह जान पडने वाली कविता भी खुल जाती है। लेकिन वे मानते थे, कला कलेंडर की चीज नहीं। इसलिए अपने अनुभव का निजी... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   12:58pm 1 Oct 2010 #
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सहजता अगर मनुष्य का गुण है तो शमशेर बहादुर सिंह का जीवन और काव्य उसका उदाहरण है। न औपचारिकता, न पाखंड। जैसा जीवन, वैसा लेखन। उनके अनुभव का सूत्र पकड में आ जाये तो दुरूह जान पडने वाली कविता भी खुल जाती है। लेकिन वे मानते थे, कला कलेंडर की चीज नहीं। इसलिए अपने अनुभव का निजी... Read more
clicks 70 View   Vote 0 Like   12:58pm 1 Oct 2010 #
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पूर्वांश.............. क्रमश:......भारतेन्दुयुगीन साहित्य की विशेषतायें व्यक्तित्व और कृतित्व से अटूट रूप से संबद्ध है। जीवन पद्धति हो या रचनात्मक प्रतिभा दोनों एक दूसरे से जुड़ी हैं। ज़्यादातर लोग प्रतापनारायण मिश्र के हिन्दूवादी विचारों से दुखी हैं, जबकि उनका व्यक्तित्व इ... Read more
clicks 67 View   Vote 0 Like   2:53pm 7 Sep 2010 #
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पूर्वांश.............. क्रमश:......भारतेन्दुयुगीन साहित्य की विशेषतायें व्यक्तित्व और कृतित्व से अटूट रूप से संबद्ध है। जीवन पद्धति हो या रचनात्मक प्रतिभा दोनों एक दूसरे से जुड़ी हैं। ज़्यादातर लोग प्रतापनारायण मिश्र के हिन्दूवादी विचारों से दुखी हैं, जबकि उनका व्यक्तित्व इस... Read more
clicks 77 View   Vote 0 Like   2:53pm 7 Sep 2010 #
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भारतेन्दुयुग से पूर्व रीतिकाव्य का समय था। यूँ तो रीतिकाव्य में ‘रीतिमुक्ति’ भी थी, पर श्रृंगारिकता से भिन्नता नहीं थी। रीतिकालीन कविता में अभिव्यक्ति के स्वरूप में अलंकारप्रियता, चमत्कारिता और रूढ़िबद्धता पर अतिरिक्त बल सहज ही देखा जा सकता है। कहा जाता है कि इस द... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   7:05pm 24 Aug 2010 #
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भारतेन्दुयुग से पूर्व रीतिकाव्य का समय था। यूँ तो रीतिकाव्य में ‘रीतिमुक्ति’ भी थी, पर श्रृंगारिकता से भिन्नता नहीं थी। रीतिकालीन कविता में अभिव्यक्ति के स्वरूप में अलंकारप्रियता, चमत्कारिता और रूढ़िबद्धता पर अतिरिक्त बल सहज ही देखा जा सकता है। कहा जाता है कि इस दौ... Read more
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ध्यकालीन ‘रीतिकाल’ स्थूल कायिकता और रसिक-मनोरंजन का काव्य था। ‘भारतेन्दु-युग’ रीतिकालीनता, मध्यकालीनता और समाजोन्मुखी आधुनिकता का संक्रांति युग था। इसमें तत्कालीन सामाजिक यथार्थ और आधुनिक आकांक्षाओं के बीज अवश्य अंकुरित हुए। ‘द्विवेदी-युग’ तक आते-आते आधुनिक चे... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   7:51am 11 Jul 2010 #
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‘रीतिकाल’ स्थूल कायिकता और रसिक-मनोरंजन का काव्य था। ‘भारतेन्दु-युग’ रीतिकालीनता, मध्यकालीनता और समाजोन्मुखी आधुनिकता का संक्रांति युग था। इसमें तत्कालीन सामाजिक यथार्थ और आधुनिक आकांक्षाओं के बीज अवश्य अंकुरित हुए। ‘द्विवेदी-युग’ तक आते-आते आधुनिक चेतना और स्... Read more
clicks 102 View   Vote 0 Like   7:51am 11 Jul 2010 #
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हिन्दी गद्य के विकास के साथ ही हिन्दी आलोचना का विकास हुआ। हिन्दी आलोचना की कहानी बहुत पुरानी नहीं है। 19वीं शताब्दी के अंत में जिसे भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है, में हम साहित्य का एक नया रूप देखते हैं। अब साहित्य व्यक्ति-सत्ता से हटकर समाज-सत्ता की वस्तु हो गयी। ... Read more
clicks 113 View   Vote 0 Like   7:04pm 3 Jul 2010 #


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