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मेरे अनुभव (Mere Anubhav)

लोगों के मन में बसे डर कमजोरियों या फिर उनकी कमियों को निशाना बनाकर धनार्जन करने की कला तो कोई इन विज्ञापन निर्माताओं से सीखे। मुझे तो कई बार ऐसा भी लगता है कि एक सामाजिक राजनैतिक या फिर कोई धार्मिक अथवा पारिवारिक धारावाहिक बनाने या लिखने से कहीं अधिक कठिन होता होगा य...
मेरे अनुभव (Mere Anubhav)...
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  April 8, 2015, 1:51 pm
पिछले कुछ महीनों मैं मुझे ऐसा लगने लगा था कि समाचार पत्रों में केवल राजनीतिक अथवा अपराधिक समाचारों के अतिरिक्त और कोई समाचार आना ही बंद ही हो गए हैं या यह भी हो सकता है कि शायद मैंने ही समाचार पत्र पढ़ने में आज से पहले कभी इतनी रुचि ही न ली हो। इसलिए मुझे पहले कभी यह महसूस ...
मेरे अनुभव (Mere Anubhav)...
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  April 1, 2015, 11:44 am
आजकल मोबाइल की इस एप्प का विज्ञापन टीवी पर बहुत दिखया जा रहा है। आपने भी ज़रूर देखा होगा। जहां इस एप्प ने आपको अपनी मन मर्जी के मुताबिक जब जी चाहे, जहां जी चाहे अपनी पसंद के कार्यक्रम देखने की सहूलियत दी वहीं दूसरी ओर कहीं न कहीं आपको अकेला कर दिया। आगे पढ़ने के लिए कृपया इ...
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  March 25, 2015, 11:54 am
यूं तो सुखद बचपन की कोई परिभाषा नहीं होती। मगर फिर भी जहां निजी जरूरत की पूर्ति के साथ-साथ बड़ों का आशीर्वाद हो, उनका प्यार दुलार डांट डपट सभी कुछ मौजूद हो, जीवन के वो हँसते गाते पल हों जो जीवन शब्द को सार्थक बनाते हैं। वही तो सही मायने में बचपन कहलाता है। आगे पढ़ने के लिए ...
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  January 18, 2015, 11:38 am
ज़िंदगीज़िंदगी एक बहुत बड़ी नियामत है जिसका कोई आकार-प्रकार, कोई आदि कोई अंत नहीं है। जहां एक और एक ज़िंदगी खत्म हो रही होती है। वहीं दूसरी और न जाने कितनी नयी ज़िंदगियाँ जन्म ले रही होती है। क्यूंकि ज़िंदगी तो आखिर ज़िंदगी ही होती है। फिर चाहे वो मानव की हो या किसी अन्य जीव जन्...
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  December 29, 2014, 3:00 pm
यह ज़िंदगी भी तो एक ऐसी ही दांस्ता हैं। एक पहेली जो हर पल नए नए रंग दिखती है। जिसे समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा लगता है। कब कहाँ, किस मोड पर ज़िंदगी का आपको कौन सा रंग देखने को मिलेगा, यह अपने आप में एक पहेली ही तो है ! इसका एक उदाहरण अभी कुछ दिनों पहले दीपावली के अवस...
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  December 2, 2014, 8:20 pm
कितना कुछ है मन के अंदर इस विषय पर कहने को, किसी से अपनी मन की बात कहने को किन्तु हर किसी को नहीं बल्कि किसी ऐसे इंसान को जो वास्तव में इंसान कहलाने लायक हो। जिसके अन्तर्मन में अंश मात्र ही सही मगर इंसानियत अब भी कायम हो। वर्तमान हालातों को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है कि ...
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  November 14, 2014, 8:50 pm
कभी सुना है किसी व्यक्ति को दीवारों से बातियाते हुए ? सुना क्या शायद देखा भी होगा। लेकिन ऐसा कुछ सुनकर मन में सबसे पहले उस व्यक्ति के पागल होने के संकेत ही उभरते है। भला दीवारों से भी कोई बातें करता है! लेकिन यह सच है। यह ज़रूरी नहीं कि दीवारों से बात करने वाला या अपने आप से...
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  August 19, 2014, 11:30 am
आज सुबह उनींदी आँखों से जब मैंने अपनी बालकनी के बाहर यह नज़ारा देखा तो मुझे लगा शायद आँखों में नींद भरी हुई होने के कारण मुझे ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए स्थिर चीजें भी मुझे चलती हुई सी दिखाई दे रही है। मगर फिर तभी दिमाग की घंटी बजी और यह ख़्याल आया कि चाहे आँखों में ज...
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  August 4, 2014, 8:40 am
बात उस समय कि है जब इंसान अपनी निजी एवं अहम जरूरतों के लिए सरकार और प्रशासन पर निर्भर नहीं था। खासकर पानी जैसी अहम जरूरत के लिए तो ज़रा भी नहीं। उस वक्त शायद ही किसी ने यह सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब पानी भी बेचा और खरीदा जायेगा। हाँ यह बात अलग है कि तब जमींदारों की हु...
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  July 7, 2014, 5:19 pm
यूं तो एक पागल व्यक्ति लोगों के लिए मनोरंजन का साधन मात्र ही होता है। लोग आते हैं उस पागल व्यक्ति के व्यवहार को देखते है। उस पर हँसते और उसका परिहास बनकर अपने-अपने रास्ते निकल जाते है। इस असंवेदनशील समाज से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। कभी-कभी सोचती हूँ तो लगता है कैस...
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  July 1, 2014, 3:08 pm
अजीब है यह दुनिया और इसके प्रपंच। कुछ चीजें ‘जस की तस’ चली आ रही हैं और कुछ इतनी बदल गई हैं कि उनके वजूद में उनसे जुड़ी उनकी पुरानी छाया का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं होता। फिर भी कभी-कभी कुछ चीजों को देखकर लगता है कि अब बस बहुत हो गया। अब तो बदलाव आना ही चाहिए। नहीं? कि...
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  June 23, 2014, 11:17 am
ज़िंदगी को क्या नाम दें यह समझ नहीं आता। लेकिन मौत भी तो किसी पहेली से कम नहीं होती। कभी-कभी कुछ ऐसे मंजर सामने आ जाते है, जो दिल और दिमाग पर अपनी एक छाप सी छोड़ जाते है। ऐसा ही एक मंजर मैंने भी देखा। यूं तो हर खत्म होने वाली ज़िंदगी  किसी नए जीवन की शुरुआत ही होती है। फिर चाहे...
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  June 11, 2014, 1:48 pm
हम अपने आसपास के लोगों के जीवन-स्तर को देखकर ही सम्‍पूर्ण समाज को उस स्‍तर पर ला खड़े करते हैं। और उसी स्तर पर हो रहे विकास को देखते हैं। जबकि उस निर्धारित स्तर से ऊपर या नीचे भी जीवन चलायमान होता है। उधर हमारी नज़र जाती ही नहीं। जाती भी है तो उस जीवन की कठिनाइयों को दूर करन...
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  March 7, 2014, 8:42 pm
बहुत याद आता है वो गुज़रा ज़माना। वो होली के रंग, वो दीवाली के दिये। वो संक्रांति की पतंग, वो गणेश उत्सव की धूम, वो नवरात्रि में गरबे के रंग, वो पकवानों की महक, वो गली की चाट, वो मटके की कुल्फी और भी न जाने क्या-क्या....ज़िंदगी तो जैसे आज भी वहीं बस्ती है। आगे पढ़ने के लिए कृपया इस ...
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  March 1, 2014, 11:47 pm
फरवरी का महीना यानी हमारे परिवार के लिए वैवाहिक वर्षगाँठ का महीना है। इस महीने हमारे घर के सभी जोडों की शादी की सालगिरह होती है। कल १७  फरवरी को मेरी भी है। लेकिन आज इतने सालों बाद जब पीछे मुड़कर देखो तो ऐसा लगता है।“ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ-साथ चलते”लेकिन ....आगे पढ़ने ...
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  February 16, 2014, 9:13 pm
आज सुबह कपडों की अलमारी जमाते वक्त अचानक ही एक पुराने कोट पर नज़र जा पड़ी। जैसे ही उसे उठाया तो उसकी जेब से चंद सिक्के लुढ़ककर ज़मीन पर जा गिरे। कहने को तो वो सिक्के ही थे मगर उनके बिखराव ने मेरे मानस पटल पर ना जाने कितनी बीती स्मृतियों के रंग बिखेर दिये। सिक्कों को तो मैंने ...
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  February 5, 2014, 3:15 pm
कल अपनी एक सहेली से बात करते वक्त अचानक उसने बात काटते हुए कहा, ‘यार…! मैं बाद में बात करती हूं। कुछ गंभीर बात है। यहाँ अपना करीबी रिश्तेदार गुजर गया है।’ सुन कर मैंने कह तो दिया कि ठीक है बाद में बात करेंगे लेकिन दिमाग में जैसे बहुत कुछ घूमने लगा। बाल्यकाल में अपनी न...
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  January 26, 2014, 4:48 pm
अभी कुछ दिन पहले की बात है शाम को पीने के पानी का जग (जिसमें फिल्टर लगा हुआ है) भरने के लिए जब मैंने अपनी रसोई का नल खोला तो उस समय नल में पानी ही नहीं आ रहा था। घर में पानी का ना होना मेरे मन को विचलित कर गया कि अब क्या होगा। लंदन(या तथाकथित विकसित देशों) में रहने का और कोई फाय...
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  January 15, 2014, 3:03 pm
एक दौर था जब बिना फोन के भी जीवन बहुत ही सुखमय तरीके से बीत रहा था। फिर धीरे-धीरे फोन आए तो पत्रों के माध्यम से मिलने वाले सुख का भी अंत हो गया, एक तरह से देखा जाये तो जहां एक और फोन ने दूरियाँ घटा दी वहीं दूसरी ओर आपसी मेल मिलाप को बहुत कम कर दिया। इसके बाद भी लोग कहीं न कहीं ...
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  January 11, 2014, 4:12 pm
कुछ दिनों पूर्व सोनी चेनल पर आने वाले धारावाहिक “मैं न भूलूँगी” का एक भाग देखा। सुना है यह नया धारावाहिक अभी-अभी शुरू हुआ है। मैंने इसके पहले इस धारावाहिक का अब तक का कोई एपिसोड नहीं देखा। लेकिन जो देखा उसने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया। उस दिन मैंने देखा नायिका सड़क पर ख...
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  January 4, 2014, 7:28 pm
आज के इस आधुनिक युग में फर्राटेदार अँग्रेजी बोलता बच्चा सभी को बहुत लुभाता है। विदेश में शिक्षा ग्रहण करना भारत में हमेशा से ही बड़े गर्व की बात समझी जाती रही है। अब भी ऐसा ही प्रभाव व्‍याप्‍त है। पहले केवल उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए ही बच्चों को विदेश भेजा जाता था,...
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  December 29, 2013, 5:46 pm
मैं उस रात की बात करती हूँ जब हमें भी यहाँ इस अद्भुत खेल को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस दिन मैंने पहली बार देखा वह माहौल जिसकी लोग बातें करते है। जिसके विषय में मैंने केवल सुन रखा था मगर देखा कभी नहीं था, इसलिए शायद जब वहाँ जाने का कार्यक्रम बना। तब मैं मन ह...
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  December 22, 2013, 6:46 pm
कभी-कभी सब चीजों को देखते हुए मुझे ऐसा लगता हैं कि उनके प्रति उत्‍पन्‍न होने वाले अनुभव सभी के एक जैसे ही होते हैं। बस इन्‍हें देखने का सभी का नज़रिया अलग-अलग हो जाता है। क्यूंकि सभी मनुष्यों को एक सा ही तो बनाया है विधाता ने। सबके पास सब कुछ एक सा ही तो है।एक सा चेह...
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  December 15, 2013, 12:01 am
कुछ ऐसा है हमारी भाबो का पुराना मोहल्ला ।मंदिरों में मंत्र उच्चारण और भजन कीर्तन से पूरे मोहल्ले का वातावरण बहुत ही शालीन महसूस हो रहा है। लोग मंदिरों में अपनी-अपनी पूजा की थाली के साथ आ रहे हैं। मोहल्ले की सभी बुज़ुर्ग महिलाएं अपनी-अपनी पूजा की टोकरी से रूई निकाल कर बा...
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  December 8, 2013, 2:39 pm

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