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Blog: दिल का दर्पण

Blogger: mohinder
साईं जी मै तेरी पतंग, सतगुरु मैं तेरी पतंग, हवा विच उडदी जावांगी, हवा विच उडदी जावांगी। साईंया डोर हाथों छोड़ी ना, मैं कट्टी जावांगी॥ बड़ी मुश्किल दे नाल मिलेय मेनू तेरा दवारा है। मेनू इको तेरा आसरा नाले तेरा ही सहारा है। हुन तेरे ही भरोसे, हवा विच उडदी जावांगी, साईंया डो... Read more
clicks 133 View   Vote 0 Like   10:36am 17 Oct 2014 #
Blogger: mohinder
मिटाना चाहते हो तो मिटा भी दो मुझकोकोई तो सिला मेरी मुहब्बत का दो मुझको मेरी हस्ती है सिर्फ और सिर्फ तेरी खातिर  जहाँ अँधेरा हो तेरी राहोँ मेँ जला लो मुझको कतरा कतरा मुहब्बत का समेटा था दिल मेँ  चाहो तुम तो इस समन्दर मेँ बहा दो मुझको करीब सबसे है तेरा मुकाम मेरे इस दिल ... Read more
clicks 149 View   Vote 0 Like   11:55am 14 Oct 2014 #
Blogger: mohinder
साँसोँ के जाल तोड कर चल देना है एक दिन किस लिये नफरतेँ दिल मेँ कैद कर के बैठे हो --------------------------------------------- नजर मेँ वक्त के साथ धुन्धलके पड जाते हैँ ये नजारे मगरदिल की दुनिया मेँ यादोँ के सितारे हमेशा चमकते रहते हैँ ----------------------------------------------------------- तेरी बेरुखी की वजह की तलाश मेँ हूँ जो न मि... Read more
clicks 130 View   Vote 0 Like   11:53am 14 Oct 2014 #
Blogger: mohinder
चू रहा था पसीना और पँखा वह झल रहा था उन जग रही आँखोँ मेँ स्वप्न कोई पल रहा था  हिलती न थी शाख कोई पेडोँ की कतारोँ मेँ मगर एक तेज अँधड सा कोई भीतर उसके चल रहा था अनाज के कोटर थे खाली और खाली पानी के घडे मजबूरियोँ की ओखली मेँ अरमान अपने दल रहा था तर्क सँगत है ऐसे मेँ कि... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   7:23am 1 Aug 2014 #
Blogger: mohinder
हर तरफ बिखरी है तेरी खुश्बू   मगर यह तो बता कहाँ है तू यक वयक गर आ गये सामने दिल पर रहेगा किस तरह काबू वहशतेँ मेरी हद से बढने लगी ज्यूँ ज्यूँ बढती गई यह आरजू किस्सा बादलोँ पर हो जैसे लिखा अँजाम बन कर बरसेँ न ये आँसू तेरी यादोँ से घिरा होता हूँ तब जब कोई नही होता आजू बा... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   9:28am 25 Mar 2014 #
Blogger: mohinder
वंदना जी की एक कविता से प्रेरित रचना  ओस में भीगी औरत पूर्ण औरत नहीं होती धवल चपल नवयौवना की तरुणाई औस की बूंदों को यौवन के ताप से वाष्पित कर एक कोहरे की चादर तान देती है जिसमें अलसाया यौवन सावन की फ़ुहारों को तरसता किसी मनचाही छुवन को प्रतीक्षारत अंधेरों से निकल र... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   6:20am 19 Mar 2014 #
Blogger: mohinder
यूँ कौन मैँ इस दुनिया मेँ खास हूँ किसको है फिक्र गर मैँ  उदास हूँ चिंदी-चिंदी जिंदगी मैँ ऐसे जीता हूँ खुद ही हूँ बदन खुद ही लिबास हूँ ना काबिले जिक्र, ना कोई यकीन हूँ मैँ सिर्फ इक वह्म,  इक क्यास हूँ क्या कहूँ कि मैँ क्या हूँ व कौन हूँ ना नशे मेँ हूँ, ना सरापा सियास हूँ ... Read more
clicks 101 View   Vote 0 Like   10:24am 18 Mar 2014 #
Blogger: mohinder
ऐ दिल ख्वाबोँ की बस्ती से निकल चल तो अच्छा हो ये वो रँग हैँ बिगाड देँगे जिंदगी की तस्वीर जो तेरी ले समझ उस क्षितिज से आगे है और भी दुनिया सरकती जाती है सीमायेँ और राहेँ साथ चलती हैँ हर सजग राही के बन चेरी  है दुख हार का अच्छा न जश्न किसी जीत का बेहतर हवाओँ के रुख ... Read more
clicks 111 View   Vote 0 Like   9:09am 21 Feb 2014 #
Blogger: mohinder
बहुत सी चाहतेँ हैँ इस दिल मेँ सोई हुई   रूई सी नर्म और शबनम मेँ भिगोई हुई   कुछ दर्द जिंदा हैँ मेरे अपने ही पाले हुए कुछ ख्वाहिशेँ हैँ उनकी खातिर बोई हुई रात आसमाँ मेँ जरा से भी बादल न हुए फिर भी लगती है सारी कायनात रोई हुई शायद था कोई तुफान दिल मेँ समेटे हुए लगती है क... Read more
clicks 97 View   Vote 0 Like   6:32am 21 Jan 2014 #
Blogger: mohinder
क्या खबर थी इस तरह  दगा देगा मुझे पा कर अपनी मँजिलेँ वो भुला देगा मुझे मैँ उसके लिये रास्ते का दीपक भर रहा अँधेरोँ के गुजरते ही वो बुझा देगा मुझे तोड डाला उसी ने मेरी उम्मीदोँ का भ्रम सोचा जो वक्ते मुसीबत हौँसला देगा मुझे मेरे हर जख्म का रिश्ता है उस शक्स से दर्द दे... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   8:23am 20 Jan 2014 #
Blogger: mohinder
प्रीत नहीँ पर सिँगार अनूठे देहोँ के यह हैँ बाजार अनूठे अंधकार है जहाँ सारा जीवन खोजेँ वहाँ जीवन सँचार अनूठे जीवन हीन हैँ व्यथित यहाँ पर भावना शून्य हैँ पथिक यहाँ पर लाशेँ मोल भाव करेँ स्वँय का इन गलियोँ के व्यापार अनूठे बीज किसी का पौध किसी की लहू किसी का धौँस क... Read more
clicks 77 View   Vote 0 Like   11:03am 6 Jan 2014 #
Blogger: mohinder
अपने बच्चोँ मेँ तो हम सब की जान बसती है नजर क्योँ नहीँ आता फिर कोई खाली पालना हमको तस्वीर दुनिया की भला ऐसे क्यूँ कर बदलेगी गरीबी पर तरस खा आता सिर्फ इक रोटी भर डालना हमको हमारी नीँद गहरी है कि उनके स्वप्न हैँ कच्चे ना जाने क्योँ नहीँ आता गिरते को सहारा दे सम्भाल... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   6:59am 2 Jan 2014 #
Blogger: mohinder
साथ गुजारे लम्हात भी नही सताते उसको वक्ते फ़ुर्सत भी हम याद नहीं आते उसको सरेशाम कांधे पर सर रख जो किया वादा खुदा जाने क्यों आज नही निभाते उसको कभी मेरी बातों पर बिखेरते थे अपनी हंसी अब मेरे लफ़्ज किसी तरह न लुभाते उसको आसमां को छत होते देखना चाहा था जिसने टूटते तारे न जा... Read more
clicks 86 View   Vote 0 Like   10:33am 27 Dec 2013 #
Blogger: mohinder
रूप रंग व श्रृंगार न होता रूठन व मनुहार न होता तो हम भी बैरागी हो गये होते चातक की प्यास न होती मिलने की आस न होती तो हम भी बैरागी हो गये होते प्रीत के ये प्रसंग न होते रिश्तो के अनुबन्ध न होते तो हम भी बैरागी हो गये होते फ़ूलों में रंग न होते सपनों के पंख न होते तो हम ... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   8:57am 23 Dec 2013 #
Blogger: mohinder
ख्वाब चुभते हैं आंखों में मेरी क्या करूंगा मैं चैन से सो कर दिल में पाला था इक जज्वा पड गया पीछे वो हाथ धो कर इन लबों को तब्बसुम है भाता सिर्फ़ आहें भरोगे मेरे हो कर नसीब में अपने सिर्फ़ कांटे हैं देख लिया है फ़ूल भी बो कर यह दर्द थमेगा लाईलाज हो कर मिलेगा चैन मुझे सब खो कर म... Read more
clicks 115 View   Vote 0 Like   9:19am 9 Sep 2013 #
Blogger: mohinder
प्यार की राह में हमने चाहतें बिछाईं और तुमने शतरंज की बिसात उसके बाद जीत कर भी तुम खुश नहीं हुये कल तलक गलत फ़हमी तुम्हारे साथ थी आज पछतावा है न तुम मेरा बीता कल लौटा पाओगे न तुम किसी का आज बन पाओगे दूसरों को कसौटी पर परखते परखते तुम स्वंय खोटे साबित हो गये हो और खोटे सिक्... Read more
clicks 108 View   Vote 0 Like   10:59am 19 Aug 2013 #
Blogger: mohinder
न रस्मो-रिवाज न बाजार की बातें कीजे हैं फ़ुर्सत में तो बस प्यार की बातें कीजे वक्त रुकता नहीं किसी  मानो-मिन्नत से ये गुजर जायेगा न टकरार की बातें कीजे बात छोटी है फ़ायदा क्या इसे बढाने से चिलमन से निकल दीदार की बातें कीजे बोझ बढता है दिल की दिल में छुपाने से आज मौका है ... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   5:24am 14 Aug 2013 #
Blogger: mohinder
आज तक सींचते रहे अपने प्यार के अमृत से मुझ निर्जीव ठूंठ को तुम और जब कौंपले अंकुरित हुई हैं तब छोड कर जाने लगे हो कैसे रोकूं मैं तुम्हें है नहीं तुम पर कुछ अधिकार विषेश मेरा परन्तु जाते जाते यह भी सुन लो मुर्झा जायेंगी कौंपले सब जो तुम्हारे स्पर्ष से पल्ल्वित हुई केव... Read more
clicks 105 View   Vote 0 Like   10:09am 28 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
इस कविता में लडकियों को ’बेल’ और लडकों को ’मोढा’ शब्द से सम्बोधित किया गया है. ’मोढा’ एक प्रादेशिक शब्द है जिसका अर्थ होता है कोई आवलम्बन या सहारा जो बेल को विकसित करने के लिये उसके पास गाड दिया जाता है ताकि बेल उस पर चढ कर पनप सके. इसी सामाजिक कुन्द सोच पर प्रहार करती है ... Read more
clicks 86 View   Vote 0 Like   5:10am 18 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
बचपन में जो पढा दो और दो चार एक और एक ग्यारह वह तर्क संगत था परन्तु जीवन में जब वही एक और एक अपने तर्को की सीढी चढ अपना प्रभुत्व जताते हैं कंधे से कंधा मिला चलने वाले हर बात में अपनी टांग अडाते हैं तब विकास विघ्टन बन जाता है घर की चूलें तक हिल जाती हैं द्वार में पडी दरा... Read more
clicks 94 View   Vote 0 Like   7:45am 8 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
ये परिन्दे खुले आसमानों के शाख से कब दिल लगाते हैं सफ़र की थकन दूरे होते ही फ़िर हवाओं में लौट जाते हैं फ़ूल पत्तों से शान गुलशन की घने हरे पेड जान गुलशन की सच फ़िर भी यही सब जाने हैं तिनके घौंसलों में काम आते हैं खिलते फ़ूलों पर है नजर सबकी भंवरे तितली उन पर मंडराते हैं मगर उन... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   7:41am 8 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
अन्जान सफ़र का था वो राही कौन सी मंजिल थी उसने चाही ये कौन सुझाये कहां से लाये वो कसक वो बैचेनी वो लाचारी या वो आवारापन जो उसकी आदत से हो बाबस्ता उसे रुकने नहीं देता उसे बैठने नहीं देता उसे कहने नहीं देता क्या है उसके मन की गहराई में किसकी तलाश है उसे अमराई में और फ़िर ... Read more
clicks 68 View   Vote 0 Like   7:32am 8 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
किसके बस में है इस धरा पर अवतरण चयनियत नहीं होते कुल,  जाति या वर्ण भाग्य से मिलते या कहो बंदर बांट से आये नहीं हो उच्च कुल में तुम छांट के क्यूं किसी को हेय बना कर हो लीकते लांछणा के शब्द किसी पर हो पीकते नाम ही काफ़ी है पहचान के प्रयाय से उपनाम उपजे न जाने किस अध्याय से ह... Read more
clicks 107 View   Vote 0 Like   7:27am 8 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
लेटे लेटे जब भी निगाह जाती है सामने सीलन से बदरंग हुई दीवार पर हर एक धब्बे से अलग अलग चेहरे उभरते हैं ऐसा लगता है जैसे मेरा जह्न ही एक पोस्टर बन कर दीवार पर टंगा है इसी खातिर इस दीवार को रंगवाता नहीं मैं नहीं चाहता कि मेरा जह्न रंगीन कफ़न ओढ सारे चेहरे निगल जाये और फ़िर दे... Read more
clicks 94 View   Vote 0 Like   11:42am 5 Jul 2013 #
Blogger: mohinder
तुम्हारा दिया वह फ़ूल आज भी सुरक्षित है वर्षों से जीवाश्म की भांति पुस्तक के मध्य दबा वो चटक रंग नहीं रहे गंध भी उड सी गई है परन्तु जब भी पुस्तक खुलती है वो फ़ूल नजर आता है यादों की वयार बहती है तुम्हारे संग गुजरे वो पल छिन फ़िर से एक बार जीता हूं उपवन व मरू में बिचरता मु... Read more
clicks 121 View   Vote 0 Like   7:39am 3 Jul 2013 #

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