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यात्रा एक मन की

*They know what you want ,Tell all that you cann't,Time goes on ,but they remain .Their richness rewards ,Their wisdom guards ,They would leave you never alone .The most trusted friends ,Whose help never ends ,Without them 's life lone and lame .So simple ,though looks ,But wonderful books ,All past and future contain .Just know and acknowledge ,Their ever growing knowledge ,Your heart and mind would gain .If cann't catch sense ,Need not being tense ,Go through with all might and main . -- Pratibha....
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  January 6, 2011, 10:17 am
   (from Old Poems) *For we could know & face the truth,O, teacher, gave you that insight.You taught not only read &write,But how to work at book of life.Lost child on sea shore,you got hold ,And made worth while human life.Whenever in fix I think of you,Your words always provide some clue,As guide, you shade me all my way,And how to separate wrong &and right. Unbound the chains & opened door ,To find the treasure of world lore ,Crops, ever more once you sowed the seeds,I owe you wisdom love & light.For we could know & face the truth,O, teacher, gave you that insight.*-- Pratibha Saksena...
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  January 6, 2011, 8:01 am
*Dhritrashtra can't see ,and weapons are free ,The ideals impotent ,barbarians free . *Where logic is sin ,all new thoughts crime ,Many thousand years thrown  in dust bin ,Where womanhood is crushed with only disdain ,Are those human ,are they really sane ?Where malice to lead , good faith to bury ,When ethics powerless , what then to decree ?,*They suppose they are merited ,all else sinners ,Only their accordance decides and adhers .Imprisioned humanity , and throwing away keys ,They are growing on crops and crops of zombies .And Dhritrashtra can''t see the hatred is free ,He inquires, accuses ,waiting further more to be.*He  only observes and condemns what''s done .Only avoi...
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  January 6, 2011, 12:18 am
*You can feel fragrance of smiles ,she is child ,She is growing and glowing in hues so mild .A candle in mist ,a bliss for sight .Then makes a heaven of home ,her site .*And childhood jumps and clings to her lap.In womanhood childhood there's no gap.But time goes on ,she gains grey hair ,This part of nature ,though ,not fair .*Great grand ma nature,never gets old ,And this injustice never been told --Great great grand ma ever fresh n 'green ,And this grand mother never has been .*Comes childhood dancing around ,surrounds .Her content pleasure ,knows no bounds .She sings lull-a-by ,her grey hair dance She looks not grown up ,as if in trance .*She holds the age old magic -wand ,To take grandch...
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  January 4, 2011, 11:13 am
*भूत कभी मरता नहीं .जितना भागोगे ,घेरेगा .दौड़ना मत, भगाता चला जाएगा.दूर ,और दूर !तंत्र-मंत्र अभिचार , सब बेकार ,अपना मौका तलाशता हवाएँ सूँघ लेता है .*अकेली ,कुछ कमज़ोर , शिथिल-सी मनस्थिति देखअनायास छाया सा घिर ,तन-मन आविष्ट-अवसन्न कर छोड़ देता है किसी अगाध में .*जितना भागोगे ,घ...
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Tag :अभिचार
  December 27, 2010, 9:54 am
अनलिखा वह पत्र मन ने पढ़ लिया होगा !*मुखर हो पाई न चाहे कामना तो थी ,सत्य हो पाई न हो , संभावना तो थी ,बहुत गहरे उतर अंतर थाह लेता जोरह गई अभिव्यक्ति बिन पर भावना तो थी,उड़ा डाला आँधियों ने और तो सब कुछ ,किन्तु भारी-पन यथावत् धर दिया होगा *कुछ न मिटता, रूप बस थोड़ा बदल जाता ,स्व...
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  December 3, 2010, 2:35 am
*भौतिकता और चेतना के दो घटवाली जीवन-काँवर ,लेकर आता है जीव ,श्वास की त्रिगुण डोर में अटका कर ,*हर बार नये ही निर्धारण ,काँवरिये की यात्रा के पथचक्रिल राहों पर भरमाता देता फिर बरस-बरस भाँवर .*घट में धारण कर लिया आस्था-विश्वासों का संचित जल अर्पित कर महाकाल को फिर, चल देता अपन...
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  November 2, 2010, 10:02 am
मत रोओ शकुन्तला ,मत रो बहिन . वे निकल गए आगे थोड़ी देर बाद चलेंगे हम .*जाना अकेले है ,आए भी थे अकेले ,इस बीच देखे कितने मेले ,कुछ गुज़र गया .कुछ चल रहा है बीत जाएगा यह भी. न तुम दे सकोगी साथ मेरा न मैं तुम्हाराअगर चाहें भी तो *उनके साथ थीं तुम मैने भी अनुभव किया था उन्हें ,इस दूरी ...
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  October 7, 2010, 10:47 pm
* ईषत् श्यामवर्णी,उदित हुईं तुम दिव्यता से ओत-प्रोत अतीन्द्रिय विभा से दीप्त मेरे आगे प्रत्यक्ष . मैं ,अनिमिष-अभिभूत- दृष्टि की स्निग्ध किरणों से अभिमंत्रित, आविष्ट .कानों में मृदु-स्वर- 'क्या माँगती है, बोल ?' * द्विधाकुल हो उठा मन - पल-पल बदलती दुनिया और चलती फिरती इच्छाएँ ...
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  September 27, 2010, 10:07 am
*धरती तल में उगी  घास यों ही अनायास ,पलती रही धरती के क्रोड़ में,मटीले आँचल में .हाथ-पाँव फैलाती आसपास .मौसमी फूल नहीं हूँकि,यत्न से रोपी  जाऊँ ,पोसी जाऊँ!*हर तरह से, रोकना चाहा ,.कि हट जाऊँ मैं,धरती माँ का आँचल पाट कर  ईंटों सेकि कहीं जगह न पाऊँ .पर कौन रोक पाया मुझे?जहाँ ज...
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  September 4, 2010, 10:52 am
*कुछ पहचाने कुछ ,अनजाने दृष्य देख मन भरमा जाता,एक पहेली पसरी लगती  ,अपना देश याद आता है !*कहाँ  गए सारे टेसू- वन ,कैसे सूखी वे सरिताएँ १ उजड़ा जीवन जीती होंगी साँसें, जैसे हों विधवाएँजिनका तन-मन-जीवन सींचा ,तूने किया नेह से पोषितमेरे देश ,शप्त-सा तू अपनी ही संतानों से शो...
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  August 19, 2010, 2:21 am
*डाल पर दो फूल खिलते साथ ही जो टूटने के बाद उनके हो गए जब स्थान दो ,जिनमें नहीं समता कहीं भी. क्या परस्पर वहाँ कुछ भी शेष रह जाती न ममता ,सूख जाते स्नेह के सब स्रोत? क्या सभी संबंध उनके टूट जाते हैं इसी से?*...
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  August 10, 2010, 8:39 am
उठो भैरव ,मैं तुम्हारी भैरवी हूँ !*यह जगत जो कर्म का पर्याय होता ,और जो कि प्रबुद्ध जीवन-मर्म का समवाय होता ,रह गया बस कुमति की औ'दानवों की विकट लीला ,औ त्रिशूली, भूधरों को कर विखंडित .इस धरा की साँस को नव वायु देनेउतर आओ धरा पर मैं टेरती हूँ !*ये बिके-से लोग ,कैसे साथ देंगे ?अकर...
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  July 30, 2010, 6:04 am
समग्र शान्ति के लिए हिमालया पुकारता !कि जीव मात्र के लिए धरा कुटुम्ब ही रहे ,वनों,समुद्र पर्वतों में शंख-ध्वनि गुँजारता .*अलग न भूमि खंड ये ,अखंड है वसुन्धरा ,हृदय विशाल हो मिलन समान मित्र-भाव का ,न स्वार्थ साधना ,न हो प्रवंचना ,विडंबना ,मिलो तो प्यार से मिलो ,समुद्र मार्ग द...
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  July 17, 2010, 11:24 am
*वह प्रथम छंद,बह चला उमड़ कर अनायास सब तोड़ बंध, ऋषि के स्वर में वह वह लोक-जगत का आदि छंद ! *जब तपोथली में जन-जीवन से उदासीन, करुणाकुल वाणी अनायास हो उठी मुखर क्रौंची की दारुण -व्यथा द्रवित आकुल कवि-मनकी संवेदना अनादि-स्वरों में गई बिखर .*अंतर में कैसी पीर ,अशान्ति और विचलन ऐस...
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  July 1, 2010, 10:05 am
* किस किरातिन ने लगा दी आग ,धू-धू जल उठा वन !रवि किरण जिसका सरस तल छू न पाई युगों तक पोषित धरित्री ने किया जिनको लगन से !पार करते उन सघन हरियालियों को प्रखर सूरज किरण अपनी तीव्रता खो ,हो उठे मृदु श्याम वर्णी ,ओढे है अँगारे !जल रही है घास-दूर्वायें कि जिनको तुहिन कण ले सींचते स...
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  June 15, 2010, 5:52 am
*यवनिकाओं खिंचे रहस्यलोक में ढल रहीं अजानी आकृतिकी निरंतर उठा-पटक ,जीवन खींचताविकसता अंकुर कितनी भूमिकाओं का निर्वाह एक साथ नए जन्म की पूर्व-पीठिका .*कितने विषम होते हैं जन्म के क्षणरक्त और स्वेद की कीचदुसह वेदना ,धरती फोड़ बाहर आने को आकुल अंकुर और फूटने की पीड़ा से व...
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  May 12, 2010, 11:03 am
*मेरे लिए कहीं निवृत्ति है बार-बार बिखरता है जो सपनाकहीं घर है मेरा अपना ?कुछ छूट पाने का अवसर है याअपेक्षाएँ पूरी किए जाना यही नियति है ?सब कुछ निभाए जाना क्या सहज प्रकृति है ?कुछ चाहना ,या जीवन को अपनी तरह थाहना ,गुनाह है मेरा ?कहाँ मुक्ति है ,वानप्रस्थ या सन्यास ,मुझे क्य...
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  May 7, 2010, 3:37 am
ओ रे, सावन इस बार जरा जल्दी आना !*आ रही याद जाने कितनी उस आँगन की ,क्या पता कहीं कुछ शेष रह गई हो डोरी .अब नए रंग में रँगे हुए अपने घर की ,उन कमरों की जिनमें अबाध गति थी मेरी ,अपनी आँखों से एक बार जाकर देखूँ अनुमानों से संभव न रहा अब बहलाना !*शायद कोई भूले-भटके ही आजाए आपा-धापी मे...
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  May 3, 2010, 9:43 am
*हम आज बिदाई कैसे दें ,क्या कहें तुम्हें ,मन में जो है वे बोल न मुख पर आते हैं ,हैं शब्द बड़े लाचार आज ये समझ लिया उमड़े बादल बिन बरसे भी रह जाते है .ओ,मीत ,ज़िन्दगी की ये राहें ऐसी हैं,कोई चाहे भी तो रुकता है कौन यहाँ ,हम आज यहाँ जिस कोलाहल के बीच खड़े ,कल सूना होगा और चतुर्दिक् ...
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  April 26, 2010, 2:25 am
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