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'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का मंथन

रघुवर तुमको मेरी लाज । सदा सदा मैं शरण तिहारी, तुम हो ग़रीब निवाज ॥ पतित उधारन विरद तिहारो, श्रवन न सुनी आवाज । हूँ तो पतित पुरातन कहिये, पार उतारो जहाज ॥१॥ अघ खण्डन दुख भंजन जन के, यही तिहारो काज । तुलसीदास पर किरपा कीजे, भक्ति दान देहु आज॥२॥  – गोस्वामी  तुलसीदास स्वर: -...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :अनकही
  January 18, 2013, 3:10 am
दिनकर जी की कविता 'समर शेष है' की पंक्तियाँ आज के सन्दर्भ में जब अन्ना और उनके साथ पूरा भारत एक भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में जुटा हुआ है .. इन पंक्तियों को आज के परिपेक्ष में समझिये, दिनकर जी ने आजादी के सात साल बाद ही भ्रष्टाचार से त्रस्त हो कर ये कविता लिखी थी, आज भी व...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :रामधारी सिंह 'दिनकर'
  August 7, 2011, 12:53 am
दिनकर जी की कविता 'समर शेष है' की पंक्तियाँ आज के सन्दर्भ में जब अन्ना और उनके साथ पूरा भारत एक भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में जुटा हुआ है .. इन पंक्तियों को आज के परिपेक्ष में समझिये, दिनकर जी ने आजादी के सात साल बाद ही भ्रष्टाचार से त्रस्त हो कर ये कविता लिखी थी, आज भी व...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Ramdhari Singh 'Dinkar'
  August 7, 2011, 12:53 am
इन्हीं तृण-फूस-छप्पर सेढंके ढुलमुल गँवारूझोंपड़ों में ही हमारा देश बसता हैइन्हीं के ढोल-मादल-बाँसुरी केउमगते सुर मेंहमारी साधना का रस बरसता हैइन्हीं के मर्म को अनजानशहरों की ढँकी लोलुपविषैली वासना का साँप डँसता हैइन्हीं में लहरती अल्हड़अयानी संस्कृति की दुर्दशा ...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Sachchidanand Vatsyayan 'Agyeya'
  February 27, 2011, 7:03 pm
इन्हीं तृण-फूस-छप्पर सेढंके ढुलमुल गँवारूझोंपड़ों में ही हमारा देश बसता हैइन्हीं के ढोल-मादल-बाँसुरी केउमगते सुर मेंहमारी साधना का रस बरसता हैइन्हीं के मर्म को अनजानशहरों की ढँकी लोलुपविषैली वासना का साँप डँसता हैइन्हीं में लहरती अल्हड़अयानी संस्कृति की दुर्दशा ...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
  February 27, 2011, 7:03 pm
साँप !तुम सभ्य तो हुए नहींनगर में बसनाभी तुम्हें नहीं आया।एक बात पूछूँ .. (उत्तर दोगे?)तब कैसे सीखा डँसना?        विष कहाँ पाया?       – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Sachchidanand Vatsyayan 'Agyeya'
  February 11, 2011, 9:33 am
साँप !तुम सभ्य तो हुए नहींनगर में बसनाभी तुम्हें नहीं आया।एक बात पूछूँ .. (उत्तर दोगे?)तब कैसे सीखा डँसना?        विष कहाँ पाया?       – सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
  February 11, 2011, 9:33 am
अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैंखो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सकादेखा जग ने टोपी बदलीतो मन बदला, महिमा बदलीपर ध्वजा बदलने से न यहाँमन-मंदिर की प्रतिमा बदलीमेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोईधो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न स...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :गोपाल सिंह 'नेपाली'
  February 5, 2011, 7:24 pm
अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैंखो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सकादेखा जग ने टोपी बदलीतो मन बदला, महिमा बदलीपर ध्वजा बदलने से न यहाँमन-मंदिर की प्रतिमा बदलीमेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोईधो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न स...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Gopal Singh 'Nepali'
  February 5, 2011, 7:24 pm
जग-जीवन में जो चिर महान,सौंदर्य-पूर्ण औ सत्‍य-प्राण,मैं उसका प्रेमी बनूँ, नाथ!जिसमें मानव-हित हो समान!जिससे जीवन में मिले शक्ति,छूटें भय, संशय, अंध-भक्ति;मैं वह प्रकाश बन सकूँ, नाथ!मिट जावें जिसमें अखिल व्‍यक्ति!दिशि-दिशि में प्रेम-प्रभा प्रसार,हर भेद-भाव का अंधकार,मैं खो...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Yugant
  January 29, 2011, 11:07 pm
खूनी हस्‍ताक्षरवह खून कहो किस मतलब काजिसमें उबाल का नाम नहीं।वह खून कहो किस मतलब काआ सके देश के काम नहीं।वह खून कहो किस मतलब काजिसमें जीवन, न रवानी है!जो परवश होकर बहता है,वह खून नहीं, पानी है!उस दिन लोगों ने सही-सहीखून की कीमत पहचानी थी।जिस दिन सुभाष ने बर्मा मेंमॉंगी उ...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :गोपालप्रसाद व्यास
  January 23, 2011, 1:40 pm
दीप मेरे जल अकम्पित,घुल अचंचल!सिन्धु का उच्छवास घन है,तड़ित, तम का विकल मन है,भीति क्या नभ है व्यथा काआंसुओं से सिक्त अंचल!स्वर-प्रकम्पित कर दिशायें,मीड़, सब भू की शिरायें,गा रहे आंधी-प्रलयतेरे लिये ही आज मंगलमोह क्या निशि के वरों का,शलभ के झुलसे परों कासाथ अक्षय ज्वाल क...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :महादेवी वर्मा
  January 15, 2011, 1:05 pm
पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्ट पोस्...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :जयप्रकाश नारायण
  December 30, 2010, 7:30 pm
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या हैतुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या हैन शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदाकोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या हैये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसेवरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या हैचिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहनहमारी ज़ेब क...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :मिर्ज़ा असदुल्लाह खान 'ग़ालिब'
  December 28, 2010, 12:04 am
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या हैतुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या हैन शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदाकोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या हैये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसेवरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या हैचिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहनहमारी ज़ेब क...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :'ग़ालिब'
  December 28, 2010, 12:04 am
भाग – ५जिनकी भुजाओं की शिराएँ फड़की ही नहीं,जिनके लहू में नहीं वेग है अनल का;शिव का पदोदक ही पेय जिनका है रहा,चक्खा ही जिन्होनें नहीं स्वाद हलाहल का;जिनके हृदय में कभी आग सुलगी ही नहीं,ठेस लगते ही अहंकार नहीं छलका;जिनको सहारा नहीं भुज के प्रताप का है,बैठते भरोसा किए वे ही...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :रामधारी सिंह 'दिनकर'
  December 27, 2010, 10:44 pm
भाग – ५जिनकी भुजाओं की शिराएँ फड़की ही नहीं,जिनके लहू में नहीं वेग है अनल का;शिव का पदोदक ही पेय जिनका है रहा,चक्खा ही जिन्होनें नहीं स्वाद हलाहल का;जिनके हृदय में कभी आग सुलगी ही नहीं,ठेस लगते ही अहंकार नहीं छलका;जिनको सहारा नहीं भुज के प्रताप का है,बैठते भरोसा किए वे ही...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Ramdhari Singh 'Dinkar'
  December 27, 2010, 10:44 pm
भाग – ३न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है जब तक न्याय न आता,जैसा भी हो महल शान्ति का सुदृढ़ नहीं रह पाता।कृत्रिम शान्ति सशंक आप अपने से ही डरती है,खड्ग छोड़ विश्वास किसी का कभी नहीं करती है|और जिन्हें इस शान्ति-व्यवस्था में सुख-भोग सुलभ है,उनके लिये शान्ति ही जीवन - सार, सिद्...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :रामधारी सिंह 'दिनकर'
  December 7, 2010, 3:27 pm
भाग – ३न्याय शान्ति का प्रथम न्यास है जब तक न्याय न आता,जैसा भी हो महल शान्ति का सुदृढ़ नहीं रह पाता।कृत्रिम शान्ति सशंक आप अपने से ही डरती है,खड्ग छोड़ विश्वास किसी का कभी नहीं करती है|और जिन्हें इस शान्ति-व्यवस्था में सुख-भोग सुलभ है,उनके लिये शान्ति ही जीवन - सार, सिद्...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Ramdhari Singh 'Dinkar'
  December 7, 2010, 3:27 pm
भाग – १समर निंद्य है धर्मराज, पर, कहो, शान्ति वह क्या है,जो अनीति पर स्थित होकर भी बनी हुई सरला है?सुख-समृद्धि का विपुल कोष संचित कर कल, बल, छल से,किसी क्षुधित का ग्रास छीन, धन लूट किसी निर्बल से।सब समेट, प्रहरी बिठला कर कहती कुछ मत बोलो,शान्ति-सुधा बह रही न इसमें गरल क्रान्त...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :रामधारी सिंह 'दिनकर'
  December 3, 2010, 4:47 pm
भाग – १समर निंद्य है धर्मराज, पर, कहो, शान्ति वह क्या है,जो अनीति पर स्थित होकर भी बनी हुई सरला है?सुख-समृद्धि का विपुल कोष संचित कर कल, बल, छल से,किसी क्षुधित का ग्रास छीन, धन लूट किसी निर्बल से।सब समेट, प्रहरी बिठला कर कहती कुछ मत बोलो,शान्ति-सुधा बह रही न इसमें गरल क्रान्त...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Ramdhari Singh 'Dinkar'
  December 3, 2010, 4:47 pm
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;और लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।आदमी ...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Ramdhari Singh 'Dinkar'
  December 2, 2010, 12:04 pm
रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;और लाखों बार तुझ-से पागलों को भीचाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।आदमी ...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :सामधेनी
  December 2, 2010, 12:04 pm
धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।चढ़ती जवानिय...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :Ramdhari Singh 'Dinkar'
  November 28, 2010, 10:57 am
धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।चढ़ती जवानिय...
'भाव-तरंगिनी' - कुछ बिसरे कलम का ...
Tag :सामधेनी
  November 28, 2010, 10:57 am
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