| पुनः सम्पादित एवं प्रकाशित _______________ मेरेजहाँकीहदसेकुछदूरएकछोटासा जहांऔरभीहैमेरेमकांसेआगेकुछदूरमिलतेजुलतेसे मकां औरभीहैंवोदिखतेतो हैंकरीबमगरपहुंचना उनतकबहुत मुश्किलहैएकखाईहैदिलोंकीगहरीगुज़रना जिससेबहुत मुश्किलहैतहकोपानाउसकीनामुमकिनभराहैकितन... |
| मुट्ठियों में जाने क्या दर्द कस रहा हैकुछ बोलता नहीं है आँखों से हंस रहा है हंसी के साथ बहती नमी छलक गयी कुछ मुस्कुराहटों में, कोशिश झलक गयी कुछउसकी वो मुस्कराहट चुगली सी कर थीकहने लगी जो कहते ज़बान डर रही थीहंसी की झिर्रियों से कुछ राज़ झाँक बैठे दिल की हाल कहने हमर... |
| बादल का अम्बर से बूँद बूँद रिश्ता हैबाती का दीपक से बूँद बूँद रिश्ता है पल भर के सुख को भी सांसें तरसती हैं खुशियों की झड़ीयाँ सदा झोली न भरती हैं सीपी का मोती से बूँद बूँद रिश्ता है मन की गहराई से भावों को खेना हैउनको कहाँ दुःख सुख से कुछ लेना देना हैनयनों का आंसू ... |
| सीने से जो लगाया वो वक्त जा रहा हैजिंदगी से रिस कर ये लख्त जा रहा है कुछ शक्लें मेरा रोज़ चेहरा टटोलती हैंजुबां तो बंद हैं पर नज़रें बोलती हैंआँखों से कह रही हैं कि वक्त जा रहा हैसीने से जो लगाया वो वक्त जा रहा है ऐसा नहीं है मैंने कोई कसर है छोड़ीमिन्नत से बाँधा उसको,... |
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January 16, 2013, 1:16 pm |
| पुनः सम्पादित एवं प्रकाशित ________________________कभी इन की दूरी कभी इनका मेलये जीवन सुना, है लकीरों का खेलये तकदीर बन हथेली पे चढ़ती शिकन बन कभी माथे पे जड़ती सरहदें बन के अपनों को पड़ोसी बनाएंलकीरें तो रोज़ नए गुल खिलायेंकभी चेहरे पे छा, आइनें में डराएँकलम वक्त की इन्हें जिस... |
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December 1, 2012, 4:16 pm |
| ज़मीं को सजदा करो आसमां मिल जाएगाख़ुद को ढूंढोगे अगर शायद ख़ुदा मिल जाएगाहाथ चाहे छूट जाएँ राहें गुम हों जाए सबदौर- ऐ-गर्दिश में मगर अपना पता मिल जाएगाबैठे बैठे बस दिखेंगे रेत के उड़ते निशाँ चलते क़दमों को कहीं तो कारवां मिल जाएगाकोशिशें करते हो इतनी घर दिलों में ... |
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October 16, 2012, 12:22 pm |
| कल की रात कोई आया थामुट्ठी में एक तोहफ़ा लाया थाचेहरे पर कुछ फूल खिले थेचाँद चमकता था माथे पेसाँसों में खुशबू संदल सीआँख में तारे भर लाया थाकल की रात कोई आया थामैं आँखों को मूँद पड़ा थावो मेरे सिरहाने खड़ा थाउसकी नज़रों की ठंडक कोअपनी पलकों पर पाया थाकल की रात कोई आ... |
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October 14, 2012, 5:13 pm |
| मेरे अन्दर काफी दिनों से भावनाओं और यादों की गुत्थम्गुत्थी हो रही है ।मेरे लिए समझना मुश्किल है की ये भावनाएं यादों का साइड इफ्फेक्ट है या यादें इन भावनाओं का आफ्टर इफ्फेक्ट हैं ।मैंने इन्हें रोकने की पुरज़ोर कोशिश पुरानी फिल्मों की उन हीरोइनों की तरह कर रहा हूँ,... |
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September 27, 2012, 4:36 pm |
| आज फिर ख़ुद को बहलायापैबंदो में कमीज़ को पायाछत के छेदों से छिड़क कर तारेचाँद रोटी की जगह खायाआज फिर ख़ुद को बहलायानल गली का फिर रहा सूखाऔर बारिश ने भी दिया धोखाप्यास की लोरियां सुनते नींद आयी दर्द सब गिनतेगले के कांटे गिन नहीं पायाआज फिर ख़ुद को बहलायादेर स... |
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September 14, 2012, 9:52 am |
| ' Sardarji ke 12 baj gaye' . This caption suddenly caught my attention while scrolling down my Facebook page today. It was pasted on a photo which showed a Sardarji standing on a railway track, with a train in the background. The photo also contained a small paragraph narrating few details and sentiments about Sikhism , Sardarji jokes and the origin of the above mentioned famous sentence. In the comments section there were responses from all corners in the shape of views, praises, theories, counter theories, criticism and some counter criticism translating into nasty personal remarks.I went through the story and all the responses with a mixed bag of emotions. There was an occasion... |
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September 12, 2012, 6:44 pm |
| (1)ये जिस्म मेरा आखिर क्यों सामने पड़ा हैजल रहा सिरहानेदिया एक बड़ा है नाम मेरा लेकरक्यों सबको रुलातेमुझे क्यों न आवाज़देकर बुलातेभीड़ में ही खड़ा हूँ खोया नहीं हूँउठाओ मुझे कोईसोया नहीं हूँ(2)कहीं चाहतों केहैं कुछ जाम बाकीअभी तो बचे हैंकई काम बाकीइस जिस्म में आ... |
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September 6, 2012, 5:28 pm |
| मेरे सफ़र में इक साया हमेशा साथ चलता हैख़ुशी में कहकहे देता ग़मों में गुनगुनाता है संग में ठोकरें खाए गिरता है संभलता हैतपिश जितनी हो सूरज कीये मेरे साथ जलता हैकभी फिसला ये मेरे साथ मैं इसके संग कभी संभलामेरे कंधे पे रखे हाथ आगे बढ़ता रहता है मेरे सफ़र में इक स... |
Tag :'मेरे सफ़र में इक साया'
| मेरे साथ इक साया हमेशा चलता जाता हैखुशी में कहकहे देता ग़मों में गुनगुनाता है खाए ठोकरे संग मेंगिरता है संभलता है तपिश कितनी हो सूरज कीये मेरे साथ जलता हैमेरे कहने पे थम जाएमेरे चलने पे चलता हैमुझे रखकर उजाले मेंअंधेरा लेता जाता हैमेरे साथ इक साया हमेशा चलता ज... |
| मेरे ख़ामोश सीने में ये आवाज़ कैसी हैदिल के बंद दरवाज़े पे दस्तक तेरे जैसी हैदरारों से मेरे ज़ेहन में कबसे झांकता कोईजो चाहूँ देखना है कौन तो दिखता नहीं कोईएक अहसास है जिसकी झलक कुछ तेरे जैसी हैहवाएं भी क्यों रह रह कर मुझे हैरान करती हैं परेशां हूँ, मुझे वो और परे... |
| मेरे ख़ामोश दिल में ये आवाज़ कैसी हैज़ेहन के बंद दरवाज़े पे दस्तक तेरे जैसी हैदरारों से ख्यालों में, है कबसे झांकता कोईपुकारा था भी लेकिन सामने आता नहीं कोईएक अहसास है जिसकी झलक कुछ तेरे जैसी हैहवाएं बेवजह रह रह मुझे हैरान करती हैं परेशां हूँ, मुझे वो और परेशा... |
| पुनः संपादित एवं प्रकाशित _____________________अपार समुद्र का विस्तार कैसे जाना हो उस पार स्वयं को निर्बल अशक्त जानखड़े सोच रहे थे हनुमान"क्या ज्ञात नहीं है दाता को की खोजना सीता माता को न कोई तलैया फांदना है इस महा सागर को लांघना है न मैं देव न दानव हूँ न परम योग्य महामानव... |
| अपार समुद्र का विस्तार पहुंचू कैसे मैं उस पार खड़े सोच रहे थे हनुमान अपने को निर्बल अशक्त जान "क्या ज्ञात नहीं है दाता को की खोजना सीता माता को भरने सा नहीं किसी गागर को है लांघना महा सागर कोन मैं देव न दानव हूँ न परम योग्य महामानव हूँ जाना उड़ के उस पार वहाँ वा... |
| आसमां से एक तारा मेरी छत पर ताकता रहता है मेरी ओर अक्सरमुस्कुराए और शरारत से ज़रा हंसता भी है आँखों ही आँखों में मुझसे बात सब करता भी है मूंह चिढाये, बादलों में जा के छुप जाता कहीं छान लूं कितनी घटायें हाथ पर आता नहीं चुन्नटों से तब निकल बोले कि,लो मैं आ गयादेख के उ... |
| हाथ मेरातेरी जानिबबढ़ा है कब से, बनके नग़मातू धड़कन में जड़ा है कब से राख़ यादों कीतूने क्यों कुरेदी न कभी,बन के चिंगारीदीवानापड़ा है कब से कब से ..............- योगेश शर्मा ... |
| फूल में ख़ुशबू रंगों में असर बाकी हैबहार लुटने में थोड़ी सी कसर बाकी है दिल के दरवाज़े पे तुम कान लगाए रखना इसके रस्ते पे कोई रहगुज़र बाकी हैदौर- ए- गर्दिश ने बहुत उसको तोड़ा होगा तेरे फ़नकार में जुड़ने का हुनर बाकी है - योगेश शर्मा... |
| सितारों के आगे जहाँ है कहाँ परकोई तो कहो आस्मां है कहाँ परयहाँ इंसान देखे ज़माना है गुजरा क्यों परेशान हो के खुदा है कहाँ पर पसीने में सब धुल गयीं हैं लकीरें नसीबों का जाने निशाँ है कहाँ पर सच देखती थी सही बोलती थी कहाँ है वो आँखें, जुबां है कहाँ पर सहर से सुबह रा... |
| सितारों के आगे जहाँ है किधर कोई तो कहो आस्मां है किधर यहाँ इंसान देखे ज़माना है गुजरा क्यों परेशान हो के खुदा है किधर सच देखती थी सही बोलती थी कहाँ है वो आँखें, जुबां है किधर रात से सहर रास्ता पूछती है पूछूं मैं किसको, है मंजिल किधर पसीने में सब धुल गयीं हैं ... |
| बहुत दिनों से लब नहीं खोले नज़र में सब पयाम रखने लगा भूल बैठा हूँ सारी परवाज़ें खूद को मुटठी में थाम रखने लगान कोई शौक न कोई चाहत कोई सपना नहीं, यही राहत हसरतें सब नाक़ाम रखने लगाख़ुद से शिक्वे हैं ,गुज़री यादें हैंरूठे रिश्ते हैं टूटे वादें हैंबोझ दिल पे तम... |
| मेरे जहाँ की हद से कुछ दूर एक छोटा सा जहां और भी हैमेरे मकां से आगे कुछ दूर मिलते जुलते से मकां और भी हैं,वो दीखते तो हैं करीब मगर,उन तक पहुंचना बहुत मुश्किल है,एक खाई है दिलों की गहरी,जिस से गुज़रना बहुत मुश्किल है,इसकी तह तक पहुंचना नामुमकिन भरा उस में कितनी आँखों क... |
| सपने ही पाते हैं मंजिलकदम तो चलते रहते हैंसूरज तो चमके है हर पल दिन उगते ढलते रहते हैंजीवन सूना दर्पण होता जो न होते स्वपन ये सारेमन की कश्ती फिर भर जाए जाने कितने पार उतारेकब ढलते हैं स्वप्न भला ये ढलते हैं बस रात के साए जाता अंधियारा मुट्ठी में नन्हा उजियारा ... |
Tag :सपने ही पाते हैं मंजिल
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February 14, 2012, 12:24 pm |
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