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...प्राची के पार !

अपने को अपने सामने सामान्य सिद्ध करने को,दोस्तों से बात करते वक्त अनगिनत बार बोला 'भो...' और 'मा...' चुस्कियां लेते हुए... सिग्नेचर के दो थर्टी एम. एल.पैग लगाये ...वन फ़ॉर मेडिसन, टू फ़ॉर इंजॉयमेंट .पैंतीस पन्ने पढ़ चुकने के बादफ़िर उठाई 'मेटामॉरफोसिस'.स्खलित होते वक्त उस बदसूरत स...
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  June 13, 2012, 4:50 am
नहीं देखीं कई दिनों से तितलियाँ,पर सुना है अंधे भी प्रेम कर सकते हैं.अपने होने पर शर्म तो कभी महसूस नहीं हुई,क्यूंकि प्रकृति ने ही चुना था मेरे होने को.सृष्टि ने ही मुहर लगायी थी वर्तमान की मुझमें.किन्तु फिर भी...क्षमा प्रार्थी हूँ सारी सृष्टि से,अपने किये के लिए....एक छोट...
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  May 15, 2012, 3:13 pm
I thought that the creativity is something which is hindering my entire being... My ownness... But I was wrong. I may be wrong in the future that I am wrong... ...But as of Now what I beleive is that 'myself' is itself a expression... Commultaive expression, Cosmic expression... I can not get an answer of the question 'Who am I' untill... ...I create my self. So... Creating myself is being myself ! There was a revoulutionary thought (Not from the mind though) that by creativity only, I can find myself.... ...I agree that creativity can't be 100 % creative, and I agree that to be creative words are not required, not even colours or expression (Literature, Art and Dance/music etc.) and sometim...
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  May 13, 2012, 6:21 pm
मैंने देखी है वर्तमान इश्वर की सार्थकता,वो कम से कम,"यहाँ पेशाब करना मना है" या "नो स्पिटिंग" वाले जुमले से तो अधिक ही कारगर है.ये इश्वर ही हो सकता है,जो जिंदगी दे सकता है आपको,धार्मिक वैमनस्य में बिन ब्याही माओं के गर्भ से भी.और ले भी सकता है,ऐसे  ही किसी दंगे में, बिना क...
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  February 9, 2012, 7:31 am
डार्विन हम तर्क दे सकते हैं,भेडिये क्यूँ मांसाहारी हैं?जिराफ की गर्दन लंबी क्यूँ है?और इंसान की पूँछ क्यूँ नहीं?पर हम निश्चित तौर पर नहीं बता सकते कि,इतने युग बीत जाने पर अब भी क्यूँ होती हैं कविता और आत्महत्याएं ?मंटो मंटो की प्रासंगिकता इसलिए नहीं है कि,जिंदगी खूबसूर...
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  February 8, 2012, 7:31 am
कई तो ऐसे ही चले गए थे, बिना इस दिन का इंतज़ार किये. वो भाग्यशाली रहे थे कि उनको अपमान के ये कड़वे घूंट जो नहीं पीने पड़े. वे जो अब तक जा चुके थे, वे सब, एक एक कर कभी, या कभी दो-तीन के झुण्ड में रुख्सत हुए. शायद उन्हें अंदेशा था कि एक ऐसी रात आएगी ही. सब यहाँ मजबूरी के मारे ही तो आये थे...
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  December 28, 2011, 12:26 pm
चलो बात करते हैं, इश्वर की. आप क्या समझते हैं? क्या है इश्वर ? एक कहानीकार ? क्या वो भी पड़ा रहता होगा यूनिक कहानियों के चक्कर में? और तब कहीं जाकर एक जीवन बनता होगा? क्या होता अगर सच में कोई व्यक्ति हो और इश्वर ने उसके कर्म, उसका भवितव्य अभी लिखना हो?बुरा लगता है न सोचकर की इश्...
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  December 22, 2011, 5:34 pm
("पापा क्या हो पा" ये वाक्यांश किसी भी भाषा में नहीं है, पर ये अपने आप गढ़ा हुआ भी नहीं. बस इतना जान लीजिये कि इसका अर्थ "पापा क्या होते हैं? बोलो तो ज़रा?" होता है. या हो सकता है. दरअसल शब्द और मौन की सत्ता से ठीक ऊपर एक सत्ता है जिसे अपने को व्यक्त करने के लिए अगर शब्दों की आ...
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  December 7, 2011, 2:53 pm
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