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मन के झरोखे से...

मेरी उदासी (जो अमूमन बेवज़ह होती है) को, बहला-फुसला कर या शायद थोडी बहुत रिश्वत दे कर, वो घर आते ही बाहर निकाल करता है. और फिर अपनी कहना शुरु करता है, इस बात से बेखबर कि मैं सुन भी रही हूं या नहीं. उसकी किस बात का मुझ पर क्या असर हो रहा है इस बात की उस रत्ती भर भी फिक्र नहीं नहीं. ...
मन के झरोखे से......
Tag :तुम्हें सोच कर...
  July 15, 2012, 12:14 am
"बुद्धू... गंवार... अनपढ... पागल लडके""क्या बात है! आज बहुत प्यार आ रहा है?""किसी को बुद्धू, गंवार, अनपढ तब कहते हैं क्या कि जब प्यार आता हो? तुम तो सच में ही पागल हो.""अरे हां, तभी तो कहते हैं... तुम्हें नहीं पता?""नहीं... सब कुछ तुम्हें ही तो पता होता है.""हां, ये भी है. चलो फिर हम ही बता देते...
मन के झरोखे से......
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  April 25, 2012, 12:58 pm
वो रात-बेरात अपनी अधपकी नींद से एक झटके के साथ उठ कर बैठ जाती और फिर तमाम दराजों को टटोलने लगती. जबकि ये बात उसे भी पता होती कि वो जो ढूंढ रही है उसे अगर दराजों में सहेज कर रखा जा सकता तो खुदा ने इंसान को आंसुओं की नेमत नहीं बख्शी होती और इंसानों ने नींद की दवाओं का आविष्कार ...
मन के झरोखे से......
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  April 11, 2012, 10:44 pm
शादी होने से पहले लडकियां जैसे सपने देखती हैं, वैसा कोई सपना ना उसे सोते हुये आया... ना जागते हुये ही. जाने कैसे, अपनी पसंद के लडके शादी करते हुये भी उसे ये लगता रहा कि वो गहनों और भारी कपडों से लदी-फदी, खिलखिलाती हुई अपनी मौत की तरफ एक-एक कदम बढा रही है. शादी वाले दिन भी उसके च...
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  March 31, 2012, 1:09 am
बचपन में अम्मा अक्सर भूत-प्रेत, ऊपरी असर, ना जाने कौन्-कौन सी अलाओं-बलाओं से बचाने के लिये झाडा लगवाने ले जाती थीं. ज़रा जुकाम हुआ नहीं कि नज़र उतारने के बीसियों टोटके तैयार... आज अगर वो होतीं तो पूछते कि फरिश्तों के असर से निज़ात दिलाने के लिए कहीं कोई झाडे नहीं लगते, कहीं ...
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  March 21, 2012, 11:07 pm
दिसम्बर की कोई तारीख, साल नामालूमकई बार सोचती हूं कि तुम कोई मौसम, कोई साल होते तो कैलेण्डर का एक पन्न भर पलट कर मैं तुम्हें पीछे छोड कर कहीं आगे बढ जाती. तुम्हें पकडे रखने की... बांध कर जकडे रखने की कोई कोशिश कभी कामयाब नहीं होती और मुझे तुमसे 'इश्क़ जैसा कुछ' हो जाने के भ्रम (...
मन के झरोखे से......
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  February 29, 2012, 11:40 pm
तुम अक्सर कहते हो कि मेरे मन की थाह लेना चाह कर भी तुम कभी मुझे समझ नहीं पाते और यकीन मानो कि इस बात की जितनी झुंझलाहट तुम्हें है, उतनी ही पीडा मुझे भी. इसलिये मैं सोचती हूं कि क्या ही हो जो मैं एक किताब में तब्दील हो जाऊं???तुम पन्ना-पन्ना... हर्फ़-हर्फ़ मुझे पढ डालो. मेरी अनक...
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  February 18, 2012, 11:52 pm
तेरी बातों को हवा में उडा देने की फितरत भी मेरी थीउन्हीं बातों को हवा से छीन लाने की आदत भी मेरी हैतेरी ज़िन्दगी का हिस्सा बनने को रब से मिन्नत भी मेरी थीतेरी यादों के भंवर से उबरने को धागों में मन्नत भी मेरी हैतेरे दिल में अपने लिये मुहब्बत की चाहत भी मेरी थीतेरे ज़ेहन ...
मन के झरोखे से......
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  January 8, 2012, 11:16 am
तुम्हें हमेशा शिकायत रहती है ना कि मेरा लिखा हमेशा ही बडा उदास रहता है. जानते हो क्यों? क्योंकि मैं केवल तब ही लिखती हूं कि जब तुम उदास होते हो, जब मेरी सुनने के लिए तुम मुझे नहीं मिलते तब ही तो कागज़ों का रुख करती हूं.देखो जी... तुम चाहे नाराज़ हो जाओ या खमोश मगर यूं उदास मत ह...
मन के झरोखे से......
Tag :
  December 16, 2011, 10:23 pm
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