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ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र

जी-मेल एक्सप्रेस अलका सिन्हा जी द्वारा लिखित उपन्यास किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित है . अलका सिन्हा जी किसी परिचय की मोहताज नहीं इसलिए उनसे परिचित कराने की बजाय सीधे उपन्यास पर ही बात की जाए . पुरुष विमर्श को केंद्र में रख लिखा गया उपन्यास पाठक को एक अलग ही दुनिया में ले...
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वन्दना
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  February 17, 2017, 4:13 pm
यहाँ तो वही रजाई वही कम्बल गरीबी के उलाहने भ्रष्टाचार के फरेब जाति धर्म का लोच वोट का मोच लुभावने वादों का गुलदस्ता प्यार मोहब्बत का वही किस्सा कुछ नहीं बदला कुछ नहीं बदलना संवेदना संवेदनहीनता बहनों सी गलबहियाँ डाले कुहुकती किसी मन में न पीली सरसों खिलती ऐसे में किस ...
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वन्दना
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  February 2, 2017, 11:45 am
उम्मीद के टोकरे में होकर सवार आया नववर्ष मेरे द्वार तो क्या हुआ मुझे रीतना था , रीत गयी वक्त ने जीतना था , जीत गया एक नामालूम , बेवजह सा सपना था टूटना था , टूट गया ज़िन्दगी पाँव में पायल डाल जरूरी नहीं झंकार ही करे मैंने उम्मीदों की शाख पर नहीं सुखाई अपनी हसरतें क्योंकि वक्त ...
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वन्दना
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  January 2, 2017, 1:00 pm
एक शहर रो रहा है सुबह की आस में जरूरी तो नहीं कि हर बार सूरज का निकलना ही साबित करे मुर्गे ने बांग दे दी है यहाँ नग्न हैं परछाइयों के रेखाचित्र समय एक अंधी लाश पर सवारढो रहा है वृतचित्र नहीं धोये जाते अब मलमल के कुरते सम्हालियत से साबुन का घिसा जाना भर जरूरी है बेतरतीबी ब...
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वन्दना
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  December 31, 2016, 11:07 am
मित्रों मेरा पहला कहानी संग्रह "बुरी औरत हूँ मैं"आप सब की नज़र विश्व पुस्तक मेले में APN PUBLICATION के स्टाल पर 8 जनवरी 2017 को हॉल संख्या 12ए, स्टॉल नंंबर 107 पर दिन में 3 बजे लोकार्पित होगा ..........आप सबकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है . APN से ही मेरा पहला उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु'आया था ज...
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वन्दना
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  December 28, 2016, 5:58 pm
16 दिसम्बर हर साल आएगा और चला जाएगा समय का पंछी एक बार फिर हाथ मल बिलबिलायेगामगर इन्साफ न उसे मिल पायेगा स्त्रियाँ और इन्साफ की हकदार हरगिज़ नहीं चलो खदेड़ो इन्हें इसी तरह कानून की दहलीज पर सिसका सिसकाकरताकि कल फिर कोई न दिखा सके ये हिम्मत ये देश है वीर जवानों का अलबेलों क...
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वन्दना
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  December 16, 2016, 4:31 pm
मन में जाने कितनी बातें चलती रहती हैं . कहीं कुछ पढो तो मन करता है कुछ चुहल की जाए लेकिन फिर लगता है छोडो , गीत बनाने के दौर गुजर चुके हैं ....आओ हकीकतों से करो सामना ये मन , एक बदमाश बच्चा , छेड़खानी खुद करता है खामियाज़ा या तो दिल या आँखें उठाती हैं 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए'कितना ही...
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वन्दना
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  December 1, 2016, 3:27 pm
ओह ! सच बोलना कितना खतरनाक है खतरनाक समय है ये  सुना था इमरजेंसी में लागू थीं यही धाराएं तो क्या सच की धार से नहीं कटेगा झूठ इस बार ?तो क्या फिर सलीब पर लटकेगा कोई मसीह ?तो क्या सिले जायेंगे लब बिना किसी गुनाह के ?सच में खतरनाक समय है ये जहाँ अभिव्यक्ति भी नहीं उठा पाती ...
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वन्दना
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  November 2, 2016, 5:17 pm
दिन जाने किस घोड़े पर सवार हैं निकलते ही छुपने लगता है समय का रथ समय की लगाम कसता ही नहीं और मैं सुबह शाम की जद्दोजहद में पंजीरी बनी ठिठकी हूँ आज भी ......तेरी मोहब्बत के कॉलम में और तुम फाँस से गड़े हो अब भी मेरे दिल के समतल में मोहब्बत के नर्म नाज़ुक अहसास कब ताजपोशी के मोहताज र...
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वन्दना
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  October 24, 2016, 2:17 pm
यूँ तो भूलने की आदत बरसों पहले शुरू हो गयी थी जो अब इतनी पक गयी है कि उसके असमय बाल सफ़ेद हो गए हैं . आज इन्हें रंगने का कोई रंग भी नहीं बना बाज़ार में जो जाएँ खरीदें और रंग दें . अब इन्होने तो सोच लिया है इसका तो जनाजा निकाल कर ही रहना है तभी तो जब चाहे जहाँ चाहे दगा दे जाती है ख...
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वन्दना
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  September 22, 2016, 5:10 pm
जैसे दाने दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम वैसे ही किताब किताब पर लिखा होता है पढने वाले का नाम ऐसा ही मेरे उपन्यास अँधेरे का मध्य बिंदु के साथ हुआ जब जन्माष्टमी पर एक फ़ोन आया .हैलो , क्या मैं वंदना  गुप्ता जी से बात कर सकता हूँ जी मैं बोल रही हूँ (थोडा हिचकिचाते हुए) म...
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वन्दना
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  September 7, 2016, 11:15 am
ये रात का पीलापन जब तेरी देहरी पर उतरता है मेरी रूह का ज़र्रा ज़र्रा सज़दे में रुका रहता है खामोश परछाइयों के खामोश शहरों पर सोये पहरेदारों से गुफ्तगू बता तो ज़रा , ये इश्क नहीं तो क्या है ?चल बुल्लेशाह से बोल अब करे गल(बात)खुदा से नूर के परछावों में अटकी रूहें इबादतों की मोहत...
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वन्दना
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  August 31, 2016, 5:41 pm
ज़िन्दगी की बालकनी से देखती हूँ अक्सर हर चेहरे पर ठहरा अतीत का चक्कर ये चेहरे पर खिंची गहरी रेखाएं गवाह हैं एक सिमटे दुबके भयभीत जीवन की ज़िन्दगी के पार ये सब कुछ है मगर नहीं है तो बस 'ज़िन्दगी'ही मज़ा तब था जब याद रहता एक खुशगवार मौसम आखिरी साँस पर भी होती तसल्ली जी लिए ज़िन्द...
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वन्दना
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  August 20, 2016, 6:38 pm
मंतव्य पत्रिका का दूसरा विशेषांक पाँच लम्बी कहानियों का संकलन है . मंतव्य का क्या मंतव्य है ये जानने के लिए उन कहानियों से गुजरना जरूरी है . पहली कहानी ‘ललिता मैडम’ लेखक सूरज प्रकाश जी द्वारा लिखित है . ललिता मैडम की शख्सियत ही कहानी का मूल है . आज के वक्त में जब कोई स्त्...
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वन्दना
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  August 4, 2016, 12:21 pm
कोई ज़िन्दगी से संवाद करे भी तो कितना जहाँ प्रश्नों का ज़खीरा हो समय कम हो और उत्तर नदारद नमक मिर्च वाली ज़िन्दगी में इश्क नाकामियों का ही तो दूसरा नाम है और तुम ... पहला अब चटखारों की आवाज़ मौन के गुम्बद में अज़ान भरती है ...
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वन्दना
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  July 31, 2016, 5:27 pm
मरखनी गाय और कटखने कुत्तों से हम भूल चुके हैं अपनी सभ्यताएं भी अब आने वाली पीढियां मशगूल हैं अंतर्विरोधों को ताबीज बना पहनने में समय सिर धुन रहा है ......
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वन्दना
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  July 26, 2016, 11:27 am
अकेलेपन के गीतों पर डोलता है धरती का सीना जाने कैसे निष्ठुर हो गया आसमांयूँचिडिया ने चुग्गे तो खूब खिलाये थे फिर कैसे बाँझ हो गयी इंसानियत जो पराये दर्द पर तिलमिला उठो और उसके लिए खुद ही दर्द के बायस बन जाओ आह !जान लो इतना सा सच बस चाहे न मिले धरती न मिले आसमांफिर भी जानत...
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वन्दना
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  July 14, 2016, 11:57 am
अँधेरे से उजाले की ओर ले जाती प्रेम-कहानी"अँधेरे का मध्य बिंदु "वंदना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है । इससे पहले उनकी पहचान एक कवयित्री और एक ब्लॉगर के रूप में ही थी...सबसे पहली बात मेरे मन में जो आती है वह ये है कि जिस विषय पर हमारा समाज कभी बात करना पसंद नहीं करता, जिसे नई पीढ...
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वन्दना
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  July 2, 2016, 1:19 pm
छंदबद्ध कविता गेयता रस से ओत प्रोत जैसे कोई सुहागिन सोलह श्रृंगार युक्त और दूसरी तरफ अतुकांत छन्दहीन कविता जैसे कोई विधवा श्रृंगार विहीन मगर क्या दोनों के सौष्ठव में कोई अंतर दीखता है गेयता हो या नहीं श्रृंगार युक्त हो या श्रृंगार विहीन आत्मा तो...
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वन्दना
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  June 13, 2016, 4:35 pm
एक लेखक के लिए जन्मदिन का इससे प्यारा तोहफा क्या होगा जब उसे उपहार स्वरुप उसकी कृति की समीक्षा मिले ........ जी हाँ , ये तोहफा दिया है हम सबकी जानी मानी सुप्रसिद्ध लेखिका ‪#‎geetashreeगीताश्री‬ने और सुबह सबसे पहले फ़ोन पर शुभकामना सन्देश भी उन्ही का मिला .........तो प्रस्तुत है गीताश्र...
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वन्दना
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  June 9, 2016, 1:03 pm
वक्त का जालीदार बिछौना है ज़िन्दगी जर्रे जर्रे से रेत सी फिसलती मौत के स्पंदन ख़ारिज करने से खारिज नहीं होते ज़िन्दगी न साहस है न दुस्साहस अम्लीय क्षार ने कब दी है दुहाई एकतारे से चाहे जितनी धुनें निकालो आखिरी कतार में तो मिलेगी रामनामी धुन ही अब पालो पोसो पुचकारो दुलारो...
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वन्दना
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  June 4, 2016, 6:17 pm
तेरी जिद की रेत को उलट कर ले मैंने भर दी है  अब अपने जिद के गिलास में यूं आसमां के चुहचुहाने के दिनों का हो चुका है अब वाष्पीकरण सुना है न 'फ्री सेक्स''के बारे में और अब समझ चुकी हूँ वास्तव में स्त्री की फ्रीडम न न , गलत मत समझना मेरा वो मतलब नहीं तुम और तुम्हारी सोच हमेशा खू...
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वन्दना
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  June 1, 2016, 12:39 pm
"क्या हुआ जयंती ? आज बड़े उदास हो ? ""हाँ , वो शशांक की माँ से जब से मिलकर आया हूँ मन बहुत खराब है .""क्यों, क्या हुआ उन्हें?""क्या कहें अब ऐसी औलाद को जिसे आज माँ ही बुरी लगने लगी . कल तक तो आगे पीछे डोलते थे लेकिन जिस दिन से बेचारी ने बेटों को मुख्तियार बना दिया मानो अपने हाथ ही काट ...
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वन्दना
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  May 30, 2016, 6:16 pm
ये हाशिये का नवगीत हैजो अक्सर बिना गाये ही गुनगुनाया जाता है एक लम्बी फेहरिस्त सा रात में जुगनू सा जो है सिर्फ बंद मुट्ठियों की कवायद भर तो क्या हुआ जो सिर्फ एक दिन ही बघार लगाया जाता है और छौंक से तिलमिला उठती हैं उनकी पुश्तें तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके प...
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वन्दना
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  May 1, 2016, 6:06 pm
भूले बिसरे गीत हो गए हैं हम .......उसने कहा और मैं सोच में पड़ गयी सच ही तो कहा एक दिन सभी भूले बिसरे गीत बन जाने हैं नहीं नहीं ये भी सत्य नहीं गीत तो फिर भी कभी कोई गुनगुना ही लेगा समय असमय लेकिन हम किसकी यादों की पालकी में जगह बनायेंगे एक दिन निश्चित ही मिट जायेंगे अमिट बनने के ...
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वन्दना
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  April 5, 2016, 6:14 pm
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