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ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र

ये जिन्ना गोडसे रावण और कंसों को पूजने का दौर है तुम निश्चित कर लो अपनी पगडण्डी वक्त ने बदल दिए हैं अपने मन्त्र उच्च स्वर में किये गए उच्चारण ही बनेंगे अब वेदों की ऋचाएं ये खौलती खदबदाती भावनाओं को व्यक्त न करने का दौर है जी हजूरी और गुलामी के ही शिखर पर पहुँचने की प्रबल ...
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र...
वन्दना
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  May 4, 2018, 3:19 pm
जब आ चुको तुम आजिज़ रोजमर्रा के कत्लोआम से शून्य हो जाती हैं संवेदनाएं नहीं दीखता तुम्हें फिर आस पास बिखरा समंदर, नीला आकाश या उडती तितलियाँ अजीजों का महाप्रयाण हो या नन्हें कमलों का असमय नष्ट होना या फिर हो अर्धविकसित कलियों से व्यभिचार दिमाग की नसें करने लगती हैं चीत...
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र...
वन्दना
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  April 27, 2018, 12:24 pm
हम सब एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करते हैं अक्सर ...शायद वही जीने का एक बहाना बन जाती है, एक आस का पंछी ही जीवन को दिशा दे जाता है लेकिन क्या हो यदि हम उस काल्पनिक दुनिया में वीभत्सता को जीने लगें? हमें पता है ये गलत है लेकिन फिर भी एक सोच अपनी जकड़न में ऐसे जकड़े कि चाहकर भी न...
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वन्दना
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  April 23, 2018, 2:36 pm
आज क्यूँ है खड़ी, ये उदासी बड़ी सुलगे क्यूँ हैंअरमान, बेबसी है कड़ीज़िन्दगी दुल्हन बनी, बेजारी की घडी राख क्यूँ है पड़ी, मासूमियत है झड़ीरूह क्यूँ है मरी, बेसाख्ताअट्टहास करी लाश पे लाश पे लाश, आखिर क्यूँ है गिरी कब्र में क्यूँ है दबी, वो खामोश सिसकी अनारकली जब भी चिनी, क्यूँ ह...
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वन्दना
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  April 19, 2018, 5:16 pm
धर्म एक ऐसी अफीम है जिसके नाम पर सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते हैं. धर्म की अफीम जिसने चाटी वो बुलंदियों पर पहुँच गया, कौन नहीं जानता. सबसे आसान है धर्म के नाम पर शोषण. उसमें भी यदि धर्म इस्लाम हो तो वहाँ की जटिलताओं से कौन वाकिफ नहीं. आम इंसान को नहीं पता होता आखिर उनके शास्त्रो...
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वन्दना
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  April 5, 2018, 5:57 pm
नहीं ये मैं नहीं नहीं वो भी मैं नहींमैं कोई और थीअब कोई और हो गयीबेदखली के शहर का आखिरी मज़ार हूँजिस पर कोई दीया अब जलता नहींहाँ, मैं वो नहींमैं ये नहींमैं कोई और थीजिसकी चौखट पर आसमाँ का सज़दा थापीर फ़क़ीर दरवेश का कहकहा थासच, वो कोई और थीये कोई और हैपहचान के चिन्हों से परेइ...
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वन्दना
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  March 31, 2018, 10:57 am
राम बधाई और शुभकामनाओं तक ही बची है तुम्हारी प्रासंगिकता जानते हो प्रयोग होते हो तुम अब एक अस्त्र की तरह जिससे जीती जाती हैं जंग तुम, तुम्हारी मर्यादा और तुम्हारा औचित्यमहज प्रायोगिक हथियार हैं जिनसे काटी जाती हैं सभ्यताओं की नस्लें इस मर्यादाविहीन समय में मर्यादा ...
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वन्दना
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  March 25, 2018, 12:30 pm
एक लम्बे अरसे बाद जब खोलती है घूँघट अपने मुख से कविता चकित रह जाता है कवि देख उसका अनुपम सौन्दर्य उसकी काम कमान भवेंनेत्रों की चपलताधीर गंभीर मुखाकृति पर छोड़ जाती हैं एक विरोधाभास वो कोई और थी या तुम कोई और हो पहचान के सभी चिन्ह मिलते हैं जब नदारद हो जाता है कवि चारों खा...
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वन्दना
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  March 21, 2018, 12:08 pm
प्राचीन ग्रंथों वेदों उपनिषदों से आम इंसान अनजान ही रहता है. जितना उसे कहीं सुनने को या थोडा बहुत पढने को मिलता है उसी के आधार पर अपनी सोच बना लेता है. ऐसी सोच खतरनाक होती है क्योंकि आधा ज्ञान कभी समाज को सही दिशा नहीं दे सकता. ऐसे में जरूरी है ज्ञान का प्रचार प्रसार. उसक...
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वन्दना
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  March 15, 2018, 4:35 pm
मुँह फाड़ हँसती लड़की आज बन चुकी है आश्चर्य का प्रतीक हँसी का फूटता फव्वारा जब गुजरता है कानों के बीहड़ से गुजरकर ह्रदय की संकुचता तक मुड़कर ठहरकर देखी जाती है कभी ईर्ष्या से तो कभी अचम्भे से कल बेशक अशोभनीय था उसका मुँह फाड़ हँसना तो क्या हुआ बदली है सभ्यता मगर सोच तो नहीं ख...
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वन्दना
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  March 8, 2018, 12:15 pm
आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का शुभ अवसर है तो मुझे लगा आज के लिए इससे उपयुक्त प्रस्तुति और क्या होगी जब एक पुरुष स्त्री मन को, उसकी भावनाओं को इतना मान सम्मान दे तो सार्थक हो जाता है महिला दिवस .....इसी बदलाव की तो समाज को जरूरत है ..... पवन करण जी ने जो स्त्री शतक लिखा है उस ...
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वन्दना
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  March 8, 2018, 12:06 pm
आइये फटकारें खुद को थोडा झाडें पोंछें कि भूल चुके हैं सभी तहजीबों की जुबानसंवेदनशीलता और संवेदनहीनता के मध्य ख़ामोशी अख्तियार कर रुकें , सोचें, समझें वक्त बेशक बेजुबान है मगर जालिम है नहीं पूछेगा तुमसे तुम्हारे इल्म धराशायी करने को काफी है उसकी एक करवट आरोपों आक्षेपो...
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वन्दना
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  February 27, 2018, 12:01 pm
सफ़र 30 वर्षों का पल में सिमट गया दामन ज़िन्दगी का खुशियों से भर गया कि गुजर चुकी उम्र शिकवो शिकायतों की कि बदल चुकी इबारत दिल की इनायतों की ये दौर है कोई और वो दौर था कोई और अब नयी है वर्णमाला नए हैं अक्षर और नया है व्याकरण रिश्ते का जहाँ कोई कोमा नहीं कोई अर्ध विराम नहीं अब प...
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वन्दना
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  February 15, 2018, 12:28 pm
जब एक सजग पाठक और सच्चे आलोचक के द्वारा आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया मिले तो शायद वो ही एक लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है. उसमे भी गंगा शरण सिंहजी जैसे साहित्य के सजग प्रहरी आपको पढ़ें और आपके कहानी संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया दें तो ये किसी भी लेखक के लिए किसी उपलब्ध...
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वन्दना
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  February 9, 2018, 12:20 pm
ज़िन्दगी किसी किताब का फटा पन्ना ही सही आओ नृत्यांगना करो नृत्य यहाँ चंचल हैं उदासियाँ भी मौन की रिदम पर दो थाप कि सुर लय ताल की बंदिश पर लिख सको एक प्रेमगीत मैं विस्तारित अनंत का वो राग जिस पर न गुनगुनाया कोई गीत मैं किसी छोर का कोई अछोरजिसे पकड पाया न कोई मीत आओ रक्कासा , ...
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वन्दना
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  February 7, 2018, 12:32 pm
  हे वीणावादिनी हे तमहारिणी होकर दयाल दे ये वरदान खुशहाल हो सकल संसार सुबुद्धि का वास हो कोई न उदास हो जीवन में उल्लास हो बस तुझ पर ही विश्वास हो बसंत सा हर मन हो हर आँगन तेरा घर हो उमंग का नर्तन हो सप्त सुरों सा जीवन हो बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें ...
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र...
वन्दना
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  January 22, 2018, 11:27 am
जब आपके  संग्रह का जिस दिन विमोचन हुआ हो और रात को सूचना मिले आपके संग्रह को दूर बैठे मर्मज्ञ ने पढ़कर उसपर समीक्षा भी लिख दी तो मेरे ख्याल से ये किसी के लिए भी कितना महत्वपूर्ण हो सकता है ये कोई लेखक/कवि ही समझ सकता है. समीक्षा पढ़कर मुझे लगा बाकी सब काम बाद में पहले ये आवा...
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वन्दना
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  January 8, 2018, 11:07 am
विश्व पुस्तक मेले में 7 जनवरी 2018 को मेरे नए कविता संग्रह 'गिद्ध गिद्दा कर रहे हैं'का विमोचन वनिका पब्लिकेशन के स्टॉल पर आदरणीय लक्ष्मी शंकर वाजपेयी जी, सुशील सिद्धार्थ जी और लालित्य ललित जी के करकमलों द्वारा होगा. आप सबकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है :वनिका पब्लिकेशन 7 ...
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वन्दना
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  January 6, 2018, 5:37 pm
क्योंकि सत्य तो यही है देते हैं हम ही उपाधियाँ और बनाते हैं समाधियाँ वर्ना क्या पहचान किसी की और न भी हो तो क्या फर्क पड़ जायेगा अंतिम सत्य तो यही रहेगा कोई जन्मा और मर गया छोड़ गया अपने पीछे अपनी निशानियाँ गायक, चित्रकार, कवि, लेखक के रूप में जो जिसने कहा सिर झुका मान लिया औ...
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वन्दना
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  December 6, 2017, 1:27 pm
हम आधुनिकाएं जानती हैं , मानती हैं फिर क्यों संस्कारगत बोई रस्में उछाल मारती हैं प्रश्न खड़ा हो जाता है  विचारबोध से युक्त संज्ञाओं पर प्रश्नचिन्ह लगा जाता है हम आधुनिकाएं निकल रही हैं शनैः शनैः परम्पराओं के ओढ़े हुए लिहाफ से जानते बूझते भी आखिर क्यों ढोती हैं उन प्रथ...
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वन्दना
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  October 8, 2017, 1:11 pm
लड़ो स्त्रियों लड़ो लड़ो कि अब लड़ना नियति है तुम्हारी करो दफ़न अपने भय के उन ५१ पन्नो को जो अतीत से वर्तमान तक फडफडाते रहे , डराते रहे युग परिवर्तन का दौर है ये अतीत और वर्तमान की केंचुलियों में से तुम्हें चुनना है अपना भविष्य आने वाली पीढ़ी का भविष्य तो क्या जरूरी है शापित यु...
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वन्दना
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  September 27, 2017, 1:15 pm
उसने कहा : आजकल तो छा रही हो                   बडी कवयित्री /लेखिका बनने के मार्ग पर प्रशस्त होमैने कहा : ऐसा तो कुछ नही किया खास                तुम्हें क्यों इस भ्रम का हुआ आभास                 मुझे मुझमें तो कुछ...
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वन्दना
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  September 21, 2017, 3:36 pm
मत बोलना सच सच बोलना गुनाह है बना डालो इसे आज का स्लोगन रावण हो या कंस स्वनिर्मित भगवाननहीं चाहते अपनी सत्ता से मोहभंग और बचाए रहने को खुद का वर्चस्व जरूरी है आवाज़ घोंट देना आवाज़ जो बन न जाए सामूहिक प्रलाप आवाज़ जिसके शोर से न उखड जाएँ सत्ता के खूँटेआवाज़ जिसका और कोई पर्...
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वन्दना
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  September 6, 2017, 11:36 am
इक गमगीन सुबह के पहरुए करते हैं सावधान की मुद्रा मेंसाष्टांग दंडवत किवक्त की चाबी है उनके हाथों में तो अकेली लकीरें भला किस दम पर भरें श्वांसये अनारकली को एक बार फिर दीवार में चिने जाने का वक्त है...
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वन्दना
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  August 26, 2017, 12:40 pm
बच्चे सो रहे हैं माँ अंतिम लोरी सुना रही है मत ले जाओ मेरे लाल को वो सो रहा है चिल्ला रही है , गिडगिडा रही है , बिलबिला रही है उसके कपडे, खिलौने , सामान संवार रही है सोकर उठेगा उसका लाल तब सजाएगी संवारेगी मत करो तुम हाहाकार कह, समझा रही है सुनिए ये सदमा नहीं है हकीकत है दर्द है...
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वन्दना
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  August 13, 2017, 1:06 pm
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