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ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र

हम आधुनिकाएं जानती हैं , मानती हैं फिर क्यों संस्कारगत बोई रस्में उछाल मारती हैं प्रश्न खड़ा हो जाता है  विचारबोध से युक्त संज्ञाओं पर प्रश्नचिन्ह लगा जाता है हम आधुनिकाएं निकल रही हैं शनैः शनैः परम्पराओं के ओढ़े हुए लिहाफ से जानते बूझते भी आखिर क्यों ढोती हैं उन प्रथ...
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र...
वन्दना
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  October 8, 2017, 1:11 pm
लड़ो स्त्रियों लड़ो लड़ो कि अब लड़ना नियति है तुम्हारी करो दफ़न अपने भय के उन ५१ पन्नो को जो अतीत से वर्तमान तक फडफडाते रहे , डराते रहे युग परिवर्तन का दौर है ये अतीत और वर्तमान की केंचुलियों में से तुम्हें चुनना है अपना भविष्य आने वाली पीढ़ी का भविष्य तो क्या जरूरी है शापित यु...
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वन्दना
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  September 27, 2017, 1:15 pm
उसने कहा : आजकल तो छा रही हो                   बडी कवयित्री /लेखिका बनने के मार्ग पर प्रशस्त होमैने कहा : ऐसा तो कुछ नही किया खास                तुम्हें क्यों इस भ्रम का हुआ आभास                 मुझे मुझमें तो कुछ...
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वन्दना
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  September 21, 2017, 3:36 pm
मत बोलना सच सच बोलना गुनाह है बना डालो इसे आज का स्लोगन रावण हो या कंस स्वनिर्मित भगवाननहीं चाहते अपनी सत्ता से मोहभंग और बचाए रहने को खुद का वर्चस्व जरूरी है आवाज़ घोंट देना आवाज़ जो बन न जाए सामूहिक प्रलाप आवाज़ जिसके शोर से न उखड जाएँ सत्ता के खूँटेआवाज़ जिसका और कोई पर्...
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वन्दना
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  September 6, 2017, 11:36 am
इक गमगीन सुबह के पहरुए करते हैं सावधान की मुद्रा मेंसाष्टांग दंडवत किवक्त की चाबी है उनके हाथों में तो अकेली लकीरें भला किस दम पर भरें श्वांसये अनारकली को एक बार फिर दीवार में चिने जाने का वक्त है...
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वन्दना
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  August 26, 2017, 12:40 pm
बच्चे सो रहे हैं माँ अंतिम लोरी सुना रही है मत ले जाओ मेरे लाल को वो सो रहा है चिल्ला रही है , गिडगिडा रही है , बिलबिला रही है उसके कपडे, खिलौने , सामान संवार रही है सोकर उठेगा उसका लाल तब सजाएगी संवारेगी मत करो तुम हाहाकार कह, समझा रही है सुनिए ये सदमा नहीं है हकीकत है दर्द है...
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वन्दना
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  August 13, 2017, 1:06 pm
कल तक बात की जाती थी फलानी को पुरस्कार मिला तो वो पुरस्कार देने वाले के साथ सोयी होगी .....आज जब किसी फलाने को मिला तो कहा जा रहा है उसे तब मिला जब वो देने वाली के साथ सोया होगा ........ये किस तरफ धकेला जा रहा है साहित्य को ? क्या एक स्त्री को कभी सेक्स से अलग कर देखा ही नहीं जा सकता? ...
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वन्दना
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  August 5, 2017, 1:13 pm
मित्रों मुझे ये सूचना अभी अभी Surjit Singhजी की वाल से मिली. न उन्होंने मुझे टैग किया न शेयर का आप्शन है इसलिए स्क्रीन शॉट लेकर ही लगा रही हूँये तो मेरे लिए एक बहुत बड़ा सरप्राइज है .......मैं तो कभी सपने में भी नहीं सोच सकती थी ऐसा हो सकता है ......रेडियो 'देश प्रदेश'के स्टूडियो में मेरे ...
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वन्दना
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  July 29, 2017, 5:04 pm
गुस्से के धुएं में जल रही है चिता अपनी ही आजकल पंगु जो हो गयी है व्यवस्था और लाचार हो गयी है जनता तो क्या हुआ जो न मिले न्याय दस वर्षीय गर्भवती को उनके घर नहीं होते ऐसे हादसे 'इतना बड़ा देश है, आखिर किस किस की संभाल करें'कारण से हो जाओ संतुष्ट कि तालिबानी देश के वासी हो अब तुम...
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वन्दना
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  July 25, 2017, 1:21 pm
मैं सन्नाटा बुन रही हूँ ...जाने कब से न, न अकेलापन या एकांत नहीं है ये और न ही है ये ख़ामोशी तेरे शहर के सन्नाटे का एक फंदमेरी रूह के सन्नाटे से जुड़ कर बना रहा है तस्वीर-ए-यार सुनो तुम ओढ़ लेना मैं पढ़ लूँगी जुबाँहो जायेगी बस गुफ्तगू काफी है जीने के लिए इश्क की प्यालियों का नमक ह...
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वन्दना
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  July 23, 2017, 12:53 pm
  एक शाम ब्लॉगिंग के नाम ......जी हाँ, हम सबके प्रिय मित्र Mahfooz Aliद्वारा आयोजित ब्लॉगर मीट (ये वो वाला मीट नहीं है जनाब जो गौरक्षकों के हथियार निकल आयें और पेल दें सब पर दे दनादन, लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता तो कोई डर नहीं था क्योंकि आयोजन करने वाला भी तो हमारा मोहम्मद अली था :) ) ह...
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वन्दना
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  July 16, 2017, 3:23 pm
साथ कब किसी का होता है सब अकेले ही चलते हैं ये तो मन के भरम होते हैं वो मेरा है वो मेरा अपना है वो मेरा प्रियतम है जब भीड़ में भी तन्हाई डंसती है तब पता लगता है किस साथ के भरम में उम्र के शहतूत गिर गए वो जो चिने थे सदियों ने सारे पर्वत पिघल गए फिर इक नया ...
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वन्दना
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  July 6, 2017, 5:42 pm
मैं मर चुकी हूँ हाँ , चुक चुकी है मेरी खोज मेरी अंतर्वेदना मेरा मन नही रही चाह किसी खोजी तत्व की एक गूंगा मौसम फहरा रहा है अपना लम्पट आँचल और मैं हूँ गिरफ्त में जीने की चाह न बचना आखिर है क्या ?मौत ही तो है ये भी साँस लेना जिंदा होने का सबूत नहीं राम रोज बरस रहा है धरती पर कभी ...
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वन्दना
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  July 1, 2017, 8:00 am
चूंकि मैं एक औरत हूँ नहीं जी पाती मनमाफिक ज़िन्दगी फिर जी भर के जीना किसे कहते हैं ...नहीं पता बस उम्र के दौर बदलते रहे नहीं बदला तो जिम्मेदारियों का शिड्यूल क्या उमंगों की बारात नहीं निकलती थी मेरे मन की गली से क्या चाहतों के शामियाने नहीं टंगा करते थे मेरी हसरतों पे सब थ...
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वन्दना
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  June 26, 2017, 1:52 pm
जाने कैसे चलते चलते किसी को कोई यूं ही मिल जाया करता है ...यहाँ तो उम्र के सिरे हाथ से छूटते रहे मगर किसी गुनगुनी धूप का कोई साया भी न पसरा किसी कोने में ...जाने कौन से लोग थे जिन्हें तुम और मैं दो रूपक मिले यहाँ तो सिर्फ उम्र से ही बावस्ता रहे ...कि किरच किरच चटखती है अक्सर रूह...
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वन्दना
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  June 21, 2017, 4:49 pm
लाठी पकड़ चलते पिता कितने अशक्त एक एक कदम मानो मनो शिलाओं का बोझ उठाये कोई ढो रहा हो जीवन/सपने/उमीदें फिर भी सिर्फ अपनी ममता से हार जाते खुद को ढ़ोकर टुक-टुक करते लाठी पकड़ पहुँच ही जाते दूसरे कमरे में टेलीफोन के पास मोबाइल का ज़माना नहीं था वो यदि था भी तो इनकमिंग ही इतनी महँ...
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वन्दना
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  June 18, 2017, 11:51 am
एकतरफा खेल है ज़िन्दगी तुम ही चाहो तुम ही पुचकारों उस तरफ कोई नहीं तुम्हें चाहने वाला फिर वो खुदा हो या संसार उठाये थे कुछ मोहरे चली थीं कुछ चालें कभी सीधी कभी तिरछी हर चाल पे शह और मात अब न खुदा की खुदाई है न ज़िन्दगी की रुसवाई है घूँघट की ओट से झाँक रही है मेरे मन की कुँवार...
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वन्दना
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  June 5, 2017, 11:49 am
देखा है कभी भटकी हुई रूह का मातम दीवानगी की दुछत्ती पर जर्रा जर्रा घायल मगर नृत्यरत रहा एक तेरे लिए और तू बेखबर अब कौन गाये सुहाग गीत बेवाओं के मातम हैं ये और तुम खुश रहे अपनी मुस्कुराहटों में ऐसे में उम्मीद का आखिरी गज़र भी तोड़ दिया अब सोखने को गंगा जरूरत नहीं किसी जन्हु ...
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वन्दना
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  June 1, 2017, 12:12 pm
मन एक जंगली हाथी सा कुचल रहा है सुकून के अभ्यारण्य में विचरती ख़ामोशी के फूलों को बेजा जाता जीवन अक्सर तोलने लगता है प्राप्तियों को सत्य के बाटों से तो सिवाय थोथे जीवन के कोई सिरा न हाथ लगता है  खुद से उठता विश्वास ... सत्य है स्वीकारना ही पड़ेगा कि चुक ही जाता है इं...
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वन्दना
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  May 16, 2017, 1:03 pm
हम इंतज़ार करेंगे साथी हम इंतज़ार करेंगे इंतज़ार पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कह, नहीं सिद्ध किया जा सकता कुछ भी हाँ , कह सकें गर इंतज़ार पर हमारा कॉपी राईट है तो वजन बढ़ता है एक तीर से कई शिकार करता है इंतज़ार एक छोटा सा शब्द लेकिन व्यापक अर्थ और खुद में समायी एक मुकम्मल अभिव्...
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वन्दना
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  May 4, 2017, 12:33 pm
मंजिल की तलाश में बहुत दूर निकल आये हम वो कहते हैं रास्ता बदल दो वो कहते हैं मंजिल अब मुझे खुद से शिकायत है सोचता हूँ खुदा बदल दूँकिबुतपरस्ती मेरा शौक है यारा .......
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वन्दना
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  April 22, 2017, 1:06 pm
"बुरी औरत हूँ मैं"की Binni Chaudharyद्वारा लिखित प्रतिक्रिया ....कम शब्दों में गागर में सागर भरती प्रतिक्रिया के लिए दिल से आभार बिन्नी........तुम सबकी प्रतिक्रिया ही मेरे लेखन का सबसे बड़ा प्रतिफल है जो मुझे आगे लिखने को प्रेरित करता है :)प्रतिक्रिया इस प्रकार है : वंदना गुप्ता द्वा...
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वन्दना
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  April 14, 2017, 12:27 pm
"धुँधले अतीत की आहटें"गोपाल माथुर जी द्वारा लिखित उपन्यास बोधि प्रकाशन से छपा है जिसे गोपाल माथुर जी ने बहुत ही स्नेह के साथ मुझे भेजा . गोपाल माथुर जी की लेखनी को मैंने पहले भी पढ़ चुकी हूँ तो उनकी लेखनी की तो हमेशा से ही कायल हूँ . जब इस उपन्यास को पढ़ा तो लगा लेखक खुद मे...
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वन्दना
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  April 12, 2017, 2:44 pm
रचनी हैं अब साजिशें स्वप्न तो बहुत देख दिखा चुके ये वक्त का बदला लहजा है जिस पर इंसानियत तलवों का उपालम्भ है और साजिश एक आदतन शिकारी चौतरफा बहती बयार में जरूरी है बह जाना जिंदा रहना जरूरत जो ठहरी आज की हकीकतों के चिंघाड़ते जंगल दे रहे हैं दलीलें वक्त अपनी नब्ज़ बदल चुका ह...
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वन्दना
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  March 21, 2017, 12:39 pm
मर्दों के शहर की अघायी औरतें जब उतारू हो जाती हैं विद्रोह पर तो कर देती हैं तार तार सारी लज्जा की बेड़ियों को उतार देती हैं लिबास हया का जो ओढ़ रखा था बरसों से सदियों ने और अनावृत हो जाता है सत्य जो घुट रहा होता है औरत की जंघा और सीने में अघायी औरतों के तिलि...
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वन्दना
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  March 8, 2017, 4:48 pm
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