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स्पर्श

इस समतल पर पॉव रखवो चल दी है आकाश की ओरहवाओं का झूला औरघाम का संचय करशाम के बादलों से निमित्त रास्ते सेअपने गूंगेपन के साथवो टहनियों में बांधकरआंसूओं की पोटली ले जा रही हैटटोलकर कुछ बादलों कोवो सौंप देगी ये पोटलीफिर चली आयेगी उसी राह सेफडफडाती आंखों की चमक के साथइसी उ...
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  June 26, 2013, 4:37 pm
दो अंगुलियों के बीच वो अनुभूति नहीं पनपती जो तुम्हारे और मेरे बीच अक्सर पनपा करती है ।© दीप्ति शर्मा ...
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  June 15, 2013, 2:24 pm
 रचना क्या है??आत्मा से निकले शब्दया कुछ भावहै ये आध्यात्मिकताअन्तरात्मा से निकले भाव कीक्या दब सकती है??या कोई मार सकता है??मेरी रचना कोरचना के भाव कोजो कोमल हैबहती हुयी एक नदी हैजो निरंतर चलती हैकभी पुराणों का व्याख्यानऔर मिथों को दुत्कारतीइस रचना कोकोई मार सकता है??...
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  June 8, 2013, 11:44 am
मांग करने लायककुछ नहीं बचामेरे अंदरना ख्याल , ना हीकोई जज्बातबस ख़ामोशी हैहर तरफ अथाह ख़ामोशीवो शांत हैंवहाँ ऊपरआकाश के मौन मेंफिर भी आंधी, बारिशधूप ,छाँव  मेंअहसास करता हैखुद के होने काउसके होने पर भीनहीं सुन पाती मैंवो मौन ध्वनिआँधी में उड़तेउन पत्तों में भी नहीं...
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  June 5, 2013, 1:56 pm
आवाज़ जोधरती से आकाश तकसुनी नहीं जातीवो अंतहीन मौन आवाज़हवा के साथ पत्तियोंकी सरसराहट मेंबस महसूस होती हैपर्वतों को लांघकरसीमाएं पार कर जाती हैंउस पर चर्चायें की जाती हैंपर रात के सन्नाटे मेंवो आवाज़ सुनी नहीं जातीदबा दी जाती हैसुबह होने परघायल परिंदे कीअंतिम सा...
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  May 24, 2013, 10:16 pm
हाथ की कुछ रेखाएँअब गहरी हो गयी हैंना जाने येकिस बात का अंदेशा हैनये जीवन के आगमन काया इस जीवन की मुक्ति का-दीप्ति शर्मा...
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  May 16, 2013, 7:44 pm
एक दरियाफ्त की थी कभी ईश्वर सेदे दो मुट्ठी भर आसमानआज़ादी से उड़ने के लिएऔर आज उसनेज़िन्दगी का पिंजरा खोल दियाऔर कहा ले उड़ ले .।- दीप्ति शर्मा...
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  May 11, 2013, 8:27 pm
किसी एक जगह पर निशान पड़ गये हैं मैं तो सीमा पर खड़ी हूँ और धसते जा रहें हैं पैर बन्दुक की नोक पर या सीमा से दलदल पर ना जानेरेत पर भी पक्के निशान कैसे पड़ जाते हैं-दीप्ति शर्मा...
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  May 10, 2013, 12:52 pm
कहते हैं पुनर्जन्म के फलभोगने पड़ते हैं इस जनम मेंतो क्या मिल जाता हैइस जनम का वो हीप्यार , सोहार्द , अपनापनअगले जनम में भी ।- दीप्ति शर्मा ...
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  May 8, 2013, 2:17 pm
हिरासत में थाकई सालों सेयातनाओं से घिरान्याय की आस लिएमैं जासूस नहींआम इन्सान थाजो गलती कर बैठाये देश की सीमायेंनहीं जानी कभीसब अपना सा लगा परबर्बरतापूर्ण व्यवहार जो कियावो कब तक सहताआज़ाद हो लौटना था मुझेअपने परिवार के पासपर वो जेहादी ताकतेंमुझ पर हावी थींनफरत क...
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  May 6, 2013, 1:06 pm
क्यों मिल गयी संतुष्टिउन्मुक्त उड़ान भरने कीजो रौंध देते हो पग मेंउसे रोते , कराहतेफिर भी मूर्त बनसहन करना मज़बूरी हैक्या कोई सह पाता हैरौंदा जाना ???वो हवा जो गिरा देती हैटहनियों से उन पत्तियों कोजो बिखर जाती हैं यहाँ वहाँऔर तुम्हारे द्वारा रौंधा जानास्वीकार नहीं उ...
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  May 5, 2013, 9:28 pm
अक्सर खाक होकर भीपनपती हैं इच्छाएँजो अन्दर हीखोज लेती हैं राहऔर कभी अपनेछुपने की जगहें भी ।---    दीप्ति शर्मा...
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  April 22, 2013, 8:38 pm
मेरे कमरे में अबधूप नहीं आतीखिड़कियाँ खुली रहती हैंहल्की सी रौशनी हैमन्द मन्द सी हवागुजरती है वहाँ सेतोड़ती है खामोशीया शुरू करती हैकोई सिलसिलाकिसी बात के शुरू होनेसे खतम होने तक का ।कुछ पक्षी विचरते हैंआवाज़ करते हैंतोड़ देते हैं अचानकगहरी निद्रा कोया आभासी तन्...
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  February 15, 2013, 6:40 pm
उन छोटी पत्तियों पर गिर जाती है ओसकोहरा सूखा देता है उन्हें और पतझड़ गिरा देता है शायद ये ही उनकी नियति  है ।                                                     - दीप्ति शर्मा...
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  February 13, 2013, 9:48 am
गुज़र गया जो वक़्त अब हम उसकी बात नहीं करते ज़ख्म सीले हैं आँसूओं से अब हम उनसे मुलाकात नहीं करते - दीप्ति शर्मा ...
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  February 12, 2013, 3:18 pm
देखा था कल गिरतेपेड़ के हरे पत्तों कोना आँधी आयी कोईना पतझड़ का मौसम थाबस तड़पते सहतेरोते देखा था मैंनेपेड़ के हरे पत्तों कोआगे बढ़ना था उनकोविश्वास के साथकुछ पल जीने कासाथ ही तो माँगा थापर तोड़ दिया उसनेजिससे साथ चलजीने का सहारा माँगा थामुरझाते देखा था मैंनेपेड़ क...
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  February 11, 2013, 12:27 pm
ज़फर पथ पर चल रहीबिरदैत होने की फ़िराक में हूँअभी चल रही हूँ अँधेरों परमैं उजालों की तलाश में हूँ ।क़यास लगा रही जीवन काअभी जिन्दगी के इम्तिहान में हूँख्वाबों में सच्चाई तलाशतीमैं उजालों की तलाश में  हूँ ।अल्फाज़ लिखती हूँ कलम सेआप तक पहुँचाने के इंतज़ार में हूँउलझ...
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  February 3, 2013, 6:00 pm
मेरे गीत तेरी पायलिया हैओ मीत तू मेरी सावरिया है|प्रेम गीत मैं गा रहा हूँतेरे लिए ही आ रहा हूँमिलन को बरस रही बादरिया हैओ मीत तू मेरी सावरिया है|मद्धम हवा साथ चली हैदिल में दीपक सी उजली हैदेख झलक गयी गागरिया हैओ मीत तू मेरी सावरिया है|अगली पहर तक आ जाऊंगातुझे दुल्हन बना ...
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  January 24, 2013, 9:53 pm
लहरों को देखकर डर जाते हो तुम आँखें बंद कर सिहर जाते हो तुम जानते हो डूब जाओगे समन्दर में तो जानकर भी पास क्यों जाते हो तुम ।© दीप्ति शर्मा ...
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  January 20, 2013, 4:41 pm
डर सा लगता है अकेले चलने में अँधियारे और तन्हा से उन सुनसान रस्तों पर ।जहाँ कोई नहीं गुजरता बस एक एहसास है मेरा जो विचरता है ठहरता है और फिर चल पड़ता है उन सुनसान रस्तों पर ।चौराहे तो बहुत हैं पर कोई सिग्नल नही ना कोई आवाज़ आती है जो रोक सके मुझे उन सुनसान रस्तों पर ।गहरे ...
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Tag :कविता
  January 9, 2013, 9:20 pm
नववर्ष में आओ हाथ मिलाये साथ मिलकर चल पड़े नव उमंग की चाह में हम बढ़ चले हम चल पड़े ।सूरज की रौशनी सा प्रेम भाव ले चले कदम से कदम मिला हम बढ़ चले हम चल पड़े ।आपस का बैर भूलकर नये गीत गढ़ चले सफलताऐं साथ लेकर हम बढ़ चले हम चल पड़े ।उम्मीदों की किरण जला मुस्कुराती धूप ले चले स...
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  January 1, 2013, 2:59 pm
Published with Blogger-droid v2.0.9...
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  December 30, 2012, 9:50 pm
वो शब्द छोड़ दिये हैं असहायविचरने को खुले आसमान मेंवो असहाय हैं, निरुत्तर हैंकुछ कह नहीं पा रहे याकभी सुने नहीं जातेरौंध दिये जाते हैं सरेआमइन खुली सड़को परसंसद भवन के बाहरऔर न्यायालय में भीसब बहरे हैं शायद याअब मेरे शब्दों में दम नहींजो निढाल हो जाते हैंऔर अक्सर बै...
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  December 23, 2012, 12:10 pm
एक ऐसा इंसान जो सच के लिये जीता हो... त्याग,सदभावना में विश्वास हो..मैं भी एक ऐसे इंसान को जानती हूँसच में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं..कुछ पंक्तियाँ मेरी तरफ से..वो आत्मविश्वास जिससेखुद आगे बढ़ते जायेतलाश ले मंज़िलउन हौसलों की जोअत्यधिक अटूट हैंमैं कद्र करती हूँ ।अकेले चलन...
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  December 19, 2012, 9:26 pm
कब तक आबरू अपनी खोयेगीहैवानियत पर फूट फूटकर रोयेगीशरम करो नौजवानों, रहते तुम्हारेकब तक वो नारी काल के गाल में सोयेगी??© दीप्ति शर्मा...
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  December 19, 2012, 9:19 pm
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