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ज़ख्म…जो फूलों ने दिये

गोली और गाली जो बन चुके हैं पर्यायवाची इस अंधे युग की बनकर सौगात लगाते हैं ठिकाने बडबोली जुबान को तुम , तुम्हारी जुबान और तुम्हारी कलम रहन है सत्ता की नहीं बर्दाश्त सत्ता को कलम का अनायास चल जाना बन्दूक की निकली गोली सा गर करोगे विद्रोह तो गोली मिलेगी और मरने के बाद गाल...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये...
वन्दना
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  September 9, 2017, 4:44 pm
सपनों की लुगदी बनाओ और चिपका लेना ज़िन्दगी का फटा पन्ना उसने कहा था ......और मैंने ब्रह्म्वाक्य मान किया अनुसरण आज हारे हुए सपनों की भीड़ में खड़ीपन्ना पन्ना अलग कर रही हूँ तो हर पन्ना मुंह चिढ़ा रहा है मानो कह रहा है सपने भी कभी सच होते हैं ...........और मेरे हारे हुए सपनो...
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वन्दना
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  September 3, 2017, 1:15 pm
अम्बुआ की डाली पर चाहे न कुहुके कोयलकिसी अलसाई शाम से चाहे न हो गुफ्तगू कोई बेनामी ख़त चाहे किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए ज़िन्दगी का कोई नया शब्दकोष ही क्यों न गढ़ लिया जाये अंततः बातें हैं बातों का क्या ...अब के देवता नहीं बाँचा करते यादों की गठरी से ... मृत्युपत्र न दिन...
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वन्दना
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  August 16, 2017, 1:28 pm
चलिए शोक मनाईये ... दो मिनट का मौन रखिये ... एक समिति गठित कीजिये और विभागीय कार्यवाही करिए ...... बस इतना करना काफी है उनके घावों पर मरहम लगाने को और पूरा घाव ठीक करने को २०-२५ लाख दे कर कर दीजिये इतिश्री अपने कर्तव्य की .....आखिर सरकार माई बाप हैं आप और माई बाप को सिर्फ एक को ही थो...
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वन्दना
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  August 13, 2017, 12:19 pm
ये मेरी हत्या का समय है न कोई पूर्वाभास नहीं कोई दुर्भाव नहीं बस जानता हूँ तलवारों की दुधारी धार को मैं विवश हूँ स्वीकारने को नियति धिक्कारने को प्रगति जिसकी बिनाह पर हो रहे हैं कत्ले आम धरोहरें सहमी खड़ी हैं अपनी बारी की प्रतीक्षा में बाढ़ में बहते धान की चीखें कब किसी क...
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वन्दना
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  August 1, 2017, 9:00 am
Maitreyi Pushpaजी की लिखी संस्मरणात्मक पुस्तक पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षा "शिवना साहित्यिकी"के जुलाई-सितम्बर 2017 अंक में प्रकाशित हुई है ......जो चित्र में न पढ़ पायें उनके लिए यहाँ भी लगा रही हूँ....शिवना प्रकाशन की हार्दिक शुक्रगुजार हूँ जो उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया को प्रकाशित ...
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वन्दना
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  July 24, 2017, 1:56 pm
 साइटिका के दर्द से बोझिल पिता नहीं रह पाते खड़े कुछ पल भी मगर जब भी करते हैं बस में सफ़र नहीं देते दुहाई किसी को कि बुजुर्गों के लिए होते हैं विशेष प्रावधान अपनी जगह बैठा देते हैं जवान बेटी को कि जानते हैं ज़माने का चलन आदिम सोच से टपकती बेशर्मी करती है मजबूर खड़े रहने को ...
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वन्दना
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  July 18, 2017, 11:50 am
कुछ पन्ने हमेशा कोरे ही रह जाते हैं उन पर कोई इबारत लिखी ही नहीं जाती एक शून्य उनमे भी समाहित होता है बिलकुल वैसे ही जैसे सामने टीवी चल रहा है आवाज़ कान पर गिर रही है मगर पहुँच नहीं रही जहाँ पहुंचना चाहिए एक शून्य उपस्थित है वहां भी सब कुछ है फिर भी कुछ न होने का अहसास तारी ...
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वन्दना
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  July 3, 2017, 11:32 am
दुःख दर्द आंसू आहें पुकार सब गए बेकार न खुदी बुलंद हुई न खुदा ही मिला ज़िन्दगी को न कोई सिला मिला यहाँ रब एक सम्मोहन है और ज़िन्दगी एक पिंजर और तू महज साँस लेती भावनाओं से जकड़ी एक बदबूदार लाश ये जानते हुए कि यहाँ कोई नहीं तेरा चल फकीरा उठा अपना डेरा और गुनगुनाता रह ज़िन्...
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वन्दना
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  June 18, 2017, 12:01 pm
ये जानते हुए कि नहीं मिला करतीं खुशियाँ यहाँ चाँदी के कटोरदान में सहेज कर जाने क्यों दौड़ता है मनवा उसी मोड़ पर ये जानते हुए कि सब झूठ है, भरम है ज़िन्दगी इक हसीं सितम है जाने क्यों भरम के पर्दों से ही होती है मोहब्बत ये जानते हुए कि वक्त की करवट से बदलता है मौसम और ज़िन्दगी क...
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वन्दना
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  June 13, 2017, 12:00 pm
मत ढूँढो छाँव के चौबारे तुम ने ही तो उतारे वस्त्र हमारे अब नहीं जन सकती जननी बची नहीं उसमे शक्ति पौधारोपण को जरूरी है बीज और तुमने किया मुझे निस्तेजबंजर भूमि में गुलाब नहीं उगा करते जाओ ओढ़ो और बिछाओ अब अपने विकास की मखमली चादरें कि कीमत तो हर चीज की होती है फिर वो खोटा स...
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वन्दना
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  June 5, 2017, 1:08 pm
तुम मेरे सपनो के आखिरी विकल्प थे शायद जिसे टूटना ही था हर हाल में क्योंकि मुस्कुराहट के क़र्ज़ मुल्तवी नहीं किये जाते क्योंकि उधार की सुबहों से रब ख़रीदे नहीं जाते एक बार फिर उसी मोड़ पर हूँ दिशाहीन ...चलो गुरबानी पढो कि यही है वक्त का तक़ाज़ाकहा उसने और मैंने सारे पन्ने कोरे क...
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वन्दना
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  June 2, 2017, 1:32 pm
वो कह गए "कल मिलते हैं "मगर किसने देखा है कल शायद कशिश ही नहीं रही कोई जो ठहर जाता , जाता हुआ हवा का झोंका या रही ही नहीं वो बात अब प्रेम में हमारे जो रोक लेती सूरज को अस्ताचल में जाने से या फिर बन गए हैं नदी के दो पाट अपने अपने किनारों में सिमटे तभी तो आज नहीं हुआ असर मेरी सरगो...
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वन्दना
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  May 30, 2017, 3:16 pm
ये मेरे लिए उम्मीद से ज्यादा है :):) अभी दो दिन पहले मैंने सच्ची आलोचना पर ये पंक्ति लिखी थी (सच्ची आलोचना सहना अच्छा लेखक बनने की दिशा में पहला कदम है)और आज उसका नमूना यहाँ उपस्थित है ........ऐसे की जाती है सच्ची आलोचना :यश पब्लिकेशन से प्रकाशित "प्रश्नचिन्ह...आखिर क्यों?"पर Ashu...
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वन्दना
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  May 15, 2017, 11:28 am
सरकार आपको होली तक फ्री राइड करवाएगी फिर वो बस हो ऑटो टैक्सी या फिर मेट्रो क्योंकि यदि नोट लेकर निकले और किसी ने रंग भरा गुब्बारा मार दिया तो आपकी तो बल्ले बल्ले हो जाएगी न ........अब खाली जेब खाली हाथ निकालिए और काम पर चलिए ........होली है भई , सरकार को भी मौका चाहिए था रंग डालने ...
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वन्दना
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  March 9, 2017, 5:11 pm
मेरे फुफकारने भर से उतर गए तुम्हारी तहजीबों के अंतर्वस्त्र सोचो यदि डंक मार दिया होता तो ?स्त्री सिर्फ प्रतिमानों की कठपुतली नहीं एक बित्ते या अंगुल भर नाप नहीं कोई खामोश चीत्कार नहीं जिसे सुनने के तुम सदियों से आदि रहे अब ये समझने का मौसम आ गया है ...
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वन्दना
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  March 1, 2017, 12:15 pm
ये चुके हुए दिनों की दास्ताँ है जहाँ चुक चुकी थीं संवेदनाएं जहाँ चुक चुकी थीं वेदनाएं जहाँ चुक चुकी थीं अभिलाषाएं तार्रुफ़ फिर कौन किसका कराये जहाँ चुक चुके थे शब्द जहाँ चुक चुके थे भाव जहाँ चुक चुके थे विचार उस सफ़र का मानी क्या ?एक निर्वात में गोते खाता अस्तित्व किसी चु...
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वन्दना
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  February 9, 2017, 4:43 pm
मुझे गुजरना था मैं गुजर गयी वक्त की नुकीली पगडण्डी से तुम्हें ठहरना था तुम ठहर गए रेत के ठहरे सागर से अब हाशियों के चरमराते पुलों से नहीं गुजरती कोई रेल धडधडाती सी क्योंकि सूखे समन्दरों से मोहब्बत के ताजमहल नहीं बना करते ......
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वन्दना
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  January 2, 2017, 12:49 pm
अभी अभी प्राप्त सूचना के अनुसार मनोरमा इयर बुक 2017 में मेरा उपन्यास "अँधेरे का मध्य बिंदु"भी शामिल है जो APN Publication से प्रकाशित है . 2016 की शुरुआत उपन्यास के आगमन से हुई तो जाता हुआ साल मेरी झोली में ये छोटी सी ख़ुशी डाल गया ...खुश होने के लिए छोटी-छोटी वजहें भी काफी होती हैं .....अपने ...
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वन्दना
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  December 26, 2016, 3:44 pm
चलिए देश बदल गया विकास हो गया अब और क्या चाहिए भला ?जो जो आप सबने चाहा उन्होंने दिया अब जो भी विरोध करे देशद्रोही गद्दार की श्रेणी का रुख करे आइये गुणगान करें क्योंकि अच्छे दिन की यही है परिभाषा आँख पर लगा काला चश्मा प्रतीक है हमारी निष्ठा और समर्पण का शुभ है लाभ है उसके ...
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वन्दना
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  November 18, 2016, 3:48 pm
आ जाओ या बुला लोइन्ही रूई के फाहों समकिपिघल न जाऊँगुजरे वक्त के साथफिर तुम आवाज़ दो तो भी आ न सकूँकियादों के आगोश मेंइक बर्फ अब भी पिघलती हैक्या नम नहीं हुईं तुम्हारी हथेलियाँयूँ कि येबर्फ के गिरने का समय हैयातुम्हारी यादों का कहरगोया अनजान तो नहीं होंगी तुमजानता हूँ ...
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वन्दना
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  November 2, 2016, 4:24 pm
सोचती हूँ सहेज दूँ ज़िन्दगी की बची अलमारी में पूरी ज़िन्दगी का बही खाता बता दूँ कहाँ क्या रखा है किस खाने में कौन सा कीमती सामान है मेरे अन्दर के पर्स में कुछ रूपये हैं जो खर्च करने के लिए नहीं हैं लिफाफों में हैं निकालती हूँ हमेशा सबके जन्मदिन पर एकमुश्त राशि करुँगी प्रय...
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वन्दना
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  September 28, 2016, 11:53 am
ये कैसा हाहाकार है कुत्ते सियार डोल रहे हैं गिद्ध माँस नोंच रहे हैं काली भयावह अंधियारी में मचती चीख पुकार है ये कैसा हाहाकार है चील कौवों की मौज हुई है तोता मैना सहम गए हैं बेरहमी का छाया गर्दो गुबार है ये कैसा हाहाकार है काल क्षत विक्षत हुआ है धरती माँ भी सहम गयी है उसक...
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वन्दना
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  September 21, 2016, 2:44 pm
मेरी मोहब्बत के अश्क जज़्ब ही हुए बहने को जरूरी था तेरी यादों का कारवाँलम्हे ख़ामोशी से समझौता किये बैठे हैं इंतज़ार की कोई धुन होती तो बजाती इतनी खाली इतनी उदास मोहब्बत ये मोहब्बत का पीलापन नहीं तो क्या है ?और ये है मोहब्बत का इनाम किअब तो आह भी नहीं निकलती मेरी मोहब्बत क...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये...
वन्दना
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  August 24, 2016, 12:29 pm
मैं कविता का पक्ष हूँ और मैं विपक्ष मैं कवयित्री का पक्ष हूँ और मैं विपक्ष और खिंच गयी तलवारें दोनों ही ओर से गहन वेदना में थी उस वक्तजिंदा थी या मर चुकी थी कविता आकलन को नहीं था कोई संवेदनशील बैरोमीटर कि जरूरी था शोर जरूरी था बस अपराधी को अपराधी सिद्ध किया जाना या निर...
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वन्दना
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  August 9, 2016, 11:23 am
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