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ज़ख्म…जो फूलों ने दिये

मैं सो रहा था मुझे सोने देते चैन तो था अब न सो पाऊंगा और न जागा रह पाऊँगामझधार में जैसे हो नैया कोई एक विशालकाय प्रेत की मानिंद हो गया हूँ अभिशप्त तुम्हारी बनायीं मरुभूमि में शापित बना दिया नहीं सोचा तुमने अपनी महत्वाकांक्षा से ऊपर अब झेलना है मुझे शीत ताप और बरसात यूँ ...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये...
वन्दना
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  November 5, 2018, 12:46 pm
कहानियां, हमारे जीवन का आधार रही हैं आदिम काल से. जैसे जैसे सभ्यता विकसित होती गयी, कहानियाँ उसी के अनुसार आकार लेती रहीं. वक्त के साथ कहानियों के स्वरुप में भी परिवर्तन आया लेकिन कहानियों का जो मुख्य स्वरुप है वो ही पाठक/श्रोता के जेहन पर मुख्यतः कब्ज़ा जमाये रहता है. कह...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये...
वन्दना
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  September 25, 2018, 4:33 pm
किसी के जाने के बाद झरती हैं यादें रह रह ये जाना वास्तव में जाना नहीं होता जाने वाला भी तो समेटे होता है रिश्तों की धार कराता है अहसास पल पल मैं हूँ तुम्हारी ज़िन्दगी में उपस्थित कभी बूँद की तरह तो कभी नदी की तरह कभी पतझड़ की तरह तो कभी बसंत की तरह कभी सावन की रिमझिम फुहारों ...
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वन्दना
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  August 27, 2018, 1:18 pm
मेरे चेहरे पर एक जंगल उगा है मतलबपरस्ती का मेरी दाढ़ों में माँस अटका है खुदगर्जी का आँखों पर लगा है चश्मा बेहयाई का मारकाट के आईने में लहू के कतरे सहमा रहे हैं पूरी सभ्यता को भूख के ताबीज चबा रही हैं आने वाली पीढ़ियाँकोहराम और ख़ामोशी के मध्य साँसों की आवाजाही ज़िन्दगी की ...
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वन्दना
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  July 26, 2018, 11:22 am
मेरे पास उम्मीद की कोई सड़क नहीं कोई रास्ता नहीं कोई मंजिल नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास मोहब्बत का कोई महबूब नहीं कोई खुदा नहीं कोई ताजमहल नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास जीने की कोई वजह नहीं कोई आस नहीं कोई विश्वास नहीं फिर भी जिंदा हूँ मेरे पास खोने को कोई दिल नहीं कोई ...
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वन्दना
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  July 11, 2018, 12:00 pm
मेरी ये कविता शनिवार 16 जून को जयपुर से प्रकाशित होने वाले पेपर 'बुलेटिन टुडे'में प्रकाशित कविता हुई और आज @kusum kapoor जी के पति सुरेन्द्र नाथ कपूर जी द्वारा उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया गया ........दोनों साथ में लगा रही हूँ :) :) ठहरना एक खामोश क्रिया है****************************         ...
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वन्दना
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  June 30, 2018, 1:10 pm
उपन्यास लेखन एक साधना है. सिर्फ शब्दों का खेल भर नहीं. ऐसे में जब कोई पहला उपन्यास लिखता है तो पाठकों को उम्मीद होती है कुछ नया मिलेगा. पहले उपन्यास में लेखक अपने आस पास के घटनाक्रमों से प्रभावित होता है तो उनका आना लाजिमी है. जरूरी नहीं वो उनकी ज़िन्दगी का हिस्सा हों या उ...
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वन्दना
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  June 19, 2018, 12:32 pm
मैं वक्त की नदी में तैरती इकलौती कश्ती ...दूर दूर तक फैले सूने पाट और ऊपर नीला आकाश...गुनगुनाऊं गीत तो तैरता है नदी की छाती पर हिलोर बनकर तो कभी हवाएं बेशक ले जाती हैं बहाकर अपने संग...शायद पहुँचे किसी मीत तक फ़रियाद बन ...तन्हाइयों के शहर में बेबसी की आवाज़ बन....शायद दर्द बह जाए ...
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वन्दना
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  May 25, 2018, 11:35 am
जाने कैसा ये साल आया है एक के बाद एक सभी छोड़ कर जा रहे हैं. Vijay Kumar Sappattiपिछले कई सालों से एक के बाद एक मुश्किलों से गुजर रहे थे...हम ब्लॉग के वक्त से मित्र रहे और उसी दौरान उनके जीवन में पहले नौकरी की समस्या शुरू हुई जो कई सालों तक लगातार चलती रही. उसके बाद उनकी पत्नी बीमार रहीं और...
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वन्दना
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  April 25, 2018, 12:36 pm
कृष्णपक्ष से शुक्लपक्ष तक की यात्रा है ये आकाशगंगाओं ने खोल लिए हैं केश और चढ़ा ली है प्रत्यंचा खगोलविद अचम्भे में हैं ब्रह्माण्ड ने गेंद सम बदल लिया है पाला ये सृष्टि का पुनर्जन्म है लिखी जा रही है नयी इबारत मनु स्मृति से परे ये न इतिहास है न पुराणचाणक्य की शिखा काट कर ...
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वन्दना
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  April 18, 2018, 5:26 pm
सुनो देवी तुम तो नहीं हिन्दू या मुसलमानफिर कैसे देखती रहीं अन्याय चुपचापक्यों न काली रूप में अवतरित हो किया महिषासुर रक्तबीज शुम्भ निशुम्भ का नाश सुनो देवी क्या संभव है तुम्हें भी तालों में बंद रखना?फिर क्यों नहीं खोले तुमने चंड मुंडों के दिमाग क्यों नहीं दुर्गा रूप...
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वन्दना
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  April 14, 2018, 5:39 pm
जीवन का उल्लास हैं रंग. ज़िन्दगी में इंसान चाहता ही क्या है सिवाय रंगों के होने के. बिना रंगों के कैसा जीवन? कितना नीरस होता जीवन यदि उसमें रंग न होते. यहाँ तक कि प्रकृति भी समेटे हुए है जाने कितने रंग और शायद यही है कारण इंसान ने रंगों के महत्त्व को जाना , समझा और अपनाया. ऐसा...
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वन्दना
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  April 8, 2018, 4:24 pm
लड़की बोल रही है चट्टान, लिख रही है दूब...लड़की खोज रही है संसार, पा रही है खार...वाकिफ नहीं हकीकत के प्रवाह से ...लड़की बह रही है नदी सी समय के चक्रव्यूह में...नहीं जानती, तोड़ी जायेगी, मरोड़ी जाएगी, काटी जायेगी, छिली जायेगी, तपाई जायेगी तब बनेगी बांसुरी जिस पर गुनगुनायी जायेगी कोई ...
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वन्दना
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  April 4, 2018, 6:25 pm
आशा की देह से उतार दी है चमड़ी और निराशा को दी हो ऐसा भी नहीं...साजन के प्यार का तबस्सुम घूँघट की ओट में ज्यादा खिलता है...जाना जब से, खुमारी है कि उतरती ही नहीं, सोच लड़की खिल उठी. किताबी ज्ञान ही उसकी प्रथम गुरु...दिन सोने की सान चढ़ाए उगता और रातें चाँदी के केश फैला करती पदार्प...
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वन्दना
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  March 31, 2018, 5:28 pm

भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव हम नमन के सिवा तुम्हें कुछ नहीं दे सकते बदल चुकी है हवा बदल चुकी हैं प्रतिबद्धताएं वो दौर और था ये दौर और है बस इतने से समझ लेना सार आज नहीं पैदा होती वो मिटटी जिससे पैदा होते थे तुमसे लाल और सुनो ये नमन भी बस कुछ सालों तक चलेगा आने वाला दौर शायद ...
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वन्दना
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  March 23, 2018, 12:03 pm
आपका लिखा कभी जाया नहीं होता इसका उदाहरण है ये कि हिंदी समय पर मेरी कवितायें शामिल हैं. वहाँ प्रोफ़ेसर संजीव जैन जी ने पढ़ीं और बिजूका समूह जो व्हाट्स एप पर बनाया गया है उस पर शेयर कीं. उसके बाद मुझसे 10 नयी कवितायें मांगी गयीं जिन्हें आज 'बिजूका'ब्लॉग पर स्थान मिला है. Satya Patel...
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वन्दना
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  December 8, 2017, 4:37 pm
 सुधा ओम ढींगरा जी का कहानी संग्रह 'सच कुछ और था'मिले तो शायद २ महीने बीत गए. पढ़ भी लिया गया था बस लिख नहीं पायी क्योंकि बीच में एक महीना मैं खुद लिखने पढने से दूर रही. आज वक्त और मूड दोनों ने साथ दिया तो कलम चल निकली. लेखिका का लेखन ही उसकी पहचान का सशक्त हस्ताक्षर है इसलिए ...
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वन्दना
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  November 27, 2017, 4:29 pm
गोली और गाली जो बन चुके हैं पर्यायवाची इस अंधे युग की बनकर सौगात लगाते हैं ठिकाने बडबोली जुबान को तुम , तुम्हारी जुबान और तुम्हारी कलम रहन है सत्ता की नहीं बर्दाश्त सत्ता को कलम का अनायास चल जाना बन्दूक की निकली गोली सा गर करोगे विद्रोह तो गोली मिलेगी और मरने के बाद गाल...
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वन्दना
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  September 9, 2017, 4:44 pm
सपनों की लुगदी बनाओ और चिपका लेना ज़िन्दगी का फटा पन्ना उसने कहा था ......और मैंने ब्रह्म्वाक्य मान किया अनुसरण आज हारे हुए सपनों की भीड़ में खड़ीपन्ना पन्ना अलग कर रही हूँ तो हर पन्ना मुंह चिढ़ा रहा है मानो कह रहा है सपने भी कभी सच होते हैं ...........और मेरे हारे हुए सपनो...
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वन्दना
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  September 3, 2017, 1:15 pm
अम्बुआ की डाली पर चाहे न कुहुके कोयलकिसी अलसाई शाम से चाहे न हो गुफ्तगू कोई बेनामी ख़त चाहे किसी चौराहे पर क्यों न पढ़ लिया जाए ज़िन्दगी का कोई नया शब्दकोष ही क्यों न गढ़ लिया जाये अंततः बातें हैं बातों का क्या ...अब के देवता नहीं बाँचा करते यादों की गठरी से ... मृत्युपत्र न दिन...
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वन्दना
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  August 16, 2017, 1:28 pm
चलिए शोक मनाईये ... दो मिनट का मौन रखिये ... एक समिति गठित कीजिये और विभागीय कार्यवाही करिए ...... बस इतना करना काफी है उनके घावों पर मरहम लगाने को और पूरा घाव ठीक करने को २०-२५ लाख दे कर कर दीजिये इतिश्री अपने कर्तव्य की .....आखिर सरकार माई बाप हैं आप और माई बाप को सिर्फ एक को ही थो...
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वन्दना
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  August 13, 2017, 12:19 pm
ये मेरी हत्या का समय है न कोई पूर्वाभास नहीं कोई दुर्भाव नहीं बस जानता हूँ तलवारों की दुधारी धार को मैं विवश हूँ स्वीकारने को नियति धिक्कारने को प्रगति जिसकी बिनाह पर हो रहे हैं कत्ले आम धरोहरें सहमी खड़ी हैं अपनी बारी की प्रतीक्षा में बाढ़ में बहते धान की चीखें कब किसी क...
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वन्दना
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  August 1, 2017, 9:00 am
Maitreyi Pushpaजी की लिखी संस्मरणात्मक पुस्तक पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षा "शिवना साहित्यिकी"के जुलाई-सितम्बर 2017 अंक में प्रकाशित हुई है ......जो चित्र में न पढ़ पायें उनके लिए यहाँ भी लगा रही हूँ....शिवना प्रकाशन की हार्दिक शुक्रगुजार हूँ जो उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया को प्रकाशित ...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये...
वन्दना
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  July 24, 2017, 1:56 pm
 साइटिका के दर्द से बोझिल पिता नहीं रह पाते खड़े कुछ पल भी मगर जब भी करते हैं बस में सफ़र नहीं देते दुहाई किसी को कि बुजुर्गों के लिए होते हैं विशेष प्रावधान अपनी जगह बैठा देते हैं जवान बेटी को कि जानते हैं ज़माने का चलन आदिम सोच से टपकती बेशर्मी करती है मजबूर खड़े रहने को ...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये...
वन्दना
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  July 18, 2017, 11:50 am
कुछ पन्ने हमेशा कोरे ही रह जाते हैं उन पर कोई इबारत लिखी ही नहीं जाती एक शून्य उनमे भी समाहित होता है बिलकुल वैसे ही जैसे सामने टीवी चल रहा है आवाज़ कान पर गिर रही है मगर पहुँच नहीं रही जहाँ पहुंचना चाहिए एक शून्य उपस्थित है वहां भी सब कुछ है फिर भी कुछ न होने का अहसास तारी ...
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वन्दना
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  July 3, 2017, 11:32 am
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