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बेचैन आत्मा

ठंडी में बेगमपुरा मिली। और सभी ट्रेनें अत्यधिक लेट हैं। यह भी अपने समय के अनुसार अत्यधिक लेट है मगर रोज के यात्रियों के समय पर है। नेट में ट्रेनों का समय देख सभी अपने-अपने दड़बे से निकल सीटी स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर जमा हो गए। प्लेटफार्म के बाहर नगर पालिका ने आज गीली लकड...
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Tag :लोहे का घर
  February 4, 2018, 7:34 pm
सभी अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से बजट बनाते हैं। सरकार और व्यापारी साल भर का, आम आदमी महीने भर का और गरीब आदमी का बजट रोज बनता/बिगड़ता है। सरकारें घाटे का बजट बना कर भी विकास का घोड़ा दौड़ा सकती है लेकिन आम आदमी घाटे का बजट बनाकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है। आम आ...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  January 28, 2018, 7:57 pm
जब कोई ट्रेन हवा से बातें करते हुएपुल पार करती हैबहुत शोर करता हैपुलशांत दिखती हैनदी।आदमियों कोलोहे के घर में बैठबिना छुएऊपर ऊपर से यूं जाते देखदुख तो होता होगा नदी को?क्या जानेकितना रोई होजब बन रहा थापुल!किसी केचन्द सिक्के फेंक देने सेखुश हो जाती होगी?हमारे सिक...
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Tag :ट्रेन
  January 28, 2018, 1:14 pm
काशी में मराठी भाषा का एक कथन मुहावरे की तरह प्रयोग होता रहा है.. "काशी मधे दोन पण्डित, मी अन माझा भाऊ! अनखिन सगड़े शूंठया मांसह।"जजमान को लुभाने के लिए कोई पण्डित कहता है.. काशी में दो ही पण्डित हैं, एक हम और दूसरा हमारा भाई। बाकी सभी मूर्ख मानव हैं। ऐसे ही हमारे देश के लोकत...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  January 20, 2018, 7:29 pm
एक बार बलिया के पशु मेले में गए थे, एक बार दिल्ली के पुस्तक मेले में। दोनों मेले में बहुत भीड़ आई थी। जैसे पशु मेले में लोग पशु खरीदने कम, देखने अधिक आए थे वैसे ही पुस्तक मेले में भी लोग पुस्तक खरीदने कम, देखने अधिक आए थे। दर्शकों के अलावा दोनों जगह मालिकों की भीड़ थी। कहीं...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  January 14, 2018, 1:17 pm
लोहे के घर में तास खेलने वालों की मंडली में एक सदस्य कम था और तीन साथियों ने मुझे खेल से जोड़ लिया। उधर कलकत्ता जा रहे बंगाली परिवार के बच्चों का झुंड शोर मचा रहा था, इधर मेरे बगल में बैठकर कनाडा से भारत दर्शन के लिए आईं एक गोरी मेम पुस्तक पढ़ रही थीं। मेरा ध्यान कभी बच्चो...
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Tag :लोहे का घर
  January 7, 2018, 9:56 am
देर सबेर प्लेटफार्म पर ट्रेन आ गई तो ट्रेन को देखते ही रोज के यात्रियों की पहली समस्या होती है कि किस बोगी में चढ़ें? 60 किमी की दूरी के लिए बर्थ रिजर्व तो होता नहीं। लगभग सभी ए सी क्लास के यात्री होते हैं जो जनरल की भीड़ में रोज चल सकते नहीं। रोज के यात्रियों के लिए रेल...
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Tag :लोहे का घर
  December 24, 2017, 10:50 am
सुबह उठा तो देखा-एक मच्छर मच्छरदानी के भीतर! मेरा खून पीकर मोटाया हुआ,करिया लाल। तुरत मारने के लिए हाथ उठाया तो ठहर गया। रात भर का साफ़ हाथ सुबह अपने ही खून से गन्दा हो, यह अच्छी बात नहीं। सोचा, उड़ा दूँ। मगर वो खून पीकर इतना भारी हो चूका था क़ि गिरकर बिस्तर पर बैठ गया! मैं जैसे...
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Tag :सुबह की बातें
  December 17, 2017, 7:39 pm
भण्डारी स्टेशन जौनपुर के प्लेटफार्म नंबर 1 पर एक ट्रेन दुर्ग-नौतनवां 18201आधे घंटे से अधिक समय से खड़ी है। दुर्ग से आई है और शाहगंज आजमगढ़ होते हुए गोरखपुर नौतनवां जाना है। इसके परेशान यात्री गोल बनाकर स्टेशन मास्टर के कमरे के बाहर खड़े हैं। स्टेशन मास्टर यहां नहीं बैठ...
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Tag :लोहे का घर
  December 17, 2017, 1:00 pm
जिंदगीचार दिन की नहींफकतएक दिन की होती है।हर दिननई सुबहनया दिननई शाम और..अंधेरी रात होती है।सुबहबच्चे सापंछी-पंछी चहकताफूल-फूल हंसतादिनजैसे युवाकभी घोड़ाकभी गदहाकभी शेरकभी चूहाशामजैसे प्रौढ़ढलने को तैयारभेड़-बकरी की तरहगड़ेरिए के पीछे-पीछेचलने को मजबूररातजैस...
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Tag :दर्शन
  December 17, 2017, 12:39 pm
मेहमान नवाजी शब्द में वो मजा नहीं है जो अतिथि सत्कार में है.  मेहमान का स्वागत तो मोदी जी भी कर सकते  है,अतिथि का कर के दिखाएँ तो जाने! मेहमान वो जो बाकायदा प्रोटोकाल दे कर आये. फलां तारिख को, फलां गाडी से, फलां समय आयेंगे. ये घूमना है, यह काम है और इतने बजे लौट जायेंगे. सब क...
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Tag :व्यंग्य की जुगलबंदी
  December 10, 2017, 2:13 pm
यह मेरा नया ब्लॉग है. इसमें सारनाथ के चित्र, उससे सम्बन्धित जानकारी और प्रातः भ्रमण के दौरान मन में आये विचार सुबह की बातें शीर्षक से प्रकाशित करने का मूड बनाया है. कोशिश है कि आज नहीं तो कल सारनाथ के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए यह एक बढ़िया लिंक बने. इस ब्लॉग से ज...
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Tag :
  December 10, 2017, 10:06 am
लघुशंका जाने से पहले पत्नी को जगा कर गये हैं वृद्ध। पत्नी की नींद टूटी। पहले बैग की तरफ निगाह थी, अब करवट बदल ऊपर के बर्थ की ओर मुंह कर सीधे लेटी हैं। नींद में दिखती हैं पर नींद में नहीं हैं। चौकन्नी हैं। सोच रही होंगी.. "सामने बैठा अधेड़ बड़ा स्मार्ट बन मोबाइल चला रहा है, द...
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Tag :लोहे का घर
  December 8, 2017, 10:41 pm
साइकिल ले कर भोर में सैर को निकला तो मॉर्निंग हो ही रही थी और थोड़ा गुड-गुड लगना शुरू ही हुआ था।  पूरा गुड लगता कि सजे हुए मैरिज लॉन दिखने लगे। भीगी_पलकेंका समय था। बिदाई की बेला थी। घर की अजोरिया परायों की होने वाली थी। अपना भी मन शोकाकुल हो इससे पहले तेज पैडिल मार कर आग...
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Tag :व्यंग्य
  December 2, 2017, 1:16 pm
ट्रेन ने बदली पटरियाँ लोहे के घर की खिड़की से हौले से आई और..दाएं गाल को चूमकर गुम हो गई जाड़े की धूप।..........पुत्रों को सौंपधानी चुनरियासन बाथ ले रही हैधरती माँपटरी पर चल रही हैअपनी गाड़ी।........सुबह के समय लोहे के घर की खिड़कियों से दिखते हैं सुनहरे धूप में नहाए स्वर्णिम ख...
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Tag :लोहे का घर
  November 29, 2017, 10:45 am
जब कोई बड़ा लेखक मरता हैहमारे पास आता है।अखबारें करती हैंउनकी चर्चाछापती हैंउनकी कविताएं, संस्मरण, कृतियाँ और,..पुरस्कारों के नाम।जब कोई बड़ा लेखक मरता हैयकबयकजागृत हो जाता हैमृतप्रायः साहित्यिक समाजचमकने लगती हैंगोष्ठियाँराजनैतिक चर्चा छोड़चाय पान की अढ़ियों मेंह...
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Tag :व्यंग्य
  November 29, 2017, 10:21 am
हम नहीं करेंगेतुम नहीं करोगेलेकिन वह जरूर करेगाजिसे सहन नहीं होगासंघर्ष तो होगा।उतनी ही चलती है तानाशाहीजितनी झुक पाती हैरीढ़ की हड्डीउतना ही रो पाती हैंआँखेंजितने होते हैंआँसूपांच गांव मिल जातातो क्यामहाभारत होता?संघर्ष तो होगा।झूठ की ही नहींआँच अधिक होने परफ...
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Tag :
  November 29, 2017, 10:18 am
सुबह का समय है, लोहे के घर की खिड़की है और सामने हरे-भरे खेतों में दूर दूर तक फैली जाड़े की धूप। #ट्रेन छोटे छोटे स्टेशनों पर रुकती है, अपनी वाली की प्रतीक्षा में खड़े लोग दिखते हैं फिर ट्रेन चल देती है। लगभग हम उम्र पॉच बच्चों के साथ बैठी एक देहातन देर तक याद आती है। लग...
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Tag :यात्रा
  November 19, 2017, 11:27 am
आज छठ की भीड़ है लोहे के घर में। साइड अपर में सामानों के बीच चढ़ कर बैठ गए हैं हम। सामने एक महिला ऊपर के बर्थ पर दो बच्चों को टिफिन में रखा दाना चुगा रही हैं। चूजे कभी इधर फुदकते हैं, कभी उधर। गिरने-गिरने को होते हैं कि मां हाथ बढ़ाकर संभाल लेती हैं। बगल के बर्थ में एक लड...
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Tag :
  November 19, 2017, 8:54 am
रेलगाड़ी में बैठ कर रेलगाड़ी पर व्यंग्य लिखने का मजा ही कुछ और है। बन्दा जिस थाली में खायेगा उसी में तो छेद कर पायेगा। दूसरा कोई अपनी थाली क्यों दे भला? पुराने देखेगा और नया बनाकर सबको दिखायेगा। ट्रेन में चलने वाले ही ट्रेन को समझ सकते हैं। हवा में उड़ने वाले जमीनी हकीकत स...
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Tag :लोहे का घर
  September 16, 2017, 10:28 am
धर्म और अधर्म का अर्थ समझाते हुए तुलसी दास जी लिखते हैं...परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।परोपकार के बड़ा कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है।वे यहीं नहीं रुकते। आगे जटायू सन्दर्भ में लिखते हैं..परहित बस जिनके मन माहीं।तिन्ह ...
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Tag :निबन्ध
  September 9, 2017, 9:45 pm
सुबह (दफ्तर जाते समय)ट्रेन हवा से बातें कर रही है। इंजन के शोर से फरफरा के उड़ गए धान के खेत में बैठे हुए बकुले। एक काली चिड़िया उम्मीद से है। फुनगी पकड़ मजबूती से बैठी है। गाँव के किशोर, बच्चे सावन में भर आये गढ्ढे/पोखरों के किनारे बंसी डाल मछली मार रहे हैं। क्या बारिश के साथ...
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Tag :लोहे का घर।
  September 2, 2017, 12:36 pm
बारिश से पहलेतेज हवा चली थीझरे थेकदम्ब के पातछोटे-छोटे फलदुबक कर छुप गये थेफर-फर-फर-फरउड़ रहे परिंदेतभी उमड़-घुमड़ आयेबदरी-बदराझम-झम बरसेबादलसुहाना हो गया मौसमबारिश के बाद सहमे से खड़े थेसभी पेड़-पौधेकोई बात ही नहीं कर रहा थाकिसी से!सबसे पहलेबुलबुल चहकीकोयल ने छेड़ी लम्बी...
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Tag :प्रकृति
  September 2, 2017, 9:54 am
कर्फ्यू वाले दिनों में बनारस की गलियाँ आबाद, गंगा के घाट गुलजार हो जाते । इधर कर्फ्यू लगने की घोषणा हुई, उधर बच्चे बूढ़े सभी अपने-अपने घरों से निकल कर गली के चबूतरे पर हवा का रुख भांपने के लिए इकठ्ठे हो जाते। बुजुर्ग लड़कों को धमकाते..अरे! आगे मत जाये!!बनारस की गलियों में लड़क...
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Tag :व्यंग्यकीजुगलबन्दी
  August 22, 2017, 11:29 pm
नदीअब वैसी नहीं रहीनदी में तैरते हैंनोटों के बंडल, बच्चों की लाशेंगिरगिट हो चुकी हैनदी!माझी नहीं होतानदी की सफाई के लिए जिम्मेदारवो तो बस्सइस पार बैठो तोपहुँचा देगाउस पारनदीके मैली होने के लिए जिम्मेदार हैंइसमें गोता लगानेऔरहर डुबकी के साथपाप कटाने वालेपाप ऐसे कट...
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Tag :व्यंग्य
  August 18, 2017, 11:15 pm
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