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Blog: बेचैन आत्मा

Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
सरकारी नौकरों कोकाम के बदलेवेतन दिया जाता हैलेकिन वेइससे संतुष्ट नहीं होतेअधिकार ढूँढते हैं!जबकिउनके हिस्से कीकानूनी वसीयत में,अधिकार शब्दहोता ही नहीं,दायित्व होता है।कुछ तोबड़े खुशफहमी में जीते हैंदायित्व को,अधिकार की शराब मेंघोलकर पीते हैं।ज्यों-ज्योंदायित्... Read more
clicks 10 View   Vote 0 Like   12:51pm 10 Sep 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
पाण्डे जी का चप्पल.................................जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था। चढ़े तो अपनी बर्थ पर किसी को सोया देख, प्रेम से पूछे.…भाई साहब! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? वह शख्स पाण्डे जी की तरह शरीफ नहीं था। हाथ नचाते हुए, मुँह घुमाकर बोला...य... Read more
clicks 23 View   Vote 0 Like   11:01am 18 Aug 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?.................................न जाने कौन टेसन उतरेगा, बनारस से चढ़ा, पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में घुस कर, सफर कर रहा देसी कुत्ता! सौ/दो सौ किमी की यात्रा के बाद जब वह उतरेगा ट्रेन से तो उस पर कितना भौंकेंगे अनजान शहर के कुत्ते! क्या जी पायेगा चैन से? क्या हो जाएग... Read more
clicks 3 View   Vote 0 Like   10:55am 18 Aug 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
वह अस्तबल नहीं, देश का जाना माना, एक प्राइवेट प्रशिक्षण संस्थान था जहाँ देश भर से घोड़े उच्च शिक्षा के लिए आते। संस्थान में कई घोड़े थे। मालिक चाहता कि सभी घोड़े और तेज दौड़ें. और तेज..और तेज। इस 'और'की हवस को पाने के लिए वह अनजाने में ही घोड़ों के प्रति क्रूर होता चला गया। धीरे-ध... Read more
clicks 88 View   Vote 0 Like   2:55pm 14 Jul 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, अनचाहे प्लेटफार्म पर, कोई युवा रुक जाता है। ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। मैं बाहर उतरकर देखने लगा..माजरा क्या है? कब होगा हरा सिगनल?मेरे इ... Read more
clicks 60 View   Vote 0 Like   7:03am 12 Jul 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
इस मौसम की पहली बारिश हुई जफराबाद स्टेशन में। झर्र से आई, फर्र से उड़ गई। ढंग से सूँघ भी नहीं पाए, माटी की खुशबू। प्रयागराज जाने वाली एक पैसिंजर आ कर भींगती हुई खड़ी हो गई। बड़ी इठला रही थी! गार्ड ने हरी झण्डी दिखाई तो कूँ€€€ चीखते, शोर मचाते/भींगते चली गई। अभी थोड़ी दूर नहीं ग... Read more
clicks 49 View   Vote 0 Like   3:51am 22 Jun 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
        गंगा की लहरें, नाव, बाबूजी और तीन बच्चे। इन तीन बच्चों में मैं नहीं हूँ। तब मेरा जन्म ही नहीं हुआ था।पिताजी के साथ अपनी बहुत कम यादें जुड़ी हैं लेकिन जो भी हैं, अनमोल हैं। सबसे छोटा होने के कारण मैं उनका दुलरुआ था। इतना प्यारा कि शायद ही कोई मेरा बड़ा भाई हो जिसन... Read more
clicks 70 View   Vote 0 Like   5:33am 18 Jun 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
गरमी के तांडव से घबराकर घुस गए ए. सी. बोगी में। दम साधकर बैठे हैं लोअर बर्थ पर। बाहर प्रचण्ड गर्मी, यहाँ इतनी ठंडी कि यात्री चादर ओढ़े लेटे हैं बर्थ पर! ए. सी.बोगी में गरमी तांडव नहीं कर पाती, गेट के बाहर चौकीदार की तरह खड़ी हो, झुनझुना बजाती है। पैसा वह द्वारपाल है जो हर मौसम क... Read more
clicks 38 View   Vote 0 Like   5:28am 18 Jun 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
इतने तनाव में क्यों हो? धूप में पैदल चलकर आ रहे हो? नहीं भाई, समाचार देख कर आ रहा हूँ। अरे! रे! रे! इतना जुलुम क्यों किया अपने ऊपर? जेठ की दोपहरी में दस किमी पैदल चलना मंजूर, समाचार देखना नामंजूर। क्या बताएं यार! आज छुट्टी थी, कोई काम भी नहीं था, बाहर धूप थी, सोचा समाचार ही ... Read more
clicks 23 View   Vote 0 Like   5:16am 18 Jun 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
कुछ शब्द दोउछालूँ दर्द भर कर हवा मेंनभ चीर कर बरसें बादल उमड़-घुमड़भर जाएताल-तलैयों सेधरती का ओना-कोनाहरी-भरी होधरती।कुछ शब्द दोतट पर जाअंजुलि-अंजुलि चढ़ाऊँस्वच्छ/निर्मलकल-कल बहने लगेगंगा।कुछ शब्द दोगूँथ कर पाप, सारे जहाँ केहवन कर दूँबोल दूँ..स्वाहा!शब्दों से हो सकता ह... Read more
clicks 70 View   Vote 0 Like   4:30pm 4 Jun 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
बुद्धिजीवी वह जो खाली पेट तो भगवान से भोजन की याचना करे और जब पेट भरा हो, उसी भगवान को गाली देने में रत्ती भर भी संकोच न करे। बुद्धिजीवी वह परजीवी होता है जो खुद को सबसे बड़ा श्रमजीवी समझता है। बुद्धिजीवी वह जो चौबीस घण्टे काम करे मगर अपने कुर्ते में धूल की हल्की-सी परत भी ... Read more
clicks 62 View   Vote 0 Like   11:52am 31 May 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
पिता स्वर्ग में रहतेघर मेंबच्चों के संगमां रहती थीं।बच्चों के सुख की खातिरजाने क्या-क्यादुःख सहती थीं।क्या बतलाएं साथी तुमकोमेरी अम्माक्या-क्या थीं?देहरी, खिड़की,छत-आंगनघर का कोना-कोना थीं।चोट लगे तोमरहम मां थींभूख लगे तोरोटी मां थींमेरे मन की सारी बातेंसुनने वा... Read more
clicks 57 View   Vote 0 Like   3:14pm 13 May 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
वहघाट की ऊँची मढ़ी पर बैठनदी में फेंकता हैकंकड़!नदी किनारेनीचे घाट पर बैठे बच्चेखुश हो, लहरें गिनने लगते हैं...एक कंकड़कई लहरें!एक, दो...सात, आठ, नौ दस...बस्स!!!वहऊँची मढ़ी पर बैठनदी में,दूसरा कंकड़ फेंकता है..।देखते-देखते,गिनते-गिनतेबच्चे भी सीख जाते हैंनदी में कंकड़ फेंकनापहले स... Read more
clicks 71 View   Vote 0 Like   7:50am 12 May 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
अच्छा हैबनारस कीपूरी एक युवा पीढ़ीदेखे बिनाजवान हो गई लेकिनअपने किशोरावस्था मेंहमने खूब देखेकर्फ्यू।गंगा तट के ऊपर फैलेपक्के महाल की तंग गलियों मेंकर्फ्यू का लगनाबुजुर्गों के लिएचिंता का विषय,बच्चों/किशोरों/युवाओं के लिएउत्सव के शुरू होने काआगाज़ होता था!स्कूलों... Read more
clicks 80 View   Vote 0 Like   2:43pm 27 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
बनारस की एक गलीगली में चबूतराचबूतरे पर खुलतीबड़े से कमरे की खिड़कीखिड़की से झाँकोकमरे में टी.वी.टी.वी. में दूरदर्शनएक से बढ़कर एकसीरियलहम लोग, बुनियाद, नीम का पेड़सन्डे की रंगोली, चित्रहार, रामायण..सुबह हो या शामतिल रखने की खाली जगह भी न होती थीचबूतरे से कमरे तकजब शुरू होते ... Read more
clicks 122 View   Vote 0 Like   7:09am 25 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
लोहे के घर की खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं एक वृद्ध। सामने की खिड़की पर उनकी श्रीमती जी बैठी हैं। वे भी देख रही हैं तेजी से पीछे छूटते खेत, घर, मकान, वृक्ष....। ढल रहे हैं सुरुज नारायण। तिरछी होकर सीधे खिड़की से घर में घुस रही हैं सूरज की किरणें। जल्दी-जल्दी, बाय-बाय, हाय-हैलो कर ल... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   6:28am 24 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
गली मेंबच्चे खेलते थेक्रिकेटबड़ेपान की दुकान के पासखड़े-खड़ेदेर तकसुनते रहते थे कमेंट्रीबूढ़ेचबूतरे पर बैठ करकोसते रहते थे..क्रिकेट ने बरबाद कर दियादेश को।देश कितना बर्बाद हुआ, नहीं पता!टेस्ट, वन डे, ट्वेंटी-ट्वेन्टीघरेलू, विश्वकप, आई.पी.यलक्रिकेट का इतना फैला बाजा... Read more
clicks 26 View   Vote 0 Like   6:19am 24 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
ढूँढ रहा था अपने ही शहर की गलियों में भटकते हुए बचपन का कोई मित्र जिसके साथ खेले थे हमने आइस-पाइस, विष-अमृत या लीलो लीलो पहाड़िया. हार कर बैठ गया पान की एक दुकान के सामने चबूतरे पर. बड़ी देर बाद एक बुढ्ढा नजर आया. बाल सफ़ेद लेकिन चेहरे में वही चमक. ध्यान से देखा तो वही बचानू था! ज... Read more
clicks 30 View   Vote 0 Like   7:27am 21 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
गली में भीड़ देखठिठक जाते थे कदमघुसकरझाँकते थे हम भीचबूतरे परबिछी होती थीशतरंज की बाजीखेलने वाले तोदो ही होते थेचाल बताने वाले होते थेकई।हर मोहल्ले में थींदो/चारचाय और पान की दुकानेंदुकानों के पासचबूतरों परसजती थीं अड़ियाँहोती थींखेल, फ़िल्म, नाटक, संगीत, साहित्य और..... Read more
clicks 89 View   Vote 0 Like   1:33pm 20 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
सोम से रवि तकअलग-अलगसभी भगवानों के दिन निर्धारित हैं।जब हम छोटे थेजाते थे समय निकालनिर्धारित वारनिर्धारित भगवान के दरबारसोमवार-विश्वनाथ जी,मंगलवार-संकटमोचन,बुद्धवार-बड़ा गणेश,बी वार-बृहस्पति भगवान,शुक्रवार-संकठा जी,शनिवार-शनिदेव,रविवार-काशी के कोतवाल, भैरोनाथ के ... Read more
clicks 45 View   Vote 0 Like   6:40pm 19 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
चबूतरे पर बैठे होते थेप्याऊबड़े-से मिट्टी के घड़े में लेकरठंडा-ठंडा पानीपेट भर पीते थे हमहोने पर कभी दे भी देेते थेएक पइसा, दो पइसा या फिर पूरे पाँच पैसे भीलेकिन नहीं माँगता था कभीअपने मुँह सेएक पइसा भीप्याऊ!गर्मी की दोपहरी मेंबनारस की गली में।.........................सहमकरचढ़ जाते... Read more
clicks 44 View   Vote 0 Like   5:59pm 19 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
ढेरा सारादाल-भात, साग-सब्जी खाकरमस्त सांड़-साखिड़की के पासपसर जाता था तोंदियलभरता रहता थाजोर-जोर खर्राटेपास बैठी उसकी पत्नीनिरीह गाय-सीघुमाती रहती थीगोल-गोलघिर्रीदार हाथ का पंखापर्दा हटाकरखिड़की से घर मेंझांकना चाहता थापूरा शहरझांक पाते थे मगरकुछ मेरी ही उम्र क... Read more
clicks 24 View   Vote 0 Like   5:55pm 19 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
उस गली सेलगते थे नारे..दो बैलों की जोड़ी हैएक अंधा एक कोढ़ी है।इस गली सेलगते थे नारे...जिस दिये में तेल नही हैवह दिया बेकार है।पता नहींवे गर्मियों के दिन थे या जाड़े केपर याद हैहम भीनिकलते थे घर सेइन्कलाब जिंदाबाद कोतीन क्लास जिंदाबाद कहते हुएबनारस की गली में।........................... Read more
clicks 85 View   Vote 0 Like   5:52pm 19 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
खिड़की के रास्तेकमरे मेंआ ही जाते हैंकबूतरमैने इन्हें कई बार कहा..कहाँ तुम शांति के प्रतीक,कहाँ यह सरकारी कार्यालय!यहाँ मत आओ।तुम चाहे जितने भी निर्बल वर्ग के हो,इसमें तुम्हारा कोई स्थान नहीं!प्राकृतिक संसाधनों परहम मनुष्यों का हो चुका है सम्पूर्ण कब्जा,आरक्... Read more
clicks 138 View   Vote 0 Like   1:48pm 9 Apr 2019
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
जब तक एक भी बनारसी में फक्कड़पन है तब तक यह वाक्य सत्य है कि बनारस में मोक्ष मिलता है। मोक्ष मतलब आवागमन से मुक्त हो जाना। लाभ/हानी से मुक्त हो जाना। जय/पराजय से मुक्त हो जाना। यश/अपयश से मुक्त हो जाना। अपने/पराए से मुक्त हो जाना। मुक्त होने के लिए मुक्त करना आना चाहिए। त... Read more
clicks 115 View   Vote 0 Like   8:37am 24 Mar 2019
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