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Blog: बेचैन आत्मा

Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
पत्नी की रहनुमाई में,दिवाली की सफाई में,दृश्य एक दिखलाता हूँक्या पाया, बतलाता हूँ।एक पुराना बक्सा थाजिसमें मेरा कब्जा थाजब बक्सा मैने खोलाधक से मेरा दिल डोलाएक गुलाबी रुमाल मिलातीर चुभा दिलदार मिलाऔर टटोला भीतर तोअक्षर अक्षर प्यार मिलाखत में प्यारी बातें थींधूप छ... Read more
clicks 30 View   Vote 0 Like   4:24am 27 Oct 2019 #दिवाली
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
बिना चीनी की चाय और प्रातः भ्रमण की आदत को देख,मेरे एक सहकर्मी ने मन ही मन मान लिया,मुझे मधुमेह है!एक दिन लंच में उसने मुझेरसगुल्ले खाते देखा!डिनर के बादबर्फी उड़ाते देखा!!!तो उससे रहा न गया..मेरी तरफ तंज कसते हुएसांकेतिक भाषा मेंमुझे सुनाते हुए, दूसरे से कहने लगा...कु... Read more
clicks 52 View   Vote 0 Like   3:01am 25 Sep 2019 #हास्य-व्यंग्य
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
पहले सुबह होती थी, शाम होती थी, अब लोहे के घर में, पूरी रात होती है। वे दिन, रोज वाले थे। ये रातें, साप्ताहिक हैं। बनारस से जौनपुर की तुलना में, बनारस से लखनऊ की दूरी लंबी है। रोज आना जाना सम्भव नहीं है। ये रास्ते सुबह/शाम नहीं, पूरी रात निगल जाते हैं और उफ्फ तक नहीं करते!लखनऊ ... Read more
clicks 93 View   Vote 0 Like   5:59am 21 Sep 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
सरकारी नौकरों कोकाम के बदलेवेतन दिया जाता हैलेकिन वेइससे संतुष्ट नहीं होतेअधिकार ढूँढते हैं!जबकिउनके हिस्से कीकानूनी वसीयत में,अधिकार शब्दहोता ही नहीं,दायित्व होता है।कुछ तोबड़े खुशफहमी में जीते हैंदायित्व को,अधिकार की शराब मेंघोलकर पीते हैं।ज्यों-ज्योंदायित्... Read more
clicks 41 View   Vote 0 Like   12:51pm 10 Sep 2019 #
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
पाण्डे जी का चप्पल.................................जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था। चढ़े तो अपनी बर्थ पर किसी को सोया देख, प्रेम से पूछे.…भाई साहब! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? वह शख्स पाण्डे जी की तरह शरीफ नहीं था। हाथ नचाते हुए, मुँह घुमाकर बोला...य... Read more
clicks 44 View   Vote 0 Like   11:01am 18 Aug 2019 #हास्य-व्यंग्य
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
क्या मैं सही ट्रेन में बैठा हूँ?.................................न जाने कौन टेसन उतरेगा, बनारस से चढ़ा, पैसिंजर ट्रेन के बाथरूम में घुस कर, सफर कर रहा देसी कुत्ता! सौ/दो सौ किमी की यात्रा के बाद जब वह उतरेगा ट्रेन से तो उस पर कितना भौंकेंगे अनजान शहर के कुत्ते! क्या जी पायेगा चैन से? क्या हो जाएग... Read more
clicks 12 View   Vote 0 Like   10:55am 18 Aug 2019 #लोहे का घर
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
वह अस्तबल नहीं, देश का जाना माना, एक प्राइवेट प्रशिक्षण संस्थान था जहाँ देश भर से घोड़े उच्च शिक्षा के लिए आते। संस्थान में कई घोड़े थे। मालिक चाहता कि सभी घोड़े और तेज दौड़ें. और तेज..और तेज। इस 'और'की हवस को पाने के लिए वह अनजाने में ही घोड़ों के प्रति क्रूर होता चला गया। धीरे-ध... Read more
clicks 132 View   Vote 0 Like   2:55pm 14 Jul 2019 #व्यंग्य
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। उस प्लेटफॉर्म पर रुकी थी जहाँ उसे नहीं रुकना चाहिए। ऐसे रुकी थी जैसे पढ़ाई पूरी करने के बाद, नौकरी की तलाश में, अनचाहे प्लेटफार्म पर, कोई युवा रुक जाता है। ट्रेन बहुत देर से रुकी थी। मैं बाहर उतरकर देखने लगा..माजरा क्या है? कब होगा हरा सिगनल?मेरे इ... Read more
clicks 114 View   Vote 0 Like   7:03am 12 Jul 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
इस मौसम की पहली बारिश हुई जफराबाद स्टेशन में। झर्र से आई, फर्र से उड़ गई। ढंग से सूँघ भी नहीं पाए, माटी की खुशबू। प्रयागराज जाने वाली एक पैसिंजर आ कर भींगती हुई खड़ी हो गई। बड़ी इठला रही थी! गार्ड ने हरी झण्डी दिखाई तो कूँ€€€ चीखते, शोर मचाते/भींगते चली गई। अभी थोड़ी दूर नहीं ग... Read more
clicks 68 View   Vote 0 Like   3:51am 22 Jun 2019 #
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
        गंगा की लहरें, नाव, बाबूजी और तीन बच्चे। इन तीन बच्चों में मैं नहीं हूँ। तब मेरा जन्म ही नहीं हुआ था।पिताजी के साथ अपनी बहुत कम यादें जुड़ी हैं लेकिन जो भी हैं, अनमोल हैं। सबसे छोटा होने के कारण मैं उनका दुलरुआ था। इतना प्यारा कि शायद ही कोई मेरा बड़ा भाई हो जिसन... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   5:33am 18 Jun 2019 #
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
गरमी के तांडव से घबराकर घुस गए ए. सी. बोगी में। दम साधकर बैठे हैं लोअर बर्थ पर। बाहर प्रचण्ड गर्मी, यहाँ इतनी ठंडी कि यात्री चादर ओढ़े लेटे हैं बर्थ पर! ए. सी.बोगी में गरमी तांडव नहीं कर पाती, गेट के बाहर चौकीदार की तरह खड़ी हो, झुनझुना बजाती है। पैसा वह द्वारपाल है जो हर मौसम क... Read more
clicks 55 View   Vote 0 Like   5:28am 18 Jun 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
इतने तनाव में क्यों हो? धूप में पैदल चलकर आ रहे हो? नहीं भाई, समाचार देख कर आ रहा हूँ। अरे! रे! रे! इतना जुलुम क्यों किया अपने ऊपर? जेठ की दोपहरी में दस किमी पैदल चलना मंजूर, समाचार देखना नामंजूर। क्या बताएं यार! आज छुट्टी थी, कोई काम भी नहीं था, बाहर धूप थी, सोचा समाचार ही ... Read more
clicks 35 View   Vote 0 Like   5:16am 18 Jun 2019 #व्यंग्यकीजुगलबन्दी
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
कुछ शब्द दोउछालूँ दर्द भर कर हवा मेंनभ चीर कर बरसें बादल उमड़-घुमड़भर जाएताल-तलैयों सेधरती का ओना-कोनाहरी-भरी होधरती।कुछ शब्द दोतट पर जाअंजुलि-अंजुलि चढ़ाऊँस्वच्छ/निर्मलकल-कल बहने लगेगंगा।कुछ शब्द दोगूँथ कर पाप, सारे जहाँ केहवन कर दूँबोल दूँ..स्वाहा!शब्दों से हो सकता ह... Read more
clicks 105 View   Vote 0 Like   4:30pm 4 Jun 2019 #पर्यावरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
बुद्धिजीवी वह जो खाली पेट तो भगवान से भोजन की याचना करे और जब पेट भरा हो, उसी भगवान को गाली देने में रत्ती भर भी संकोच न करे। बुद्धिजीवी वह परजीवी होता है जो खुद को सबसे बड़ा श्रमजीवी समझता है। बुद्धिजीवी वह जो चौबीस घण्टे काम करे मगर अपने कुर्ते में धूल की हल्की-सी परत भी ... Read more
clicks 90 View   Vote 0 Like   11:52am 31 May 2019 #व्यंग्य की जुगलबंदी
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
पिता स्वर्ग में रहतेघर मेंबच्चों के संगमां रहती थीं।बच्चों के सुख की खातिरजाने क्या-क्यादुःख सहती थीं।क्या बतलाएं साथी तुमकोमेरी अम्माक्या-क्या थीं?देहरी, खिड़की,छत-आंगनघर का कोना-कोना थीं।चोट लगे तोमरहम मां थींभूख लगे तोरोटी मां थींमेरे मन की सारी बातेंसुनने वा... Read more
clicks 78 View   Vote 0 Like   3:14pm 13 May 2019 #माँ
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
वहघाट की ऊँची मढ़ी पर बैठनदी में फेंकता हैकंकड़!नदी किनारेनीचे घाट पर बैठे बच्चेखुश हो, लहरें गिनने लगते हैं...एक कंकड़कई लहरें!एक, दो...सात, आठ, नौ दस...बस्स!!!वहऊँची मढ़ी पर बैठनदी में,दूसरा कंकड़ फेंकता है..।देखते-देखते,गिनते-गिनतेबच्चे भी सीख जाते हैंनदी में कंकड़ फेंकनापहले स... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   7:50am 12 May 2019 #व्यंग्य
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
अच्छा हैबनारस कीपूरी एक युवा पीढ़ीदेखे बिनाजवान हो गई लेकिनअपने किशोरावस्था मेंहमने खूब देखेकर्फ्यू।गंगा तट के ऊपर फैलेपक्के महाल की तंग गलियों मेंकर्फ्यू का लगनाबुजुर्गों के लिएचिंता का विषय,बच्चों/किशोरों/युवाओं के लिएउत्सव के शुरू होने काआगाज़ होता था!स्कूलों... Read more
clicks 116 View   Vote 0 Like   2:43pm 27 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
बनारस की एक गलीगली में चबूतराचबूतरे पर खुलतीबड़े से कमरे की खिड़कीखिड़की से झाँकोकमरे में टी.वी.टी.वी. में दूरदर्शनएक से बढ़कर एकसीरियलहम लोग, बुनियाद, नीम का पेड़सन्डे की रंगोली, चित्रहार, रामायण..सुबह हो या शामतिल रखने की खाली जगह भी न होती थीचबूतरे से कमरे तकजब शुरू होते ... Read more
clicks 174 View   Vote 0 Like   7:09am 25 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
लोहे के घर की खिड़की से बाहर झाँक रहे हैं एक वृद्ध। सामने की खिड़की पर उनकी श्रीमती जी बैठी हैं। वे भी देख रही हैं तेजी से पीछे छूटते खेत, घर, मकान, वृक्ष....। ढल रहे हैं सुरुज नारायण। तिरछी होकर सीधे खिड़की से घर में घुस रही हैं सूरज की किरणें। जल्दी-जल्दी, बाय-बाय, हाय-हैलो कर ल... Read more
clicks 143 View   Vote 0 Like   6:28am 24 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
गली मेंबच्चे खेलते थेक्रिकेटबड़ेपान की दुकान के पासखड़े-खड़ेदेर तकसुनते रहते थे कमेंट्रीबूढ़ेचबूतरे पर बैठ करकोसते रहते थे..क्रिकेट ने बरबाद कर दियादेश को।देश कितना बर्बाद हुआ, नहीं पता!टेस्ट, वन डे, ट्वेंटी-ट्वेन्टीघरेलू, विश्वकप, आई.पी.यलक्रिकेट का इतना फैला बाजा... Read more
clicks 40 View   Vote 0 Like   6:19am 24 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
ढूँढ रहा था अपने ही शहर की गलियों में भटकते हुए बचपन का कोई मित्र जिसके साथ खेले थे हमने आइस-पाइस, विष-अमृत या लीलो लीलो पहाड़िया. हार कर बैठ गया पान की एक दुकान के सामने चबूतरे पर. बड़ी देर बाद एक बुढ्ढा नजर आया. बाल सफ़ेद लेकिन चेहरे में वही चमक. ध्यान से देखा तो वही बचानू था! ज... Read more
clicks 46 View   Vote 0 Like   7:27am 21 Apr 2019 #संस्मरण
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
गली में भीड़ देखठिठक जाते थे कदमघुसकरझाँकते थे हम भीचबूतरे परबिछी होती थीशतरंज की बाजीखेलने वाले तोदो ही होते थेचाल बताने वाले होते थेकई।हर मोहल्ले में थींदो/चारचाय और पान की दुकानेंदुकानों के पासचबूतरों परसजती थीं अड़ियाँहोती थींखेल, फ़िल्म, नाटक, संगीत, साहित्य और..... Read more
clicks 119 View   Vote 0 Like   1:33pm 20 Apr 2019 #बनारस की गलियाँ
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
सोम से रवि तकअलग-अलगसभी भगवानों के दिन निर्धारित हैं।जब हम छोटे थेजाते थे समय निकालनिर्धारित वारनिर्धारित भगवान के दरबारसोमवार-विश्वनाथ जी,मंगलवार-संकटमोचन,बुद्धवार-बड़ा गणेश,बी वार-बृहस्पति भगवान,शुक्रवार-संकठा जी,शनिवार-शनिदेव,रविवार-काशी के कोतवाल, भैरोनाथ के ... Read more
clicks 77 View   Vote 0 Like   6:40pm 19 Apr 2019 #व्यंग्य
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
चबूतरे पर बैठे होते थेप्याऊबड़े-से मिट्टी के घड़े में लेकरठंडा-ठंडा पानीपेट भर पीते थे हमहोने पर कभी दे भी देेते थेएक पइसा, दो पइसा या फिर पूरे पाँच पैसे भीलेकिन नहीं माँगता था कभीअपने मुँह सेएक पइसा भीप्याऊ!गर्मी की दोपहरी मेंबनारस की गली में।.........................सहमकरचढ़ जाते... Read more
clicks 62 View   Vote 0 Like   5:59pm 19 Apr 2019 #बनारस की गलियाँ
Blogger: देवेन्द्र पाण्डेय
ढेरा सारादाल-भात, साग-सब्जी खाकरमस्त सांड़-साखिड़की के पासपसर जाता था तोंदियलभरता रहता थाजोर-जोर खर्राटेपास बैठी उसकी पत्नीनिरीह गाय-सीघुमाती रहती थीगोल-गोलघिर्रीदार हाथ का पंखापर्दा हटाकरखिड़की से घर मेंझांकना चाहता थापूरा शहरझांक पाते थे मगरकुछ मेरी ही उम्र क... Read more
clicks 35 View   Vote 0 Like   5:55pm 19 Apr 2019 #बनारस की गलियाँ
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