| कई दिन से 'सवाल' शब्द मेरे पीछे पड़ा था ,आज कुछ सोचते सोचते यह बेतुकी भी लिख ही दी :)सवाल इस बात का नहींकि सवाल क्या हैसवाल इस बात का हैकि सवाल ,सवाल ही क्यों हैसवाल सच मेंकिसी बवाल से कम नहींवह बवाल ही क्याकि जिसमे सवाल ही गुम हैसवाल इस बात का नहींसवाल का जवाब क्या हैसवाल इस ... |
| 'समर' के इस समर मेंसंभल संभल के चलना है सर पे टोपी या अंगोछासाथ मे पानी पीते रहना हैयह मौसम है लू कातपती धूप का मेरे लिये घर की ठंडक में दुबक करहर दुपहर को सोना हैबस आज निकला जो घर से बाहरतो हर 'अक्सर' की तरह देखामजदूर के बच्चों को तोअंगारों पे ही रहना हैमेरे पैरों मे पड ज... |
| पुरानी किताब केगलते पन्नों कीधुंधलाती इबारतेंकभी कभीसामने आ जाती हैंअपने चटख रंग मेंजब उन के बीचकहीं दबा हुआपुराना सूखा फूलज़मीन पर गिर करले चलता है समय कोउल्टी दिशा में। ~यशवन्त माथुर©... |
| सोच रहा हूँमैं कौन हूँ ?हाड़ -माँस के खोल में छुपीएक आत्माया मिट्टी से बनाएक सजीव शरीर ....या आत्मा और शरीरदोनों ही हूँ ?मैं आध्यात्मिक नहींन ही धार्मिक हूँमुझे दर्शन की समझ नहीं न कल्पना हूँ,न वास्तविक हूँमुझे रूचि नहींरहस्य और रोमांच मेंमुझे रूचि नहींशस्त्र में न शास्... |
| मजबूरी हैमेरे लियेबने रहनामन का गुलामयूं तो हैं कई कामजिंदगी के इस मेले मेंकुछ स्याह कुछ सफ़ेद पलकभी मनाते हैं उत्सवऔर कभी छेड़ते हैंनिराशा की बेसुरी तानइनमें से ही कुछदेख सुन और समझ करमन बोलता रहता हैचाहे अनचाहेसुनाता रहता है कुछ बातें .....जो उतरती रहती हैंवर्तमान, भ... |
| बहुत वक़्त सेदेखता रहता थामैंदीवार पर टंगीउस तस्वीर कोन जाने कब से टंगी थीघर के कोने केउस अंधेरे कमरे मेंगर्द कीएक मोटी परतरुई धुनी रज़ाई की तरहलिपटी हुई थीउस तस्वीर सेपर आज .....पर आजमन नहीं माना मेराउत्सुकताऔर रहस्य के चरम नेरोशन कर ही दिया अंधेरे कमरे कोऔरफिरा ही दिय... |
| ये बचपन कीमासूम सी मुस्कुराहटबनी रहे यूं ही तो अच्छा है यूं तो खुदा की नेमत हूँ माँ-पापा की गोद में वह भी मुसकुराते रहें तो अच्छा है ये दौर न जाने कहाँ दौड़ा कर ले जाएगा दिन बीतते जाएंगे और बचपन याद आएगा खामोशी रोज़ ही टूटे तो अच्छा है ये मुस्कुराहट कभी न छूटे तो अच्छा है अच... |
| लू के गरम थपेड़ों मेंकहीं पेड़ों की छांह नहींसूखते प्यासे हलक तरसतेकहीं प्याऊ की राह नहींपुण्य कमाने की लोगों मेंअब दिखती कोई चाह नहींसड़क किनारे के मॉलों मेंफटेहालों की परवाह नहीं'वाटर पार्कों' में पानी बहताबिन धुली कारों की शान नहींकंक्रीट की छतों पे टंकी रिसतीबिन ... |
| कभी जैसा हुआ करता था जोअब नहीं वो वैसा ही है बदलते वक़्त में सब कुछअब तो ऐसा ही है कभी चलते थे आना पाईदौड़ता-चलता तो अब रुपया ही हैएक अरब के इस प्रदेश मेंराजा वहीं पर रंक वही हैकभी 'इन्सान' हुआ करता था जोदिखता तो अब भी वैसा ही हैदिल की सफेदी मे अब काला कुछ कुछ मशीन में कार्बन ... |
| मोटा वेतन शिक्षक कासब ऊंट के मुँह में जीरा हैमुफ्त की नौकरी बैठे ठालेफिर भी हरदम पीड़ा हैस्कूल सरकारी देर से खुलतामैदानों में कचरा उड़ताफटी कटी सी टाट पट्टी परखुली किताब, पर कुछ न बूझतावक़्त परीक्षा का; प्रश्नपत्रजो बनाता वो ही उत्तर लिखताजिसको पढना उसकी किस्मतऔर अकल प... |
| काँटों की तरह हाथों को कभी चुभता हूँ मैंदुश्मन की तरह नज़रों कोकभी खटकता हूँ मैंमुझ में नमी नहींशुष्कता समाई हुई हैमुझे छू कर गुजरतीहवा भी गरमाई हुई हैफूल की तरह न शाम कोकभी बिखरता हूँ मैं हर खास ओ आम कोतीखा लगता हूँ मैंमैं सच में काँटा हूँकाँटा ही बने रह करकभी खुद को भी... |
| कार्ल मार्क्स के जन्म दिवस (5 मई) परप्रस्तुत है मेरे पिता जी श्री विजय माथुर का यह आलेख- -------------------------------- समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स जब-जब धरा विकल होती,मुसीबत का समय आता। किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता॥ ये पंक्तियाँ महर्षि कार्ल मार्क्स पर पूरी तरह खरी उ... |
| अगर वो पाक होतातो क्यों नापाक होता मगर वो नापाक हैतो और क्या करता वो सोता नहीं हमारी तरह 'मौन' की चादर में 'चीन' छीन कर चैन* न यूं ही अड़ा होता एक अरब में एक 'सरब' गर उसके मोल को समझा होता अपना लड़का अपने घर को आज न 'ऐसे' लौटा होता न मंज़र दर्दनाक होतान दौर शर्मनाक होता अगर वो पा... |
| (चित्र:प्रियंका जी की फेसबुक वॉल से )खुशियों के रंग से रंग दूँ बे रंग फूलों को जिनमें हो ताजगी और हमेशा मुस्कुराहट हो इनकी खुशबू में डूबी हुई महकती फिज़ाओं में बसंत भी ज़िद्द करे बस यहीं ठहर जाने को खुशियों के रंग से रंग दूँ बे रंग फूलों को और अपनी दुनिया में हंसती रहूँ काँ... |
| एक जैसे ही होते हैंनींव और मजदूरदोनों ही होते हैं आधारदोनों ही सहते हैंतरक्की का हर वारदोनों ही देते हैंऊंचाई और चमकउन पर टिकी होती हैंआसमान से बतियातीइमारतेंउन से ही हम सुनते हैंप्रतिशत विकास कीआहटेंदोनों ही होते हैं गुमनामशीतगर्मी और बरसात से बेखबररखते हैं बदल... |
| कल 26 अप्रैल के 'हिंदुस्तान' मे यह समाचार पढ़ा-(इस इमेज पर क्लिक कर के स्पष्ट पढ़ सकते हैं ) ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी देहरादून मे इंजीनियरिंग के छात्र चिराग जुयाल के आविष्कार के बारे मे पढ़ कर बस यही मन मे आया की यही है सच्चा भारत रत्न। अगर इस समाचार को आप ध्यान से पढ़ेंगे ... |
| एक फूल होता है जो सुबह खिल करमुस्कुराता हैशाम होते होतेमुरझाता हैऔर गहरी रात केआते आतेबिखर जाता हैमिल जाता हैयादों की धूल में ।और एक काँटा होता है जो अपने बीच मेंपनाह देता हैखूबसूरत फूल कोजो अड़ा रहता हैअपनी ही ज़िद्द परजिसके भीतरऔर बाहर होती है दर्द की तीखी चुभनजो ... |
| सिर्फ नारे हैं यहाँकोई ज़िंदाबाद हैकोई मुर्दाबाद हैकहीं जुलूस हैंहाथों में तख्तियाँ हैंमोमबत्तियाँ हैंसिर्फ आक्रोश है यहाँविरोध हैकुम्हार भी हैऔर उसकी चाक भी हैमगर नदारद हैबदलाव की चिकनी मिट्टीक्योंकिउसमे मिली हुई है रेतटांग खिंचाई की। ~यशवन्त माथुर©... |
| भागते समय कोपकड़ने कीजद्दोजहद मेंअक्सर याद करता हूँकछुआऔर खरगोश की कहानी और खुद परअफसोस कि मैंकछुआ भी तो नहीं। ~यशवन्त माथुर©... |
| आसमान को छूतीमहंगाई के इस दौर मेंसिर्फ इंसान ही सस्ता हैजो ज़मीन पर थाऔर अब भीज़मीन पर ही खड़ा है वह इंसानकभी आदमी के रूप मेंकभी औरत के रूप मेंआसमान की छतऔर ज़मीन के फैले आँगन में कभी लेटता हैकभी बैठता हैउस पर होने लगा हैअसर पड़ोसी आवारा जानवरों कीसंगत का जो दुनियावी रिश्त... |
| कहना हमारी शान है ,कुछ करना अपमानहाथ पे हाथ धर बैठना और बघारना ज्ञानऔर बघारना ज्ञान, दिखाना झूठ मूठ की शान खुद को सुधरना है नहीं,करना कानून की मांगअब तो कानून बन गया,फिर भी हुआ अपमानमोम पिघलेगा फिर मगर,पत्थर दिल इंसान ? ~यशवन्त माथुर©... |
| अब वो दौर नहीं जब लिखी जाती थीं चिट्ठियाँ पहुँच कर मंज़िल पर पढ़ ली जाती थीं चिट्ठियाँ वो भी क्या पोस्टकार्ड क्या अंतर्देशीय हुआ करते थे टेलीग्राम का नाम सुन सब बेचैन हुआ करते थे लगते थे मजमे पढे-लिखों के ठौर पर अनपढ़ जहां अपनों की बातें सुना करते थे तब खून की स्याही मे... |
| फोटो साभार-गूगल इमेज सर्च काँटों से भरे बगीचों मेंखोजता फिर रहा गुलाबों को रौनक यहाँ पे कहीं नहींबस ख्वाब लुभाते ख्वाबों को कागज़ के पन्ने हैं फैलेकलम ढूंढती दवातों कोअब वो दौर है बीत रहाकान सुनते खटरागों कोहर तरफ बस शोर ही शोरदिन, रात और ठंडी भोरदेखूँ चाहे जिस भी ओर... |
| न यह गजल हैन कविता हैइस में न छंदन रस ही मिलता हैयह तो बस जज़्बात हैऔर कुछ मन की बात हैजो व्याकरण के नियमों मेंन बंधता है न घुलता हैइसे ऐसा ही रहने दोये जैसा है बस वैसा हैबिखरा बिखरा सा कुछइन 'पंक्तियों' के रूप मेंजो सोचता है मनवो ही कहता है न यह गजल हैन कविता है ~यशवन्त माथु... |
| प्रस्तुत हैं कन्या भ्रूण हत्या पर कुछ पंक्तियाँ- (चित्र साभार-गूगल इमेज सर्च)बेटों की चाह में कहीं खो रही हैं बेटियाँ।बदलाव के इस दौर में भी मर रही हैं बेटियाँ॥ खुदा की नेमतों का क्यूँ कत्ल करती रूढ़ियाँ। भले ही चढ़ रहे हों आज तरक्कियों की सीढ़ियाँ॥ गर्भ के भीतर है क्य... |
|
|
|