जो मेरा मन कहे

अच्छा है कभी कभी कर लेना दीवारों से कुछ बातें .... वह जैसी हैं वैसी ही रहती हैं बिल्कुल गंभीर शांत और कभी कभी हल्के से मुस्कुराती हुई राज़दार बन कर सुनती हैं सब बातें बिना किसी तर्क-कुतर्क बिना किसी क्रोध के .... जिंदगी के अँधेरों में जब छोड़ कर चल देते हैं अपने ही अपनों का हाथ द...
जो मेरा मन कहे...
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  July 22, 2014, 5:13 pm
जिसे लोग समझते हैं सशक्तिकरण क्या वही सही है ? घर की चौखट के बाहर दिन के उजालों मे रातों की चकाचौंध में अंधेरे रास्तों से गुज़रती कभी पैदल चलती कभी मोटर मे दौड़ती हर वामा भीतर ही भीतर समाए रहती है एक डर एक दर्द क्या पहुँच भी पाएगी अपनी मंज़िल पर ? किताबों में यूं तो उसे कहा गय...
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  July 19, 2014, 9:38 pm
Photo:-Palestine Solidarity Campaign UK दूर देश से आती तुम्हारे झुलसे हुए नाज़ुक जिस्मों की तस्वीरें देखकर कौन ऐसा होगा जो रो न देता होगा ... मगर सुनाई नहीं देतीं दर्द से भरी तुम्हारी चीखें तुम्हारी कराहें इस क्रूर दुनिया के सफेदपोश लोगों को  .... दिखाई नहीं देतीं अनगिनत चोटें ठंडे पड़ चुके ...
जो मेरा मन कहे...
Tag :पंक्तियाँ
  July 17, 2014, 6:05 pm
हम सभी उलझे रहते हैं रोज़ कितने ही विचारों के जाल में जिनकी उलझन को सुलझा कर कभी हो जाते हैं मुक्त और कभी फँसे रहते हैं लंबे समय तक जूझते रहते हैं खुद से कभी किसी और से .... विचार अपने तीखेपन से कभी चुभते हैं तीर की तरह और कभी करा देते हैं एहसास शक्कर की मिठास का .... सबके अपने अप...
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  July 14, 2014, 6:11 pm
जानता हूँ यूं चलते चलते एक पल ऐसा भी आना है समय के साथ दौड़ में पिछड़ना है रुक जाना है .... 'आज'से शुरू हुआ सफर 'आज'पर ही रुक कर भविष्य की मिट्टी में मिल कर भूत बन जाना है .... समझना होगा अब तो दर्द गुमनाम तस्वीरों का गर्द रोज़ धुले पुछे कुछ ऐसा कर जाना है ... आज नहीं तो कल एक पल ऐसा भी आना...
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  July 12, 2014, 3:58 pm
'नशा शराब में होता तो नाचती बोतल मैकदे झूमते पैमानों मे होती हलचल'पर नशा शराब या काँच की बोतल में नहीं मन के भीतर ही कहीं रचा बसा होता है दबा सा होता है जो बस उभर आता है कुछ बूंदों के हलक मे उतरते ही बना देता है चेहरे को कभी विकृत कभी विदूषक धकेल देता है लंबी प्रतीक्षा की अं...
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  July 9, 2014, 4:28 pm
अच्छा ही है मन का थम जाना कभी कभी शून्य हो जाना शब्दों का कहीं खो जाना कल्पना का और यहीं कहीं किसी किनारे पर रुक कर सुस्ताना बहती धारा का .... टकरा टकरा कर कितने ही पत्थरों को अस्तित्वहीन कर देने के बाद कितने ही प्यासे हलक़ों मे उतर कर जीवन देने के बाद अच्छा ही है एक करवट ले क...
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  July 7, 2014, 4:16 pm
आज की नींव पर गाता हूँ मैं कल की सँवरी इमारत का राग छैनी हथोड़ी की सरगम और ईंटों का साज़ सुना देता है मेरे मन के भीतर की आवाज़ .... मैं रूप धरता हूँ कभी बढ़ई का कभी राजमिस्त्री का और कभी नज़र आता हूँ सिर और पीठ पर किस्मत का बोझा उठाए साधारण बेलदार के रूप में .... मेरी झो...
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  July 4, 2014, 3:01 pm
https://www.facebook.com/ravishkumarndtvfans/posts/258233774381812 न अच्छे दिन हैं,न कडवे ही दिन हैं ये  गरीब की पीठ पर,कोड़े से पड़े दिन हैं ये ।  कड़वे होते तो असर करते नीम की तरह  मीठे होते तो हलक मे घुलते गुड़ की तरह।  अंबानियों के महलों में रोशन होते दिन हैं ये  फुटपथियों के झोपड़ों में सिसकते दिन हैं ये ।  ~यशव...
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  June 25, 2014, 9:33 am
सच है कि पेट जिनके भरे होते हैं हद से ज़्यादा। क्या होती है भूख उनको समझ नहीं आता ॥ सोते हैं सिरहाने रख कर वो गांधी के चेहरे को । सच का समंदर आँखों से कभी बाहर नहीं आता ॥ झांक कर तो देखें कभी ऐ सी कारों के बाहर । है मंज़र यह कि उन्हें कुछ भी नहीं सिखाता ॥ दिल दहलते हैं हर रो...
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  June 23, 2014, 10:17 am
(चित्र:गूगल के सौजन्य से ) बरसों था जो हरा भरा आज वो सूखा पेड़ पतझड़ मे छोड़ चली सूखी पत्तियों को नीचे बिखरा देख पल पल गिन रहा है दिन क्या होगा उसका धरती के बिन.......? धरती - जिसने आश्रय दे कर हो कर खड़े जीना सिखलाया धूप- छांव -तूफान झेल कर   रहना अड़े उसने बतलाया ..... भूकंपों से निडर ब...
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  June 19, 2014, 4:30 pm
अभी 2 घंटे पहले घर के ऊपर आसमान मे काला धुआँ छाया रहा। पता चला है कि लखनऊ मे सीतापुर  रोड पर किसी प्रतिष्ठान में भीषण आग लगी है।हालांकि अब आसमान साफ है फिर भी इस धुएँ ने जो मेरे मन से कहा उसे निम्न शब्दों में व्यक्त कर रहा हूँ- [घर की बालकनी से लिया गया यह चित्र उसी धुएँ का ह...
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  June 14, 2014, 7:23 pm
रोज़ भटकता हूँ उलझे ख्यालों की अनकही अजीब सी दुनिया में जिसके एक तरफ घनी हरियाली है और दूसरी तरफ वीरान बंजर जिसके एक तरफ बारिश की बूंदें और सोंधी खुशबू है और दूसरी तरफ ऊपर से बरसती आग  फिर भी यह पागल मन मचलता है कह देने को पल पल उभरता हर जज़्बात मगर मिल नहीं पाते शब्द जुड़ न...
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  June 8, 2014, 6:06 pm
फेसबुक पर कभी कभी कुछ इतनी बेहतरीन और मर्मस्पर्शी रचनाएँ पढ़ने को मिल जाती हैं कि उन्हें साझा किये बिना मन नहीं मानता।आज पेश है साभार मगर बिना औपचारिक अनुमति, हनुमंत शर्मा जी की यह बेहतरीन लघु कथा जो सरल भाषा शैली में मर्मस्पर्शी शब्द चित्र प्रस्तुत करती है। -------------------------...
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Tag :हनुमंत शर्मा
  June 4, 2014, 3:56 pm
वक़्त बहुत तेज़ी से चलता है इसकी यह रफ्तार हमारे जीवन के बाद भी थमती नहीं है। वक़्त की इसी तेज रफ्तार का एक नमूना है आज का दिन। जी हाँ आज 2 जून का दिन ....ब्लॉग जगत और सोशल मीडिया पर आप सबों के बीच चौथे वर्ष के पूरा होने के साथ  5 वें वर्ष मे मेरे प्रवेश का गवाह है। इन 4 वर्षों मे कई ...
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  June 2, 2014, 4:00 am
कुछ लोग चलते रहते हैं जीवन के हर सफर में कभी अकेले कभी किसी के साथ .... पीते हुए कभी कड़वे -मीठे घूंट और कभी सुनते हुए दहशत की चिल्लाहटें .... उनकी राह में फूलों के गद्दे पर बिछी होती है काँटों की चादर जिस पर चल चल कर अभ्यस्त हो जाते हैं उनके कदम सहने को वक़्त की हर ठोकर और साथ ही मह...
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Tag :पंक्तियाँ
  May 27, 2014, 2:45 pm
कुछ लोग अक्सर खेला करते हैं आग से कभी झुलसते हैं कभी  जलते हैं  न जाने किस डाह को साथ लिये चलते हैं... शायद डरते हैं खतरे में देख कर खुद के अहंकार की नींव जो दिन पर दिन खोखली होती रह कर ढह जानी है एक दिन अनजान भूकंप के एक हल्के झटके भर से .... ऐसे लोग बे खबर हो कर अपनी नाक के अस्ति...
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Tag :पंक्तियाँ
  May 21, 2014, 7:58 pm
इस मौसम की हर तपती दुपहर  को मैं देखता हूँ कुछ लोगों को फुटपाथों पर बिछे लू के बिस्तर  पर अंगड़ाइयाँ लेते हुए .... या  गहरी नींद मे फूलों की खुशबू के हसीन ख्वाबों को साथ ले कर  किसी और दुनिया की हरियाली में टहलते हुए .... ये कुछ लोग हैं तो हमारी इसी दुनिया के बाशिंदे - मगर अनकही ...
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Tag :पंक्तियाँ
  May 19, 2014, 8:45 pm
ऊंची डिग्रीधारी कुछ लोग समझने लगते हैं कभी कभी खुद को इस कदर काबिल कि बंद हो जाता है दिखना उनको हर वो शख्स जो परिधि में नहीं आता उनके आसपास फैली चकाचौंध की ....... वह लोग सिमटे-सिकुड़े रहते हैं अपनी सोच की अनूठी चादर के भीतर जिसकी लंबाई चौड़ाई फैली होती है यूं तो मीलों दूर तक फि...
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Tag :पंक्तियाँ
  May 17, 2014, 3:37 pm
तस्वीरें जो लटकी हैं यूं ही दीवारों पर याद दिलाने को बीता कल कभी कभी बातें करती हैं मुझ से अकेले में बताती रहती हैं दूसरों के निहारने से मिलने वाला सुख जमी हुई गर्द से मिलने वाला दुख और न जाने क्या क्या कहती रहती हैं अपनी खामोश जुबान से कभी कभी सुनती रहती हैं मेरी हरेक अन...
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  May 13, 2014, 1:06 pm
बिखरी हुई हैं हर तरफ कुछ धुनें जानी पहचानी अनजानी जो  कभी शब्दों के संग संगीत मे घुल कर और कभी दृढ़ संकल्प बन कर कराती हैं एहसास  खुद की अदृश्य ताकत का और ले चलती है उजास की गुलशन गली में ।  ~यशवन्त यश© ...
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  December 5, 2013, 5:35 pm
 -पेश है मन की कही कुछ बेतुकी सी- कुछ नहीं तो रात में सपने ही भले तुम सोओ या जागो  अब हम तो चले बंद आँखों मे खुद की तस्वीर देखेंगे सुबह उठ कर शीशे में माथे की लकीर देखेंगे दिन मे यूं तो सब हमें फकीर समझेंगे हर शाम महलों के अमीर समझेंगे पर्दों-मुखौटों के हर राज़ नाराज़ हो चले ...
जो मेरा मन कहे...
Tag :बस यूँ ही
  December 4, 2013, 10:10 pm
देखो न दिसंबर भी आ गया देखते देखते साल बीतने को आ गया क्या पाया क्या खोया कितना हँसा कितना रोया कब तक जागा कब तक सोया  कितना झेला कितना ढोया कुछ ही पन्ने बचे डायरी के जिसमे इतिहास का अक्षर बोया   यह अंत है नया दौर फिर नए ठौर का बौर आ गया देखो न दिसंबर भी आ गया । ~यशवन्त यश© ...
जो मेरा मन कहे...
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  December 1, 2013, 9:42 am
आदरणीय हनुमंत शर्मा जी ने इसे कल फेसबुक पर पोस्ट किया था। इस बेहतरीन अभिव्यक्ति को इस ब्लॉग पर साभार प्रस्तुत करने से मैं खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ ।  साहब , नाम ज़रूरी ही तो अलमा कबूतरी कह लीजिये | इस वक्त एक सद्यप्रसूता हूँ और आपकी पनाह में हूँ | आदमी ने हमारे रहने लाय...
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  November 27, 2013, 9:03 am
कौन है वो अनजान  ? बिखरे बिखरे बालों वाला जिसका आधा चेहरा किसी पुरुष का है आधा किसी स्त्री का और उसका धड़ अवशेष है  किसी जानवर का .... न जाने कौन बनाता  है मन की काली दीवार पर सफ़ेद स्याही से  यह अजीब सी तस्वीर जो दिल के दर्पण मे परावर्तित हो कर कराती है एहसास सदियों से चेहरों ...
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Tag :बस यूँ ही
  November 25, 2013, 9:46 pm
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  गूगल के द्वारा अपनी रीडर सेवा बंद करने के कारण हमारीवाणी की सभी कोडिंग दुबारा की गई है। हमारीवाणी "क्...
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