जो मेरा मन कहे

ओ इन्सानों !हर दिनन जानेकितनी ही जगहन जानेकितनी ही बारकरते होकितने ही वारकभी मेरे जिस्म परकभी मेरे मन परसमझते होसिर्फ अपनी कठपुतलीतो फिर आजक्यों याद आयीं तुम्हेंवैदिक सूक्तियाँश्लोक और मंत्रक्या इसलिएकि यह आडंबरअपने चोले के भीतरढके रखता हैतुम्हारे कुकर्मों काक...
जो मेरा मन कहे...
Tag :मैं 'देवी' हूँ
  September 29, 2014, 4:00 am
गूंज रहे हैं आजसप्तशती केअनेकों मंत्रहवा मे घुलतीधूप-अगरबत्तीऔर फूलों कीखुशबू के साथअस्थायी विरक्ति कासफ़ेद नकाब लगाएझूमतेकीर्तन करतेकुछ लोगशायद नहीं जानतेएक सचकि मुझे पता हैउनके मन के भीतर कीहर एक बातजिसकी स्याह परतेंअक्सर खुलती रही हैंआती जातीइन राहों केकई च...
जो मेरा मन कहे...
Tag :मैं 'देवी' हूँ
  September 27, 2014, 4:00 am
आज सेशुरू हो गया हैउत्सवगुणगान कामेरी प्राण प्रतिष्ठा काबिना यह समझेबिना यह जानेकि मिट्टी कीइस देह मेंबसे प्राणों का मोलकहीं ज़्यादा हैमंदिरों मे सजीमिट्टी कीउस मूरत सेजिसके सोलह श्रंगारऔर चेहरे कीकृत्रिम मुस्कुराहटकहीं टिक भी नहीं सकतीमेरे भीतर के तीखे दर्दऔर ...
जो मेरा मन कहे...
Tag :मैं 'देवी' हूँ
  September 25, 2014, 4:00 am
शब्द !जो बिखरे रहते हैंकभी इधरकभी उधरधर कर रूप मनोहरमन को भाते हैंजीवन केकई पलों को साथ लियेकभी हँसाते हैंकभी रुलाते हैं ....इन शब्दों कीअनोखी दुनिया केकई रंगमन के कैनवास परछिटक करबिखर करआपस मेंमिल करकरते हैंकुछ बातेंबाँटते हैंसुख -दुखअपने निश्चितव्याकरण की देहरी क...
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Tag :
  September 17, 2014, 12:56 pm
भाषामाध्यम हैवरदान हैहरेक जीव कोकुछअपनी कहने कासबकी सुनने काकभी इशारों सेकभी ज़ुबान सेअपने कई रूपों सेजीवन में रच बस करले जाती हैकभी प्रेम केअसीम विस्तार तकऔर कभीडुबो देती हैघृणा या द्वेष केगहरे समुद्र में  ।भाषाकभी सिमटी रहती हैनियमों कीपरिधि के भीतरऔर कभीअनग...
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  September 14, 2014, 11:59 am
सुना थाकुछ सपनेबदलते हैंहकीकत मेंकभी कभीदेते हैंन बयां होने वालीखुशीलेकिनयह काल कोठरीतमाम बदलावों औररूप परिवर्तनों के बाद भीअब भी वैसी ही हैजिसके रोशनदान सेझाँकतीउम्मीद कीकुछ सफ़ेद लकीरेंअपने तय रास्ते सेभटक करपहले से जमाकालिख मेंकहीं गुम होकरघुल मिल जाती हैं...
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  September 8, 2014, 3:26 pm
जब देखता हूँ डायरी केभरे हुए पन्नों परबिखरे हुए जज़्बातों कोतो लगता हैशब्दों की यह दुनियाकितनी विचित्रकिन्तु सत्य है ....विचित्र इसलियेकि मन की भित्ति परउभरी आड़ी तिरछी भावनाएँकिसी प्रतिलिपि की तरहइन पन्नों परहू ब हूमेल खाती दिखती हैं .....और सत्य इसलियेकि इन पन्नों परज...
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Tag :
  September 1, 2014, 4:06 pm
पूर्वाग्रहों सेघिरे हुएकुछ लोगसब कुछजान समझ करबने रहते हैंअनजानकरते रहते हैंबखानअपनी सोच कीचारदीवारी केभीतर कीउसी किताबीमानसिकता कीजो निकलने नहीं देतीदेखने नहीं देतीबाहर की दुनिया मेंहो रहेबदलावों की तस्वीर....ऐसे लोगअपने 'वाद'मेंउलझे रह करव्यर्थ के विवादों का...
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Tag :पंक्तियाँ
  August 23, 2014, 1:06 pm
छोटी सी ज़िंदगी काबहुत लंबा है सफरचलो कहीं चलेंइन अँधेरों से निकल करकहीं जल रही है लौस्याह तस्वीरों की आँखों मेंउलझे हैं जिनके होठबहते जीवन की बातों मेंमाना कि कठिन हैयहाँ काँटों भरी डगरफिर फूल भी मिलेंगेआगे कहीं बिखर करमिलेगा सुकुं रूह कोअब साहिल पर ही थम करचलो कही...
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Tag :
  August 18, 2014, 5:35 pm
सभी मित्रों को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिकशुभकामनाएँ ! एक तरफ रंकएक तरफ राजाकहीं दौलत का बंदकहीं खुला दरवाजा .....बड़ी मुश्किल से कहींपिसता गेहूं आटादेखो यहीं कहींकोई पिस्ता मेवा खाता ....बचपन कहीं पचपनकहीं पचपन मे बचपनचाँदी की चम्मच कोकोई ढालता कोई खाता .....ऐसा ही है जी...
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Tag :
  August 15, 2014, 8:36 am
ज़रूरी नहींकि लिखा होसब कुछअपने मतलब काकिसी किताब केहर पन्ने परकुछ बातेंहोती हैंअर्थ हीनतर्क हीनहमारी नज़र मेंलिये होती हैंमंज़रबंजर ज़मीन साजिसके चारों ओरफैला रहता हैघना सुनसान ....लेकिनउसी किताब कीपथरीलीबंजरज़मीन परकुछ और नज़रेंखिलते देखती हैंउल्लास केअनेकों फूलज...
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  August 7, 2014, 3:26 pm
कोई रंक यहाँ कोई राजा बना फिरता हैउठता है यहाँ कोई हर रोज़ गिरा करता है।किसी के पैरों से यहाँ कुचल जाते हैं नगीनेकिसी हाथ से  छूकर सँवर जाते हैं  नगीने।मूरत बन कर कोई खड़ा रहता है मैदानों मेंशीशों मे जड़ कर कोई टंगा रहता है दीवारों मे।एक मिट्टी के कई चोलों में एक रूह के ...
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  August 4, 2014, 4:13 pm
कुंठा केविष से भरेकुछ लोगअक्सर भूल जाते हैंअपने बीते दिनऔर वो बीती बातेंजिनके आधार परखड़ी हैउनके आज कीसंगमरमरी इमारत.....जिसे कभी महलतो कभी ताज़ कह करलोग निहारा करते हैंबातें किया करते हैंमगरमोहब्बत की वो मिसालखुद के भीतरसमेटे रहती हैअनगिनतकटे हाथों के ज़ख्म ........फिर भी...
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Tag :पंक्तियाँ
  August 1, 2014, 7:49 pm
जितना आसान हैकागज़ पर उकेर देनाशून्य का चित्रउतना ही कठिन हैढालनाऔर समझनाशून्य का चरित्र .....जो आदि से अंत तकगुज़रता हैअनगिनतघुमावदार मोड़ों सेजिसके रास्ते मेंकभी मिलती हैसमुद्र की गहराईअंतहीन गहरी खाईकभी मिलते हैंमौसम के अनेकों रूपकहीं छांव कहीं धूपकहीं कांटे-फूल...
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  July 28, 2014, 1:01 pm
अच्छा है कभी कभी कर लेना दीवारों से कुछ बातें .... वह जैसी हैं वैसी ही रहती हैं बिल्कुल गंभीर शांत और कभी कभी हल्के से मुस्कुराती हुई राज़दार बन कर सुनती हैं सब बातें बिना किसी तर्क-कुतर्क बिना किसी क्रोध के .... जिंदगी के अँधेरों में जब छोड़ कर चल देते हैं अपने ही अपनों का हाथ द...
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  July 22, 2014, 5:13 pm
जिसे लोग समझते हैं सशक्तिकरण क्या वही सही है ? घर की चौखट के बाहर दिन के उजालों मे रातों की चकाचौंध में अंधेरे रास्तों से गुज़रती कभी पैदल चलती कभी मोटर मे दौड़ती हर वामा भीतर ही भीतर समाए रहती है एक डर एक दर्द क्या पहुँच भी पाएगी अपनी मंज़िल पर ? किताबों में यूं तो उसे कहा गय...
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  July 19, 2014, 9:38 pm
Photo:-Palestine Solidarity Campaign UK दूर देश से आती तुम्हारे झुलसे हुए नाज़ुक जिस्मों की तस्वीरें देखकर कौन ऐसा होगा जो रो न देता होगा ... मगर सुनाई नहीं देतीं दर्द से भरी तुम्हारी चीखें तुम्हारी कराहें इस क्रूर दुनिया के सफेदपोश लोगों को  .... दिखाई नहीं देतीं अनगिनत चोटें ठंडे पड़ चुके ...
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Tag :पंक्तियाँ
  July 17, 2014, 6:05 pm
हम सभी उलझे रहते हैं रोज़ कितने ही विचारों के जाल में जिनकी उलझन को सुलझा कर कभी हो जाते हैं मुक्त और कभी फँसे रहते हैं लंबे समय तक जूझते रहते हैं खुद से कभी किसी और से .... विचार अपने तीखेपन से कभी चुभते हैं तीर की तरह और कभी करा देते हैं एहसास शक्कर की मिठास का .... सबके अपने अप...
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  July 14, 2014, 6:11 pm
जानता हूँ यूं चलते चलते एक पल ऐसा भी आना है समय के साथ दौड़ में पिछड़ना है रुक जाना है .... 'आज'से शुरू हुआ सफर 'आज'पर ही रुक कर भविष्य की मिट्टी में मिल कर भूत बन जाना है .... समझना होगा अब तो दर्द गुमनाम तस्वीरों का गर्द रोज़ धुले पुछे कुछ ऐसा कर जाना है ... आज नहीं तो कल एक पल ऐसा भी आना...
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  July 12, 2014, 3:58 pm
'नशा शराब में होता तो नाचती बोतल मैकदे झूमते पैमानों मे होती हलचल'पर नशा शराब या काँच की बोतल में नहीं मन के भीतर ही कहीं रचा बसा होता है दबा सा होता है जो बस उभर आता है कुछ बूंदों के हलक मे उतरते ही बना देता है चेहरे को कभी विकृत कभी विदूषक धकेल देता है लंबी प्रतीक्षा की अं...
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  July 9, 2014, 4:28 pm
अच्छा ही है मन का थम जाना कभी कभी शून्य हो जाना शब्दों का कहीं खो जाना कल्पना का और यहीं कहीं किसी किनारे पर रुक कर सुस्ताना बहती धारा का .... टकरा टकरा कर कितने ही पत्थरों को अस्तित्वहीन कर देने के बाद कितने ही प्यासे हलक़ों मे उतर कर जीवन देने के बाद अच्छा ही है एक करवट ले क...
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  July 7, 2014, 4:16 pm
आज की नींव पर गाता हूँ मैं कल की सँवरी इमारत का राग छैनी हथोड़ी की सरगम और ईंटों का साज़ सुना देता है मेरे मन के भीतर की आवाज़ .... मैं रूप धरता हूँ कभी बढ़ई का कभी राजमिस्त्री का और कभी नज़र आता हूँ सिर और पीठ पर किस्मत का बोझा उठाए साधारण बेलदार के रूप में .... मेरी झो...
जो मेरा मन कहे...
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  July 4, 2014, 3:01 pm
https://www.facebook.com/ravishkumarndtvfans/posts/258233774381812 न अच्छे दिन हैं,न कडवे ही दिन हैं ये  गरीब की पीठ पर,कोड़े से पड़े दिन हैं ये ।  कड़वे होते तो असर करते नीम की तरह  मीठे होते तो हलक मे घुलते गुड़ की तरह।  अंबानियों के महलों में रोशन होते दिन हैं ये  फुटपथियों के झोपड़ों में सिसकते दिन हैं ये ।  ~यशव...
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  June 25, 2014, 9:33 am
सच है कि पेट जिनके भरे होते हैं हद से ज़्यादा। क्या होती है भूख उनको समझ नहीं आता ॥ सोते हैं सिरहाने रख कर वो गांधी के चेहरे को । सच का समंदर आँखों से कभी बाहर नहीं आता ॥ झांक कर तो देखें कभी ऐ सी कारों के बाहर । है मंज़र यह कि उन्हें कुछ भी नहीं सिखाता ॥ दिल दहलते हैं हर रो...
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  June 23, 2014, 10:17 am
(चित्र:गूगल के सौजन्य से ) बरसों था जो हरा भरा आज वो सूखा पेड़ पतझड़ मे छोड़ चली सूखी पत्तियों को नीचे बिखरा देख पल पल गिन रहा है दिन क्या होगा उसका धरती के बिन.......? धरती - जिसने आश्रय दे कर हो कर खड़े जीना सिखलाया धूप- छांव -तूफान झेल कर   रहना अड़े उसने बतलाया ..... भूकंपों से निडर ब...
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  June 19, 2014, 4:30 pm
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