जो मेरा मन कहे

बिखरी हुई हैं हर तरफ कुछ धुनें जानी पहचानी अनजानी जो  कभी शब्दों के संग संगीत मे घुल कर और कभी दृढ़ संकल्प बन कर कराती हैं एहसास  खुद की अदृश्य ताकत का और ले चलती है उजास की गुलशन गली में ।  ~यशवन्त यश© ...
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  December 5, 2013, 5:35 pm
 -पेश है मन की कही कुछ बेतुकी सी- कुछ नहीं तो रात में सपने ही भले तुम सोओ या जागो  अब हम तो चले बंद आँखों मे खुद की तस्वीर देखेंगे सुबह उठ कर शीशे में माथे की लकीर देखेंगे दिन मे यूं तो सब हमें फकीर समझेंगे हर शाम महलों के अमीर समझेंगे पर्दों-मुखौटों के हर राज़ नाराज़ हो चले ...
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Tag :बस यूँ ही
  December 4, 2013, 10:10 pm
देखो न दिसंबर भी आ गया देखते देखते साल बीतने को आ गया क्या पाया क्या खोया कितना हँसा कितना रोया कब तक जागा कब तक सोया  कितना झेला कितना ढोया कुछ ही पन्ने बचे डायरी के जिसमे इतिहास का अक्षर बोया   यह अंत है नया दौर फिर नए ठौर का बौर आ गया देखो न दिसंबर भी आ गया । ~यशवन्त यश© ...
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  December 1, 2013, 9:42 am
आदरणीय हनुमंत शर्मा जी ने इसे कल फेसबुक पर पोस्ट किया था। इस बेहतरीन अभिव्यक्ति को इस ब्लॉग पर साभार प्रस्तुत करने से मैं खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ ।  साहब , नाम ज़रूरी ही तो अलमा कबूतरी कह लीजिये | इस वक्त एक सद्यप्रसूता हूँ और आपकी पनाह में हूँ | आदमी ने हमारे रहने लाय...
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  November 27, 2013, 9:03 am
कौन है वो अनजान  ? बिखरे बिखरे बालों वाला जिसका आधा चेहरा किसी पुरुष का है आधा किसी स्त्री का और उसका धड़ अवशेष है  किसी जानवर का .... न जाने कौन बनाता  है मन की काली दीवार पर सफ़ेद स्याही से  यह अजीब सी तस्वीर जो दिल के दर्पण मे परावर्तित हो कर कराती है एहसास सदियों से चेहरों ...
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Tag :बस यूँ ही
  November 25, 2013, 9:46 pm
बिखरी चट्टानों पर लहरों का असर तारी है चल रही हैं सांसें और  सफर जारी है साँसे जिन पर न मेरा वश है न किसी और का मालिक ही लिखता है पता पिछले और अगले ठौर का उस मुकाम पे खुश हूँ जिसे पाया है अब तलक ज़मीं पे रह कर ही छूना चाहता हूँ फ़लक चलना है चल रहा हूँ  न जाने कौन सी खुमारी है लह...
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  November 22, 2013, 4:00 am
बहुत गहरी नींद में अचानक उपजी इन पंक्तियों को रात 1:30 से 02:15 तक मन से कागज़ पर उतारता चला गया। सचिन साहब से अग्रिम माफी के साथ अब इस सुबह अपने ब्लॉग पर भी सहेज ले रहा हूँ- भारत रतन ! भारत रतन ! सोना कहाँ,चाँदी कहाँ  गरीब के बच्चे को रोज़ ही  रोना यहाँ,दूध पीना कहाँ ? श्री तेंदुलक...
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Tag :व्यंगतियाँ
  November 20, 2013, 8:59 am
उसने नहीं देखा कभी मुस्कुराता चेहरा माँ का देखी हैं तो बस चिंता की कुछ लकीरें जो हर सुबह हर शाम बिना हिले जमी रहती हैं अपनी जगह पर खड़ी किसी मूरत की तरह .... वह खुद भी नहीं मुस्कुराता क्योंकि ज़ख़्मों और खरोचों से भरी उसकी पीठ पाना चाहती है आराम.... लेकिन आराम हराम है उसे जुटानी ...
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Tag :बाल दिवस
  November 14, 2013, 4:00 am
जिंदगी एक मज़ाक है इसे यूं भी जीना पड़ता है  खुशी को निगलना गम को पीना पड़ता है कुछ पाने के लिये कुछ खोना पड़ता है जो खो न सके कुछ तो दर्द को ढोना पड़ता है यहाँ निशाना भी है तीर कमान भी है यहाँ ज़मीन भी है और आसमान भी है  उड़ते ख्वाब भटकते अरमान भी हैं पूरे होने को तरसते कुछ फरमान ...
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  November 11, 2013, 7:36 pm
Photo:Yanni-'Tribute'अलग अलग साज सबकी अपनी अलग आवाज़ उनको बजाने वाले जादूगर जाने कौन सी छड़ी लिये फिरते हैं हाथों में कि बन जाती है सरगम में गुथी एक सुरीली धुन एक सुरीली धुन जिसके उतार चढ़ाव खुशी -गम परिहास और उत्साह को  थामे रह कर कभी ढुलका देते हैं पलकों से आँसू और कभी फड़का देते हैं ...
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  November 9, 2013, 8:25 pm
  फोटो साभार-भावना जी की फेसबुक वॉल  तन नहीं मन भिगोती हैं, देखो बरसती ये बूंदें मुस्कुरा कर गिरती हैं, कहीं खो जाती हैं ये बूंदें हर बार सोचता हूँ सहेज लूँगा कुछ बूंदें मन की प्याली मेंचूक जाता हूँ फिर भी न जाने किस बेख्याली में आना जाना जिंदगी का सिखा देती हैं ये बूं...
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Tag :बस यूँ ही
  November 7, 2013, 9:22 am
सभी पाठकों को दीवाली की अशेष शुभ कामनाएँ! आज फिर दीवाली है आज की रात आसमान गुलज़ार रहेगा आतिशबाज़ी के रंगों से और ज़मीं पर सजी रहेंगी महफिलें जश्न और ठहाकों की मेरे घर के पास रहने वाली नन्ही मुनिया मैली से फ्रॉक पहने कौतूहल से देखती है इन सब सपनीली रंगीनीयों को हर साल वह ब...
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  November 3, 2013, 4:00 am
सड़क किनारे  ठौर जमाए  बैठा है एक दीये वाला    भूख की आग में  तपी मिट्टी से  हर घर रोशन करने वाला  उसके आगे ढेर सजे हैं  तरह तरह के आकार ढले हैं  वो है खुशियाँ देने वाला  मोल भाव में वो ही फँसता  वो ही महंगा वो ही सस्ता फिर भी मुस्कान की चादर ओढ़े  बैठा  है एक दीये वाला। ...
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  October 29, 2013, 6:53 pm
मेरे घर के सामने है एक बड़ा खाली मैदान जिसने देखा है पीढ़ियों को जन्मते गुजरते जिसकी गोद में खेले कूदे हैं छोटे छोटे बच्चे जो बना है गवाह सावन के झूलों का पेड़ों से झरते गुलमोहर के फूलों का । वो मैदान आज खुदने लगा है आधार बनने को ऊंचाई छूती नयी एक नयी इमारत का जिसकी ईंट ईंट प...
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  October 25, 2013, 4:03 pm
हर रस्ते पर हर चौराहे पर हर आसान और तीखे मोड़ पर अक्सर देखता हूँ भीड़ भागते -दौड़ते हाँफते -थकते और आराम से चलते इन्सानों की जिसका हिस्सा हुआ करता हूँ मैं भी। इस भीड़ से कानों को चुभती चिल्ल पों से मन होता है कभी कभी लौट जाने को अपने आरंभ पर लेकिन कैसे लौटूँ ? मैं एक छोटी सी लहर ...
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  October 20, 2013, 2:35 pm
'पंक्तियों'की श्रेणी में यह मेरे जीवन और इस ब्लॉग की 500 वीं पोस्ट है। जबकि कुल प्रकाशित पोस्ट्स की संख्या 559 हो चुकी है। आप सभी के आशीर्वाद और निरंतर मिल रहे स्नेह के लिए हार्दिक आभारी हूँ। चित्र: विभा आंटी की फेसबुक से रंगीन फूलों से महकते उस बगीचे में रोज़ दिन भर उड़ान भर...
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  October 16, 2013, 5:36 pm
दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक  भीड़ को चीरता हर चेहरा मुबारक हर बार की तरह राम रावण भिड़ेंगे  तीरों से कट कर दसों सिर गिरेंगे  दिशाओं को घमंड की दशा ये मुबारक दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक  दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक  महंगाई में भूखा हर चेहरा मुबारक गलियारे दहेज के हर कहीं ...
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  October 13, 2013, 9:46 am
उसने देखे थे सपने बाबुल के घर के बाहर की  एक नयी दुनिया के  जहां वह और उसके उन सपनों का सजीला राजकुमार खुशियों के आँगन में रोज़ झूमते नयी उमंगों की अनगिनत लहरों पर उन काल्पनिक सपनों का कटु यथार्थ अब आने लगा था उसके सामने जब उतर कर फूलों की पालकी से उसने रखा अपना पहला कदम म...
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  October 12, 2013, 4:00 am
कल सारी रात चलता रहा जगराता सामने के पार्क में लोग दिखाते रहे श्रद्धा अर्पण करते रहे अपने भाव सुगंध,पुष्प और प्रसाद के साथ नमन,वंदन अभिनंदन करते रहे झूमते रहे माँ को समर्पित भजनों-भेंटों की धुन पर । मगर किसी ने नहीं सुनी नजदीक के घर से बाहर आती बूढ़ी रुखसाना की चीत्कार ज...
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  October 7, 2013, 7:01 pm
सड़क किनारे का मंदिर सजा हुआ है फूलों से महका हुआ है ख़ुशबुओं से गूंज रहा है पैरोडी भजनों से हाज़िरी लगा रहे हैं जहां लाल चुनरी ओढ़े माता के भक्त जय माता दी के जयकारों के साथ। उसी सड़क के दूसरे किनारे गंदगी के टापू पर बसी झोपड़ी के भीतर नन्ही उमा की बुखार से तपती देह  सिमटी हुई ...
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  October 5, 2013, 5:01 pm
फोटो साभार-Gregg Bradenरंग अलगरूप अलगपसंद अलगनापसंद अलगहो सकता हैवेश और परिवेश अलगभाषा और देश अलगजाति और धर्म अलग  फिर भी भीतर सेएक ही हैहमारा ढांचाबिल्कुलउसी साँचे की तरहजिसमे रख करढाला गया हैतन की मिट्टी को   स्त्री और पुरुष बना करजाने कितने रंगऔर रूप बना कर ।साँसों क...
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  September 10, 2013, 3:41 pm
हर सुबह से शाम वो रोज़ गुज़रता हैगली गली घूमता है  हर घर केसामने सेआवाज़ लगाते हुएखरीदने कोफालतू रद्दीलोहा लंगड़टूटा प्लास्टिकऔरन जाने क्या क्यासब कुछजो उसकेऔर हमारेकाम का नहीं।वो तोल कर  बटोर कर  समेट करसहेजता है  अपने ठेले मेंऔर चल देता हैअगली राहजहां कोई और हो...
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  September 8, 2013, 3:02 pm
निकल जाए जो साँस, तो मुर्दा बदन देख करज़ख्मी रूह भी आएगी,जनाज़े का मंज़र देखने। मैं इंतज़ार में हूँ,कफन कोई ला दे मुझकोचल दूंगा फिर खुद ही,खुद को दफन करने। अब और नहीं चलना,इस राह ए जिंदगी परजन्नत निकल पड़ी है,गबन दोज़ख का करने।  ~यशवन्त यश©...
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Tag :पंक्तियाँ
  September 6, 2013, 7:51 pm
जब घबरा जाता थाकठिन शब्दों की इमला सेआँखों से बहने लगते थे आँसूतब कोई थाजो हौसला बढ़ाता थालिखना सिखाता थाजब लिख कर दिखाता थाकिसी पन्ने पर  कल्पना से बातें करतीकोई कवितातब कोई थाजो सहेजना सिखाता थाजब पढ़ता थाफर्राटेदार संस्कृतक्लास रूम रीडिंग के समयतब कोई थाजो सबसे ...
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Tag :पंक्तियाँ
  September 5, 2013, 4:00 am
नज़रों के सामनेफैले हुए हैंढेर सारे विषयकुछ आकार में बड़ेकुछ बहुत ही छोटेकुछ समुंदर कीअंतहीन गहराई लियेपहाड़ों की ऊंचाई लिये  कुछथोड़ा ही कुरेदने परमुट्ठी के भीतर  समा जाते हैंकुछपल मे हीउफनाने लगते हैं  सबके अपने शब्द हैंअपनी भाषा हैअपना अलग व्याकरण हैऔर इन सबके...
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  September 1, 2013, 7:04 pm
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