जो मेरा मन कहे

कल शाम को फेसबुक पर मृगतृष्णा जी की यह कविता पढ़ कर इसे अपने ब्लॉग पर साझा करने से खुद को न रोक सका। आप भी पढ़िये-(1)पगडंडियां मौके नहीं देतीं संभलने केपीछे से कुचले जाने का ख़ौफ़ भी नहीं  (2)पगडंडियां दूर तक नहीं जातींबस इनके क़िस्से शेष रह जाते हैं (3)बड़े रास्...
जो मेरा मन कहे...
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  November 8, 2014, 8:59 am
कभी कभीबीते दौर की कुछ बातेंयादों के बादल बन कर छा जाती हैंमन के ऊपरबना लेती हैंएक कवचरच देती हैंएक चक्रव्यूहजिसे भेदनानहीं होता आसाननये दौर कीनयी बातों के लिये ।मन !उलझा रहता हैसिमटा औरबेचैन रहता हैभीगने कोअनंत शब्दों कीतीखी बारिश मेंजो अवशेष होते हैंउड़ते जातेउन ...
जो मेरा मन कहे...
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  November 6, 2014, 9:34 am
कुछ लोगहोते हैंकोरे पन्ने की तरहसफ़ेदजिनका मनज़ुबान और दिलढका होता हैपारदर्शकटिकाऊ  आवरण से....आवरण !जो रहता हैबे असरचुगलखोरी कीदूषित हवाऔर काली स्याही केअनगिनत छींटों सेआवरण !जिसे तोड़नेचूर चूर करने कीकई कोशिशें भीरह जाती हैंबे असर पाया जाता हैउन कुछ हीलोगों के पास...
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  November 4, 2014, 10:01 am
पीठ पर लादे भारी भरकम सा बस्ताजिसके भीतर उसका हर ज्ञान सिमटता  कभी करती हुई बातें संगी साथियों सेवो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामने से कभी हाथ थामे अपने किसी बड़े का गुनगुनाती हुई कोई प्यारी सी कविता खुश होता है मन उसकी शरारतों से  वो निकलती है रोज़ मेरे घर के सामन...
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  November 1, 2014, 12:30 pm
इन जलते हुएहजारों दीयों मेंढूंढ रहा हूँएक अपना दीयाजिसकी रोशनीसैकड़ों अँधेरों केउस पारपहुँच करदिखा दे एक लौउन उम्मीदों कीजो अब तकसिर्फ कल्पना बन करउतरती रही हैंकागज़ के झीनेपन्नों पर .... किरचे किरचे बन करअब तकजो उड़ती रही हैंहवा मेंऔर चूमती रही हैंधरती के पाँवउन उम्म...
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Tag :पंक्तियाँ
  October 23, 2014, 9:42 am
आटे दाल का भाव न पूछोभरे बाज़ार पहेली बूझोगुम हो गया चिराग का जिन्नअच्छे दिन अच्छे दिन। आलू गोभी अकड़ दिखातामंडी जाना रास न आतामहंगाई के यह ऐसे दिन   अच्छे दिन अच्छे दिन। देवियाँ अब भी लुटतीं पिटतीं अपमान के हर पल को सहतीं कहाँ कृष्ण ....यह कैसे दिन अच्छे दिन अच्...
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  October 16, 2014, 2:56 pm
बहुत अजीब होते हैंपल पलबदलते  मौसम के रंगकभी  पलट देते हैंमोड़ देते हैं  तैरती नावों के रुख   और कभीअपनी ताकत से चूर कर देते हैंधरती का घमंड ....इन रंगों मेंकोई रंग  कभी देता है ठंडकडाह मे जलतेझुलसते मन कोऔर कभीकोई रंगदहका देता हैभीतर की आग कोजो लावा की तरहनिकलती ह...
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  October 15, 2014, 11:24 am
बज रहा हैकभी धीमाकभी तेज़ संगीतवक़्त केइसी कत्लखाने मेंजहाँ बंद आँखों सेज़िंदगीरोज़ देखती हैअगले सफर केसुनहरे सपने और खुश हो लेती हैदेह कीअंतिम विदा मेंउड़ते फूलों कीलाल पीली  पंखुड़ियों को महसूस कर के खुद परबिखरा हुआ ....आजनहीं तो कलजिस्म की कैद सेबाहर निकलउसे भटकना ही ...
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  October 10, 2014, 1:59 pm
मन !भटकता है कभीकभी अटकता हैआस पास कीदीवारों परलटकती तस्वीरों केमोहपाश मेंफँसकरकुछ समझता हैकभीकुछ कहता हैबातें करता हैतन को छू करनिकलने वालीठंडी हवाओं सेपेड़ों की हिलतीशाखाओं सेझरती सूखी पत्तियोंनयी कलियों सेतुलना करता हैकभीखुद केबीते कल कीआज कीबनाता है रूपरेख...
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  October 5, 2014, 7:31 pm
आप सभी पाठकों को दशहरा बहुत बहुत मुबारक !इस ब्लॉग पर पिछले वर्ष प्रकाशित पोस्ट को ही इस बार भी पुनर्प्रकाशित कर रहा हूँ।दशहरा मुबारक- दशहरा मुबारक भीड़ को चीरता हर चेहरा मुबारकहर बार की तरह राम रावण भिड़ेंगे तीरों से कट कर दसों सिर गिरेंगे दिशाओं को घमंड की दशा ये...
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  October 3, 2014, 7:53 am
नोटों पर छपीतुम्हारीमुस्कुराती तस्वीरहर रोज़ गुजरती हैन जाने कितने हीकाले हाथों से ........दीवारों पर लगीतुम्हारीमुस्कुराती तस्वीरहर रोज़ गवाह बनती हैन जाने कितने हीअसत्य बोलों की .......तुमबदलना चाहते थेदेश समाजऔर विश्वपर तुम्हाराअसीम संघर्षअंतिम साँस के साथ ही दफन हो ...
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  October 2, 2014, 8:12 am
दुनिया की सूरतदेखने से पहले हीमुझे गर्भ में मारने वालों !मेरे सपने सच होने से पहले हीदहेज की आग मेंजलाने वालों !सरे बाज़ारमेरी देह कीनीलामी करने वालों !बुरी नज़रों सेदेखने वालों !गली कूँचोंपार्कों मेंमेरे दरबारसजाने भर सेजागरण की रातों मेंफिल्मी तर्ज़ पर बनेभजनऔर भें...
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Tag :मैं 'देवी' हूँ
  October 1, 2014, 4:00 am
ओ इन्सानों !हर दिनन जानेकितनी ही जगहन जानेकितनी ही बारकरते होकितने ही वारकभी मेरे जिस्म परकभी मेरे मन परसमझते होसिर्फ अपनी कठपुतलीतो फिर आजक्यों याद आयीं तुम्हेंवैदिक सूक्तियाँश्लोक और मंत्रक्या इसलिएकि यह आडंबरअपने चोले के भीतरढके रखता हैतुम्हारे कुकर्मों काक...
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Tag :मैं 'देवी' हूँ
  September 29, 2014, 4:00 am
गूंज रहे हैं आजसप्तशती केअनेकों मंत्रहवा मे घुलतीधूप-अगरबत्तीऔर फूलों कीखुशबू के साथअस्थायी विरक्ति कासफ़ेद नकाब लगाएझूमतेकीर्तन करतेकुछ लोगशायद नहीं जानतेएक सचकि मुझे पता हैउनके मन के भीतर कीहर एक बातजिसकी स्याह परतेंअक्सर खुलती रही हैंआती जातीइन राहों केकई च...
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Tag :मैं 'देवी' हूँ
  September 27, 2014, 4:00 am
आज सेशुरू हो गया हैउत्सवगुणगान कामेरी प्राण प्रतिष्ठा काबिना यह समझेबिना यह जानेकि मिट्टी कीइस देह मेंबसे प्राणों का मोलकहीं ज़्यादा हैमंदिरों मे सजीमिट्टी कीउस मूरत सेजिसके सोलह श्रंगारऔर चेहरे कीकृत्रिम मुस्कुराहटकहीं टिक भी नहीं सकतीमेरे भीतर के तीखे दर्दऔर ...
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Tag :मैं 'देवी' हूँ
  September 25, 2014, 4:00 am
शब्द !जो बिखरे रहते हैंकभी इधरकभी उधरधर कर रूप मनोहरमन को भाते हैंजीवन केकई पलों को साथ लियेकभी हँसाते हैंकभी रुलाते हैं ....इन शब्दों कीअनोखी दुनिया केकई रंगमन के कैनवास परछिटक करबिखर करआपस मेंमिल करकरते हैंकुछ बातेंबाँटते हैंसुख -दुखअपने निश्चितव्याकरण की देहरी क...
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  September 17, 2014, 12:56 pm
भाषामाध्यम हैवरदान हैहरेक जीव कोकुछअपनी कहने कासबकी सुनने काकभी इशारों सेकभी ज़ुबान सेअपने कई रूपों सेजीवन में रच बस करले जाती हैकभी प्रेम केअसीम विस्तार तकऔर कभीडुबो देती हैघृणा या द्वेष केगहरे समुद्र में  ।भाषाकभी सिमटी रहती हैनियमों कीपरिधि के भीतरऔर कभीअनग...
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  September 14, 2014, 11:59 am
सुना थाकुछ सपनेबदलते हैंहकीकत मेंकभी कभीदेते हैंन बयां होने वालीखुशीलेकिनयह काल कोठरीतमाम बदलावों औररूप परिवर्तनों के बाद भीअब भी वैसी ही हैजिसके रोशनदान सेझाँकतीउम्मीद कीकुछ सफ़ेद लकीरेंअपने तय रास्ते सेभटक करपहले से जमाकालिख मेंकहीं गुम होकरघुल मिल जाती हैं...
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  September 8, 2014, 3:26 pm
जब देखता हूँ डायरी केभरे हुए पन्नों परबिखरे हुए जज़्बातों कोतो लगता हैशब्दों की यह दुनियाकितनी विचित्रकिन्तु सत्य है ....विचित्र इसलियेकि मन की भित्ति परउभरी आड़ी तिरछी भावनाएँकिसी प्रतिलिपि की तरहइन पन्नों परहू ब हूमेल खाती दिखती हैं .....और सत्य इसलियेकि इन पन्नों परज...
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  September 1, 2014, 4:06 pm
पूर्वाग्रहों सेघिरे हुएकुछ लोगसब कुछजान समझ करबने रहते हैंअनजानकरते रहते हैंबखानअपनी सोच कीचारदीवारी केभीतर कीउसी किताबीमानसिकता कीजो निकलने नहीं देतीदेखने नहीं देतीबाहर की दुनिया मेंहो रहेबदलावों की तस्वीर....ऐसे लोगअपने 'वाद'मेंउलझे रह करव्यर्थ के विवादों का...
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Tag :पंक्तियाँ
  August 23, 2014, 1:06 pm
छोटी सी ज़िंदगी काबहुत लंबा है सफरचलो कहीं चलेंइन अँधेरों से निकल करकहीं जल रही है लौस्याह तस्वीरों की आँखों मेंउलझे हैं जिनके होठबहते जीवन की बातों मेंमाना कि कठिन हैयहाँ काँटों भरी डगरफिर फूल भी मिलेंगेआगे कहीं बिखर करमिलेगा सुकुं रूह कोअब साहिल पर ही थम करचलो कही...
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  August 18, 2014, 5:35 pm
सभी मित्रों को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिकशुभकामनाएँ ! एक तरफ रंकएक तरफ राजाकहीं दौलत का बंदकहीं खुला दरवाजा .....बड़ी मुश्किल से कहींपिसता गेहूं आटादेखो यहीं कहींकोई पिस्ता मेवा खाता ....बचपन कहीं पचपनकहीं पचपन मे बचपनचाँदी की चम्मच कोकोई ढालता कोई खाता .....ऐसा ही है जी...
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  August 15, 2014, 8:36 am
ज़रूरी नहींकि लिखा होसब कुछअपने मतलब काकिसी किताब केहर पन्ने परकुछ बातेंहोती हैंअर्थ हीनतर्क हीनहमारी नज़र मेंलिये होती हैंमंज़रबंजर ज़मीन साजिसके चारों ओरफैला रहता हैघना सुनसान ....लेकिनउसी किताब कीपथरीलीबंजरज़मीन परकुछ और नज़रेंखिलते देखती हैंउल्लास केअनेकों फूलज...
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  August 7, 2014, 3:26 pm
कोई रंक यहाँ कोई राजा बना फिरता हैउठता है यहाँ कोई हर रोज़ गिरा करता है।किसी के पैरों से यहाँ कुचल जाते हैं नगीनेकिसी हाथ से  छूकर सँवर जाते हैं  नगीने।मूरत बन कर कोई खड़ा रहता है मैदानों मेंशीशों मे जड़ कर कोई टंगा रहता है दीवारों मे।एक मिट्टी के कई चोलों में एक रूह के ...
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  August 4, 2014, 4:13 pm
कुंठा केविष से भरेकुछ लोगअक्सर भूल जाते हैंअपने बीते दिनऔर वो बीती बातेंजिनके आधार परखड़ी हैउनके आज कीसंगमरमरी इमारत.....जिसे कभी महलतो कभी ताज़ कह करलोग निहारा करते हैंबातें किया करते हैंमगरमोहब्बत की वो मिसालखुद के भीतरसमेटे रहती हैअनगिनतकटे हाथों के ज़ख्म ........फिर भी...
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Tag :पंक्तियाँ
  August 1, 2014, 7:49 pm
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