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Blog: ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी

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------------शब्द बहाने ढूंढता है गढ़ता है और मढ़ देता है परत दर परत भाषा का लेप एक अतिरेक और अतिरिक्त अनावश्यकता  को जन्मता है शब्द संवेदना का पूरक नहीं आभास है मात्र ... Read more
clicks 134 View   Vote 0 Like   9:45am 2 Mar 2013 #
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खोलता हूँ आँखेंहवा के लिहाफ मेंहर रोज़ सुबह-सुबहदिन किसी बच्चे सा मुस्कुराता हैधूप की बुढ़िया चली आती हैपूरब के किस देस से जानेगठरी लादे काँधेदिन भर का बोझचुभती है दुपहरी की किरचेंसड़क की आँखों मेंकिरकिराती हैंआखिरी बस की तरह लदी-पदी शामनिकल जाती हैहिचकोले खाती सी... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   8:56am 28 Sep 2011 #
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एक रात के छिद्रों मेंफूँकता है कोई प्राण बाँसुरी मचल उठती है तम की लहरियाँ छेड़ती हैं धमनियों को एक तुम नहीं रात का यौवन व्यर्थ दो जीवन बाँस बन बैठा हैफूल न खिलेतो अकाल सा दिखता है खिल गए फूल अगर तो अकाल के अंदेशे में पत्थर मारते हैं लोग तीन  घर मेरे होने को सार्थक क... Read more
clicks 92 View   Vote 0 Like   11:22am 16 Jun 2011 #
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तुम तक कैसे पहुँचे दर्द मेरा तुम्हें दर्द देना नहीं परिचित कराना है इन स्वरों और सुरों से ताकि बाद के दिनों में दर्द तुम्हें अपना सा लगे तुम अपनी मुस्कुराहटें मुझे भेज दो मैं भी हँसता हूँ खुश हूँ मगर किसी और के हाथों से मरहम बड़ा सुकून देता है और ये जो सम्प्रेषण है ... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   7:10am 7 Jun 2011 #
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बीकानेर की एक धुल भरी गरम उदास शाम है यह छड़े-बिछड़े रूँख रेत के बोझ से दबे कंधे लटकाए खड़े हैं शहर भर की आँखों में एक निष्क्रिय प्यास है इतिहास के खंडहरों में फड़फडाता है एक कबूतर आकाश कुछ बेचैन-सा करवट बदलता हैकाँख में दबा किला कसमसाता है  चौड़े सीने और लम्बी बाँहों... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   12:09pm 28 Apr 2011 #
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खोलता हूँ कभी कभार उस पुरानी पोटली को जंग खाई चीज़ों के बीच ढूँढता हूँ कुछएक पूरी की पूरी बस्ती जिन्दा हो उठती है भीतर धुएँ की महीन सी लकीरों को छेदती नमी की एक परत उभर आती है आँखों में जब तक जिएगा ये पोटली का सामान अहसास रहेगा अपनी गर्भनाल से जुड़े होने का                     ... Read more
clicks 93 View   Vote 0 Like   1:02pm 3 Apr 2011 #
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लोग कहते रहेपंख तेरे हैं पर उड़ान नहीं कहते रहे सैकड़ों हजारों साल बांधते रहे देहरी तक आकाश एक सम्मोहन की तरह सीमाएं उसके अस्तित्व पर मढ़ती चली गईआज उस लड़की की आँख में छोटे-छोटे कुछ बादल तैरते हैं सपनों की पाल खुल नहीं पाती एक घर है एक आँगन है मुस्कुराहटें कम सही क... Read more
clicks 95 View   Vote 0 Like   4:31am 16 Mar 2011 #
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मौसम बदलते रहे तुम्हारे इर्द-गिर्द हवाएँ ठंडी से गर्म फिर ठंडी हो गईं बच्चे जवान होकर पिता बन गए पौधे वृक्ष बन बैठे पुण्य फलित हुए पाप दण्डित हुए सिर्फ तुम्हीं हो अरुणा जो नहीं बदली सैंतीस साल तुमने प्रतीक्षा को दिये मृत्यु की या जीवन की हम भी नहीं समझ पाए सोहन सात साल ... Read more
clicks 84 View   Vote 0 Like   5:10pm 8 Mar 2011 #
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हवा जब भी गुज़रती है सरसों के खेत से होकर दो चार पीले फूल टंग जाते हैं उसकी कमीज़ के बटन में और पीठ पर गूंजती दिखती है एक भीनी भीनी सी थाप इन रंगों और खुशबुओं की उम्र कोई बहुत ज्यादा तो नहीं मगर सूखे मौसमों के दौर में आँखों में उतार लेंगे वो पीली सुगंध छाती भर सांस कुछ कदम ... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   8:16am 13 Feb 2011 #
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फिर तुम्हारी गोरी पतली उँगलियों में सरसों के फूल नज़र आने लगे फिर उस बीजूके के इर्द-गिर्द मंडराने लगीं तुम्हारी खुशबुएँ कुए के आसार पर गूंजने लगीं जब पंखुड़ी सी तुम्हारी मुस्कुराहटें मुझे लगने लगा है बसंत आने को है ... Read more
clicks 76 View   Vote 0 Like   4:49am 6 Feb 2011 #
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हिचकियों की गर्भनाल बचपन के किसी कोने तक पहुँचती है उम्र के तमाम पाखंड भरभरा उठते हैं ऐसी ही किन्हीं आतिशबाजियों में एक आकाशवाणी सी जीवन में धड़कनों की धार सी उतर जाती है ... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   4:37am 30 Jan 2011 #
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धुंधियाए आकाश के आईने मेंचाँद उदास दिखता है अंधेरों से दामन छुड़ा कर रात ने छिटकी तारों जड़ी चूनर सुखाने डाल दी आकाश की अलगनी पर यादों के मिटने का वक़्त है रात के सायेचाँद के मफलर से लिपटे उदासी के रंग को गहरा कर रहे ... Read more
clicks 86 View   Vote 0 Like   5:40pm 25 Dec 2010 #
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बेशक चुप हो जाना हार जाना नहीं है मगर चुप्पियाँ किनारे बैठ कर तमाशा देखने का बोध है कंठ की विवशताएँ शब्दहन्ता बनती हैं हवाओं में एक और भीष्म जबडाता चला जाता है ... Read more
clicks 78 View   Vote 0 Like   4:08pm 23 Dec 2010 #
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धूप दिखाई है पुराने चावलों को एक जम्हाई ली है दाल बीनती माँ ने कई दिनों के बाद काका ने भूंगडे भुनाए हैं याद आने लगी कुएँ की पाल पर बैठकर खाते हुए गुड़ वाले दिनों की भेलियाँ रामलीला के पुराने मैदान में रात खूब बरसा पानीघुटनों तक हो गया कीचड़ ही कीचड़ पट्टीदार पाजामें के फट... Read more
clicks 87 View   Vote 0 Like   3:31am 27 Oct 2010 #
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रात के चेहरे पररोशनी की लकीर खींचते सेआ लगे किनारे तुम्हारे ख़यालआकाश की जाजम परहोने लगी चाँद की ताजपोशीतारों की जयकार घुटने लगीएक पुरानी नदी यादों कीउत्तर से दक्षिणदूर तक पसरती चली गईसूरज के रखवाले ने जब खोले द्वारआँसुओं के निशान छिपाने लगेफूलों पर बिखरे पद-चिह्न ... Read more
clicks 117 View   Vote 0 Like   5:29pm 21 Oct 2010 #
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इन पत्थरों कीबुझी नहीं है अभी आगदर्प का लेपदरक भले ही गया होदिपदिपाता अब भी वहीं हैशताब्दियों की दंतकथाएँहर चट्टान हे चेहरे परसाक्षीत्व के हस्ताक्षर हैंभूगोल की भींत परफड बांचता पुरखों कीमत्स्य-रूपा पठार का भोपारक्त के खंडहर हैं येजिनको छूते हीशिराओं के थोथले जा... Read more
clicks 112 View   Vote 0 Like   3:22pm 19 Oct 2010 #
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मैंने मन के तहखानों को खंगालादीवारों पर एक इन्द्रधनुष संवाराअंधेरों को बुहार कर कुछ जगह निकालीबाहर हंसती हवा का एक झौंकाबगल में गुच्छा लिये फूलों कामुस्कुराता खड़ा था... Read more
clicks 88 View   Vote 0 Like   3:58pm 17 Oct 2010 #
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बासनों की रगड़ी मिट्टी की सुगंध सेजो लोग बैठे हैं बहुत दूरदेर रात तक कानों मेंउतरती पाजेबों की छनक छाए रहती हैतुम्हारी खूबसूरती कितना मायने रखती हैउनके लिएजिनके तकिये के दोनों किनारेहर सुबहदो ओस की बूँदें टंगी मिलती है... Read more
clicks 99 View   Vote 0 Like   5:11pm 11 Oct 2010 #
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हम सबने अपने अपने परमात्माओं को पुकारा हमें रास्ता दिखाओ हम भटके हुए हैं पर दिशाओं ने चुप्पी की चादर ओढ़ ली कोई नहीं आया इतने में सूरज के दरीचे खुले रोशनी के रास्ते पिघले और हम सब अपने अपने घरों को चल दिये ... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   11:03am 7 Sep 2010 #
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फ़लक पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं lकि तेरे गेसुओं की बावली बलाएँ हैं lतपती धरती रूठ गयी तो बरखा फिर बरसी कि जैसे आकाश की अदाएँ हैं lऊपर से सब भीगा भीतर सूख चला न जाने कौन से मौसम की हवाएँ हैं lपिघल के रहती हैं ये आखिर घटाएँ बिखरे दूर तक जब प्यास की सदाएँ हैं lफू... Read more
clicks 96 View   Vote 0 Like   6:28am 5 Sep 2010 #
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