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व्यंग्यमहापुरुषों को मैं बचपन से ही जानने लगा था। 26 जनवरी, 15 अगस्त और अन्य ऐसेे त्यौहारों पर स्कूलों में जो मुख्य या विशेष अतिथि आते थे, हमें उन्हींको महापुरुष वगैरह मानना होता था। मुश्क़िल यह थी कि स्कूल भी घर के आसपास होते थे और मुख्य अतिथि भी हमारे आसपास के लोग होते थे...
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Tag :great
  March 12, 2017, 4:47 pm
परसों जब मैं अपने ब्लॉग नास्तिक TheAtheistकी अपनी एक पोस्ट ‘मनुवाद, इलीटवाद और न्याय’ के पृष्ठ पर गया तो देखा कि उसमें पाठकों के सवालों व राजेंद्र यादव के जवाबों से संबंधित लिंक काम नहीं कर रहा। क्लिक किया तो पता लगा कि संबंधित साइट देशकाल डॉट कॉम से यह स्तंभ ही ग़ायब है, मे...
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Tag :dishonesty
  February 17, 2017, 5:39 pm
ग़ज़ल                                                                                    इस मुसीबत का क्या किया जाएबात करने न कोई आ जाएबात करने जो कोई आ जाएकुछ नई बात तो बता पाएमौत से पहले मौत क्यूं आएअपनी मर्ज़ी का कुछ किया जाएजिसको सच बोलना ...
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Tag :different
  February 4, 2017, 12:38 pm
ग़ज़ल                                                                                                                                                              मैं से हम होते जाओमांगो, मिलजुलकर खाओसुबह को उठ-उठकर ...
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Tag :formless
  January 11, 2017, 2:02 pm
लघुकथामैंने सोचा किसीसे असलियत पता लगाऊं।मगर चारों तरफ़ सामाजिक, धार्मिक, सफ़ल, महान और प्रतिष्ठित लोग रहते थे।फिर मुझे ध्यान आया कि असलियत तो मैं कबसे जानता हूं।-संजय ग्रोवर05-10-2016...
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Tag :fan
  October 5, 2016, 9:07 pm
ग़ज़लय़क़ीं होता नहीं थाकभी सोचा नहीं था19-08-2016सफ़र अच्छा ही ग़ुज़राकहीं जाना नहीं था25-08-2016लगी तन्हाई बेहतरकोई परदा नहीं था26-08-2016बड़ा या छोटा, कुछ भी-मुझे ‘बनना’ नहीं था27-08-2016न अब डर है न चिंता,क्यूं तब सूझा नहीं था07-09-2016-संजय ग्रोवर...
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Tag :literature
  September 7, 2016, 2:25 pm
कवितामैंने उन्हें दुनिया के बारे में बतायावे सोचने लगेदुनिया ने उन्हें मेरे बारे में बतायावे मान गए-संजय ग्रोवर17-07-2016...
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Tag :friends
  July 17, 2016, 7:54 pm
मुर्दाघर की रौशन दुनिया कर देंगेतुम जागे तो मुर्दे हत्या कर देंगेलाशें, मोहरे, कठपुतली या भाषणबाज़बड़ा बनाकर तुमको क्या-क्या कर देंगेठगों के झगड़ों में क्या सच क्या झूठ भलाये तो बस हर रंग को मैला कर देंगेतुम सोचोगे तुम्हे प्रकाशित कर डालाचारों जांनिब घुप्प अंधेरा कर दे...
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Tag :hypocritical
  March 28, 2016, 4:09 pm
व्यंग्यविश्वगुरु बनने का एक ही तरीक़ा है- दूसरे सभी देशों को अपने देश से भी बुरी स्थिति में ले आओ।इसके लिए आवश्यक है कि-दुनिया में ज़्यादातर देश खाने-पीने में मिलावट शुरु कर दें।किसी भी देश में बिना दहेज के लड़कियों की शादी न हो पाए।सभी देशों के लोग अच्छे काम करना बंद कर ...
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Tag :movements
  March 9, 2016, 2:53 pm
मालिक़ के जैसा होने में उसको आराम है अब पता चला ग़ुलाम क्यों ग़ुलाम हैमुर्दों के जैसी ज़िंदगी चुनते हैं बार-बारफिर पूछते हैं क्यों यहां जीना हराम हैऊंचाईओं की चाह को मरना ही एक राहअब मर ही गए हो तो देखो कितना नाम है10-02-2016जब काम नहीं था तो मैं बारोज़गार थाफिर छोड़ दिया उसको मुझ...
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Tag :ghazal
  February 16, 2016, 2:20 pm
‘हम तुम्हे मंदिर में नहीं घुसने देंगे’ वे बोले मैं हंसाकुछ वक़्त ग़ुज़राकई लोग हंसने लगेवे फ़िर आए और बोले-‘हम तुम्हे मंदिर पर हंसनेवालों में शामिल नहीं करेंगे’मैं हंसाकुछ वक़्त और ग़ुज़राऔर कई लोग हंसेवे फिर चले आएअबके बोले ‘हमसे घृणा मत करो’मैं हंसाबोले-‘घृणा पर ह...
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Tag :funny
  January 23, 2016, 2:10 pm
व्यंग्यकई लोग, बहुत सारे लोग कहते हैं कि हम तो भई दिल से जीते हैं।मेरा मन होता है कि इन्हें ले जाकर सड़क पर छोड़ दूं कि भैय्या, लेफ़्ट-राइट देखे बिना, दिमाग़ का इस्तेमाल किए बिना, ज़रा दिल से चलकर दिखाओ तो।क्या ये लोग महीने के आखि़री दिन अपनी तनख़्वाह बिना गिने ही ले आते होंगे !? क...
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Tag :senseless
  January 5, 2016, 6:13 pm
ग़ज़लवो महज़ इक आदमी है बसऔर उसमें क्या कमी है बसउम्रे-दरिया के तजुर्बों परअब तो काई-सी जमी है बसआंसुओं का बह चुका दरियाआंख में थोड़ी नमी है बसहर बरस आता है इक तूफ़ांजोश सारा मौसमी है बसइन डरे लोगों के हिस्से मेंइक मरी-सी ज़िंदगी है बस-संजय ग्रोवर...
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Tag :music
  December 23, 2015, 9:08 am
ग़ज़ल ज़िंदगी की जुस्तजू में ज़िंदगी बन जाढूंढ मत अब रोशनी, ख़ुद रोशनी बन जारोशनी में रोशनी का क्या सबब, ऐ दोस्त!जब अंधेरी रात आए, चांदनी बन जागर तक़ल्लुफ़ झूठ हैं तो छोड़ दे इनकोमैंने ये थोड़ी कहा, बेहूदगी बन जाहर तरफ़ चौराहों पे भटका हुआ इंसान-उसको अपनी-सी लगे, तू वो ग...
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Tag :ghazal
  December 17, 2015, 7:24 pm
ग़ज़लख़ुदको फिर से खंगालते हैं चलो,आज क़ाग़ज़ संभालते हैं चलोगर लगे, हो गए पुराने-सेख़ुदको रद्दी में डालते हैं चलोक्यूं अंधेरों को अंधेरा न कहारौशनी इसपे डालते हैं चलोज़हन जाना तो मार डालोगेबात को कल पे टालते हैं चलोसुन न पाओगे, कह न पाएंगेएक फ़ोटो निकालते हैं चलोआदमी जैसी ...
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Tag :paper
  December 2, 2015, 9:35 pm
पुरस्कार क्यों लिए-दिए जाते हैं, इसपर किसीने भी सवाल नहीं उठाया, कोई उठाएगा इसकी उम्मीद भी न के बराबर ही है।इस देश में लेखकों की रचनाएं, संपादक और प्रकाशक, चाहे वे वामपंथीं हों या संघी, किस आधार पर छापते हैं, इसपर भी सवाल कम ही उठते हैं, कम ही उठेंगे।यह सवाल भी नहीं उठा कि ए...
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Tag :hypocrisy
  October 19, 2015, 7:15 pm
ग़ज़लबिलकुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थेवो राज़ एक-दूसरे के खोल रहे थेतहज़ीब की तराज़ू भी तुमने ही गढ़ी थीईमान जिसपे अपना तुम्ही तोल रहे थेअमृत तो फ़क़त नाम था, इक इश्तिहार थाअंदर तो सभी मिलके ज़हर घोल रहे थेवो तितलियां भी तेज़ थीं, भंवरे भी गुरु थेमिल-जुलके, ज़र्द फूल पे जो डोल रहे ...
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Tag :ghazal
  October 12, 2015, 10:33 pm
व्यंग्यक्या आपने कभी ऐसी गाय देखी है जो कहती हो कि आदमी मेरा बेटा है ? मैंने तो नहीं देखी। बचपन से सुना ख़ूब है कि गाय हमारी माता है, गाय हमारी माता है। कमाल की माता है कि माता को ख़ुद ही नहीं पता कि वह माता है, है तो किसकी माता है! कभी आपने कोई क़िताब ही पढ़ी हो जिसमें लिखा हो म...
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Tag :cow
  October 2, 2015, 2:15 pm
ग़ज़लग़ायब का तू वक़ील है तो मुझको माफ़ करसाज़िश तेरी दलील है तो मुझको माफ़ कर24-06-2015चेहरे पे तेरे होगी कबूतर-सी इक अदाआंखों में तेरी चील है तो मुझको माफ़ करऔरों की तरह गिरने को मैं भी कहूं उठना!ऐसी तेरी अपील है तो मुझको माफ़ करबदनामी से बचने को बेईमान बन गया!अब डर से ख़ुद ज़लील है त...
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Tag :formless god
  June 25, 2015, 12:26 pm
छोटे थे तो फ़िल्मों से पता चलता था कि ब्लैकमेल नाम की भी एक क्रिया होती है और बहुत ही घिनौने लोग इसे अंजाम देते हैं। बड़े होते-होते, समझ आते-आते समझ में आया कि इस महानता में तो जगह-जगह, तरह-तरह से लोग हाथ बंटा रहे हैं। ‘इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ के मुहावरे से तो आज बहुत-से लोग परिच...
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Tag :character
  June 3, 2015, 11:40 pm
एक बड़ा-सा मैदान, चारों तरफ़ भीड़, शोर ही शोर, चीख़-चिल्लाहट।कहीं एक कोने से दो आदमी निकलते हैं। आराम-आराम से चलते हुए। लगता नहीं कि भीड़ और शोर का उनपर कुछ असर हो रहा है। ख़ासे शांत और एकाग्रचित्त मालूम होते हैं। बीच मैदान में पहुंचकर आपस में कुछ बुदबुदाने लगते लगते हैं। फिर...
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Tag :cricket
  April 19, 2015, 12:25 pm
पुरस्कार टॉफ़ियों की तरह होते हैं, देनेवाले अंकल की तरह होते हैं, लेनेवाले बच्चों की तरह। बल्कि बचकाने।अंततः तसल्ली यही बचती है कि हमने कौन-से वाले अंकल से टॉफ़ी ली, तथाकथित अच्छे अंकल से या तथाकथित बुरे अंकल से। ज़्यादा लालची बच्चे यह सावधानी भी नहीं रख पाते, कई बार वे झ...
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Tag :satire
  March 31, 2015, 12:39 pm
फ़ेसबुक/इंटरनेट पर बीच-बीच में ऐसी बातें उठती रहतीं हैं कि किसीके विचार/रचना/स्टेटस चुराने में बुरा क्या है, आखि़र हम उसके विचार फ़ैला रहे हैं, समाज को फ़ायदा पहुंचा रहे हैं, रचनाकार का काम ही तो कर रहे हैं, तो रचनाकार/विचारक को इसपर आपत्ति क्यों हो। इंटरनेट के विस्तार से एक...
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Tag :royalty
  March 25, 2015, 1:28 pm
‘क्या लाए ?’‘जी, जो भी बन पड़ा ले आया हूं।’‘गुड, देखो हमारे यहां अपना पक्ष चुनने की पूरी स्वतंत्रता है, चाहो तो इसे मेरी दायीं जेब में डाल दो, चाहो तो बायीं में।’‘जी, मैं जानता हूं कि रास्ते अलग़-अलग़ हैं पर गंतव्य एक ही है।’‘शाबाश! बाहर लोगों को बताना मत भूलना कि मुझे अपना पक...
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Tag :short story
  March 4, 2015, 3:13 pm
व्यंग्यपता नहीं भगवान, भ्रष्टाचार और चमत्कार का क्या रिश्ता है पर पिछले कुछ सालों से इन तीनों का नाम कई बार एक साथ सुनने में आया है। आप भी सुनना चाहते हैं तो यह वार्त्तालाप सुनिए-‘देखिए, मैं ज़रुर भ्रष्टाचार दूर कर दूंगा, यह अच्छा मौक़ा है, भगवान भी अब यही चाहता है, लगता है ...
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Tag :satire
  February 14, 2015, 7:06 pm
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