संस्कृति सेतु / Samskriti Setu...
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January 21, 2012, 9:41 am |
| (पंजाबी) लेखक - अजीत सैलानीरूपांतर – नीलम शर्मा ‘अंशु’ वह समझ नहीं पा रही थी कि अब क्या करे। अंतत: वह सड़क के किनारे बने पार्क में उस चूबतरे पर आ बैठी, जहां वह पहले भी कई बार घंटों बैठकर अपने अंतर्मन से बातें किया करती थी। इस चबूतरे पर बैठने से उसे दोनों सड़कें ... |
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November 25, 2011, 12:21 am |
| गुलजा़र साहब के जन्म दिन पर विशेष‘प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं, एक ख़ामोशी है सुनती है, कहा करती है, न ये रुकती है न ठहरती है कभी, नूर की बूँद है सदियों से बहा करती हैं। सिर्फ़ अहसास है ये रूह से महसूस करो प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।’ ... |
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| कहानी श्रृंखला -13 (पंजाबी) वे घरों को नहीं लौट सकेंगे। इंतज़ार करते-करते माएं बूढ़ी हो जाएंगी और मर जाएंगी। पता नहीं वे संख्या में कितने थे।मैं भी उन्हीं में से था। मेरी आँखों में भी सेल्युलॉयड के सपने थे। वे स... |
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| पापा तुम कब आओगे ? 0 दिलीप कौर टिवाणाप्यारे पापा, आप मेरा ख़त पढ़कर हैरान तो होंगे ही। कई बार जी चाहा कि आपको ख़त लिखूं परंतु फिर यह ख़याल आया कि यदि बीजी को पता चल गया तो वे दु:खी होंगीं। बहुत बार दिल चाहा कि उनके और आपके बारे में कुछ पूछूं परंतु जब भी मैं बात शुरू क... |
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| बांगला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत आप पढ़ रहे थे। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हुए। प्रस्तुत है उपन्यास की अंतिम किस्त।गोधूलि गी... |
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| (यहां प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध... |
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| (प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम स... |
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| (यहां प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध... |
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| (प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम स... |
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| (प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम ... |
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| (प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम स... |
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| (प्रस्तुत है बांग्ला के जाने-माने लेखक श्री समीरण गुहा साहब के उपन्यास का हिन्दी रूपातंर गोधूलि गीत। बांग्ला में तो उनके एक से बढ़कर एक उपन्यास मौजूद हैं। इस उपन्यास के माध्यम से हिन्दी पाठकों से वे पहली बार रू-ब-रू हो रहे हैं ताकि हिन्दी भाषा के विशाल फलक के माध्यम स... |
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| (आज शायर साहिर लुधियानवी का जन्म दिन है। इस अवसर पर प्रस्तुत है पंजाबी के जाने माने लेखक बलवंत गार्गी का लिखा यह रेखाचित्र उनकी पंजाबी में लिखित पुस्तक 'हसीन चेहरे' से साभार। यह आलेख साहिर साहब के विभिन्न पक्षों को उजागर करता है। आज साहिर और गार्गी साहब दोनों ही हमारे ब... |
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| कहानी श्रृंखला - 11माई लभ्भो: इलियास घुम्मणलाहौर शहर से निकल कर कार रावी के पुल पर चढ़ी तो सभी का रंग पीला पड़ गया। ड्राईवर की सीट पर बैठे मेरे बड़े भाई साहब ने डोल रहे अपने शरीर को संभाला और सामने वाले शीशे से आगे की ओर देखते हुए कहा, ‘तुम्हारी यह हरकत कहीं हम सबको ले न ड... |
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December 28, 2010, 7:19 pm |
| रजाईवीना वर्मा वह मुँह सर लपेटे पड़ी थी। सुबह के ग्यारह बज गए थे। दिन पूरा चढ आया था, परंतु उसने मुँह से रजाई नहीं उतारी थी। उसकी पुत्रवधु कैथी कई बार आकर रजाई हटा कर देख गई थी कि कहीं बुढ़िया मर तो नहीं गई परंतु उसकी साँस चलती देख वह फिर उसके मुँ... |
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November 19, 2010, 10:09 pm |
| हिरणी की आँख 0मोहन भंडारीउस दिन शनिवार ही था, शायद! हाँ, शनिवार ही। छुट्टी थी न! अरे नहीं, छुट्टी दी गई थी। वर्ना यह हादसा क्यों होता? मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा हो जाएगा। मैं डरा नहीं, हाँ, घबरा ज़रूर गया था। और, घबराहट में इन्सान को दिन, वार याद ह... |
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September 26, 2010, 10:39 am |
| दोस्तो, इमरोज़साहब का एक प्यारा सा संस्मरण आपके साथ शेयर करना चाहती हूँ। मैं अभी चौथी कक्षा में ही था कि माँ गुज़र गई। घर में चार चाचा थे, परंतु चाची एक भी नहीं थी। सब कुछ होते हुए भी हर शै में एक कमी सी महसूस होने लगी। ऑंखें हमेशा बाहर और भीतर कुछ तलाशती ... |
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September 18, 2010, 1:17 pm |
| पंजाबी शायर शिव कुमार बटालवी के 75 वें जन्मदिन ( 23जुलाई) पर विशेष पंजाबी लेखक बलवंत गार्गी ने अपने दोस्तों पर बहुत से रेखाचित्र लिखे हैं। प्रस्तुत है उनकी पुस्तक हसीन चेहरे से साभार, शिव बटालवी पर लिखा उनका रेखाचित्र।शिवबटालवी0 बलवंत गार्गीशिव बटालवी के साथ मेरा करार थ... |
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August 10, 2010, 12:11 am |
| श्री शंकर पात्रअनुवाद - नीलम शर्मा 'अंशु'1)आज की सहस्त्र कुंतियांआज की सहस्त्र कुंतियांपुरुष का स्नेह चाहती हैंमन की तृप्ति के लिए नहीं,पेट की ज्वाला के लिए ।पार्क के बगल में खड़ी है नमितासिनेमा हॉल के सामने कावेरीइस शताब्दी की कोई वधु, कोई कुमारी।तृप्ति नहींआशा नहीं... |
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