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उत्पत्ति प्रकरणपहला सर्गकेवल ज्ञान से ही आत्मा की मुक्ति होती है, कर्म और समाधि से नहीं।अज्ञात आत्मा ही स्वयं दृश्य की सृष्टि करता है इत्यादि का प्रतिपादन।मुमुक्षु व्यवहारप्रकरण के अनन्तर पूर्वोक्त साधनों से सम्पन्न अधिकारी के लिए 'तावद् विचारयेत् प्राज्ञो यावद...
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  March 8, 2013, 7:32 am
बीसवाँ सर्गएक दूसरे को बढ़ाने वाले प्रज्ञाबुद्धि प्रकार, महापुरुषलक्षण और सदाचारक्रम का कथन।उक्त ज्ञान महापुरुषों में ही रहता है दूसरों में नहीं, और महापुरुष बनने में वक्ष्यमाण सदाचार ही कारण है, अतः सदाचार का वर्णन करने के लिए उपक्रम कर रहे श्रीवसिष्ठजी बोले।श्र...
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  February 27, 2013, 7:24 pm
उन्नीसवाँ सर्गदृष्टान्त के अर्थनिरूपण के सिलसिले में नित्य अपरोक्ष द्रष्टा, दृश्य आदि के साक्षी ब्रह्मरूप प्रमाणतत्त्व का शोधन।प्रासंगिकता समर्थन कर उससे सम्बद्ध प्रमाणतत्त्व का निर्णय करने के इच्छुक श्रीवसिष्ठजी ने कहा, हे श्रीरामजी, जिस अंश का विशेषरूप से प्...
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  February 22, 2013, 12:39 pm
अठारहवाँ सर्गमुख्य, अमूल्य और आनुंषगिक फलों के साथ इस ग्रन्थ के गुणों का निरूपण।इस प्रकार विषय और प्रयोजन से प्रकरणभेद का वर्णन कर सम्पूर्ण ग्रन्थ के गुणों का वर्णन कर रहे श्रीवसिष्ठजी तत् तत् दृष्टान्तों के उपन्यास में ग्राह्य अंश और तात्पर्य को, ग्रन्थ शैली के ज्...
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  November 10, 2012, 12:53 am
सत्रहवाँ सर्गप्रकरणों के क्रम से ग्रन्थसंख्या का वर्णन।इस प्रकार साधनों का वर्णन कर उक्त साधनों से सम्पन्न पुरुष को प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रवण आदि से पुरुषार्थ-प्राप्ति दर्शा रहे श्रीवसिष्ठजी ग्रन्थप्रवृत्ति के क्रम का, प्रकरण आदि के विभाग से, वर्णन करने के लिए उपक...
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  October 24, 2012, 1:56 pm
सोलहवाँ सर्गसाधुसंगतिरूप चतुर्थ द्वारपाल का वर्णन तथा चारों में सेप्रत्येक के सेवन में भी पुरुषार्थहेतुता का वर्णन।साधुसमागमरूप चतुर्थ द्वारपाल का वर्णन कर रहे और चारों में से प्रत्येक के विषय में किया गया प्रबल पुरुषप्रयत्न पुरुषार्थपद है, ऐसा दर्शाते हुए श्र...
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  October 23, 2012, 7:51 am
 पन्द्रहवाँ सर्गवैराग्यकल्पवृक्ष की छाया के समान सुखकर शीतल तीसरे द्वारपाल सन्तोष का वर्णन।क्रम प्राप्त तीसरे द्वारपाल सन्तोष का वर्णन करते हैं।श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे शत्रुतापन श्रीरामजी, सन्तोष परम श्रेय (मोक्षसुख) कहा जाता है और सन्तोष स्वर्गसुख भी कहा जाता ...
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  October 22, 2012, 8:34 pm
चौदहवाँ सर्गसाधुसंगम, सत् शास्त्र के अभ्यास और अन्तःकरण की शुद्धि से बुद्धि को प्राप्त एवं शम और सन्तोष के हेतु विचार की प्रशंसा।पूर्वोक्त रीति से शमनामक पहले मोक्षद्वारपाल का वर्णन कर विचार नामक दूसरे द्वारपाल का वर्णन करनेवाले वसिष्ठजी बोलेःहे श्रीरामचन्द्रज...
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  October 18, 2012, 2:24 pm
तेरहवाँ सर्गजीवनमुक्तिरूप फल के हेतु वैराग्य आदि गुणों का एवं शम का विशेषरूप से वर्णन।वैराग्य, शान्ति आदि साधनों का आगे वर्णन करने वाले श्रीवसिष्ठजी इस समय प्रस्तुत जीवन्मुक्तिस्थिति का वर्णन करते हैं।श्रीवासिष्ठजी ने कहाः हे श्रीरामजी, इस  दृष्टि का अवलम्बन कर ...
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  October 18, 2012, 2:20 pm
बारहवाँ सर्गसंसारप्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य और राम में प्रश्नकर्ता के गुणों की अधिकता का वर्णन।अन्य लोगों के प्रति भी विवेक वैराग्य की अभिवृद्धि के लिए संसारप्राप्ति की अनर्थरूपता और ज्ञान के माहात्म्य को कहने के इच्छुक श्रीवसिष्ठजी श्रीर...
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  October 16, 2012, 10:10 am
ग्यारहवाँ सर्गज्ञानप्राप्ति का विस्तार, श्रीरामचन्द्रजी के वैराग्य की स्तुति और वक्ता तथा प्रश्नकर्ता के लक्षण आदि का प्रधानतः वर्णन।श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे पुण्यचरित, ज्ञान का पृथिवी पर अवतरण, अपने जन्म, ज्ञानावरोध, पुनः ज्ञानप्राप्ति आदि और श्री ब्रह्माजी का क...
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  October 15, 2012, 2:03 pm
दसवाँ सर्गब्रह्माजी के और अपने जन्म का वर्णन एवं समस्त जनों की मुक्ति के लिए मेरा उपदेश है इसका ज्ञान की अवतरणिका के रूप में वर्णन।प्राक्तन पौरुष का ही नाम दैव है। उस पर आधुनिक पौरुष से भले ही विजय प्राप्त हो जाय। नियति तो, जो वैराग्य प्रकरण में कृतान्त की पत्नी कही गई ...
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  October 14, 2012, 11:27 am
नौवाँ सर्गदैव के अपलाप की सिद्धि के लिए सफल कर्मों की मनोमात्रता और मन की चिदात्मता का वर्णन।पुरुषप्रयत्न की स्वतन्त्रता की सिद्ध करने के लिए पहले कहीं पर 'दैव असत् है' ऐसा कहा और कहीं पर प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव एवं पुरुष प्रयत्न कहलाता है, ऐसा कहीं पर यह ठीक ...
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  October 11, 2012, 2:12 pm
आठवाँ सर्गपूर्व सर्ग में प्रचुर उदाहरणों द्वारा वर्णित दैवमिथ्यात्व का, उपजीव्यविरोध आदि युक्तियों से भी, समर्थन।इस प्रकार दैव का निराकरण कर पौरुष की स्वतन्त्रता का समर्थन करने पर भी विश्वास न होने के कारण भ्रम में पड़ रहे और पहले स्वयं विस्तार से वर्णित (►) एवं अने...
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  October 10, 2012, 10:42 am
सातवाँ सर्गप्रचुर उदाहरण और प्रत्युदाहरणों तथा युक्तियों से पौरुष की प्रधानता का समर्थन।दैव का निराकरण कर पहले जो पौरुषप्रधानता का समर्थन किया गया था, उसी को उदाहरण और प्रत्युदाहरण द्वारा दृढ़ करने वाले श्रीवसिष्ठजी उपपत्तिपूर्वक हितोपदेशद्वारा अधिकारियों को ...
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  October 9, 2012, 10:54 am
छठा सर्गजहाँ प्रयत्न करने पर भी कार्य विनाश होने पर प्रबल दैव कार्य विनाशक माना जाता है, वहाँ पर विघातक अन्य पुरुष का प्रयत्न ही 'दैव' शब्द से कहा जाता है अथवा अपना प्राक्तन बलवान पौरुष ही दैव कहा जाता है।श्रीवसिष्ठजी ने कहाः श्रीरामचन्द्र पौरुष से अतिरिक्त दैव कोई वस...
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Tag :Yog Vasisth
  October 7, 2012, 9:38 am
पाँचवाँ सर्गपौरुष के प्रबल होने पर अवश्य फलप्राप्ति में एवं दैव की पुरुषार्थ से अभिन्नता में युक्ति और दृष्टान्तों का प्रदर्शन।पूर्व में जो यह कहा था कि दैव पौरुष से अतिरिक्त नहीं है, दैव से पौरुष प्रबल है और पौरुष से ही पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, उक्त सबका युक्ति स...
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  October 4, 2012, 6:11 pm
चौथा सर्गमुक्तों के अनुभव से सदेह और विदेह मुक्तियों में समानता वर्णन और ज्ञान की दृढ़ता के लिए शास्त्रीय पौरुष की प्रशंसा।नित्यमुक्तस्वभाव आत्मा का अज्ञानरूप आवरण ही बन्धन है और ज्ञान से उसका विनाश ही मुक्ति है। जैसे यह चित्रलिखित बाघ है, सचमुच नहीं है, ऐसा ज्ञान ह...
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  October 3, 2012, 8:36 am
तीसरा सर्गश्रीरामचन्द्रजी की शंका के निराकरण के बहाने स्थूल आदि जगत के अध्यारोप और अपवाद से प्रत्यगात्मरूप विषय की सिद्धि।इस प्रकार पूर्व वृत्तान्त का सम्पूर्णतया स्मरणकर विस्तारपूर्वक उसको कहने के लिए प्रस्तुत श्रीवसिष्ठजी सदगुरुस्मरणरूप मंगल करते हुए एवं व...
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  October 1, 2012, 5:34 pm
दूसरा सर्गश्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देने के लिए प्रार्थित श्रीवसिष्ठजी को श्रीविश्वामित्रजी का प्रोत्साहन करना।श्रीशुकदेव जी की आख्यायिका की प्रकृत में संगति दिखला रहे एवं श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देने के लिए श्रीवसिष्ठजी को उत्साहित कर रहे श्रीविश्वामित्रज...
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  September 30, 2012, 2:02 am
मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरणपहला सर्गविचार द्वारा स्वयं ज्ञात और पिता द्वारा उपदिष्ट तत्त्वज्ञान में विश्वास न कर रहेश्री शुकदेवजी को जनक के उपदेश से विश्रान्तिप्राप्ति का वर्णन।श्रीरामचन्द्रजी ने जिस शम, दम आदि साधनसम्पत्ति का वर्णन किया है, वह किस प्रकार से व्यवहा...
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  September 29, 2012, 12:03 am
तैंतीसवाँ सर्गसभा में सिद्ध पुरुषों का शुभागमन और अपनी अपनी योग्यता के अनुकूल स्थान में बैठे हुए सिद्धों द्वारा श्रीरामचन्द्रजी के वचनों की प्रशंसा।सिद्धों द्वारा की गई श्रीरामचन्द्रजी के वचनों की श्लाघा को ही विश्कलित कर रहे महामुनि वाल्मीकि जी प्रश्न के उत्तर ...
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Tag :Yog Vasisth
  September 27, 2012, 11:59 pm
बत्तीसवाँ सर्गश्रीरामचन्द्रजी के वचनों को सुनने वाले लोगों के प्रचुर आश्चर्य का तथा देवताओं द्वारा की गई पुष्पवृष्टि का वर्णन।श्रीवाल्मीकि जी ने कहाः कमल के सदृश नेत्रवाले राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार मन के मोह को नष्ट करने वाले वचन कहने पर वहाँ पर बैठे ...
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Tag :Yog Vasisth
  September 27, 2012, 1:15 am
इकतीसवाँ सर्गसासांरिक जीवन वर्षाऋतु के मेघ के समान कुत्सित है, अतः संसार निर्मुक्तिपूर्वक सुखपदप्रापक उपाय का प्रश्न।पूछे जाने वाले प्रश्नों के उपोदघातरूप से संसार में जीवन की वर्षाऋतु के मेघरूप से कल्पना करते हैं।ब्रह्मन, इस संसार में जीव की आयु ऊँचे वृक्षों के ...
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Tag :Yog Vasisth
  September 25, 2012, 11:04 am
सत्ताईसवाँ सर्गपूर्व में उक्त और अनुक्त मोक्ष के विरोधी पदार्थों में, वैराग्य के लिए, विस्तारपूर्वक दोषों का वर्णन।पहले जो कहे जा चुके हैं और जो नहीं कहे गये, उन सम्पूर्ण पदार्थों में अन्यान्य दोषों को दर्शाते हुए अपने चित्त की शान्ति के कारणीभूत पदार्थ की अप्राप्त...
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Tag :Yog Vasisth
  September 20, 2012, 5:11 pm
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