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Blog: ज़िन्दगी ज़िन्दाबाद - Zindagi Zindabad

Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
पैर लगने का सुख भी था और साथ ही यह संतोष भी कि अब एलिम्को तक की भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी. अपने नए साथियों (कृत्रिम पैर और छड़ी) के साथ जीवन का अगला सफ़र नए सिरे से आरम्भ करना था. शारीरिक बदलाव के साथ आये बहुत से बदलावों को स्वीकारते हुए कुछ और बदलाव स्वीकारने को तैयार थे. चलने के... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   9:47am 13 Sep 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
समय अपनी तरह से हमारी परीक्षा लेने में लगा हुआ था. एलिम्को में हमारे चलने का अभ्यास जैसे उसी का अंग बना हुआ था. जिस समय पैर का नाप देने आये थे, उस समय लगा था कि कृत्रिम पैर बनाकर दे देते होंगे. जब पैर बनकर तैयार हुआ और पहले दिन चलने का अभ्यास किया तब भी यही अंदाजा लगाया था कि ... Read more
clicks 6 View   Vote 0 Like   12:55pm 15 Aug 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
एलिम्को में नियमित रूप से जाना हो रहा था. चलने का अभ्यास पहले की तुलना में कुछ बेहतर होने लगा था. अब कृत्रिम पैर को बाँधने में पहले जैसी उलझन नहीं होती थी. कृत्रिम पैर पहनने के पहले बाँयी जाँघ पर पाउडर लगाया जाता, उसके ऊपर एक कपड़े की पट्टी पहननी होती थी उसके बाद कृत्रिम पै... Read more
clicks 33 View   Vote 0 Like   10:12am 3 Aug 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
एलिम्को के बाहर की दुनिया ही अकेली दर्द भरी नहीं दिखाई देती थी, एलिम्को के भीतर की दुनिया भी उसी दर्द से भरी नजर आई. वहाँ जैसे-जैसे दिन निकलते जा रहे थे वैसे-वैसे बहुत सारे लोगों के दर्द से परिचय होता जा रहा था. किसी का दर्द को अपने से कम समझ नहीं आ रहा था. कृत्रिम पैर पहनने, ... Read more
clicks 34 View   Vote 0 Like   8:32am 25 Jul 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
नमस्कार मित्रो, इधर आपसे बातचीत किये लम्बा समय हो गया. दुर्घटना के बाद से आप सभी के स्नेह के साथ चलते हुए एलिम्को तक पहुँच गए थे. वहाँ डॉक्टर ने पैर की, उस पर आई नई त्वचा की स्थिति देखकर पैर बनाने से इंकार कर दिया. यह इंकार स्थायी या दीर्घकालिक नहीं था बल्कि कुछ दिनों के लि... Read more
clicks 40 View   Vote 0 Like   11:17am 7 Jul 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
यह किसी भी व्यक्ति का सौभाग्य ही होता है कि वह जिस संस्था में अध्ययन करे उसी में उसको अध्यापन करने का अवसर मिले. यह उसके लिए आशीर्वाद ही होता है कि जिन गुरुजनों का आशीर्वाद उसे मिला, उन्हीं के साथ उसे अध्यापन करने का मौका मिले. हमें ये सौभाग्य अर्थशास्त्र और हिन्दी साहि... Read more
clicks 35 View   Vote 0 Like   4:43pm 18 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
कभी-कभी समय भी परिस्थितियों के वशीभूत अच्छे-बुरे का खेल खेलता रहता है. अनेक मिश्रित स्मृतियों का संजाल दिल-दिमाग पर हावी रहता है. सुखद घटनाओं की स्मृतियाँ क्षणिक रूप में याद रहकर विस्मृत हो जाती हैं वहीं दुखद घटनाएँ लम्बे समय तक अपनी टीस देती रहती हैं. मनुष्य का स्वभाव ... Read more
clicks 31 View   Vote 0 Like   6:33am 13 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
सब दिन न होत एकसमान, यह बात जिसने भी कही है अपने अनुभव से ही कही होगी. वाकई ऐसा होता है कि सभी दिन एक जैसे नहीं रहते हैं. समय का चक्र तो अपनी गति से ही चलता है पर हम मनुष्यों को प्रयास करने चाहिए कि अपने कार्यों से, अपनी जिजीविषा से बुरे दिनों के प्रभाव को कम से कम कर सकें. उन द... Read more
clicks 34 View   Vote 0 Like   3:35pm 7 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
उन दिनों में आराम जितना हो सकता था किया जा रहा था क्योंकि घावों के भर जाने के बाद उनकी त्वचा की कोमलता दूर होने के बाद ही कृत्रिम पैर लगने वाली प्रक्रिया शुरू की जा सकती थी. चलने की, अपने पैरों पर खड़े होने की जल्दी थी मगर जल्दबाजी में किसी तरह की हड़बड़ी करना नहीं चाहते थे. न... Read more
clicks 45 View   Vote 0 Like   5:07pm 2 Jun 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
कभी हसरत थी आसमां छूने की, अब तमन्ना है आसमां पार जाने की,ये वे दो पंक्तियाँ हैं जिन्हें उरई में आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में नवम्बर 2005 में पढ़ा था. ये दो पंक्तियाँ बाद में हमारी पहचान बन कर हमारे साथ चलने लगीं. स्थानीय दयानंद वैदिक महाविद्यालय में हिन्दी साहित्य विष... Read more
clicks 77 View   Vote 0 Like   3:46pm 29 May 2020 #आत्मकथा
Blogger: कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
घर आने के बाद समय का अकेलापन महसूस नहीं हो रहा था. अब समूचा परिदृश्य सामने दिख रहा था. कानपुर रहने के दौरान सिर्फ स्वास्थ्य लाभ लिया जा रहा था. घर के किसी सदस्य के उरई कई दिन रुकने की स्थिति भी नहीं बन सकती थी. इसके चलते गाँव के, खेती के, पिताजी के देहांत पश्चात् तमाम कानूनी ... Read more
clicks 31 View   Vote 0 Like   5:06pm 24 May 2020 #आत्मकथा
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