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कांकड़

मां के मरने और बाप के पागल होने के बाद ठेके पर शराब बेचता एक बच्‍चा बहन के पीले हाथों, छोटे की पढाई की चिंता करता हैऔर त्रासदी के सारे जमूरों को हाइवे के तपते कोलतार परनंगे पांव खड़े कर देता है. हाइवे के इस मोड़ पर रुकने का कोई कार्यक्रम नहीं था लेकिन तापमान के घोड़े जब 49 ...
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Tag :गांव- गुवाड़
  July 10, 2012, 7:34 pm
‘मौसमों की मंडी में बारदाने की ये कैसी कमी थी कि धूप की मेरी सारी फसलें बारिश में भीग गईं. सपने जो तुम्‍हारी आंखों में लिखे थे, धुल गए. वक्‍त का जमादार दूर पिड़ों (खलिहानों) में बैठा बेबसी की बीडियां फूंकता है और लाचारी सरकारी सिस्‍टम की तरां फिर से मेरे सर पर आ खड़ी हुई है...
कांकड़...
Tag :गांव- गुवाड़
  April 26, 2012, 5:31 am
कुहरा जब घना होता है तो रो‍शनियां भी रंग बदल लेती हैं. कुहरे के टिड्डी दल ने धूप के खेतों को लगभग साफ कर दिया है और धूप के बचे खुचे पौधे ओस से गीले कपड़ों को सुखाने डरते-डरते आसमान की बालकनी में आते हैं.इसबिल्डिंग में अपनी पसंसीदा जगह बालकनी की सीढियों पर बैठकर कुहरे को उ...
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Tag :गांव- गुवाड़
  December 26, 2011, 11:31 am
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