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पथराये सपने

समाज कीठिठुरती ठंढ मेफूट पड़ते हैंलड़कियों के फूलमटियालीहरी डंडियों परकोमलपीले सरसों के सेकन्या पुष्प,महकने लगता हैपूरा सीवानखेत खलिहानगमक उठते हैं,आसमान से बरसती ठंढऔरगहरे कुहासों के बीचखिलखिलातीरहती हैलड़कियों कीपौध,कुछनन्हे फूलरौंद दिए जाते हैंआवारा जंग...
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  January 20, 2013, 4:58 pm
बड़ा निर्लज्ज है मेरा मकान मालिक मांगने को तो माचिस की तीलियाँ तक उधार मांग लेता है हाँ मगर देने को दुआ तक नहीं देता सरकारी मुलाजिम है "मकान मालिक"**------------------------------------------(यथा राजा तथा प्रजा )...
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  December 26, 2012, 10:03 pm
अरसा पहलेजब मंदिरों मे हुआ करती थीसच मुच की आरती ,मस्जिदें अजान मे गुनगुनाती रहती थीं,तबजबकि भूख ...माँ के हाथों की लज्जत मे हुआ करती थी,उसी दौर मेएकाएक पागल हों गया था आदमीकलाईयों मे राखी की जगहतलवारें आ गयी थींऔरतें -बच्चे काट डाले गए थेजानवरों की तरह,हाँ एक दम उसी दरमि...
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  November 15, 2012, 5:58 pm
मैं दंगाई नहींमैं आज तकनहीं गयाकिसी मस्जिद तककिसी मंदिर के अन्दर क्या हैमैंने नहीं देखा,सुनोरुकोमुझे गोली न मारोभाईतुम्हे तुम्हारे मजहब का वास्तामत तराशो अपने चाक़ूमेरे सीने पर,जाने दो मुझेमुझेतरकारियाँ ले जानी हैंमाँरोटिया बेल रही होंगी!*amit anand ...
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  November 15, 2012, 5:57 pm
बरसती दुपहरियों मे बरामदे पर चारपाई डाले हुए मन .... हवाओं के साथ बहती आती हुयी बूंदों मे भीगता ... सिहरता अतीत की ओर भागता है!बीते दिन याद आते हैं.... एक अनदेखी लेकिन चम्पई एहसास समेटे हुए एक लड़की... जिसकी सांस सांस मे कविता के शब्द झरा करते थे.... मंदिर की घंटियों के से शब्द!याद ...
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  November 15, 2012, 5:56 pm
बारिश की प्रतीक्षा मे चिपचिपे हुए दिन मे मन होता है कि झरबेरियाँ खायी जाएँ, खट-मीठी झरबेरियाँ ....मन छुट्टी की घंटी के बाद के बच्चे सा भाग उठता है अतीत की ओर स्मृतियों का बस्ता टाँगे...नदी पर बना पीपे का डग-मग पुल.... किनारों पर खड़े कास के झुरमुट .... जामुन के जंगलों मे चरती हुयी ...
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  November 15, 2012, 5:55 pm

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  October 19, 2012, 5:54 pm
आज-कलबड़ेएहतियात सेघोलते होंतुमरंगमाटी के दीये मे,औरलाल रंगतुम्हारी उँगलियों के पोर छूमहावर बन जाता है,मेरेआँगन मेतुम्हारे शुभ पाँवउभर आते हैं!*amit anand...
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  May 24, 2012, 7:56 pm
बजबजाते कचरे से पन्नियाँ खींचते टीन -टप्पर बटोरते हुएबिधनुआ अनाथ गुनगुनाता है हरामीपन का राग ,कल कचरे में गिफ्ट वाली रंगीन पन्नियाँ निकलेंगी आज FATHER'S DAY जो है !!...
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  May 24, 2012, 7:55 pm
गुजरे समय कीवो "रुमाल"जिसमे ...बाँध करतुमनेअपनी सुधियाँ दी थीं,जिन्दगी की भाग दौड़ मेगुम गयी...गुम हों गया उसका कढाई दार किनाराउसकी गमकती महकउसमे लुभाती हुयीतुम्हारी नेहसब...शायद मैं उसेकिसी जाती हुयी ट्रेन मे भूल आया,तुम्हारी सुधियाँ मुझसे दूर भागती जा रही हैंशायदस...
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  May 24, 2012, 7:54 pm
दूरवहाँ पलाश के पास सेमुड गयी हैनयी बनी सड़क,अब इस सूनी पगडण्डी परकोई नहीं आता,दूर पहाड़ों की ओर सेबांसुरी बजातायदा कदा आनेवालाचरवाहा भी नहीं आयाअरसा हुआ,फिर भीशाम ढलते हीवोसूनी पगडण्डी परजला देती हैएक दीप,गाते हुएएक पहाड़ी गीत-"कोई ...आखिर क्यूँ आएगा"!!*amit anand...
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  May 24, 2012, 7:53 pm
अरसे सेनहीं आयाकोई "बहेलिया"जाल बिछाने / दाना डालने,वर्त्तमान का मैदानसूना पड़ा है,मन के पाखीआतुर होंछटपटाते हैं....बंधन ................
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  May 24, 2012, 7:51 pm
क्या कभीकांच के गिलासों को भी लगती होगी "प्यास"नंगी सड़क परचिलचिलाती लू ने भोगी होगी भला "चिपचिपाती उमस"क्या कभीसाहब के झबरे कुत्ते को भी ...लगी होगी "भूख"क्या कभी किसी कुर्सी ने भी पूंछा होगा ये "प्रश्न" *amit anand...
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  May 7, 2012, 4:40 pm
बड़े स्कूलों की दीवाल भीहड़प लेते हैंबड़े बड़े चेहरे ,उड़ती मछलियाँ गीत गाती तितलियाँमटकते बौने / सेब /आम/अनारगुम जाते हैं बचपन के  की तरह .....उनपे टंग जाते हैंखिचड़ी बालों वाले न्यूटन अजीब सी मूंछों वाले मार्क्स ....बड़े का अदब हमें बड़ा बनाता हों शायद! *amit anand...
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  May 7, 2012, 4:39 pm
मैंअतिक्रमण करता हूँ"अपनी सीमाओं का"मैं लांघ जाता हूँ जाति धर्म की दीवारमैं भाषाओं के पार जाता हूँ,मैं मुखर हों उठता हूँदमन के खिलाफमैं सच बोलता हूँमैं सच सुनना चाहता हूँमुझ पर प्रतिबन्ध लगना चाहिएमैं पश्छिमी बंगाल से हूँ!*amit anand ...
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  April 21, 2012, 4:33 pm
आज बाज़ार से खरीदनी है एक अदद दरातीकुछ खंजर छूरियाँ... ब्लेड नश्तर ,सभी तेज मगर छुपाये जा सकनेवाले कुछ लुभावने से इतर /परफ्यूम की शीशियाँदो चार मीठे जुमले बाजारू लटके-झटके,औरकल विशिष्टता का मुखौटा लगा कर"मैं महान बनने वाला हूँ"*amit anand...
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  April 20, 2012, 12:50 pm
मन के कच्चे प्लास्टर पर साल दर सालजबरिया चढ़ जाता है नया रंगनीला/पीला/ टेराकोटा /वेदारप्रूफ़कभी कभी तो ऐन पिछला वाला ही, हाँ लेकिनभीतर की असल ईंटें हमेशा "सुर्ख लाल" रहती हैं!*amit anand...
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  April 20, 2012, 12:49 pm
प्रिये!मैं अगर "मैं" ना होता तो "तुम" होतामैं रचता नित नए अवरोधदरवाजे की क्यारियों पर उजाता तुम्हारे लिए नए नए अपराधबोध ,नए तानो-फिकरों की फसल उगता बात बात पर प्रतिरोध करता,प्रिये!सोचो अगर "मैं" मैं ना होता तो मैं भी टाँगता अपना वजनी भीगा क्रोध तुम्हारी नेह की महीन डोर पर, ...
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  April 20, 2012, 12:48 pm
दुद्धी घुली दवातें कहाँ गयींकहाँ गयीं -कलमुही तख्तीमासाब की छपकी...गोल चक्केवाला "भोपूबाजा"फिरंगियों का खेल कागज के रंगीन चश्मे कहाँ गए? ओहतुम सही थे दादातुम्ही ने कहा था उस रोज़भाप उगलती रेल गाडी को उंगली दिखा कर ..बादलों की सी आवाज मे"छुटके"एक रोज़ मैं चला जाऊँगा इन पट...
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  April 17, 2012, 9:32 am
बार बार मन मे हुलासें भर, आँगन की किलकारियों के सपने देखती "नौगावां वाली भौजी" आज भोर मे चल बसीं!पैंतीस- चालीस साल की जिंदादिल हंसमुख भौजी की गोद अभी तलक सूनी ही थी! साल दर दर साल से बार बार उनकी कोख मे मौसमी बादलों की तरह एक अंखुआ पनपता और कोंपलें फूटने से पहले ही ... आसमान सू...
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  January 9, 2012, 9:55 pm
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