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Blog: sandhaan

Blogger: Shreeshrakesh jain
धर्म: एक त्वरित टिप्पणी —————– लोग धर्म को उस अदृश्य शक्ति जो उसके विश्वासानुसार इस चराचर जगत की नियामक सत्ता है, के प्रति कथित आनुष्ठानिक क्रियाओं के माध्यम से अपनी आस्था और श्रद्धा का प्रकटीकरण मानते हैं। जबकि धर्म इहलोक और परलोक (यदि कोई ऐसा मानता है) को सु... Read more
clicks 71 View   Vote 0 Like   5:14am 13 Aug 2018 #
Blogger: Shreeshrakesh jain
स्वाधीन रहें, लोकोन्मुख हों, सब जन अनुशासनबद्ध रहें। कर्त्तव्यों और दायित्वों के पालन के प्रति सन्नद्ध रहें। मानवता पोषक मूल्यों का संकल्पपूर्वक वरण करें। वैज्ञानिक सोच-समझ रक्खें, आदर्शोन्मुख आचरण करें। हो यही चेष्टा जीवन में आगे-आगे बढ़ते जाएं । अभ्युदय और नि:श्... Read more
clicks 65 View   Vote 0 Like   4:41am 31 Jul 2018 #
Blogger: Shreeshrakesh jain
हर वस्तु अपनी संरचना में जटिल और संश्लिष्ट होती है क्योंकि उसके अनेक पक्ष और आयाम होते हैं |चूँकि हमारी दृष्टि और भाषा दोनों की एक सीमा है इसलिए एक समय में हम किसी वस्तु का एक ही आयाम या पक्ष ग्रहण कर पाते हैं क्योंकि जब हम उसका एक आयाम पकड़ते हैं तो दूसरा छूट जाता है और दू... Read more
clicks 70 View   Vote 0 Like   2:33pm 26 Sep 2013 #अनेकांत
Blogger: Shreeshrakesh jain
यज्ञ को श्रीपाद अमृत डांगे वैदिक जनों के उत्पादन का सामूहिक ढंग मानते हैं जबकि देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय इसे सामूहिक उत्पादन का आनुष्ठानिक पक्ष मानना चाहते हैं लेकिन मेरे विचारानुसार यज्ञ वितरण का सामूहिक ढंग है |वर्गपूर्व समाज में कबीले के हर सदस्य द्वारा किये गए उ... Read more
clicks 64 View   Vote 0 Like   5:34pm 22 Oct 2011 #यज्ञ :एक टिप्पणी
Blogger: Shreeshrakesh jain
यथार्थ कृत्यात्मकता में निहित होता है |इसलिए उसे केवल क्रियात्मक रूप से जाना जा सकता है |हर वह तथ्य जो क्रियमाण या प्रवृत्तमान है ,यथार्थ है |यथार्थ का प्रकटीकरण गति या प्रवृत्ति के द्वारा होता है ,इसलिए गति या प्रवृत्ति यथार्थ के रूपाकार हैं |जो घटित हो रहा है ,वह यथार्... Read more
clicks 57 View   Vote 0 Like   5:06pm 22 Oct 2011 #यथार्थ :एक टिप्पणी
Blogger: Shreeshrakesh jain
दर्शन या दर्शनशास्त्र से सामान्य तात्पर्य है -जीवन और जगत के मूल उत्स के बारे में सैद्धांतिक विमर्श | इस विमर्श में जीवन को उन्नत बनाने के उपाय खोजना भी शामिल है लेकिन प्रायः हमारा आग्रह जीवन के भौतिक पक्ष पर कम और उसके अपार्थिव और लोकोत्तर पक्ष पर ज्यादा रहा है |इस कार... Read more
clicks 62 View   Vote 0 Like   4:41pm 6 Oct 2011 #दर्शन का दिग्दर्शन
Blogger: Shreeshrakesh jain
जैन मान्यता है कि मन ,वाणी और कर्म से की जाने वाली हर क्रिया से एक सूक्ष्म प्रभाव उत्पन्न होता है जिसकी’कर्म’ संज्ञा है और इसका भौतिक अस्तित्व माना गया है लेकिन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण यह इन्द्रियगोचर नहीं होता |न दिखने के कारण इसे ‘अदृष्ट ‘की संज्ञा भी दी गय... Read more
clicks 53 View   Vote 0 Like   3:45pm 5 Oct 2011 #
Blogger: Shreeshrakesh jain
ऋग्वेद की अंतर्वस्तु का अध्ययन और पड़ताल करने पर वैदिक जनों के मूल याने आद्यभौतिकवादी दृष्टिकोण पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है |अधिकांश ऋचाओं में लौकिक कामनाओं को केन्द्रीय महत्त्व मिला है |उनमें या तो वैदिक जनों की लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए की जाने वाली आनुष्... Read more
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