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धर्म: एक त्वरित टिप्पणी —————– लोग धर्म को उस अदृश्य शक्ति जो उसके विश्वासानुसार इस चराचर जगत की नियामक सत्ता है, के प्रति कथित आनुष्ठानिक क्रियाओं के माध्यम से अपनी आस्था और श्रद्धा का प्रकटीकरण मानते हैं। जबकि धर्म इहलोक और परलोक (यदि कोई ऐसा मानता है) को सु...
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  August 13, 2018, 10:44 am
स्वाधीन रहें, लोकोन्मुख हों, सब जन अनुशासनबद्ध रहें। कर्त्तव्यों और दायित्वों के पालन के प्रति सन्नद्ध रहें। मानवता पोषक मूल्यों का संकल्पपूर्वक वरण करें। वैज्ञानिक सोच-समझ रक्खें, आदर्शोन्मुख आचरण करें। हो यही चेष्टा जीवन में आगे-आगे बढ़ते जाएं । अभ्युदय और नि:श्...
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  July 31, 2018, 10:11 am
हर वस्तु अपनी संरचना में जटिल और संश्लिष्ट होती है क्योंकि उसके अनेक पक्ष और आयाम होते हैं |चूँकि हमारी दृष्टि और भाषा दोनों की एक सीमा है इसलिए एक समय में हम किसी वस्तु का एक ही आयाम या पक्ष ग्रहण कर पाते हैं क्योंकि जब हम उसका एक आयाम पकड़ते हैं तो दूसरा छूट जाता है और दू...
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Tag :अनेकांत
  September 26, 2013, 8:03 pm
यज्ञ को श्रीपाद अमृत डांगे वैदिक जनों के उत्पादन का सामूहिक ढंग मानते हैं जबकि देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय इसे सामूहिक उत्पादन का आनुष्ठानिक पक्ष मानना चाहते हैं लेकिन मेरे विचारानुसार यज्ञ वितरण का सामूहिक ढंग है |वर्गपूर्व समाज में कबीले के हर सदस्य द्वारा किये गए उ...
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Tag :यज्ञ :एक टिप्पणी
  October 22, 2011, 11:04 pm
यथार्थ कृत्यात्मकता में निहित होता है |इसलिए उसे केवल क्रियात्मक रूप से जाना जा सकता है |हर वह तथ्य जो क्रियमाण या प्रवृत्तमान है ,यथार्थ है |यथार्थ का प्रकटीकरण गति या प्रवृत्ति के द्वारा होता है ,इसलिए गति या प्रवृत्ति यथार्थ के रूपाकार हैं |जो घटित हो रहा है ,वह यथार्...
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Tag :यथार्थ :एक टिप्पणी
  October 22, 2011, 10:36 pm
दर्शन या दर्शनशास्त्र से सामान्य तात्पर्य है -जीवन और जगत के मूल उत्स के बारे में सैद्धांतिक विमर्श | इस विमर्श में जीवन को उन्नत बनाने के उपाय खोजना भी शामिल है लेकिन प्रायः हमारा आग्रह जीवन के भौतिक पक्ष पर कम और उसके अपार्थिव और लोकोत्तर पक्ष पर ज्यादा रहा है |इस कार...
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Tag :दर्शन का दिग्दर्शन
  October 6, 2011, 10:11 pm
जैन मान्यता है कि मन ,वाणी और कर्म से की जाने वाली हर क्रिया से एक सूक्ष्म प्रभाव उत्पन्न होता है जिसकी’कर्म’ संज्ञा है और इसका भौतिक अस्तित्व माना गया है लेकिन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण यह इन्द्रियगोचर नहीं होता |न दिखने के कारण इसे ‘अदृष्ट ‘की संज्ञा भी दी गय...
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  October 5, 2011, 9:15 pm
ऋग्वेद की अंतर्वस्तु का अध्ययन और पड़ताल करने पर वैदिक जनों के मूल याने आद्यभौतिकवादी दृष्टिकोण पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है |अधिकांश ऋचाओं में लौकिक कामनाओं को केन्द्रीय महत्त्व मिला है |उनमें या तो वैदिक जनों की लौकिक आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए की जाने वाली आनुष्...
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Tag :वेदों की मूल अंतर्दृष्टि
  September 26, 2011, 4:48 pm
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