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दिनेश दधीचि - बर्फ़ के ख़िलाफ़

नए शिखर छू लिये मगर वे सारे निर्झर किधर गये ? नयी सदी की भाषा में से ढाई आखर किधर गये ? जिनके घर में होने से घर अपना-अपना लगता था हमको अपने ही घर में वो करके बेघर किधर गये ? हर मुश्किल में साथ रहेंगे ये वादा करने वाले संग हमारे चलते-चलते जाने मुड़ कर किधर गये ?अपने पथ में पथरील...
दिनेश दधीचि - बर्फ़ के ख़िलाफ़...
Tag :नयी सदी
  May 22, 2013, 5:35 pm
राजनीति का मंजा खिलाड़ी हाथ जोड़ता आया.एक नए वोटर से उसका परिचय जब करवाया,वोटर बोला, 'अक्सर आपके बारे में सुनते हैं,'उत्तर मिला, 'मगर साबित तो कुछ भी नहीं हो पाया!'...
दिनेश दधीचि - बर्फ़ के ख़िलाफ़...
Tag :घोटाला
  May 10, 2013, 1:21 pm
17 मई 1988 की रात को पंजाब में रोपड़ के निकट एस वाई एल नहर के निर्माण में लगे इकतीस मजदूरों की आतंकवादियों द्वारा हत्या के बाद शेष मज़दूर बिहार आदि अपने प्रान्तों को लौटने लगे. इस प्रकार के समाचारों से प्रेरित थी यह कविता!हम तो आये थे बाबूजी, लिंक नहर बनवाने कोबहता देखा खून, ...
दिनेश दधीचि - बर्फ़ के ख़िलाफ़...
Tag :मज़दूर
  April 9, 2013, 7:41 pm
बचपन में जो पत्रिकाएँ या अखबार हम चाव से पढते थे, उनमें "फलों के नाम ढूंढिए" या "देशों के नाम ढूँढिये" जैसी पहेलियाँ बहुत पसंद की जाती थीं. आज पुराने कागज़ों में एक कागज़ पर स्वयं अपनी बनाई हुई ऐसी पहेलियाँ मिली हैं. आप भी इनका आनंद उठाएं और कुछ समय के लिए अपने बचपन में लौट च...
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Tag :
  March 27, 2013, 5:52 pm
Dear friends, if I were to show you some newspaper clippings regarding cases of violence against women in different forms, you would in all probability remind me that piling up evidence for something everyone accepts was totally unnecessary and uncalled for. As a matter of fact, such news till recently evoked little emotional or intellectual response, since these incidents, which I choose to describe as violent manifestations of gender discrimination, were hardly ever considered to be shocking, but (and also, maybe, because) they form an enormously sizeable component of the total crimes committed. Undoubtedly, representing such acts as contemptible and shameful in literary writings as well a...
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Tag :gender discrimination
  December 24, 2012, 6:48 pm
कालिदास के ऋतुसंहार (सर्ग ४, श्लोक ८५) में हेमंत ऋतु का वर्णन:प्रभूतशालिप्रसवैश्चितानिमृगांगनायूथविभूषितानिमनोहरक्रौंचनिनादितानिसीमांतरान्युत्सुकयन्ति चेतः(श्लोक की अंतिम पंक्ति में एक अशुद्धि है. कम्प्यूटर की विवशता समझें.)अब इसका हिंदी में भावानुवाद देखिय...
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Tag :ऋतु
  December 18, 2012, 9:02 pm
शुक्र है कि बच्चे अभी लड़ते हैंवे खूब गुस्सा करते हैंआपस में ही नहीं, माँ-बाप से भीदूसरों से ही नहीं, अपने आप से भीउन्हें गुस्सा आता हैअंदर से निकलता है,चेहरे पर बिखर जाता हैआँखों में, हाथों मेंसाफ़ दिख जाता है.कितनी खुशी की बात हैकि हमारे नन्हे-मुन्नेनहीं होते हमारी तर...
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Tag :गुस्सा
  December 12, 2012, 2:02 pm
ओ मेरी अलिखित कविते!अनिश्चित है तुम्हारा रूप, पर संभावनाएँ अनगिनत हैं.शब्द, भाषा, छंद के बंधन नहीं तुम पर,कि तुमने कागज़ों की खुरदरी, मैली, कंटीली-सी ज़मीनों परनहीं रक्खे हैं अपने पाँव अब तक,नहीं तुम जानतींउड़ते हुए, स्वच्छंद, बन्धनहीन भावों कोपकड़ कर पंक्तियों में खड़...
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Tag :अलिखित
  November 21, 2012, 12:50 pm
दीपावली का पर्व अपने प्रियजनों, पत्नी और बच्चों के साथ मनाया जाता है. पर कोई-कोई परदेसी किसी मजबूरी के चलते दीवाली पर भी अपने घर नहीं लौट पता. ऐसे समय में वह अपनी पत्नी के नाम क्या सन्देश देता है? प्रस्तुत है कविता:अब की बार भला तुम कैसी दीपावली मनाओगी?साँझ ढले कल छत के ऊपर...
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Tag :दीवाली
  November 8, 2012, 6:43 pm
यह कविता मैंने कॉलिज के दिनों में लिखी थी. आज एक पुरानी डायरी में मिल गयी. 'जैसी है, जहाँ है' आधार पर आप के लिए प्रस्तुत है :फैली हुई चाँदनी में ये मैली-सी परछाइयाँबिखर गयी हैं मौन झील के वक्षःस्थल पर काइयाँमस्त झूमते पत्तों के सर-सर स्वर से भी, देखो तो --अनजानी-सी खड़ी हुई है...
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Tag :चाँदनी
  September 13, 2012, 12:36 pm
भूख है, तो सब्र कर .....  "भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ?आजकल दिल्ली में है ज़ेरे-बहस ये मुद्दआ !"दुष्यंत भाई, आपको शिकायत थी कि मुद्दे केवल बहस तक सीमित रह जाते हैं.  हमने तो वह काम कर दिया है कि 'न रहेगा बांस, न बजेगी बाँसुरी.' कुछ भी ज़ेरे-बहस नहीं! दूर हो गयी आपकी शिकायत? ...
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Tag :दुष्यंत
  August 27, 2012, 9:19 am
मेरे अनुरागी मन में ...सत्तर के दशक में एक फिल्म आयी थी -- रजनीगन्धा, जिसमें नायिका विद्या सिन्हा को अमोल पालेकर (मध्यवर्गीय क्लर्क) और दिनेश ठाकुर (ग्लैमरस मीडियाकर्मी) में से एक को चुनना होता है. आज अगर उस फिल्म का नया वर्शन बने, या, नवयुग के अनुरूप 'रजनीगन्धा-२' बने, तो स...
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Tag :रजनीगन्धा
  August 21, 2012, 9:53 am

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Tag :mother's day
  May 30, 2012, 2:14 pm
गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर उन दिनों बहुत अस्वस्थ थे. अपने अंतिम जन्म-दिवस से पहले उन्होंने ६ मई १९४१ की सुबह यह कविता लिखी. इसके इकहत्तर वर्ष बाद कल ६ मई २०१२ कों यह कविता पढ़ कर मुझे इसका हिंदी में काव्यानुवाद करने की प्रेरणा हुई. ...
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Tag :टैगोर
  May 7, 2012, 10:45 pm
अगर कोई स्वभाव से ‘अनागत-विधाता’न हो, उसमें ‘प्रत्युत्पन्न-मति’वाली क्षमता भी न हो, तो ‘यद्भविष्य’के रूप में जीने के अलावा वह और क्या कर सकता है? क्या कोई चौथी सम्भावना भी होती है?...
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Tag :
  May 2, 2012, 9:43 am
(एक झकाझक साफ़-सुथरा तौलिया शोरूम से निकला और बाथ-रूम मेंनहीं पहुंचा. बल्कि वह यक-ब-यक ऐसी हालत में देखा गया कि पानी-पानी हो गया. ऐसा लगा मानो खुद को ढकने के लिए कोई तौलिया ढूँढ रहा हो. दर-असल हुआ यूँ कि टीवी के बीसियों कैमरों की चुंधियाती रोशनियाँ उस पर पड़ राही थीं और उसे किस...
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Tag :
  April 20, 2012, 7:21 pm
Why is the younger generation losing interest in literature? This question and some others related to this were posed to me by Mr. Parveen K. Modi of Haryana Review. My answers in that interview have been published in April 2012 issue of Haryana Review. Here are the questions and answers:Q1: The younger generation is gradually losing interest in literature. Being the Seniormost Professor in the English Department of Kurukshetra University, do you agree with this assessment?Ans.: The expression ‘younger generation’ is quite a broad one, but one cannot fail to notice that the lure of well-paid jobs in areas like computers and management has weaned away the younger generation from the pursu...
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Tag :education
  April 9, 2012, 9:52 am
साठ के दशक में जब मैं स्कूल में पढ़ता था, तब हमारी हिन्दी की पुस्तक में थी वह कविता। आज मुझे उसकी पहली दो पंक्तियाँ ही याद हैं। शायद यह सामान्य-सी कविता ही रही होगी। पर आज मन चाहता है पूरी कविता पढ़ने को। जहां तक मुझे याद है, यह विख्यात छायावादी कवि श्री सुमित्रानंदन पंत की ...
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Tag :इंटरनेट
  January 10, 2012, 1:25 pm
तुम जानते हो---- यह सब कैसे होता है?कैसे भीड़ पहली बार ऐसी घटना से उत्तेजित होती हैविरोध में नारे लगते हैं जुलूस निकलते हैं.घटना फिर होती है --- इस बार शिष्ट-मंडल जुटते हैं बहसें-चर्चाएं होती हैं.घटना एक बार फिर होती है किसी और स्थान पर किसी और समय पर थोड़े-से परिवर्तन के साथ.अब ...
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Tag :भ्रष्टाचार
  October 9, 2011, 5:11 pm
ऐसा अक्सर होता है तुम्हें कमरे में बैठे-बैठे घुटन-सी महसूस होती है और तुम उठ कर खिड़की की चिटकनी खोल देते हो तुम्हारा समूचा अस्तित्व बाहर को छिटका-सा पड़ता है तुम बाहर की हवाओं के प्रति भिक्षा-पात्र बन जाते हो. कभी-कभी कोई झोंका भी आता है बाहरी हवाओं के नंगेपन की छुअन-सा रो...
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Tag :मौसम
  September 25, 2011, 4:36 pm
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