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Blog: कही-अनकही

Blogger: sandeep yadav
      हम सबके बीच से देवीप्रसाद चला गया। लेकिन अकेले नहीं गया। अपने बच्चों के सिर से पिता का साया, अपनी पत्नी की मांग से सिंदूर, रोती—बिलखती, तड़पती मां से उसके दिल का टुकड़ा और सीने पर हाथ धरकर गर्व से अपना सीना चौड़ा करने वाले पिता का आसरा भी अपने साथ समेटकर ले गया। बदले ... Read more
clicks 54 View   Vote 0 Like   4:44pm 9 Jan 2018 #
Blogger: sandeep yadav
             अपना गड्ढा खुद खोदना, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसे न जाने कितने मुहावरे हैं जिन्हें बचपन से नकारात्मक संदर्भों से जोड़कर सिखाया जाता रहा है। इसका फायदा कितनों को हुआ यह तो नहीं जानता, लेकिन कुछ बातें आपको बताना चाहूंगा जिसके बाद आप भूल जाएंगे अपने बच्चों क... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   10:58am 25 Jul 2017 #
Blogger: sandeep yadav
कहते हैं कि विदेशों में कामचोर भूखे मरते हैं तो भारत में दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने वाला किसान भूख से दम तोड़ता है. उस किसान के लिए पानी और बारिश क्या अहमियत रखते हैं यह हम सभी जानते हैं. किसान और पानी के बीच के इसी रिश्ते को समझने की कोशिश है पहिली पानी. कीमती वक्त निकालकर एक ... Read more
clicks 92 View   Vote 0 Like   7:43am 19 Jul 2017 #
Blogger: sandeep yadav
आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को जोड़कर देश—विदेश के सैकड़ों बुद्धिजीवियों ने सिद्धांतों के जुमले गढ़े हैं। इन सिद्धांतों को हमारे लोकतंत्र, खासकर विकेंद्रीयकरण के बाद इसकी आधारभूत इकाई गांव की परिस्थितियों से जोड़कर परखें तो स्थिति साफ हो सकती है। कहानी का नायक... Read more
clicks 105 View   Vote 0 Like   7:09am 8 Jul 2017 #
Blogger: sandeep yadav
मोबाइल, इंटरनेट, टेक्नोलॉजी, ऊर्जावान युवा... विकसित होता दिखाई देता देश. पर हम आखिर जा कहाँ रहे हैं. क्या ऊर्जा समाज को आइना दिखाकर रोशन कर रहा है या मोहरा बनकर सिमट जाना चाह रहा है. दूसरी ओर, देश में कुछ ऐसे हिस्से आज भी बचे हुए हैं जिन्हें मुख्यधारा वाले तो पिछड़ेपन की निश... Read more
clicks 94 View   Vote 0 Like   11:22am 22 Jun 2017 #
Blogger: sandeep yadav
ये हम जो थोड़े—थोड़े इकॉनॉमिस्ट हैं, थोड़ा पॉलिटिशियंस हैं और थोड़ा बुद्धिजीवी का कीड़ा जो बैठा है खोपड़िया में ठोनकतेच रहता है बीच—बीच में। इस अलकरहा टाइप के दर्द को भूलाने कोई मोदी भक्त बना बैठा है तो कोई ऐसा लिख मार रहा है जिसे भक्तों के नजरिए से बराबर देशद्रोही कर... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   10:52am 31 Dec 2016 #
Blogger: sandeep yadav
     हाल ही में मैंने “सर्वश्रेष्ठ हिंदी कहानियां (२०००-२०१०) पीडीऍफ़ फोर्मेट” में वंदना राग की लिखी कहानी यूटोपिया पढ़ी है, जिसमें एक दक्षिणपंथी विचारधारा से अतिरंजित नवयुवक की कुंठाओं को सरल ढंग से अभिव्यक्त किया गया है. कहानी पढ़ने के चंद रोज बाद १४ फरवरी अर्थात प्... Read more
clicks 97 View   Vote 0 Like   6:15am 2 May 2016 #
Blogger: sandeep yadav
आमतौर पर हम सरकारों को सरोकार के प्रति संवेदनशीलता और संवेदनहीनता के तराजू पर तौलते हैं. अब इसका पैमाना विकास हो गया है. लेकिन एक सवाल पर गौर फ़र्माइएगा कि सत्ता पर बैठा सख्श क्या सचमुच विकास कर रहा है या विकास होते दिखा रहा है. मार्केटिंग और विज्ञापन के इस दौर में ये फर्... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   10:33am 30 Apr 2016 #
Blogger: sandeep yadav
               हां मैं गाँव का वही गंवार हूँ, जिसे गरीबी की सोंधी मिटटी ने जहां ममत्व का खजाना दिया तो उसी ने वो औकात भी दिखाया जहां से महलों की एक-एक सीढ़ी कदमों को बौना कर देता है. कोरबा में बीते बचपन के भोर की धुंधली शहराती यादों के साथ गवई के ठेठ मिजाज को जीता आय... Read more
clicks 103 View   Vote 0 Like   11:01am 22 Apr 2016 #
Blogger: sandeep yadav
"नईदुनिया के पत्रकार दिलीप यादव के FB वाल से साभार"कभी एक-एक एक प्याली चाय बेचने वाले पीएम नरेंद्र मोदी गरीबी को नजदीक से समझते ही नहीं, बल्कि गरीबी का दंश भी झेल चुके हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान ‘अच्छे दिन आने वाले हैं...’ नारे के साथ मजदूर, किसान और गरीबों के बीच गए. मोदी का ज... Read more
clicks 91 View   Vote 0 Like   5:50pm 12 Jul 2015 #
Blogger: sandeep yadav
कलम का एक नन्हा सिपाही हूं, जो जाने अनजाने मुझसे जिंदगी के फलसफों और अनुभवों को कागज से मेल कराकर नए-नए कैनवास बनवाते रहता है। मेरा बचपन कोरबा जैसे शहर से लेकर करुमहूं(karumahun) जैसे छोटे से गांव के सिवाने से भी दूर बियाबान में भी बीता है। कभी बस्ती के यारों की टोली से संबंध र... Read more
clicks 98 View   Vote 0 Like   3:58pm 14 Jan 2013 #
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