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Blog: हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika

Blogger: hindikunj
बालश्रम              भारत में जनगणनाओं के आधार पर विभिन्न  बाल श्रमिकों के आंकड़े निम्नानुसार हैं। 1971 -1. 07 करोड़1981 -1. 36 करोड़ 1991 -1. 12 करोड़ 2001-1. 26 करोड़ 2011 -1. 01 करोड़ यह आंकड़े सरकारी सर्वे के आंकड़े है अन्य सर्वेक्षणों के  आंकड़े और भी भयावह हो सकते हैं।  कुल बालमजदू... Read more
clicks 627 View   Vote 0 Like   5:12am 8 Jun 2016 #
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                          हंगामा क्यों बरपा हैं ?हंगामा ,हंगामा,हंगामा........ कितना हंगामा मचा है | कोई सहयोग दे रहा हैं, कोई विरोध में खड़ा हैं | लेकिन एक बात है सभी कुछ न कुछ कर रहे हैं,कह रहे हैं | अगर किसी ने चील उड़ाई तो वहाँ पर कहा जाएगा कि भैंस उडी है | अब क्या करें ह... Read more
clicks 182 View   Vote 0 Like   1:47am 8 Jun 2016 #
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 राधाबाई अपनी बेटी की शादी की तैयारियाँ करते वक़्त अचानक मेरी नज़र राधा पापड़ के पैकेट पर पड़ी, और मुझे अचानक ही राधाबाई की याद आ गई। राधाबाई हमारे घर के पीछे वाली गली में रहने वाली एक बेहद दुखियारी विधवा महिला थी। उसकी आँखें हमेशा ही डबडबाई हुई होतीं। माँ से बाते करते ... Read more
clicks 398 View   Vote 0 Like   2:50pm 7 Jun 2016 #
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कुछ गुनगुना दिया करपट खोल चाँद कभी आ जाया कर आँगन में यहीं पर सँवर लिया कर,गमले मेंचित्र साभार - dollsofindia.comबैठे फूलों से खड़े पौधों से पंखुड़ियों से बातें कर मधु रस घोल अतीत भुला प्रभात पुंज जुगुनू की तरह संघर्ष अटल विश्वास सामने रख हमें सुशोभित क... Read more
clicks 194 View   Vote 0 Like   4:52am 7 Jun 2016 #
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राष्ट्रीय सरिता-संयोजनडॉ. शुभ्रता मिश्राऐतिहासिक दृष्टि से यदि विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि स्वतंत्रता के पूर्व से ही भारत में सरिता-संयोजन अर्थात् नदियों को जोड़ने संबंधी परियोजनाएँ मिलती हैं। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक में भारत में नदियों को जोड़ने की प... Read more
clicks 428 View   Vote 0 Like   7:47am 6 Jun 2016 #
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कभी फिर से चलने को जी चाहता हैकभी फिर से चलने को जी चाहता है।कभी गिर के सम्भलने को जी चाहता है।।चंदा निकलता है अम्बर में जैसे,प्रभा निकलती है दिनकर से जैसे,जैसे यादें निकलती हैं स्वप्नों को छूकर,वैसे निकलने को जी चाहता है।कभी फिर से चलने को जी चाहता है।अजीत कुमार शर्मा... Read more
clicks 190 View   Vote 0 Like   6:06am 6 Jun 2016 #
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समय का महत्व ( Importance  of Time )जीवन नदी की धारा के समान है . जिस प्रकार नदी की धारा ऊँची नीची भूमि को निरंतर पार करती हुई आगे बढ़ती जाती है ,उसी प्रकार जीवन की धारा भी सुख -दुःख रूपी जीवन के अनेक संघर्षों को सहते -भोगते आगे बढ़ती रहती है . "बहना जीवन है और ठहराव मौत".जीवन का उद्देश्य नि... Read more
clicks 906 View   Vote 0 Like   2:10pm 5 Jun 2016 #हिंदी निबंध
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पर्यावरण संरक्षण सर्वोत्तम मानवीय संवेदना मनुष्य और पर्यावरण का परस्पर गहरा संबंध है।अग्नि , जल, पृथ्वी , वायु और आकाश यही किसी न किसी रूप में जीवन का निर्माण करते हैं, उसे पोषण देते हैं। इन सभी तत्वों का सम्मिलित , स्वरूप ही पर्यावरण है। पर्यावरण संरक्षण पाँच स्तरों... Read more
clicks 1073 View   Vote 0 Like   1:25pm 5 Jun 2016 #हिंदी लेख
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समाज के भले लोगों !!..शेखर वेदना का व्यापारी हो गया है |यह ब्लॉग 'शेखर: एक जीवनी'की समीक्षा बिलकुल नहीं है | दरअसर अज्ञेय के लिखे की समीक्षा करने की मेरी हैसियत ही नहीं है | मेरा  लिखाव उस साझेपन को समझने की कोशिश भर  है जो किताब के भीतरी चरित्रों की  बाहरी दुनिया से एकरूप... Read more
clicks 215 View   Vote 0 Like   5:07am 5 Jun 2016 #हिंदी लेख
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४ जून (शनिवार) शनि जयंती पर विशेषशनि मनोवांछित फलकारी हैंशनि जयंती सूर्यपुत्र की आराधना का महापर्व हैंशनिवार के दिन शनि जयंती से इस पर्व का महत्व एवं फल अनंत गुणा हो जाता है।शनि जयंती (४ जून २०१६, शनिवार) को दोपहर में १ बजे --शनि-मंगल, वृश्चिक राशि और शनि ज्येष्ठा नक्षत्र... Read more
clicks 244 View   Vote 0 Like   12:18pm 4 Jun 2016 #भक्ति साहित्य
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रोशनी बुझे दिये की ‘रोशनी बुझे दिये की’ यही शीर्षक था मेरे एक संस्मरण का जिसमें मैंने लिखा था:‘‘बात उन दिनों की है, जब मैं कालेज में पढ़ता था। गुस्सा नाक पर बैठा रहता था और हर छुटपुट घटना पर उग्र रूप धारण कर लेता था।‘‘एक दिन सायकिल तेजी से दौड़ाता हुआ मैं अपनी धुन में जा र... Read more
clicks 259 View   Vote 0 Like   12:00pm 3 Jun 2016 #
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सुनो मां !!... मैं जीवन से भरे तमाम लोगों के बीच रहते –रहते खाली हो गया हूँ |सुनो मां !!...जीवन की खूबसूरती  से कोसों दूर मैं वेदना की रोशनी में यह खत लिख रहा हूँ |यह खत उस सच्चाई का समझाव ही है  कि मुझे मेरे ही जीवन ने हाशिये पर ला पटका है '| मैं जीवन से भरे तमाम लोगों के बीच रहते ... Read more
clicks 168 View   Vote 0 Like   10:14am 3 Jun 2016 #
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मध्यप्रदेश का अध्यापक - सपने संघर्ष और असफलताएं अध्यापकों का दर्द यह है कि पिछले 18 साल से वे अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इस आंदोलन के गर्भ से निकले नेता अपनी रोटी सेंक कर गायब हो जाते हैं। लेकिन मांगे जस की तस हैं।अध्यापक अब अपने आप को एक असफल इन्सान के रूप म... Read more
clicks 307 View   Vote 0 Like   2:33pm 2 Jun 2016 #
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गुड़ियाकल तक जो पापा के आने की राह तकती थी ,आज वो गुड़िया गुमसुम बैठी है ।छुट्टी आने पर जिसे कंधे पर बैठ घुमाते थे,आज वो गुड़िया गुमसुम बैठी है ।जिद करके जो पापा से खिलोने मंगाती थी,आज वो गुड़िया गुमसुम बैठी है ।चित्र साभार - pinterest.comज्यादा चॉकलेट खाने पर पापा से डाँट खाती थी,आज व... Read more
clicks 326 View   Vote 0 Like   4:43am 2 Jun 2016 #
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मन की आखों की सब पट्टियां खोलिये            मेरी यादों की वो खिड़कियां खोलियेकुछ पुरानी पड़ी चिट्ठियां खोलियेहाथ अपना बढ़ाना हो मेरी तरफबंद हाथों की सब मुट्ठियां खोलियेघूप इतनी कड़ी कैंसे चल पाउंगापास अपने हैं जो छतरियां खोलियेवेणी  शंकर पटेल पेट की आग ये फिर ब... Read more
clicks 176 View   Vote 0 Like   5:21pm 1 Jun 2016 #
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बघुवार-स्वराज मुमकिन है।  मायाजी की इस पुस्तक का विमोचन ग्राम बघुवार में हो रहा था। ABP न्यूज़ के मध्यप्रदेश हेड श्री ब्रजेश राजपूत जो कि मुझे भ्रातवत अपनत्व प्रदान करते हैं के  सन्दर्भ से मायाजी की ओर से विमोचन का निमंत्रणबघुवार-स्वराज मुमकिन हैलेखिका -माया विश्व... Read more
clicks 220 View   Vote 0 Like   5:23am 1 Jun 2016 #
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धूप में सेक लिएधूप मेंसेक लिएपर अपने,गौरैयानाहकर आई कहाँ से ?नदी तालाब सेभींगी  हैअभी भीरुआं अनेकों Iहवा मस्तानीकरती छेड़खानीमारती धक्केस्पर्श कर तुझेसाथ अपने ले जानेकहती बारम्बारकिन्तु है ! गौरैयाबैठी क्यूँ ?तपते मिटटी के ढेर परजहाँ सांसें थकींसो जातीं हैंरेंगत... Read more
clicks 253 View   Vote 0 Like   11:56am 31 May 2016 #
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नशा -विनाश की ओर बढ़ते कदम               (31 मई विश्व तम्बाखू निर्मूलन दिवस पर)अनुभूतियों और संवेदनाओं  का केन्द्र मनुष्य का मस्तिष्क है। सुख-दुःख का , कष्ट-आनन्द का , सुविधा और अभावों का अनुभव मस्तिष्क को ही होता है तथा मस्तिष्क ही प्रतिकूलताओं को अन... Read more
clicks 404 View   Vote 0 Like   5:22am 31 May 2016 #
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अनुत्तरित प्रश्न एक जंगल था ,बहुत प्यारा थासभी की आँख का तारा था।वक्त की आंधी आई,सभ्यता चमचमाती आई।इस सभ्यता के हाथ में आरी थी।जो काटती गई जंगलों कोबनते गए ,आलीशान मकान ,चौखटें ,दरवाजे ,दहेज़ के फर्नीचर।मिटते गए जंगल  सिसकते रहे पेड़और हम सब देते रहे भाषणबन कर मुख्य अ... Read more
clicks 188 View   Vote 0 Like   1:08pm 30 May 2016 #
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जाना कहा है आजनिकलता हूँ घर से रोजदिल में ख्याल आता हैजाना कहा है आजघर की देहलीज छोड़करमन ही मन हारकरदिल में ख्याल आता हैरवि सुनानियाजाना कहा है आजउम्मीदों की पतंग उड़ाकरमाँ बाप के साथ थोडा खिलखिलाकरदिल में ख्याल आता हैजाना कहा है आजपक्षीयो की कलरव ध्वनि सुनकरहाथो मे... Read more
clicks 167 View   Vote 0 Like   5:14am 30 May 2016 #
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