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Blog: कारवॉं karvaan

Blogger: कारवॉं
रोजाना ना जाने कितनी कितनी बार उसकी धज्जियां सरेआम व सरेशाम उड़ायी जाती हैं पर धज्जियों का यह बादशाह कभी हार नहीं मानता। रावणके सिर की तरह उसकी धज्जि‍यां हमेशा उग-उग आती हैं।रक्‍तबीज की तरह अपनी हर बूंद से वह बहुगुणित होता जाता है। उसकी धज्जियां उडाकर सब प्रसन्‍न व... Read more
clicks 9 View   Vote 0 Like   8:22am 11 Sep 2019
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1.मेरी समझ से कविता एक जिद से पैदा होती है, एक सच्‍ची जिच से। कि बात कहीं अटकी होती है और कविता उसका बाहर आना, रूपाकार लेना संभव करती है। डॉ विनय निजी बातचीत में जब-तब आग्रह करते ... कि मैं एक खंड काव्‍य लिखूं। कि मुझे लिखना चाहिए। अक्‍सर आदमी अपनी बातों को ही किसी बहाने अरोप... Read more
clicks 1 View   Vote 0 Like   10:52am 9 Sep 2019
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1.बचपन में अंग्रेजी के शिक्षक पिता की टेबल पर जिन किताबों से मेरा साबका पडता था उनमें शेक्‍सपीयर के कम्‍पलीट वर्क्‍स के अलावे दिनकरकी कविताओं का संकलन 'चक्रवाल', मुक्तिबोध की 'भूरी-भूरी खाक धूल'के अलावा नामवर सिंह की 'दूसरी परंपरा की खोज'  और 'कविता के नये प्रतिमान'... Read more
clicks 1 View   Vote 0 Like   10:41am 9 Sep 2019
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 गजानन माधव मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचनके बाद जिन कवियों ने हिन्‍दी में नयी जमीन तोडी है उनमेंरघुवीर सहाय,केदारनाथ सिंह और कुंअर नारायणप्रमुख हैं। इनमें रघुवीर सहाय जहां इस जनतंत्र में तंत्र की भूमिका को आलोचनात्‍मक ढंग ... Read more
clicks 1 View   Vote 0 Like   9:17am 7 Sep 2019
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"अपने आप को पहचानो, तुम स्वयं ईश्वर हो"का संदेश देने वाले स्‍वामी रामतीर्थ का कहना था कि - हमें धर्म और दर्शनशास्‍त्र को भौतिकविज्ञान की तरह पढना चाहिए। 1891 में पंजाब विवि से गणित में सर्वाधिक अंकों के साथ एमए करने वाले रामतीर्थ उसी कालेज में गणित के प्रोफेसर नियुक्‍त ... Read more
clicks 3 View   Vote 0 Like   7:28am 30 Aug 2019
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खेतड़ी महाराज को लिखित अपने एक पत्र में विवेकानंद लिखते हैं - जीवन में एक ही तत्‍व है, जो किसी भी कीमत पर अमूल्‍य है - वह है प्रेम, अनंत प्रेम। ईश्‍वर अनिर्वचनीय प्रेम स्‍वरूप है। भारतीय दर्शन में सामान्‍यतया चार पुरूषार्थों की चर्चा मिलती है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   7:17am 22 Aug 2019
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1900 के बाक्‍सर( ई.ख.च्‍वान - संयुक्‍त धार्मिक धूंसेबाज - कमर पर लाल पटटा बांधते थे ये, बाक्‍सर नाम योरोपियनों ने दिया , इनके अलावा एक अन्‍य ता.ताव.हवी समाज था जिसे खडगधारी समाज कहा जाता था जो बाद में बाक्‍सर का हिस्‍सा हो गया, इनका नारा था विदेशियों को निकाल दो। खडगधारी समाज ... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   10:26am 12 Aug 2019
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जिस तरह निराला ने कविता को छंदों से मुक्त किया, केदारनाथ सिंह ने उदात्तता से मुक्त किया उसी तरह एक हद तक रघुवीर सहाय ने और ज्यादा समर्थ ढंग से विष्णु खरे ने उसे करुणा की अकर्मण्य लय से मुक्त किया है, और कविता को बचा लिया है अस्तित्व के संकट से। कवियों की बड़ी दुनिया के लि... Read more
clicks 1 View   Vote 0 Like   9:00am 12 Aug 2019
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लेखक की राजनीतिक दृष्टि साफ होनी चाहिए वरिष्‍ठ कवि विजेंद्रसे कवि, पत्रकार कुमार मुकुल कीबात-चीत-राष्‍ट्रकवि और जनकवि जैसे संबोधन को आप किस तरह देखते हैं। हाल के दशकों में ना कोई राष्‍ट्रकवि कहलाया ना जनकवि। जबकि राष्‍ट्र और जन दोनों विकसित हुए हैं ?राष्ट्र कवि और ज... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   12:25pm 9 Aug 2019
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परिचय1933 में लोथल गुजरात में जन्‍मे और जयपुर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले हिम्‍मत शाह कला के क्षेत्र में विश्‍वविख्‍यात नाम है। जग्‍गूभाई शाह के शिष्‍य श्री शाह मध्‍यप्रदेश सरकार के कालिदास सम्‍मान, साहित्‍यकला परिषद अवार्ड, एलकेए अवार्ड, एआइएफएसीएस अवार्ड दिल्‍ली ... Read more
clicks 21 View   Vote 0 Like   5:09am 8 Aug 2019
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जब कोई प्रतिभा उद्बोधन के नये स्‍तरों को अपने कलात्‍मक संघर्ष से उद्घाटित करने की कोशिश करती है तो समय और प्रकृति अपने पारंपरिक स्‍वरूप में उसे भटकाना व तोड़ना चाहते हैं। ऐसे में वह संघर्ष पीढि़यों में विस्‍थापित होता चला जाता है। और समय की सीमाएं तोड़ता कालातीत ह... Read more
clicks 4 View   Vote 0 Like   4:53am 8 Aug 2019
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हंस कार्यालय में एक बार राजेन्‍द्र यादव ने बिहार को लेकर कुछ हंसी के मूड में कहा तो मैंने भी हंसते कहा था - बहुत सताता है मगध। चंद्रगुप्‍त, चाणक्‍य, बुद्ध याद आते हैं। मगध जिसकी सीमाएं कंधार को छूती थीं और जिसकी राजधानी थी पाटलिपुत्र यानि आज का पटना। 1990 के अंत में जब सहर... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   12:12pm 7 Aug 2019
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मार्च 2005 , प्रथम प्रवक्‍ता 'कवियों से लड़कर आत्‍महत्‍या थोड़े करनी है'वीरेन डंगवाल आपको केसे लगते हैं ? कुछ टिप्‍पणीकार उन्‍हें हाशिये का कवि बताकर दयाभाव दर्शा रहे हैं। अकादमी पुरस्‍कार विवाद पर आपकी क्‍या राय है ? वीरेन की कविताएं अच्‍छी लगती हैं। उनसे किसी को क्‍या... Read more
clicks 2 View   Vote 0 Like   12:03pm 7 Aug 2019
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क्या लय की कोई पूर्वनिर्धारित व्यवस्था है...क्या रचनाकार की लय और पाठक की लय एक ही 'फ्रीक्वेंसी'पर आ सकते हैं ... क्या कथ्य का लयानुकूल व्यक्तीकरण कथ्य की क्षति तो नहीं करता। कथ्य - निरूपण प्राथमिक है या लय - निर्वाह ? ...क्या कविता की वास्तविक शक्ति लय-निर्वाह है या इससे अलग ... Read more
clicks 3 View   Vote 0 Like   4:51am 26 Jul 2019
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''मैं सामान्य हूं, पर मेरी कविता सामान्य नहीं, क्यों कि उसमें मेरे अलावा अन्य कई रचनाकार शामिल हैं। रचना व्यक्ति की नहीं समय की होती है। एक चित्रकार जब किसी का चित्र बनाता है तो उस व्यक्ति के साथ उस चेहरे पर समय का जो प्रभाव अंकित है उसे भी बना रहा होता है। मेरी कविता भी म... Read more
clicks 6 View   Vote 0 Like   6:12am 22 Jul 2019
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हउ बबवा त चल गइल हो बबा..कौन बबवा रे, हमरा छोड के अउरो कवनो बाबा बा का ए भुइ्ंलोटनअरे हम उ सिधेसर बबा के बारे में कहत हइ्ंकावन उ सिधेसरा , ओकरा त सीधे परलोक जाए के लिखले रहे , हमरा से नू ओकर जनमपतरी देखवे के चाहत रहे..पर बबा - बाकी बबवा सब त ओकर लहास लेके बइठल बाडे से कि उ फेर से ज... Read more
clicks 5 View   Vote 0 Like   11:42am 2 Jul 2019
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अपनेबारे में सोचता हूं कि क्‍या हूं तो देखता हूं कि मैं किसानी चेतना का आदमी हूं,झट से जमीन धर लेना चाहता हूं। दिल्‍ली में भी वही फूल पत्‍ते पत्‍थर मिटटी देखता ढूंढता रहता हूं। चलने से थक जाता हूं तो दौडना चाहता हूं भाग लेना चाहता हूं इस बेमकसद चलते रहने से।मैं क्‍या ह... Read more
clicks 15 View   Vote 0 Like   4:42am 24 Jun 2019
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सुलेमान सौदागर का यात्रा विवरण - 851 ई से कुछ अंश। अनुवाद - महेशप्रसाद साधु, बीएचयू, काशी। संवत 1968 में प्रकाशित। लंका के पास सुमात्रा द्वाीप में विवाह के लिए शर्त थी कि जो अपने जितने शत्रु की खोपडी हत्‍याकर जमा करेगा वह उतने विवाह कर सकता है। रामनी टापू में हाथी बहुत हैं। ... Read more
clicks 10 View   Vote 0 Like   11:32am 30 May 2019
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​​Smita Singh ने मेरे एक कवितांश के बारे में पूछा - कि क्या यह मेरी कविता है, इसे Instagram, twitteer और फेसबुक पर कई लोगों ने शेयर किया है, कुछ ने मेरा नाम दिया है, कुछ ने नहीं दिया है, साथ कुछ स्क्रीनशॉट भी थे।फिर मैंने तलाशा तो fb पर 33 लोगों ने मेरी कविता शेयर की थी,जिनमें 17 ने नाम नहीं दिया था, ... Read more
clicks 18 View   Vote 0 Like   5:24am 20 May 2019
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1990में मैं पटना आ गया था सहरसा से। लेखकों से मिलना जुलना , गोष्ठियों आदि का दौर आरंभ था। अरूण कमल, आलोक धन्‍वा, नंदकिशोर नवल,खगेंद्र ठाकुर, भृगुनंदन त्रिपाठी, मदन कश्‍यप, कर्मेंदु शिशिर,प्रेम कुमार मणि आदि पटना के सक्रिय लेखकों के घर आना जाना आरंभ हो चुका था। नवतुरिया लेख... Read more
clicks 42 View   Vote 0 Like   6:55am 23 Apr 2019
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तो भैया अब और कितना डिजि टल-मल विकास चाहते हैं। धरती पर 'स्‍वच्‍छ भारत'चलाते-चलाते हमने अंतरिक्ष में कचरा फैलाने की क्षमता हासिल कर ली है। मिशन शक्ति पर नासा का प्रहार अमेरिकी दुष्‍प्रचार और प्रोपे गैंडा है। भाई यह अमेरिकी गैंडा तो बड़ा खतरनाक लग रहा। अब अपने मोदी जी क... Read more
clicks 89 View   Vote 0 Like   9:30am 3 Apr 2019
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ऐसा कुछ नहीं है। यह मान्‍यता है बस।वैदिक समय में जो ब्रहृम का चिंतन करते थे यानि यह सोचते थे कि यह दुनिया किसने बनायी या यह अस्ति‍तव में कैसे आयी, उन्‍हें ब्राहृमण कहा जाने लगा। वे पढने लिखने का काम करते थे इसलिए उनको मान मिला। जो भी पढते लिखते थे वे ब्रहमण कहे गये न कि क... Read more
clicks 24 View   Vote 0 Like   5:38am 1 Apr 2019
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जहाँ हर चौक चौराहे परराजनीतिक हुंडारअपनी रक्तस्लथ दाढ़लोकतंत्र की राख सेचमकाते फिर रहेकोई पांव-पैदल चल रहाजन-गण-मन की धुन पर'ज्यां द्रेज'दो शब्दों का तुम्हारा नाममेरी समझ में नहीं आतापर  तुम्हारी सायकिल की टुन-टुनसुन पा रहा मैंजैसे  गांधी की आदमकद हरकतों के पीछेय... Read more
clicks 100 View   Vote 0 Like   5:03am 30 Mar 2019
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क्‍या पाकिस्‍तान शेर है ? नहीं जी, गीदड़ है। पर चुनाव तक उसे शेर मानने में अपुन के बाप का क्‍या जाता है। इसी तरह चुनाव में अपुन सवा सेर साबित हो जाएंगे! फिर इन गीदडों को कौन पूछेगा ? ये सीमा पर फूं फां करते रहेंगे लोहा लेने को अपने जवान हैं इतने, हम उनकी शहादत का सम्‍मान करत... Read more
clicks 105 View   Vote 0 Like   5:13am 8 Mar 2019
Blogger: कारवॉं
युवाल नोआ हरारी की विश्‍वप्रसिद्ध पुस्‍तक'सेपियन्‍स'का अनुवाद अब हिंदी में उपलब्‍ध है। सेपियन्‍स रोचक ढंग से'मानव जाति का संक्षिप्‍त इतिहास'हमारे सामने रखती है। पुस्‍तक इस माने में अनोखी है कि मानव जाति के पूरे वैज्ञानिक विकास क्रम को सामने रखते हुए यह हमें आत्‍मा... Read more
clicks 32 View   Vote 0 Like   10:28am 4 Mar 2019
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