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कविता के बहाने : View Blog Posts
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कविता के बहाने

गाँव में अब बच्चे नहीं खेलते गुल्ली डंडा, कबड्डी, छुप्पा-छुप्पीअब वे नहीं बनाते मिट्टी की गाडीनहीं पकड़ते तितलियाँगौरैयों और कबूतरों के घोंसलों में देख उनके बच्चों कोअब वे नहीं होते रोमांचित   अब उन्हें रोज नहीं चमकानी पड़ती लकड़ी की तख्तीढिबरी की कालिख से मांज करऔ...
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  September 14, 2015, 3:30 pm
वे बच्चेकिसके बच्चे हैंनाम क्या है उनकाकौन हैं इनके माँ बापकहाँ से आते हैं इतने सारेझुण्ड के झुण्ड,उन तमाम सरकारी योजनाओ के बावजूदजो अखबारों और टीवी केचमकदार विज्ञापनों मेंकर रही हैं हमारे जीवन का कायाकल्प,कालिख और चीथड़ो के ढकीबहती नाक और चमकती आँखों वालीजिजीविषा ...
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  July 24, 2015, 2:36 pm
कौएसुना हैविलुप्त हो रहें है।क्या सच ?पर क्या रमेसर की माँअब नहीं उड़ाएगीमुंडेर से कौए?पति के शहर सेलौटने की प्रत्याशा में।क्या अबझूठ बोलने परकाला कौआ नहीं काटेगाअबनहीं पढेंगे बच्चे'क'से कौआ।कहानी सुनाती नानीकैसे समझायेगीउन्हें किक्या होता है मतलबरानी से कौआ-हंक...
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  July 21, 2009, 3:20 pm
दरवाजे पर का बूढ़ा अशोककहते हैं जिसे रोपा थामेरे दादा ने,खडा है अब भी,अब जबकिहमने बाँट ली हैउसके नीचे की एक एक पग धरतीघर,आंगन औरमन्दिर के देवता तक ।खड़ा है वह अब भीलुटाता हम पर अपनी छांह की आशीष ।उसकी लचकती डालियाँबुलाती हैं अब भीघसीट लो मचिया इधर ही,आओ थोड़ी देर पढें म...
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  April 10, 2009, 10:39 am
तुम फ़िर आनाहम फ़िर बैठेंगे चल करजमुना की ठंडी रेत परऔर करेंगे बातेंदेर तककविता की,कहानियों कीऔर तितलियों की तरहउड़ती फिरती लड़कियों की।तुम फ़िर आनामौसम के बदलने की तरहहम फ़िर बैठेंगे चल करकंपनी बाग़ कीकिसी टूटी बेंच परहरियाली की उस उजड़ रहीदुनिया के बीचदेर तक महकता र...
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  March 28, 2009, 6:10 pm
वातानुकूलित कमरों कीबासी शीतलता मेंजो जन्म लेती हैकाफ़ी के प्यालों में,आकर ग्रहण करती हैसिगरेट के धुएँ से कविता नहीं।कविता वह नहींजिसका शव प्रकाशन के पश्चात समीक्षक की मेज पर पड़ा है पोस्ट मार्टम की प्रतीक्षा में ।कविता तो लिखता हैवह बूढाहल की नोक सेधरती की छाती परउ...
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  January 14, 2009, 5:10 pm
इन्द्रक्यों हो तुम इतनेपुंसत्वहीन ।क्यों नहीं आयाकभी मन में तुम्हारे कितुम भी करो उद्योग बढ़ाने को अपना बल, पौरुष,शक्ति और कौशल ।क्यों नही की तपस्या कभी तुमने ,क्यों होते रहे तुम सदैवशंकाग्रस्तदूसरों के तप से ।क्यों नही आई लज्जा तुम्हेंमाँगते कवच- कुंडलपुत्र सरीखे ...
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  December 24, 2008, 6:19 pm
(१९८९मेंबनीपीटरब्रुक्सकीफ़िल्म'महाभारत'काएकदृश्य)महाभारतकथा नहींसत्य है हमारे समय काऔर हर उस समय काजहाँकन्फ्यूज्ड प्रतिबद्धताएं,मिसप्लेस्ड आस्थाएं,मूल्यहीनता और अवसरवादहों जीवन के मानदंड।जब बंद हो ध्रितराष्ट्र की आँखेंन्याय की ओर से,देवव्रतव्यवस्था के पोष...
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  November 24, 2008, 10:57 am
१-दीये की लौ सेचिता की लपटों तकजीवन का रिश्ताआग का रिश्ता।२-सात फेरे अग्नि के....चलेंगे साथ-साथजीवन केअग्निपथ पर।३-न जली आगचूल्हे मेंन बुझ सकी आगपेट की।४-आग सुलगेदिलों में तोप्रेमगीत ,दिमागों में तोइंक़लाब ।...
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  November 15, 2008, 10:12 pm
वे हमारे चारो ओरबिखरी रहतीं हैं सुगन्धि की तरह , सौंदर्य और मासूमियत के एहसास की तरह ,ईश्वर के होने की तरह। जन्म के पूर्व ही मिटा दिए जाने की हमारी छुद्र साजिशों के बीच वे ढीठ उग आती हैं हरी डूब की तरह और न जाने कब बड़ी हो हमें भर देती हैं बडक्पन के एहसास से ,उनकी उपस्थिति मा...
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  October 16, 2008, 12:38 am
नदीदेर तक इठलाती रहतीआलिन्गनबद्ध,बातें करतीन जाने कितनी देर।छोटी सी नाव मेंहिचकोले लेती , निहारतीलहरों और चन्द्रमा कीलुकाछिपी।नदी तब छेड़ देतीवाही पुराना गीतजो बरसों से गाती हैं'गवांर'औरतें ।और गीत का नयापन भर देतामन के कूल किनारों कोबांसुरी की तान से ।तिरोहित हो...
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  October 4, 2008, 11:49 pm
रात के चौथे पहरअंधेरे मेंतन कर खड़ा वह पेड़ ,यौवन से आप्लावितमानो प्रतीक्षा मेंप्रेयसी की।निर्भीक , निश्चिंतहवा के झोकों संग हिलतान हो उतरा नशामानो अभी तकरात की मदिरा का।मद्धम चाँदनी मेंपत्तियों पर चमक रहींबारिष की हीरक बूँदें ,श्रम के स्वेदबिंदु।उषा के साथआएगी पह...
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  October 1, 2008, 12:05 am
तुमस्कूल जाते बच्चों केबस्तों मेंभर दोगे बारूदपरियों की कहानियों वालीकिताबों की जगह।उनके नन्हे-मुन्ने हाथों मेंपकड़ा दोगेबंदूकें,कलम की जगह ।इमले की जगहउनकी तख्ती परलिख दोगे इबारतआतंक की।तुम नोच लोगेरंगहर तितली के पंख से।हर फूल की खुशबू कोबदल दोगेसड़ांध में ।तु...
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  September 25, 2008, 9:13 pm
पूर्वज,चौराहों पर लगे,कौओं और कबूतरों कीबीट से लिथड़ेतुम्हारे बुत।तुम्हारी विस्मृति केस्मृति-चिह्न ।...
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  September 23, 2008, 9:30 pm
मुंडेर से उतर करधूपबरांडे केदूर वाले छोर परअटक जाती है।न जाने क्यों ?घिर जाता है मनएक उदास खामोशी से।सुगन्धि का एक वलयतैर जाता हैआंखों के आगेयादों का इन्द्र धनुषखिंच जाता हैमन के एक सिरे सेदूसरे सिरे तक।एक बच्चा भागता हैकटी हुई पतंग के पीछे।तितलियाँ सी उड़ती हैआंख...
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  September 21, 2008, 3:24 pm
वह अधनंगा,मरियल सा आदमीजो अभी-अभीतुम्हारी विदेशी कार केनीचे आते आते बचा है।और जिसके बारे मेंसोच रहे हो तुमकि क्यों बनाता है ऊपर वालाऐसे जाहिलों को,नहीं है जिन्हें तमीजठीक से सड़क पर चलने तक की।या फ़िर सोच रहे होंगे किबेवकूफ मरेगा अपनी गलती सेऔर दोष मढ़ जायेगातुम्हारे ...
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  September 16, 2008, 10:37 pm
आख़िर बदइंतजामियों की कोई इन्तिहाँ तो हो।मेरे शहर के हाल पर कोई तप्सरा तो हो।गड्ढों में सड़क गुम हैं, सीवर उफ़ान पर,हाकिम को इंतज़ार कोई हादसा तो हो।बदलेगा ये निजाम भी हर दौर की तरह,सीनों में आग, जेहन में कोई जलज़ला तो हो।टकरा के टूट जायेगी शमशीर हो कोई,पत्थर से हौसले हों, ...
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  September 12, 2008, 11:05 pm
नंगापननया मंत्र हैसभ्यता का।स्वतंत्रता और स्वच्छंदताहैं गडमड।विचार करना है पिछड़ापनसोचना छोड़ो।कपड़े उतार डालोअपने नहीं तो दूसरों के।नंगे हो जाओयही है आज की मांग।नंगापनविचार में,भाषा में,व्यवहार मेंबाज़ार का ताकाज़ा है।बाज़ारजो नई सदी का देवता है।जिसके दबाव मेंहैर...
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  September 10, 2008, 9:33 pm
शब्दसांत्वना और संवेदना कीरसधार से संपृक्तस्नेह और पीड़ा केआदिगीत,मास्टर जी की बेंत और अम्मा की लोरी से अभिमंत्रित,सीपियों और कंचों से निर्मल जगमग शब्द। प्रेमपत्रों से आती मेहंदी की सुगंध मन-आँगन में खिले गुलमुहर। नानी की कहानियों की राजकुमारी जैसे सुंदर थे शब्द। फ़...
कविता के बहाने...
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  September 2, 2008, 9:49 pm
हर सालगर्मियां शुरू होते हीनानी लटका देती थीमुंडेर सेमिट्टी की हंडियाभर कर जल से। नहीं भूलती थीडालना रोज पानीहंडिया मेंशालिग्राम का भोग लगाने के पश्चात,संभवतः यह भी था एक हिस्सा उनकी पूजा का। उनको था विश्वास की गौरैयों के रूप में आते हैं प्यासे पूर्वज और चोंच भर पा...
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  August 28, 2008, 8:20 pm
न जाने कबगरमा उठती हैपुरवैया,धुप की मखमली उजास न जाने कब बदल जाती है आग की पगडंडी में उबलने लगती है नदी पिघल कर बह उठते है किनारे उत्तप्त हो लावा की तरह। लहू की एक अग्निरेखा प्रवेश कर जाती है आत्मा की गहराइयों तक। और तब जब सारा उन्माद थम जाता है बदल जाता है बदबूदार कीचड़ ...
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  August 27, 2008, 9:40 pm
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