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Blog: कविता के बहाने

Blogger: SHRI BILAS SINGH
गाँव में अब बच्चे नहीं खेलते गुल्ली डंडा, कबड्डी, छुप्पा-छुप्पीअब वे नहीं बनाते मिट्टी की गाडीनहीं पकड़ते तितलियाँगौरैयों और कबूतरों के घोंसलों में देख उनके बच्चों कोअब वे नहीं होते रोमांचित   अब उन्हें रोज नहीं चमकानी पड़ती लकड़ी की तख्तीढिबरी की कालिख से मांज करऔ... Read more
clicks 177 View   Vote 0 Like   10:00am 14 Sep 2015 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
वे बच्चेकिसके बच्चे हैंनाम क्या है उनकाकौन हैं इनके माँ बापकहाँ से आते हैं इतने सारेझुण्ड के झुण्ड,उन तमाम सरकारी योजनाओ के बावजूदजो अखबारों और टीवी केचमकदार विज्ञापनों मेंकर रही हैं हमारे जीवन का कायाकल्प,कालिख और चीथड़ो के ढकीबहती नाक और चमकती आँखों वालीजिजीविषा ... Read more
clicks 152 View   Vote 0 Like   9:06am 24 Jul 2015 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
कौएसुना हैविलुप्त हो रहें है।क्या सच ?पर क्या रमेसर की माँअब नहीं उड़ाएगीमुंडेर से कौए?पति के शहर सेलौटने की प्रत्याशा में।क्या अबझूठ बोलने परकाला कौआ नहीं काटेगाअबनहीं पढेंगे बच्चे'क'से कौआ।कहानी सुनाती नानीकैसे समझायेगीउन्हें किक्या होता है मतलबरानी से कौआ-हंक... Read more
clicks 146 View   Vote 0 Like   9:50am 21 Jul 2009 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
दरवाजे पर का बूढ़ा अशोककहते हैं जिसे रोपा थामेरे दादा ने,खडा है अब भी,अब जबकिहमने बाँट ली हैउसके नीचे की एक एक पग धरतीघर,आंगन औरमन्दिर के देवता तक ।खड़ा है वह अब भीलुटाता हम पर अपनी छांह की आशीष ।उसकी लचकती डालियाँबुलाती हैं अब भीघसीट लो मचिया इधर ही,आओ थोड़ी देर पढें म... Read more
clicks 165 View   Vote 0 Like   5:09am 10 Apr 2009 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
तुम फ़िर आनाहम फ़िर बैठेंगे चल करजमुना की ठंडी रेत परऔर करेंगे बातेंदेर तककविता की,कहानियों कीऔर तितलियों की तरहउड़ती फिरती लड़कियों की।तुम फ़िर आनामौसम के बदलने की तरहहम फ़िर बैठेंगे चल करकंपनी बाग़ कीकिसी टूटी बेंच परहरियाली की उस उजड़ रहीदुनिया के बीचदेर तक महकता र... Read more
clicks 147 View   Vote 0 Like   12:40pm 28 Mar 2009 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
वातानुकूलित कमरों कीबासी शीतलता मेंजो जन्म लेती हैकाफ़ी के प्यालों में,आकर ग्रहण करती हैसिगरेट के धुएँ से कविता नहीं।कविता वह नहींजिसका शव प्रकाशन के पश्चात समीक्षक की मेज पर पड़ा है पोस्ट मार्टम की प्रतीक्षा में ।कविता तो लिखता हैवह बूढाहल की नोक सेधरती की छाती परउ... Read more
clicks 177 View   Vote 0 Like   11:40am 14 Jan 2009 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
इन्द्रक्यों हो तुम इतनेपुंसत्वहीन ।क्यों नहीं आयाकभी मन में तुम्हारे कितुम भी करो उद्योग बढ़ाने को अपना बल, पौरुष,शक्ति और कौशल ।क्यों नही की तपस्या कभी तुमने ,क्यों होते रहे तुम सदैवशंकाग्रस्तदूसरों के तप से ।क्यों नही आई लज्जा तुम्हेंमाँगते कवच- कुंडलपुत्र सरीखे ... Read more
clicks 158 View   Vote 0 Like   12:49pm 24 Dec 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
(१९८९मेंबनीपीटरब्रुक्सकीफ़िल्म'महाभारत'काएकदृश्य)महाभारतकथा नहींसत्य है हमारे समय काऔर हर उस समय काजहाँकन्फ्यूज्ड प्रतिबद्धताएं,मिसप्लेस्ड आस्थाएं,मूल्यहीनता और अवसरवादहों जीवन के मानदंड।जब बंद हो ध्रितराष्ट्र की आँखेंन्याय की ओर से,देवव्रतव्यवस्था के पोष... Read more
clicks 167 View   Vote 0 Like   5:27am 24 Nov 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
१-दीये की लौ सेचिता की लपटों तकजीवन का रिश्ताआग का रिश्ता।२-सात फेरे अग्नि के....चलेंगे साथ-साथजीवन केअग्निपथ पर।३-न जली आगचूल्हे मेंन बुझ सकी आगपेट की।४-आग सुलगेदिलों में तोप्रेमगीत ,दिमागों में तोइंक़लाब ।... Read more
clicks 142 View   Vote 0 Like   4:42pm 15 Nov 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
वे हमारे चारो ओरबिखरी रहतीं हैं सुगन्धि की तरह , सौंदर्य और मासूमियत के एहसास की तरह ,ईश्वर के होने की तरह। जन्म के पूर्व ही मिटा दिए जाने की हमारी छुद्र साजिशों के बीच वे ढीठ उग आती हैं हरी डूब की तरह और न जाने कब बड़ी हो हमें भर देती हैं बडक्पन के एहसास से ,उनकी उपस्थिति मा... Read more
clicks 153 View   Vote 0 Like   7:08pm 15 Oct 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
नदीदेर तक इठलाती रहतीआलिन्गनबद्ध,बातें करतीन जाने कितनी देर।छोटी सी नाव मेंहिचकोले लेती , निहारतीलहरों और चन्द्रमा कीलुकाछिपी।नदी तब छेड़ देतीवाही पुराना गीतजो बरसों से गाती हैं'गवांर'औरतें ।और गीत का नयापन भर देतामन के कूल किनारों कोबांसुरी की तान से ।तिरोहित हो... Read more
clicks 152 View   Vote 0 Like   6:19pm 4 Oct 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
रात के चौथे पहरअंधेरे मेंतन कर खड़ा वह पेड़ ,यौवन से आप्लावितमानो प्रतीक्षा मेंप्रेयसी की।निर्भीक , निश्चिंतहवा के झोकों संग हिलतान हो उतरा नशामानो अभी तकरात की मदिरा का।मद्धम चाँदनी मेंपत्तियों पर चमक रहींबारिष की हीरक बूँदें ,श्रम के स्वेदबिंदु।उषा के साथआएगी पह... Read more
clicks 145 View   Vote 0 Like   6:35pm 30 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
तुमस्कूल जाते बच्चों केबस्तों मेंभर दोगे बारूदपरियों की कहानियों वालीकिताबों की जगह।उनके नन्हे-मुन्ने हाथों मेंपकड़ा दोगेबंदूकें,कलम की जगह ।इमले की जगहउनकी तख्ती परलिख दोगे इबारतआतंक की।तुम नोच लोगेरंगहर तितली के पंख से।हर फूल की खुशबू कोबदल दोगेसड़ांध में ।तु... Read more
clicks 142 View   Vote 0 Like   3:43pm 25 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
पूर्वज,चौराहों पर लगे,कौओं और कबूतरों कीबीट से लिथड़ेतुम्हारे बुत।तुम्हारी विस्मृति केस्मृति-चिह्न ।... Read more
clicks 153 View   Vote 0 Like   4:00pm 23 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
मुंडेर से उतर करधूपबरांडे केदूर वाले छोर परअटक जाती है।न जाने क्यों ?घिर जाता है मनएक उदास खामोशी से।सुगन्धि का एक वलयतैर जाता हैआंखों के आगेयादों का इन्द्र धनुषखिंच जाता हैमन के एक सिरे सेदूसरे सिरे तक।एक बच्चा भागता हैकटी हुई पतंग के पीछे।तितलियाँ सी उड़ती हैआंख... Read more
clicks 187 View   Vote 0 Like   9:54am 21 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
वह अधनंगा,मरियल सा आदमीजो अभी-अभीतुम्हारी विदेशी कार केनीचे आते आते बचा है।और जिसके बारे मेंसोच रहे हो तुमकि क्यों बनाता है ऊपर वालाऐसे जाहिलों को,नहीं है जिन्हें तमीजठीक से सड़क पर चलने तक की।या फ़िर सोच रहे होंगे किबेवकूफ मरेगा अपनी गलती सेऔर दोष मढ़ जायेगातुम्हारे ... Read more
clicks 173 View   Vote 0 Like   5:07pm 16 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
आख़िर बदइंतजामियों की कोई इन्तिहाँ तो हो।मेरे शहर के हाल पर कोई तप्सरा तो हो।गड्ढों में सड़क गुम हैं, सीवर उफ़ान पर,हाकिम को इंतज़ार कोई हादसा तो हो।बदलेगा ये निजाम भी हर दौर की तरह,सीनों में आग, जेहन में कोई जलज़ला तो हो।टकरा के टूट जायेगी शमशीर हो कोई,पत्थर से हौसले हों, ... Read more
clicks 136 View   Vote 0 Like   5:35pm 12 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
नंगापननया मंत्र हैसभ्यता का।स्वतंत्रता और स्वच्छंदताहैं गडमड।विचार करना है पिछड़ापनसोचना छोड़ो।कपड़े उतार डालोअपने नहीं तो दूसरों के।नंगे हो जाओयही है आज की मांग।नंगापनविचार में,भाषा में,व्यवहार मेंबाज़ार का ताकाज़ा है।बाज़ारजो नई सदी का देवता है।जिसके दबाव मेंहैर... Read more
clicks 144 View   Vote 0 Like   4:03pm 10 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
शब्दसांत्वना और संवेदना कीरसधार से संपृक्तस्नेह और पीड़ा केआदिगीत,मास्टर जी की बेंत और अम्मा की लोरी से अभिमंत्रित,सीपियों और कंचों से निर्मल जगमग शब्द। प्रेमपत्रों से आती मेहंदी की सुगंध मन-आँगन में खिले गुलमुहर। नानी की कहानियों की राजकुमारी जैसे सुंदर थे शब्द। फ़... Read more
clicks 146 View   Vote 0 Like   4:19pm 2 Sep 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
हर सालगर्मियां शुरू होते हीनानी लटका देती थीमुंडेर सेमिट्टी की हंडियाभर कर जल से। नहीं भूलती थीडालना रोज पानीहंडिया मेंशालिग्राम का भोग लगाने के पश्चात,संभवतः यह भी था एक हिस्सा उनकी पूजा का। उनको था विश्वास की गौरैयों के रूप में आते हैं प्यासे पूर्वज और चोंच भर पा... Read more
clicks 151 View   Vote 0 Like   2:50pm 28 Aug 2008 #
Blogger: SHRI BILAS SINGH
न जाने कबगरमा उठती हैपुरवैया,धुप की मखमली उजास न जाने कब बदल जाती है आग की पगडंडी में उबलने लगती है नदी पिघल कर बह उठते है किनारे उत्तप्त हो लावा की तरह। लहू की एक अग्निरेखा प्रवेश कर जाती है आत्मा की गहराइयों तक। और तब जब सारा उन्माद थम जाता है बदल जाता है बदबूदार कीचड़ ... Read more
clicks 171 View   Vote 0 Like   4:10pm 27 Aug 2008 #
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