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Blog: अमिताभ

Blogger: amitabh shrivastava
मेरे चारो ओर फैले हैंसन्त, महात्मा, साधुसंन्यासी, बाबा, बुद्ध ,ज्ञानी,महाज्ञानी आदि इत्यादि।जीने की सीख और ढेर सारी बौद्धिक बातों से भरे प्रवचनमुखी।दिखावे में परमहंस की तरह किन्तु न सरल हैं और न ही सहज।जिन्हें भी छूना चाहा वो कड़ाजिसमें भी बहना चाहा वो सूखी नदीजिसमे... Read more
clicks 22 View   Vote 0 Like   4:39pm 16 May 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
यदि पहुंचो वहां तोबस छू भर लोऔर लौट आओ,ठहरो नहीं।क्योंकि चोटियांअक्सर सूनी होती है,निर्जन और संकरी होती है।शिखर पर बिखर जाओगे।... Read more
clicks 13 View   Vote 0 Like   1:23pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
जिनमें न नाक कटने की जलन हैऔर न ही रीढ़ झुका लेने का दर्द।वैसे भीगीली लकड़ियाँ कहाँ जल पाती हैफिर वो चाहे पानी से गीली हों या अश्रुओं से नम।◆झुकना पड़ता है कुछ पाने कोसम्मान-पुरस्कार या ओहदाये कोई आसमान है जोमस्तक ऊंचा कर ही छुआ जा सकता है?वैसे भी वहां शून्य है।◆तुम्हारी ... Read more
clicks 15 View   Vote 0 Like   1:22pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
मेरे चारो ओर फैले हैंसन्त, महात्मा, साधुसंन्यासी, बाबा, बुद्ध ,ज्ञानी,महाज्ञानी आदि इत्यादि।जीने की सीख और ढेर सारी बौद्धिक बातों से भरे प्रवचनमुखी।दिखावे में परमहंस की तरह किन्तु न सरल हैं और न ही सहज।जिन्हें भी छूना चाहा वो कड़ाजिसमें भी बहना चाहा वो सूखी नदीजिसमे... Read more
clicks 17 View   Vote 0 Like   1:21pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
जबकि इस धरती परतमाम मुद्दे आदमी कोरुला-हंसा और जिला-मरा रहे हैंआदमी इसी सबको अपनाजीवन मानकर धन्य धन्य हो रहा हैठीक इसी वक्तअंतरिक्ष में उसका भगवानउल्कापिंड पर बैठा चक्कर मार रहा है।वो घूर कर देख रहा हैमगर आदमियों को नहींपूरी धरती कोकि धरती उसका भोजन है..।आदमी उसे 'गड़... Read more
clicks 12 View   Vote 0 Like   1:19pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
दरअसल वो सुधरना और समझना चाहते थेमगर उनके नाज़िमों ने उन्हें बहका दिया।दरअसल वो सुधरना और समझना चाह रहे हैंउनके नाजिम उन्हें बहका रहे हैं।दरअसल वे न सुधर सकते हैं ,न समझ सकते हैंउनके नाजिम उन्हें बहका चुके हैं।दरअसल वो सब गुलाम और पत्थर हो चुकेउनके नाज़िम अब उनसे अपना ... Read more
clicks 13 View   Vote 0 Like   1:17pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
हमारे हाथों में हैपत्थर और प्रेमजो फेंक लो।कहते हैंजो फेंकोगे वही लौटेगा।■ अकाट्य बिल... Read more
clicks 13 View   Vote 0 Like   1:17pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
मैं सड़कों पर रेंक रहे गदहोंचीख रहे मूर्खोंऔर उन्हें हांक रहेलोगों के खुश और हंसते चेहरों मेंपिशाचों की आकृतियां देख रहा हूँ।मैं देख रहा हूँ उन दानवों कोजिन्होंने माया रची है।इंसानों के भेष में देवताओं की भूमि परनँगा नाच मचा कर जोतमाम स्थिरता और सौहार्दभरे आलम कोअस... Read more
clicks 14 View   Vote 0 Like   1:16pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
प्रदर्शन इस लोकतंत्र की खासियत हैलोकतंत्र हिंसा से ख़ास नहीं होता।हिंसा खत्म कर देती है वजूद उद्देश्य काऔर खड़ा कर देती है कटघरे मेंचोर-उचक्के, बदमाश-लुटेरों की तरह।क्या यही बनना चाहा था?दरअसल, वे सारे तथाकथित नेता, गुरु,उस्ताद, साहित्यकार,बुद्धिजीवी टाइप के पोंगापण्... Read more
clicks 16 View   Vote 0 Like   1:15pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
जगत में हूँजगत का नहीं हूँदेह में हूँदेह का नहीं हूँ।सारी माया, सारे मोहसारे राग-रंग सबकुछव्याप्त हैं चारों ओरकिन्तु निर्लिप्त हूँमैं केवल आनन्द हूँ।【टुकड़ा टुकड़ा डायरी/24 दिसम्बर 19】... Read more
clicks 14 View   Vote 0 Like   1:14pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
मानो या न मानो प्रियेवृद्धावस्था सिर्फ देह कोजर्जर नही करतीखंडित करती हैउम्रभर की अकड़अहंकार और स्वार्थ को ..किंतु आदमी उस रस्सी की तरह क्यों होता हैजो जलने के बाद भीबल नही छोड़ती ..तुम और मैं छोड़ देनासमय रहते ही ..क्योंकि समय शेष नहीं ज्यादाकि हम वृद्ध न हों ..16 -01-2017... Read more
clicks 17 View   Vote 0 Like   1:10pm 17 Jan 2020 #
Blogger: amitabh shrivastava
पेड़ पर लिपटीये जो लता हैपीड़ा इसकीकौन समझता है ।दिखती सुंदर सजी धजी येपर अंदर गहरीउदासीनता है।【टुकड़ा टुकड़ा डायरी /19 जनवरी 2019】... Read more
clicks 33 View   Vote 0 Like   3:25pm 17 Jun 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
दुःख की कविताएं गर दुःख में हुई होती तो कितना सुख मिलता।खैर..सुख में रची गई कविताएंभिन्न भिन्न प्रकार केदुःख देती हैं।तब वे कविता कमरचना ज्यादा हो जाती है।... Read more
clicks 29 View   Vote 0 Like   3:15pm 17 Jun 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
छुट्टियां खत्म..खालीपन भी भरा होता हैएक ऐसे अहसास से जो शब्द नहीं पातेजो बस होते हैं।--उनके आने की बाट जोहनेऔर उनके आने के बादजो भरे भरे होने का अहसास होता हैवो उनके लौटने पर राई के माफिक बिखरता है।--सबकुछ आवश्यक हैइस सत्य को धारण कर रहनाजैसे सीने पर सौ मन का पत्थर ढोना।व... Read more
clicks 32 View   Vote 0 Like   3:11pm 17 Jun 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
ये वो समय था जबचारों दिशाएं मुट्ठी में थींसारे ग्रह -नक्षत्र नाक की सीध में थेऔर धरा जैसे अपनीकनिष्ठा पर घूम रही थी।यकीन जानोमाता-पिता संगब्रह्माण्ड की समस्त महाशक्तियांएकत्रित होकर वास करती है देह मेंऔर निस्तेज जान पड़ता है इंद्र का सिंहासनअप्रभ होता है उसका फैला ... Read more
clicks 44 View   Vote 0 Like   6:01am 21 Jan 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
उस वक्त जबमहानगर दूर हुआ करते थेचाँद की तरह तबमैंने धरती छोड़ी थी।इस तथ्य को नकारते हुए किहर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती।---उबड़ खाबड़आक्सीजन रहित उपग्रह के लिएजीवन के एकमात्र ब्रह्माण्डी स्थल को त्यागनाइसरो या नासा का कोई अनुसंधान कार्य नहीं था।वो टिमटिमाते स्वप्न ... Read more
clicks 42 View   Vote 0 Like   12:06pm 9 Jan 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
सारे, हाँ सारे के सारेबदमाशों ने पहन ली हैसफेद कमीज़ताकि न दिखे मैली बनियान।सारे, हाँ सारे के सारेबदमाशों की हैं तख्तियांजिस पर लिखे हैंअनेक उच्च पदनाम।सारे, हाँ सारे के सारेबदमाश जुट रहे हैं एक मंच परहाथों में हाथ डाले जिनकेमन में फूट रहे हैं लड्डू ।सारे, हाँ सारे के ... Read more
clicks 34 View   Vote 0 Like   12:05pm 9 Jan 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
मोर से आकर्षकसुनहरी दुम वालेहरे,नीले बैंगनी रंग से लिपे पुतेकिन्तु बड़े मुंह और भूखे पेट वाले होते हैं वर्ष।राख से जन्मे।इनका हाजमा इतना दुरुस्त होता है किजीवन के जीवन लील जाते हैंऔर इतने नकटे कि जरा भी शिकन नहीं।बावजूद खूँटी पर टाँगे जाते हैंफीनिक्स के 365 सिर।【टुकड़... Read more
clicks 36 View   Vote 0 Like   12:03pm 9 Jan 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
रुको,ये जली हुई धरती का उज्जडपनराक्षसी नहींबल्कि ये काला टीका बनबुरी नज़र से बचाता है।और यकीन मानोजंगल नहीं होते जंजालघबराओ मत, आओ,गहरे उतरो ,छाती पर चढ़ बैठो अँधेरे कीकि बस कुछ देर बाद हीसूरज आसमान के सिर पर होगाऔर तुम्हारा घर साफ दिखाई देगा।【टुकड़ा टुकड़ा डायरी/6 जनवरी 20... Read more
clicks 38 View   Vote 0 Like   12:02pm 9 Jan 2019 #
Blogger: amitabh shrivastava
कैसा तो गूंथा है आपस मेंहरा, सूखा सब झाड़ झँखड़जैसे अब कोई रास्ता ही न होउलझे रह जाओ यहीं सुख दुःख की तरहमुक्त हो ही न सको।सुनो प्रिये,मत थको,कि आगे बढ़ो..हरे भरे में खोओ मतकि सूख चुके पत्तों का दुःख ओढो मतपार करो इसे भी क्योंकिउस पार फैला 'आकाश'हैऔर वही सार है।(2 des 2018)... Read more
clicks 55 View   Vote 0 Like   6:42am 16 Dec 2018 #
Blogger: amitabh shrivastava
यादें तो आ रही हैं मगर वो नहीं आते ,लौटे नहीं वो क्यूँ जो बिछड़ के चले जाते ;मुद्दत हुई उन्हें नहीं देखा है इसलिए ,रह रह के हमको अब ये उजाले भी सताते ।मआलूम है आएँगें नहीं वो किसी सूरत ,हर वक़्त मगर दिल से उन्हें हम हैं बुलाते ।बढ़ जाएँ न बेचैनियाँ बेहद इस डर से ,दुन्या मे लग लग क... Read more
clicks 37 View   Vote 0 Like   6:39am 16 Dec 2018 #
Blogger: amitabh shrivastava
मैं तुम्हारे लिए प्रेम लिखता हूँतुम नफरत।जिसकी कलम में जो रंग स्याही वो वही लिखता है।(9 nov 2018)... Read more
clicks 50 View   Vote 0 Like   6:38am 16 Dec 2018 #
Blogger: amitabh shrivastava
तुमने कांटो में देखा क्या प्यारपाया क्या सूखे झाड़ झंखाड़ में सौंदर्य ?निर्जन पड़े हिस्से में कभी जाकर पूछा क्याकैसे हो?दिखी क्याअकेले रास्ते, पड़े पत्थरों, खड़ी सूनी बदसूरत सी झाड़ियों में बिखरी मुस्कान?तुम्हारे आने से जिनका एकांतवास पूर्ण हुआलंबी राहत भरी उनकी सांस की आ... Read more
clicks 39 View   Vote 0 Like   6:37am 16 Dec 2018 #
Blogger: amitabh shrivastava
ये पर्वत,पेड़पथ और पत्थरपीर किसे सुनाएं अपनी?पास कौन आता इनकेप्यार करता भला कौन?देख मुझे डबडबा कर आँखेपूछापथिक तू है कौन?तभी अचानक उड़ के आईप्रीत पवन कीकंधो पे अपने लेकर आईगीत एक पुराना-मैं पल दो पल का शायर हूँ ....(19 nov 2018)... Read more
clicks 38 View   Vote 0 Like   6:36am 16 Dec 2018 #
Blogger: amitabh shrivastava
सुबह लिखती है आसमान पर कवितासूरज बिंदी बन छाता है।कोई टिटहरी कंठ खोल गाती हैऔर दिन हो जाता है ।( 22 nov 2018)... Read more
clicks 57 View   Vote 0 Like   6:35am 16 Dec 2018 #
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