| पिता-पुत्री का प्रेम कैसा हो?.... इस कविता में एक रूपक के माध्यम से बताना चाहा है. जाने क्या फिर सोच घटा के पास चला मारुत आया.केशों में अंगुलियाँ डाल फिर धीरे-धीरे सहलाया.सुप्त घटा थी जगने वाली दूज पहर होने आया.कोस रहा मारुत अपने को क्यूँ कल वो अंधड़ लाया.थकी पड़ी थी आज़ घटा... |
| उड़ रहे हृदय में दो विमान* सपनों का ईंधन* ले-लेकर.वे जाल फैंकते हैं विशाल बंदी करने पिय-उर बेघर.पिय का उर पर हर बार बचा छोटा था जाल छविजाल तुल.शर छोड़ रहे दोनों विमान पुष्पित करने हृदयस्थ-मुकुल.पर नयन-बाण सम्मुख सब शर अपनी लघुता को दिखा रहे.निश्चल नयनों के चपल बाण रण-कौशल अब त... |
| पलकों तले मेरे बसा एक स्वप्न था.जिसमें थी सोती एक सुन्दर वल्लभा.लावण्य की सारी निधि उस पर ही थी.वह स्वयं थी लेटे हुए निधि द्वार पर.पुष्प-शैया पुष्प-कण से थी विभूषित.पुष्प-वृष्टि हो रही पलकों तले नित.स्वप्न-जग में घूमती वह देखकर यह.हाथ में है हाथ पिय का साथ में वह.जा रही पिय... |
| बस में बिलकुल भी नहीं धार बह रही हृदय से जो अपार राशि-रत्नों की हुई क्षेम* जो आया था वो गया प्रेम.रस में निमग्न आनंद-धामको जाऊँगा होकर अवाम. हो राग-द्वेष से दूर, काम में लाकर पूरा मैं विराम.ममता माया मोह मध्य धार में डूबेगी होकर विकार लाएगा सिन्धु जब भी ज्वारला देगा उनको फि... |
| हे अंध निशा, गूंगी-बहरी !मत देखों निज पीड़ा गहरी.तेरी दृष्टि पड़ते ही खिल उठती है हिय में रत-लहरी. न बोलो तुम, मृदु हास करो चन्दा किरणों सह रास करो तुम सन्नाटे के साँय-साँय शब्दों पर मत विश्वास करो. हे मंद-मंद चलने वाली,तम-पद-चिह्नों की अनुगामी ! पौं फटने से पहले जल्दी प्रिय-... |
| नव मीन-निलय में विलय हुए सित सरिता के सारे सुभाव.सब सूख गये सरिता तीरे नंदन-वन तन के हरे घाव.नव मीत मिले निश-तिमिर नगर नयनाभिराम नय के नरेश. उर-सर में करते हैं नूतन सृष्टि का फिर से वे प्रवेश. ऋतु उन्मीलन कर रही, छोड़ जाने से पहले कर मरोड़. नासीर भाँति कर के समूह की उर-सर में आय... |
| हो रहा है मुझको संदेह आप क्यों करते मुझसे नेह आपका नित आना-जाना देखता है ऊपर से मेह. आप पीते थे अमृत पेय नेह था सदा आपको देय अरे अब विष का क्योंकर पान किया करते हो नेह से हेय. पलक पूरित आखें पलभर आपको कर जाती थीं गेय किन्तु जबसे त्यागा तुमने लाज का वसन, मुझे संदेह !... |
| रहा करता हूँ सबसे दूर मिलन फिर भी होता भरपूर जिन्हें मैं आने से रोकूँ वही घुसते आँखों में घूर.जहाँ जाता हूँ सारे साथ चले आते हैं वे चुपचाप भोर दिन संध्या हो या रात निरंतर देते सुन्दर शाप.दिवा में यादों का ले रूप सोच को ले जाते हैं दूररात में स्वप्नलोक का कूप घुमा लाते हैं... |
| वियत श्याम घन की प्रतूलिका पर लेटी पिय भानु-भामिनीसोच रही बदला लूँगी मैं, अभ्यागत जो बनी यामिनी. नित वसुधा के रसिक मनों पर कंज खिला कंदर्प साथ में नंग अंग को किये हुए वह नाचा करती अंध रात में. मैं देखूँगी द्विज-दर्पण से दर्पक सह निर्लज्ज यामिनी.क्या मेरे प्रियतम कवि की भ... |
| काव्य भी रहा आपका खेल रुलाया पहले अपनी गेल सोचकर दो घूँसों को झेल निकालेगा कविता का तेल. गुजरी है मेरे भावों की अरथी, हिय में जैसे कि रेल चली जाती हो नीरव में उलझती आपस में ज्यूँ बेल. काल ने भी ऐसा ही खेल आज़ खेला है मेरी गेल. प्रभो! अब क्या होगा कैसेकरूँगा मैं कविता से मेल. ... |
| भर गया न जाने क्या सर मेंभारी भारी-सा लगता सर !मैं सोच रहा आखिर है क्या सर में कैसी होती चर-मर !क्या कारण है जो नहीं चैनमिल पाता है मुझको पलभर !इक शब्द गूँजता अनहद-साबस साँय-साँय, सर में सर-सर !था ज्ञान मिला जो गुरुओं से क्या हुआ जंग खाकर जर्जर !या अवचेतन मस्तिष्क मुआ घर्षण कर... |
| सत् सुन्दरता का पान करूँकेवल वसंत का गान करूँआगंतुक अंतर्मन न पढ़े तब कैसे मैं सम्मान करूँ?प्रिय-पग-आहट भी कान करूँ मिलती उपेक्षा 'ना' न करूँ चुपचाप चला आये-जाये तब कैसे हृत का दान करूँ?... |
| जब ह्रदय के उद्गार घनीभूत होकर व्यक्त हों तब काव्य अत्यन्त प्रभावशाली बन जाता है। विद्वता जब सरलता में प्रकट होती है तब वह कविता-सी मधुर हो जाती है।पतझड़मेंथेसबझड़ेपातमैनेपूछाक्याहुयीबातवेबिलख-बिलखकरबोलेयूँपीड़ाकीगठरीखोलीयूँमैनेडालीसेप्यारकियाडालीनेमुझकोत्... |
| आशुकवि रविकर जी और आचार्यवर कौशलेन्द्र जी,पिछले कुछ दिनों से एक पीड़क मनःस्थिति को झेल रहा हूँ... आपकी काव्य-टिप्पणियों से संवाद करने से पहले आपको अपने मन में उठ रहे झंझावात से रू-ब-रू कराना चाहता हूँ. मेरे कुछ प्रिय हैं जो परस्पर घृणा करते हैं. मैं दोनों के ही गुण-विशेषो... |
| बोलो मुझसे नहीं, दिखावो ना ही तुम अपना चेहरा। बार-बार आँचल को अपने मारुत में तू नहीं तिरा। चित्र खींच उंगलियाँ तुम्हारा लेती बारम्बार चुरा। सुन्दर इतने आप कि आँखें लगा रहीं तुम पर पहरा। मधुर शब्द सुन्दर मुख पावन रूप तुम्हारा रहे खिला। किसी-किसी को ही मिलता जैसा तुमको ... |
| पतला ही रह गया रसायन नहीं हुआ वो गाढ़ा. क्षीर समझकर पीने आये हंसराज सितकाढ़ा. स्नेह शुष्क चौमासा बीता बीता थरथर जाड़ा.लेते रहे अलाव विद्युती देह से स्नेहिल भाडा. दर्शन अभिलाषा की मथनी मथती कविता-काढ़ा. पर हंसराज मुख अम्ल मिलापी जाते गाढ़ा गाढ़ा.इस कविता का सम्बन्ध 'दिव अकाल' ... |
| मन में रहता - यही मलालगलती नहीं - हमारी दाल। छंद अलंकारों के थाल नजराने में जाते घाल। बोल-बोल जो फूले गाल होली में हो रहे हलाल।।स्नेह आपका - रहा कमाल नौसिखियों से - भी पदताल। दर्शन अभिलाषा का जाल समझा व्यर्थ मोह-जंजाल। हो बारीकी से पड़तालहोली की तो 'धूल' गुलाल।।प्रिय सं... |
| लो खुला द्वार मैंने उधार माँगा चन्दा से चंद तेल।"दिविता से लो" कह टाल दिया "मैं शीतल, वो पावक-गुलेल।"हेमंत हारओढ़े तुषारराका से करके खड़ा मेल।अलि पुण्डरीक में छिपा-छिपाकेसर से करता काम-केलि।"कवि था अशांत पर शब्द शांत अब तक थे सब कल्पना गेल।चन्दा दिविता हेमंत देख कर कलम श... |
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February 29, 2012, 1:25 pm |
| तम श्याम तट पर शर्वरी ने जो रचे थे चित्र सुन्दर मिट गये वे चंद्र तारे प्रात के आने को सुनकर.सब कह दिया था प्रेयसी ने प्रथम मिलने पर हमारे अब न जायेंगे कभी हम पास से हृत के तुम्हारे.पर ये हृदय कुछ और ही मुझसे कराना चाहता है प्रिय प्रेयसी को भूलकर संन्यास लेना चाहता है.... |
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February 16, 2012, 1:54 pm |
| ओ प्रियंवदा कस्तूरी बू मैं मृग बन घूमा पूरी भू अब सोच रहा लटका ही दूँ 'दर्शन' पर कुछ मिर्ची नीबू.... |
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February 10, 2012, 6:04 pm |
| इंतज़ार के अंतिम पल में ... प्रिय की अप्रिय बात"अभी नहीं आऊँगी" कहती ... प्रियंवदा अ'वदात.कोमल शब्दों के भीतर में ... चुभन भरा बल'घात.सात दिनों का विरह हमारा ... फिर बढ़ता दिन सात.अमित-स्नेह ले गया खींचकर ... पहले बहिन बरात*.दिल्ली-जयपुर, जयपुर-दिल्ली ... छोड़ चला गुजरात.तब से अब तक ठिठुर ... |
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February 3, 2012, 2:38 pm |
| स्नेह अपनी देह से अब न रहादेह को है स्नेह अपने प्राण से प्राण लेकिन तड़पता है विरह में विरह की अनुभूति सच्चा प्रेम है प्रेमतुमसे या स्वयं से है अभी वरन् मन कब का हुआ निज विरत था.... |
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January 31, 2012, 12:39 pm |
| मुझसे मेरे मित्र बारह वर्ष के उपरान्त आकर मिले.... उनके साक्षात दर्शन से मन बहुत प्रसन्न हुआ... उनके भारत आगमन से मेरे आग-मन को जो ठंडक पहुँची... वह बहुत ही आनंददायी थी... उनका बातचीत के बीच-बीच में मेरे हाथों को छूना... और कहना इस अनुभूती को लेकर जाना चाहता हूँ... परन्तु मैंने कैम... |
| 'अनशन' है आरम्भ हमारा'प्राशन' बिलकुल नहीं कराओ.जब तक दर्शन लोकपाल बिलपास न होगा, पास न आओ.दर्शन में भी भेदभाव होतो कैसा अनुराग बताओ?कटु तिक्त अथवा कषाय होदर्शन लोकपाल बिल लाओ.... |
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December 27, 2011, 11:07 pm |
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