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पिछला भागपहली क़िताब मैंने पोथी डॉट कॉम पर छापी। छापी क्या वह तो ट्राई करते-करते में ही छप गई। सोचा कि यार देखें तो सही, क्या पता छप ही जाए। काफ़ी मग़जमारी करनी पड़ी पर अंततः क़िताब तो छप गई। काफ़ी कुछ सीखने को मिला पर उससे कहीं ज़्यादा अभी सीखने को बचा हुआ था। ऐसी ही कई चीज़ों से...
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Tag :block
  January 26, 2017, 4:55 pm
clickफ़ायदे-                                                                           1.इसमें कोई ख़र्चा नहीं आता, कई साइटें यह सुविधा मुफ़्त में देतीं हैं। बस आपमें इससे संबंधित थोड़ी-सी तक़नीक़ी योग्यता होनी चाहिए।2.इन्हें छापने के लिए कोई जोड़-जुगा...
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Tag :digital
  January 6, 2017, 8:32 pm
इस ब्लॉग पर जो मैं शुरु करना चाहता था उसकी यह पहली कड़ी है।पिछले छः-सात सालों से, भारत में संभवतम स्वतंत्रता, ईमानदारी और आनंद के साथ जी रहा हूं। सच्चाई, ईमानदारी और मौलिकता का अपना आनंद है। मेरी सारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मासिक धनराशि 10 से 13-14 हज़ार रु. में मैं यह कर पा रहा हूं। ...
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Tag :home based
  November 11, 2016, 2:53 pm
पैरोडीतेरी आंखों में हमने क्या देखाडर गए, ऐसा माफ़िया देखाहमने इतिहास जाके क्या देखाकाम कम, नाम ही ज़्यादा देखाअपनी तहज़ीब तो थी पिछली गलीखामख़्वाह सीधा रास्ता देखाअपने पैसे लगे चुराए सेख़ुदपे आयकर को जब छपा देखाहाय! अंदाज़ तेरे बिकने कातू ही दूसरों को डांटता देखाभूले ...
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Tag :history
  October 7, 2016, 2:56 pm
लघुकथाबहुत-से लोग चाहते हैं कि उनपर कोई फ़िल्म बनाए।हालांकि उनमें से कईयों की ज़िंदगी पहले से ही फ़िल्म जैसी होती है।उनके द्वारा छोड़ दिए गए सारे अधूरे कामों को फ़िल्मों में पूरा कर दिया जाता है।किसीने कहा भी है कि ज़िंदगी में किसी समस्या से निपटने से आसान है फ़िल्म में उसका...
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Tag :film
  October 5, 2016, 10:54 pm
ग़ज़लहुआ क्या है, हुआ कुछ भी नहीं हैनया क्या है, नया कुछ भी नहीं हैअदाकारी ही उनकी ज़िंदगी हैजिया क्या है, जिया कुछ भी नहीं हैरवायत चढ़के बैठी है मग़ज़ मेंपिया क्या है, पिया कुछ भी नहीं हैलिया है जन्म जबसे, ले रहे हैंदिया क्या है, दिया कुछ भी नहीं हैकि ये जो लोग हैं, ये हैं ही ऐसे...
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Tag :humour
  March 22, 2016, 2:06 pm
लघुव्यंग्यकथासड़क-किनारे एक दबंग-सा दिखता आदमी एक कमज़ोर-से लगते आदमी को सरे-आम पीट रहा था। पिटता हुआ आदमी ‘बचाओ-बचाओ’ चिल्ला रहा था। लोग बेपरवाह अपने रुटीन के काम करते गुज़र रहे थे। ‘हाय! हमें बचाने कोई नहीं आता, कोई हमारा साथ नहीं देता.....’, वह कराह रहा था...एक आदमी रुका, ‘क...
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Tag :domineering
  January 30, 2016, 3:57 pm

कुछ रचनाएं आप शुरुआती दौर में, कभी दूसरों के प्रभाव या दबाव में तो कभी बस यूंही, लिख डालते हैं और भूल जाते हैं, मगर गानेवालों और सुननेवालों को वही पसंद आ जातीं हैं...... ग़ज़लआज मुझे ज़ार-ज़ार आंख-आंख रोना हैसदियों से गलियों में जमा लहू धोना है रिश्तों के मोती सब बिखर गए दूर-...
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Tag :poems
  December 30, 2015, 3:19 pm
कुछ रचनाएं आप शुरुआती दौर में, कभी दूसरों के प्रभाव या दबाव में तो कभी बस यूंही, लिख डालते हैं और भूल जाते हैं, मगर गानेवालों और सुननेवालों को वही पसंद आ जातीं हैं...... ग़ज़लआज मुझे ज़ार-ज़ार आंख-आंख रोना हैसदियों से गलियों में जमा लहू धोना है रिश्तों के मोती सब बिखर गए दूर-...
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Tag :poems
  December 30, 2015, 3:19 pm
बहुत पुरानी एक ग़ज़लडूबता हूं न पार उतरता हूंआप पर एतबार करता हूंग़ैर की बेरुख़ी क़बूल मुझेदोस्तों की दया से डरता हूंजब भी लगती है ज़िंदगी बेरंगयूंही ग़ज़लों में रंग भरता हूंअपना ही सामना नहीं होताजब भी ख़ुदसे सवाल करता हूंकरके सब जोड़-भाग वो बोलामैं तो बस तुमसे प्य...
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Tag :life
  December 25, 2015, 1:37 pm
कविता      मैं बीमार हो गया हूं, सरकार मेरे लिए अस्पताल की व्यवस्था करे।मुझे पढ़ना है, सरकार मुझे कुछ दे।मुझे प्रेरणा चाहिए,सरकार ईनाम की व्यवस्था करे।मुझे नैनीताल में सरकार के खि़लाफ़ कविता पढ़नी है सरकार इसकी व्यवस्था करे।मैं मर गया हूं,सरकार लकड़ियों की व...
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Tag :inspiration
  October 17, 2015, 3:57 pm
कविता      मैं बीमार हो गया हूं, सरकार मेरे लिए अस्पताल की व्यवस्था करे।मुझे पढ़ना है, सरकार मुझे कुछ दे।मुझे प्रेरणा चाहिए,सरकार ईनाम की व्यवस्था करे।मुझे नैनीताल में सरकार के खि़लाफ़ कविता पढ़नी है सरकार इसकी व्यवस्था करे।मैं मर गया हूं,सरकार लकड़ियों की व...
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Tag :inspiration
  October 17, 2015, 3:57 pm
हल्का-फ़ुल्कादब्बर सिंद: त्यों बे तालिया! त्या थोत तर आए ते ? ति सरदार थुत होदा.......तालिया: एक मिनट सरदार, एक मिनट! आप क्या विदेश-यात्रा से लौटे हैं ?दब्बर: अबे त्या बत रहा ए, महीना हो दया झामपुर से बाहर निकले!तालिया: तो फिर ‘सोचकर आए थे’ ‘सोचकर आए थे’ क्या लगा रखी है ? यहां के लेख...
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Tag :gabbar singh
  July 6, 2015, 11:26 pm
छोटी कहानीवे आए थे।श्रद्धा के मारे मेरा दिमाग़ मुंदा जा रहा था।यूं भी, हमने बचपन से ही, प्रगतिशीलता भी भक्ति में मिला-मिलाकर खाई थी।चांद खिला हुआ था, वे खिलखिला रहे थे, मैं खील-खील हुई जा रही थी।जड़ नींद में अलंकार का ऐसा सुंदर प्रदर्शन! मैंने ख़ंुदको इसके लिए पांच अंक दिए...
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Tag :hypocrisy
  June 29, 2015, 1:16 pm
पुरस्कार लेनेवाले की कोई राय हो सकती है, देनेवाले की हो सकती है, लेन-देन और तमाशा देखनेवालों की राय हो सकती है, मगर पुरस्कार ! उससे कौन पूछता है तुम किसके पास जाना चाहते हो और किसके पास नहीं ? पुरस्कार की हालत कुछ-कुछ वैसी ही होती है जैसी तथाकथित भावुक समाजों में कन्याओं की...
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Tag :opinions
  June 3, 2015, 10:46 pm
तीन ताज़ा व्यंग्य-कविताएं1.यह इतिहास कौन है !?यह क्या किसी मचान पर बैठा है दूरबीन लगा कर !?झांक रहा है लोगों के घरों में, रोशनदानों से, दरारों से, झिर्रियों से !?यह आनेवाली पीढ़ियों को लोगों की सच्चाई बताएगा !?हा हा हा! यह उन लोगों की सच्चाई बताएगा जिन्हें ख़ुद अपनी सच्चाई नहीं ...
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Tag :poetry
  May 5, 2015, 2:14 pm
वे सब कितने हैं महान जो क़िस्से गढ़ते हैंनक़ली दुश्मन से अख़बारी पन्नों पे लड़ते हैंऊँचे-ऊँचे दिखते हैं जो लोग फ़ासलों सेनीचे गिर कर ही अकसर वो ऊपर चढ़ते हैंजो जहान को फूलों से नुकसान बताते हैंउनकी नाक तले गुलशन में काँटे बढ़ते हैंवे भी जिनसे लड़ते थे उन जैसे हो बैठेअपनी सारी ...
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Tag :satire
  April 14, 2015, 8:20 pm
अपना ब्लॉग शामिल करवाने के लिए कृपया ब्लॉग का नाम, भाषा और यू आर एल टिप्पणी में दर्ज़ करें......To submit your blog please leave your details in comment form-Blog's url :Blog's Name :Blog's Language :...
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Tag :hype
  April 10, 2015, 1:05 am
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