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भावनायें...

आजकल मक्कार लोग बड़े परेशान हैंकमबख़्त सीधे लोग नहीं मिलतेधोखा देने की तलब हैपर धोखा खाने वाले नहीं मिलतेअपने बच्चे की नेकी से परेशान पिता बोलामास्टर जी जमाना बदल गया हैथोड़ा आप भी समझदारी दिखायेंईमानदारी हम मेनेज कर लेगेंआप तो कृपया इसे मक्कारी सिखायेंहर तरफ मक्क...
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  October 4, 2014, 10:53 am
राम मेरा भाई तेरे राम सेइतना यार झगड़ता क्यों हैमेरे राम मुझे तारेंगेंतारें तुझे तेरे रघुवीरसहज-सरल सी बात है लेकिनतू फ़िर भी नहीं समझता क्यूँ हैराम मेरा भाई तेरे राम से....राग-द्वेष अपने अंतर् मेंकहाँ राम को भाते हैंमन को करते दुखीदेह को रोग नया दे जाते हैंइन्हें हराक...
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  December 17, 2009, 7:14 pm
कैसे राम ने जीता रावणकैसे राम बने जगदीशशीश एक क्यूँ जीत ना पायादस सिर लेकर भी दसशीशनिश्छल मन और निर्मल ह्रदयजहाँ राम की ढाल बनेमलिन ह्रदय और कपट वहीं परदशानन का काल बनेबुद्धी-कौशल और राजनीति काजहाँ रावण ने अभिमान कियाभेज अनुज को उसे सीखनेराम ने उसका मान कियाहर बुराई...
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  January 28, 2009, 7:29 pm
पाया नहीं यह ज्ञान सेसमझा नहीं विज्ञान सेयह नहीं कोई कलाजिसको तराशा ध्यान सेसंस्कारों से मिली जोयह तो बस एक भावना हैजिसने दिया विश्वास मुझकोइंसान आता है जगत मेंहाथ में क्षमता लियेकोई शिखर ऎसा नहींजिसे वो पा सकता नहीं----------आदमी कुछ भी नहींउसका पता है वह घड़ीजिसमें है ब...
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  January 9, 2009, 1:52 am
प्रश्न कुछ ऎसे हैं जिनसेरोज होता रूबरू मैंकौन हूँ क्या चाहता हूँजानने की पीर हूँ मैंइंतहानों को दिये अबसाल बीते हैं बहुतअब भी मगर ये स्वप्न मेंआकर डराते हैं बहुतज्ञान जो निर्भय बनायेपाने को गंभीर हूँ मैंकौन हूँ...राह जैसे सूर्य कीदेती है सबको उष्माचन्द्र जैसे दे रहा...
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  September 26, 2008, 7:17 am
भरा पेट खाली पेट पर आसन जमायेपास रखी रोटी को पाने कीअसफ़ल कोशिश कर रहेखाली पेट से कहता हैरोटी तक पहुँचने काआसान रास्ता न चुनो मित्रभूख पर विजय हीहमारेस्वर्णिम भविष्य...भविष्य शब्द पर अचानक भरा पेट रुकाफ़ुर्ति से रोटी उठाई और बोलाहाँ तो मैं क्या कह रहा था...
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  September 23, 2008, 9:14 pm
कितनी लगन से उसने जी होगी जिंदगीयूँ ही नहीं हँसते हुये यहाँ दम निकलता हैइबादतें, वो बड़ी बेमिसाल होतीं हैंइंसान जब भगवान से आगे निकलता हैजिंदगी में हार को तुम मात न समझोइंसान ही तो यारों गिरकर संभलता हैपहली नज़र के प्यार से हमको परहेज हैकभी-कभी ही साथ यह लंबा निकलता है...
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  May 25, 2008, 9:53 pm
कर्तव्य से बड़कर जहाँ पद हैयह मान नहीं मान का मद हैजहाँ खुलती नहीं वक्त से गाँठेंघर नहीं वो तो बस छत हैकौन फ़िर लगाये वहाँ मरहमदृड़ जो सबके यहाँ मत हैंदिल दुखाये जो अगर वाणीमान लो झूठ जो अगर सच हैकद पर उसके तुम मत जानाफ़ल नहीं छाया भी रुकसत हैकैसे रहें वहाँ पर खुशियाँदर्द ए...
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  May 6, 2008, 6:49 am
जीवन कठिन डगर हैजो साँसें नहीं हैं गहरीकैसे प्रभु मिलेगेंमन जो रहेगा लहरी~~~~~~~~~~मैनें धर्म को अधर्म के साथचुपचाप खड़े देखा हैमैं अधर्म की अट्टाहस से नहींधर्म की खामोशी से हैरान हूँ~~~~~~~~~~जहाँ छोड़ रख्खा हो उजालासबने भरोसे सूर्य केवहाँ जलता हुआ एक दीप भीकिसी सूरज से कम नहीं...
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  April 12, 2008, 7:00 pm
तेरी इस दुनियाँ में प्रभु जीरंग-बिरंगे मौसम इतनेक्यों फ़िर सूखे-फ़ीके लोगथोड़ा खुद हँसने की खातिरकितना रोज रुलाते लोगबोतल पर बोतल खुलती यहाँरहते फ़िर भी प्यासे लोगपर ऎसे ही घोर तिमिर मेंमेधा जैसे भी हैं लोगसत्य, न्याय और धर्म की खातिरलड़ते राह दिखाते लोगएक राम थे जिनने ह...
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  April 6, 2008, 11:20 pm
मैनें देखा है रौशनी कोहाथों में अंधकार लियेअंधकार से लड़ते हुयेनिरंतर चल रहेइस संघर्ष मेंरौशनी को थकते हुएअंत में नहीं रही रौशनीहमारे बीचअंधकार आज भीवैसा ही खड़ा है~~~~~~~~~~~~~~~~~मैनें देखा है रौशनी कोहाथों में रौशनी लियेअंधकार से लड़ते हुयेनिरंतर चल रहेइस संघर्ष मेंअंधकार...
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  April 5, 2008, 5:30 pm
आँसू यह अब झरता नहींकिसी को चुप करता नहींबस गाँठों पर गाँठेंयहाँ कसता है आदमीएक पल में प्राण गयेतो मुर्दा है आदमीकहता है तो रूकता नहींखुद की भी यह सुनता नहींबस छोड़कर यहाँ खुदकोसब जानता है आदमीएक पल में प्राण गयेतो मुर्दा है आदमीदेह तर्पण में लगाक्यूँ मन को यह गुनता न...
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  February 24, 2008, 4:06 am
अभिव्यक्ति से बढ़कर रखी थीअव्यक्त से आशाइंसानियत को मानकरसही धर्म की परिभाषाउसने पहलेजितना सहा जा सकता थाउतना सहाफ़िरजितना कहा जा सकता थाउतना कहापर धीरे-धीरे उसने जानागर अकेले चल पड़ातो भी मंजिलें मिल जायेंगीपर अकेले व्यक्त इनकोक्या मैं भला कर पाऊँगायह सही यहाँ मैं...
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  February 10, 2008, 8:33 pm
हे केशव तुमने ज्ञान,कर्म और भक्तियोग समझाकरअर्जुन का विषाद हर लिया थापर इस कलयुग मेंतुम्हारी कोई जरूरत नहींनिज स्वार्थ में डूबे पार्थों कोयहाँ कोई विषाद नहींइस युग में तुम्हारा कर्मयोगअब सैनिक नहीं पैदा करतानाई, पंडित और शिक्षक मेंयह क्यों ओज नहीं भरताभ्रष्ट व्य...
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  February 5, 2008, 5:35 am
रात हो चुकी थीदिन भर के थके पंछीसंतुष्ट एवं आनंदमग्नचहचहा रहे थे अपने घोंसलों मेंपेड़-पोधे भी अपार संतोष लियेसो रहे थे गहरी नींद मेंवहीं दूसरी ओरइंसानों की बस्ती मेंछाई हुई थी गहरी उदासीसब सोच रहे थेएक और दिन चला गया यूँ हीबाकी दिनों की ही तरहभरपूर रोशनी के साथ आया था ...
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  December 19, 2007, 6:59 am
बिन्देश्वरी दुबे शहर के बड़े लोकप्रिय नेता माने जाते थे । उनके कद का कोई दूजा नेता पूरे नगर में ना था । जनता उन्हें गरीबों का मसीहा मानती थी । कालेज में छात्रों के बीच उनकी बड़ी चर्चा हुआ करती थी । राकेश भी उन्हीं छात्रों में एक था । राकेश के दादा स्वर्गीय पन्नालाल जी स्वत...
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  December 16, 2007, 5:55 am
संस्कारों से मिली थीउर्वरा धरती मुझेस्नेह का स्पर्श पाकरबाग पुष्पित हो गयाभावनाओं से पिरोयासूत में हर पुष्प कोमाला ना फ़िर भी बन सकीअर्पण जिसे मैं कर सकूँहे ईश सविनय आज तुमको----प्रयास भगीरथ का यहाँहमसे यही तो कह रहाअसंभव कुछ भी नहींसत्कर्म पर निष्ठा रखेगर आदमी चलता ...
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  September 30, 2007, 3:34 am
अभी कुछ दिन पहलेकिसी अपने ने मुझसे कहाअरे अब तो आप भी हो गयेरीतेश होशंगाबादीमैं सोचने लगाअब कहाँ होती हैव्यक्ति की पहचान उसकेगाँव या शहर सेउसकी पहचानअब सिर्फ़ इससे हैकी वह आदमी है या औरतऔर हाँ उसकी उम्र क्या हैमेरा शहर जोसमय से पहले हीजवान हो गया हैमुझे बूढ़ा घोषित कर ...
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  September 19, 2007, 8:39 am
कुछ देर पहले ही की तो बात हैहर तरफ़ लगा हुआ था मेलाकोई भी नहीं था मेरे अंदर अकेलामिल रही थी ह्रदय को पर्याप्त वायुमन आश्वस्थ थाऔर कान भूल गये थे सन्नाटे की आवाजफ़िर रूक रूककर आने लगीं गहरी साँसेंरह रहकर आने लगी सन्नाटे की आहटजैसे जा रहा हो कोई दूर मुझसेअचानक यह सिलसिला भ...
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  September 15, 2007, 3:03 am
मेरी रागिनी मनभावनीमेरी कामिनी गजगामिनीजीवन के पतझड़ में मेरेतू है बनी मेरी सावनीशब्द सब खामोश थेबेरंग थी मन भावनासंगीतमय जीवन बनाजो तू बनी मेरी रागिनीआँखों को जो अच्छा लगेसुंदर कहे दुनियाँ उसेसिर्फ़ सुंदर तुम्हें कैसे कहूँजो तू तो है मनमोहिनीतू है कहीं कोई डगरमैं...
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  August 27, 2007, 1:35 am
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