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स्वयं शून्य

नदियाँ, झीलें, तालाब और भूगर्भ का जल हर बीतते दिन के साथ सूखता जा रहा परन्तु इस धरती को जल की आवश्यकता बढती ही जा रही। दिल्ली में यमुना नाला बन चुकी है तो कानपुर में गंगा। कावेरी भी रो रही है और नर्मदा का हाल भी कुछ बहुत अच्छा नहीं है। झीलें हम इन्सानों की जमीन हवस पूरा करन...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  May 24, 2016, 12:14 am
जिन अंधेरों से बचकर भागता हूँहमदम हैं वो मेरे।जिनके साथ हर पल मैं जीता हूँऔर मरता भी हूँ हर पलकि आखिरी तमन्ना हो जाए पूरी।मगर वो तमन्ना आज तक ना पाया हूँकि बेवश फिरता रहता हूँपूछता रहता हूँमैं मेरे अंधेरों से"कि कुछ तो होगीतुम्हारे होने की वजह?"अक्सर वो चुप ही रहते हैं...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  May 19, 2016, 12:31 pm
हर तस्वीर साफ ही हो ये जरूरी नहींजमी मिट्टी भी मोहब्बत की गवाही देती है।-----------------------------------मैं भी कभी हो बेसुध, नीड़ में तेरी सोता थाबात मगर तब की है, जब माँ तुझे मैं कहता था।-----------------------------------मोहब्बत में फकीरी है बड़े काम कीदिल को दिल समझ जाए तय मुकाम की॥-----------------------------------क़त्ल-ओ-गारद का स...
स्वयं शून्य...
Tag :प्रेम
  May 16, 2016, 11:30 pm
जिन स्वर लहरियों पर गुनगुना तुमने कभी सीखाया थावो आज भी अधुरे हैंकि नाद अब कोई नहीं। हर ध्वनि जो अब गूँजतीतुम तक क्या पहुँचती नहीं?या अनसुनी कर देने की कला भी तुम जानती हो? काश तुम कुछ ऐसा करतीकि संदेश हर तुम तक पहुँचताया फिर तुम ही कोई पाती पठातीकि कहानियों में तेरे कु...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  May 8, 2016, 9:28 pm
हम सभी भारत नामक अजायबघर में रहते हैं। इस अजायबघर में इस अजायबघर के लिए जान देने वालों की कीमत कुछ भी नहीं। चाहे वो मरने वाले सी आर पी एफ के जवान हों या सरहदों पर जान देने वाले वीर सैनिक (हो सकता है वो कायर भी हों। जांच की आवश्यकता है। संसद की कोई समिति बनानी चाहिए।)। इस अज...
स्वयं शून्य...
Tag :व्यंग्य
  April 9, 2016, 11:59 pm
आज फिर मैं, दिल अपना लगाना चाहता हूँ खुश है दुनिया, खुद को जगाना चाहता हूँ॥ तन्हाइयों की रात, गुजारी हमने अकेले सारी बहारों की फिर कोई, दुनिया बसाना चाहता हूँ॥ देर से लेकिन सही, आया हूँ लौटकर मगर मैं दर बदर अब नहीं, घर मैं बसाना चाहता हूँ॥ देखो मुड़कर इक बार फिर, अब पराया मैं ...
स्वयं शून्य...
Tag :गज़ल
  April 2, 2016, 11:43 pm
मुश्किल नहीं बातों कोभुलाकर बढ जाना आगे;पर धूल जो लगी है पीठ परसालती है जब ना तबऔर सालती रहेगी जब तककुछ ना कुछ होता रहेगाकि होने से फिर होने काइक सिलसिला हो जाएगाजो फिर कहानी में कईमोड़ तक ले जाएगाऔर जाने का सिलाजानिब तक पहुँच ना पाएगा।---------------------------- राजीव उपाध्याय...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  March 17, 2016, 3:22 pm
कर जो-जो तू चाहता हैकि मुक्कमल जहाँ में तू रहता है।हसरतें तेरी आसमानी हैंकि सब कुछ तू, तू ही चाहता है।जमीं आसमां एक करता हैआसमां मगर जमीं पर ही रहता है।कोई सवाल नहीं है तुझसेमगर सवाल तो बनता है।अब तू जवाब दे ना देआईना मगर सब कहता है। ----------------------------राजीव उपाध्याय...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  March 6, 2016, 10:34 pm
वो कत्ल करने से पहले मेरा नाम पूछते हैं नाम में छुपी हुई कोई पहचान पूछते हैं। शायद यूँ करके ही ये दुनिया कायम है जलाकर घर मेरा वो मेरे अरमान पूछते हैं। तबीयत उनकी यूँ करके ही उछलती है जब आँसू मेरे होने का मुकाम पूछते हैं। ऐसा नहीं कि दुनिया में और कोई रंग नहीं पर कूँचें म...
स्वयं शून्य...
Tag :गज़ल
  March 1, 2016, 12:07 pm
छोटा बेटा था मैं हाँ सबसे छोटा जिसके बालों की चाँदी को अनदेखा करके किसी ने बच्चा बनाए रखा था जिससे लाड़ था प्यार था दुलार था कि आदत जिसकी हो गई खराब थी कि अचानक अनचाही एक सुबह यूँ करके उठी कि मायने हर बात के बदल गए कि वो बच्चा आदमी सा बन गया कि बिस्तर भी उसका सोने का बदल गया क...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  January 31, 2016, 2:09 pm
ढूँढ रहा हूँ जाने कब से धुँध में प्रकाश में कि सिरा कोई थाम लूँ जो लेकर मुझे उस ओर चले जाकर जिधर संशय सारे मिट जाते हैं और उत्तर हर सवाल का सांसों में बस जाते हैं। पर जगह कहां वो ये सवाल ही अभी उठा नहीं की आदमी अब तक अभी खुद से ही मिला नहीं।--------------------- राजीव उपाध्याय...
स्वयं शून्य...
Tag :व्यंग्य
  January 28, 2016, 2:05 pm
ये जिन्दगी बड़ी अजीब है कि हर आदमी जो मेरे करीब है कि संग जिसके कुछ पल कुछ साल गुजारे थे मैंने; जिनमें से कइयों ने तो अँगुली पकड़कर चलना भी सिखाया था, दूर बहुत दूर चले जा रहे हैं जहाँ से वो ना वापस आ सकते हैं और ना ही मैं मिल सकता हूँ उनसे और इस तरह हर पल थोड़ा कम और अकेला होता जा ...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  January 25, 2016, 2:03 pm
मेरे कहे का यूँ कर ना यकीन करमतलब मेरे कहने का कुछ और था।---------------------मेरे जानिब भी तो कभी रूख हवा का करोकि उदासियाँ भी सर्द मौसम सी होती हैं।---------------------है ही नहीं कुछ ऐसा कि मैं कहूँ कुछ तुमसेबात मगर जुबाँ तक आती है कोई ना कोई।--------------------- राजीव उपाध्याय...
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Tag :मुक्तक
  January 2, 2016, 11:32 am
याद है तुम्हें? हर रोज हम उस सड़क पर घूमने जाया करते थे? वही सड़क जो बहुत दूर तक जाती थी। हमने सुना था, बहुत दूर वह किसी दूसरे देश तक जाती थी। वह सड़क बागों के बीच से होकर गुज़रती थी। शायद इस दुनिया में कोई और सड़क बागों के बीच से होकर नहीं गुज़रती --- जो इतनी लंबी हो और बहुत दूर किसी ...
स्वयं शून्य...
Tag :नवीन कुमार नीरज
  December 31, 2015, 11:29 am
ये कौन आया है, दरवाजे पर खड़ा? देता नहीं जवाब, है मौन मुस्करा रहा नाम पूछा, पता पूछा आने की वजह पूछा कुछ ना बोला मुस्कराता रहा चुपचाप मगर कुछ बताता रहा। ये कौन आया है, दरवाजे पर खड़ा? जानना जब हो गया जरूरी हाथ लगा कर छूकर देखा पर हाथ ना आया कुछ भी; भ्रम होने लगे कई निराकार हो वो ग...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  December 21, 2015, 11:57 pm
तुमने मुझसे वो हर छोटी-छोटी बात वो हर चाहत कही जो तुम चाहती थी कि तुम करो कि तुम जी सको पर शायद तुमको कहीं ना कहीं पता था कि तुमने अपनी चाहत की खुश्बू मुझमें डाल दी वैसे ही जैसे जीवन डाला था कभी कि मैं करूँ; और इस तरह शायद वायदा कर रहा था मैं तुमसे उस हर बात की जिससे जूझना था म...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  December 19, 2015, 11:55 pm
कि उम्र सारी बदल कर चेहरे खुद को सताता है जब जूस्तजू जीने की सीने में जलाता है; उम्र के उस पड़ाव पर आ कर ठहर जाना ही सफ़र कहलाता है आदमीजब आदमी नज़र आता है।------------------------------------ राजीव उपाध्याय...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  December 17, 2015, 11:53 pm
दोस्ती दुश्मनी का क्या? कारोबार है ये। कभी सुबह कभी शाम तलबगार है ये॥ कि रिसालों से टपकती है ये कि कहानियों में बहती है ये। कभी सितमगर है ये और मददगार भी है ये॥ इनके होने से आपको जीने की वजह मिलती और इस तरह चेहरे के आपके सरमाएदार हैं ये॥----------------------------- राजीव उपाध्याय...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  December 15, 2015, 11:51 pm
मिरी आँखों से कुछ आँसू ऐसे भी रिसते हैं जो किसी को दिखते नहीं और शायद अब उनका कोई मतलब भी नहीं। पर इतना यकीन मुझको मेरे आँसुओं के बह जाने में है कि साँसे भी मेरी कई बार फीकी पड़ जाती हैं और मेरे होने की वजह भी उन आँसुओं तक चली आती है।------------------- राजीव उपाध्याय...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  December 13, 2015, 11:30 pm
रहता हूँ शहर में जिसअजनबी है।कभी कहींतो कभी कहीं है॥हालात है येकि ना कोई जानने वालाऔर ना हीसड़कें पहचानती हैं।रहता हूँ शहर में जिसअजनबी है।हर तरफ शोर ही शोर हैऔर चकाचौंध भीपर मनहूस सी खामोशी कोईभारी है सीने में;जो जीने का सबब भी देती हैऔर मरने की वजह भी;और यूँ कर के बेख...
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Tag :राजीव उपाध्याय
  December 3, 2015, 1:11 am
बाज़ार तो बाज़ार है जो खुद में ही गुलज़ार है उसे क्यों कर फर्क पड़ता गर कोई लाचार है। बाज़ार तो बाज़ार है॥ कीमत ही यहाँ हर बात में है मायने रखती बिकता यहाँ है सब कुछ हर कोई किरदार है। बाज़ार तो बाज़ार है॥ तुम बात कोई और आ कर यहाँ ना किया करो कीमत बिगड़ती जाती है और हर कोई तलबगार है। ब...
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Tag :राजीव उपाध्याय
  November 27, 2015, 2:35 am
क्या शहर क्या गांव सब बदलने लगे एक घर में कई चूल्हे जलने लगे॥कहाँ दफ़न हो गयीं ममतामयी माएँगृहणियों के बच्चे आया से पलने लगे॥कितना परायापन लगा उसकी आँखों मेंजब बेटे के घर से माँ- बाप चलने लगे॥मुफ़लिसी क्या होती है उनसे जाकर पूछियेजो रोटी की एक टुकड़े पर मचलने लगे॥लगती है...
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Tag :रजनी मल्होत्रा (नैय्यर)
  October 23, 2015, 8:39 pm
रोज़ घर से निकलते हैं, यह सोचकर ---एक हमराही आज ढूँढ़ लाएंगेहम गलियों-नुक्कड़ पर मंडराते हैंहर गली हर मुहल्ले चक्कर लगाते हैंमन की आँखों से हर चेहरें निहारते हैंइस उम्मीद से कि हमराही ढूँढ़ लेंगेहम तैयार हैं --- हर काँटे को फूल समझने के लिएबस एक हसरत है ---मेरे मन को वह आबाद करेफ...
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Tag :नवीन कुमार नीरज
  October 22, 2015, 9:20 pm
ये दिल है कि टूटा हुआ मक़ान? बुर्ज़ें सारी, ढ़ह गई हैं पर, खिड़कियाँ बंद हैं। घर में कोई दरवाजा नहीं, शायद कोई आता जाता नहीं। अज़ीब विरानगी है; इस घर में, आदमी तो रहता पर आदमी नहीं। ये दिल है कि टूटा हुआ मक़ान? ---------------------राजीव उपाध्याय ...
स्वयं शून्य...
Tag :राजीव उपाध्याय
  October 20, 2015, 9:26 pm
एक नारी ऐसी भीवर्तमान नारी का जीवन, क्यों इतनी व्यथित हुई है. व्याभिचारी-अपराधी बनकर, क्यों स्वार्थी चित्रित हुई है. जब-जब भी वह बहकी पथ से, वो पथभ्रष्ट दूषित हुई है. पीड़ा-दाता बनकर उसने, खुद ही जग में पीड़ित हुई है. ये है नारी का रूप-कुरूप, क्यों विचार कुत्सित हुई है. क्यों ह...
स्वयं शून्य...
Tag :श्रीमती भारती दास
  October 18, 2015, 9:02 pm
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