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Blog: खुशी का चेहरा...............कुमार मुकुल की लंबी कविताएं

Blogger: कारवॉं
पॉलीथीन में डाल सामने खूंटी से लटका दी हैं रोटियां मैंने कि नम रहें वो देर तक और चींटियां भी ना पहूंच सकें वहां तक पंद्रह साल पहले दीपक गुप्ता ने सिखाए थे ये ढब रोटियां मुलायम रखने के अब जबकि अरसा हुए उसे बेरोजगार से प्रोफेसर हुए वह भी भूल चुका होगा ये ढब ये रोटियों ... Read more
clicks 201 View   Vote 0 Like   4:39pm 17 May 2015 #
Blogger: कारवॉं
19 मई 2014 अच्‍छे दिन... अच्‍छे दिन आ चुके हैं 'महज सरकार बदली है, इतिहास नहीं' (भाषा) भाजपा की सीटें तो करीब ढाईगुणा बढी हैं पर संसद में अपराधी केवल चार फीसद बढे हैं इनमें भी भाजपा के मात्र 35 फीसद हैं, उसके सहयोगी शिवसेना के 85 फीसद हैं और कांग्रेस तो यहां भी पिछडी है, बस 18 फीसद ... Read more
clicks 179 View   Vote 0 Like   5:46pm 15 May 2015 #
Blogger: कारवॉं
हम हमेशा शहरों में रहे और गांवों की बावत सोचा किया कभी मौका निकाल गांव गए छुटि्टयों में तो हमारी सोच को विस्तार मिला पर मजबूरियां बराबर हमें शहरों से बांधे रहीं ये शहर थे जो गांवों से बेजार थे गांव बाजार जिसके सीवानों पर आ-आकर दम तोड़ देता था जहां नदियां थीं जो नदी घाटी ... Read more
clicks 157 View   Vote 0 Like   1:00pm 22 Sep 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
राजू रंजन प्रसाद के लिए ------------------ कहने को तो मेरा है घर दाहिने बिस्तर पर फैली  किताबें हैं जिनमें कुछ में  दीमकों का बसर है उन्हें मैंने तो नहीं बुलाया पर वो रहती हैं इतना झाड़-पोंछ नीम- फिनाईल के बाद भी और यह जो चौकी है मेरी इसमें वास है कितने जीवों का रात नींद में डूब... Read more
clicks 184 View   Vote 0 Like   1:30pm 6 Sep 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
पटना के अर्धनगरीय इलाक़ों से गुज़रते सड़क किनारे की दुकानों में लगे शीशे के जारों में नज़रें कुछ ढूंढ़ती रहती हैं पाँव भागते रहते हैं पर निग़ाहें जारों में बन्द पदार्थों से लिपटतीं उनका स्वाद लेती चलती हैं पारचूनी दुकानों की धकापेल में चौक-चौराहों पर आसन जमाते ... Read more
clicks 185 View   Vote 0 Like   2:00pm 28 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
मैं जब भी उसकी आँखों में देखता मेरे बालों में फिरते उसके हाथ मेरी आँखें ढक लेते मैं अपने हाथ उसकी हथेली पर रख देता और मेरा देखना जारी रहता इसी तरह मैं सपनों की दुनिया में चला जाता और फिर गहरी नींद में और जगता तो लगता कि जैसे सुबह हुई हो धीरे-धीरे मैं अपनी आँखें खोलता ... Read more
clicks 175 View   Vote 0 Like   7:33am 22 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
खुशी को देखा है तुमने क्या् कभी श्रम की गांठें होती हैं उसके हाथों में उसके चेहरे पर होता है तनाव-जनित कसाव बिवाइयॉं होती हैं खुशी के तलुओं में शुद्ध  मृदाजनित खुशी की  हथेलियॉं देखी हैं तुमने पतली कड़ी लोचदार होती हैं वो जो अपनी गांठें  छुपा लेती हैं अक्स र अपनी आत्मा... Read more
clicks 162 View   Vote 0 Like   1:29pm 18 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
पहले बड़ी-बड़ी छितराती बूंदें गिरीं और सघन होती गयीं सामने मैदान में चरती गाय ने एक बार सिर ऊपर उठाया फिर चरने लगी और बछड़ा बूंदों की दिशा में सिर घुमा ढाही-सा मारने लगा और हारकर आख़िर गाय से सटकर खड़ा हो गया एक कुत्‍ता पूँछ थोड़ी सीधी किए करीब-करीब भागा जा रहा है ... Read more
clicks 157 View   Vote 0 Like   12:28pm 11 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
1 प्‍यार  आलोकित कर जाता है सुबहों को और शामों को बनाता चला जाता है  रहस्‍यमयी  प्‍यार  जैसे तारों से आती है टंकार... और सारा दिन निस्‍तेज पड़े चांद की रौशनी वापस आने लगती है प्‍यार कि आत्‍मा अपने ही शरीर से  बेरुख़ी करती कहीं और जा समाने को  मचलने लगती है प्‍यार और ख... Read more
clicks 184 View   Vote 0 Like   7:35am 10 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
मेरे सामने बैठा मोटे कद का नाटा आदमी एक लोकतांत्रिक अखबार का रघुवंशी संपादक है पहले यह समाजवादी था पर सोवियत संघ के पतन के बाद आम आदमी का दुख  इससे देखा नहीं गया और यह मनुष्‍यतावादी हो गया घोटाले में पैसा लेने वाले संपादकों में इसका नाम आने से रह गया है यह खुशी इसे और मो... Read more
clicks 155 View   Vote 0 Like   6:41pm 9 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
क्‍या हर प्‍यार करने वाले से शादी करनी होगी मुझे पूछती है-- उर्सुला और भाग खड़ी होती है विन्‍सेंट को पुकारती लाल सिर वाला बेवकूफ़ सुबहें होती आई हैं शबनम से नम और आग से भरी हुईं हमेशा से और शामें उदास-ख़ूबसूरत ग़ुलाम हो चुकी भाषा के व्‍याकरण को अपनी बेहिसाब जिरहों... Read more
clicks 180 View   Vote 0 Like   3:47pm 9 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
नवंबर के इस महीने में सीटीओ के फैक्स रूम में तितलियां भरी पड़ी हैं सब की सब भूरी धूसर व काली हैं नीली प्लास्टिक पेंट चढ़ी दीवारों पर एक फुट के घेरे में पांच-छह तितलियां बैठी हैं वहीं एक मोटी सफेद छिपकली लटकी है दीवार से उनकी ओर से मुंह फेरे फिर नीचे देखता हूं रजिस्ट... Read more
clicks 171 View   Vote 0 Like   3:45pm 9 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
सीढि़यों से गलियों में उतरा ही था कि हवा ने गलबहियाँ देते कहा - इधर नहीं उधर फिर कई मोड़ मुड़ता सड़क पर आया तो बाएँ बाजू ख्‍ड़ी प्रागैतिहासिक इमारत ने अपना बड़ा सा मुँह खोल कहा-- हलो मैंने भी हाथ हिलाया और आगे बढ़ गया फुटपाथ पर- दाएँ सड़क पर गाडि़याँ थीं इक्का-दुक्का स... Read more
clicks 166 View   Vote 0 Like   3:32pm 9 Aug 2014 #long poems
Blogger: कारवॉं
कभी-कभार होता है कि ज़िंदगी का तर्जुमा उदासी में कर दूं उदासी जो मेरे लिए खुशी के बेशुमार थकते घोड़ों की टापों से उड़ती हुई धूल है गोधूलि में उतरती हुई जो बैठती जाती है जिसकी रौ में दिशाएं डूबने लगती हैं और सांझ का निकलता पहला तारा जलना छोड़ टिमटिमाने लगता है और चा... Read more
clicks 182 View   Vote 0 Like   3:30pm 9 Aug 2014 #long poems
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