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वय-वृद्धि क्रम --------------------कालक्रम में जीवन भोला न रहता, बचपन के शौख-अंदाज उम्र संग नदारद मुस्काता, खिलता-हँसता चेहरा, जीवन की वीभत्स-युद्ध छाया में जाता छुप। 'भूल गए तानमान भूल गए जकड़ी, तीन चीजें याद रह गई नून-तेल-लकड़ी' प्रातः-जाग बाद दिवस संघर्ष में धकाया जाता, सा...
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Tag :काव्य
  July 14, 2018, 10:07 pm
 कठिन मूल-भेदन-------------------सृष्टि-चलन एक महातंत्र, बहु कारक, सतत घटित है, अनेक रहस्य विस्मयी कौन जग को पूर्ण मनन में सक्षम, प्राणी क्षीण-चिंतक, विचार मात्र सतही। विशाल सृष्टि, बहुल-विस्तृत अवयव, चिर-दूरी मध्य, स्पष्ट संदर्भ भी न दर्शित सब अपनी जगह नन्हें जग में...
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Tag :काव्य
  July 1, 2018, 6:19 pm
सम्मिलित चेतना--------------------इस प्रकृति के बहु-आयाम, अति सघन-विस्तृत, प्रतिकण  है विचित्र रूप उसका सबसे गहन-संबंध, मनीषियों का सर्व-ब्रह्मांड एकत्रण हेतु मनन। मानव भी बहु-संख्यक, अन्य जीव सम प्रकृति-हिस्सा, तदानुक्रम उत्पन्नलाखों वर्षों  संग रह रहा, एक समन्वय सा बना...
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Tag :लोक-व्यवहार
  May 28, 2018, 12:47 am
निकटस्थ - हित -------------------सभी निज संगठनों से जुड़े रहते, शांत रह समाज हेतु करते काम घर-कार्यालय माना प्रधान, पर यहीं नागरिक-दायित्व रूकता न। जिस परिवेश में हम जन्म लेते, उसके प्रति लगाव एक प्रवृत्ति सहज माना संपूर्ण ब्रह्मण्ड एक कुटुंब ही, निकटस्थों को समझते ...
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Tag :काव्य
  May 20, 2018, 12:08 am
मस्तिष्क-ग्रंथि प्रहेलिका---------------------------अन्वेषण प्रक्रिया से एक शब्द की यात्रा, प्राप्ति तो कुछ अग्र चरण  सकल जीवन यूँ चिंतन में बीतता, ठहरकर क्यूँ न उठाता अनुपम। चारों ओर ध्वनि-नाद गुंजायमान, मैं कर्ण होते भी न श्रव्य-सक्षम  अंदर से कुछ भी निकल न रहा, यूँ मूढ़...
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Tag :काव्य
  May 6, 2018, 7:14 pm
निज-निर्णय ---------------लोगों से सीखना ही होगा, निर्भीकता से निज बात कह-कर देते  लोग चाहे उनको पसंद करें या नहीं, जो जँचता प्रस्तुत कर देते। एक उक्ति पढ़ी थी 'Always Take Sides', जो मनानुरूप लगे हम भी सदा उचित न सोच पाते, पूर्वाग्रह-आवरण ओढ़े रहते। बहुदा एक मन बना लेते, परिस्थिति-प...
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Tag :दर्शन
  April 28, 2018, 11:23 pm
गहराई -----------'गहराई'शब्द अभी मेरे जेहन में आया है और मैं सोच रहा हूँ कि इसे कैसे परिभाषित करूँ, कैसे इसे अपने साथ जोड़ूँ, और कैसे इससे अनुभूत होऊँ। 'गहराई'क्या है - यह मात्र अनदेखी भ्रान्ति तो नहीं है जिसकी दूर से ही कुछ कल्पना करके हम अपना कुछ अस्पष्ट सा निष्कर्ष निकाल ल...
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Tag :आलेख
  April 1, 2018, 6:08 pm
विद्यानग-पथ ----------------कितना बना वह शिक्षित, इसका पैमाना है क्या कुछ उपाधियाँ एकत्रित भी, पर क्या वे पर्याप्त ?कितना शिक्षा-यत्न, कितना वास्तव में ही समझता  कितनी फिर स्मृति ही, कितना आचार में ला पाता ? कितने अल्प सतही ज्ञान पर, यूँ इतराता है फिरता स्वयं को फिर वि...
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Tag :काव्य
  March 25, 2018, 6:31 pm
  कर्त्तव्य-परायणता कितने दिन का चुग्गा-पानी नर का, न कोई कथन-शक्यता अति-दूरी होंठ एवं प्याले मध्य, जो खा लिया वही है अपना। स्थल-विरक्तता, व्यक्ति-त्यक्ता, प्रायः सबसे निर्लेपता  भाव मानव छूटता जाता बंधनों से, या स्व-जिम्मेवारियों से दुराव। जगत के रा...
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Tag :लोक-व्यव्हार
  February 24, 2018, 5:24 pm
सुवीर --------कुछ लघु ही किन्तु अनुपम, अल्प-शब्दों में आह्वानित भाव अति सूक्ष्म, अर्थ गूढ़ व पावन सुंदर का एकत्रण। पूर्ण मन का स्वामी और त्याग त्यज्य को हुआ सजग कुछ बुद्ध-दर्शन ग्रहण-प्रेरणित, कुछ अवस्था सुमधुर। लुप्त हुआ स्वान्वेषण में, पवित्र-पुष्कर में किया ...
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Tag :काव्य
  February 10, 2018, 11:10 pm
 दूर यात्रा-----------एक शब्द-अन्वेषण प्रक्रिया से गुजर रहा, मिले तो कुछ बढ़े अग्र जीवन यूँ ही बीत जाता, ठहरकर चिंतन से उठा सकता अनुपम। चारों ओर ध्वनि-नाद गुंजायमान, मैं कर्ण होते भी न सकता सुन अंतः से कुछ निकल न पा रहा है, मूढ़ सम बैठा प्रतीक्षा ही बस। इतना विशाल वि...
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Tag :काव्य
  January 30, 2018, 6:42 pm
स्व-नियंता --------------उच्चावस्था संभव प्रयोजनों में, आत्म-मुग्ध या विद्वद-स्वीकृत संस्तुति वाँछित मनीषियों द्वारा, पर मात्र उसके न कर कष्ट। कोई नहीं है तव प्रतिद्वंद्वी यहाँ, समस्त कवायद स्वोत्थानार्थ निज-भाँति सब विकसित होते, न कोई उच्च है अथवा क्षुद्र। स्व...
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Tag :काव्य
  January 22, 2018, 12:43 am
 स्वयं-सिद्धा----------------मिश्रित कोलाहल-ध्वनि सा यह जहाँ, गूँज है चहुँ ओर से मानव मन एकाकी चाहता, बाह्य कारक प्रभाव डालते।मैं एक गाथा लिखना चाहता, जो हो एक बिंदु पर केंद्रितपर आ जाते इतर-तितर से अवयव, होते अभिमुख सतत। कैसे चले एक सत्य पथ पर ही, वह भी तो सीधा नहीं जब ...
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Tag :काव्य
  January 7, 2018, 6:19 pm
ललकार -----------समय यूँ परीक्षा लेता, अनेक कष्ट देकर बनाता सशक्तन बीतता चैन से जीवन, मानव बनने में है बहुत माँग। अब नहीं बालक, जब सब माता-पिता से मिलता पोषण युवा-शिक्षित हो बन्धु, एक पद मिला करने को निर्वाह। विभाग एक जैसों का कुल्य, सबके करने से ही तो प्रगति  न...
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Tag :चाहत
  December 25, 2017, 11:44 pm
मन-दृढ़ता---------------कौन हैं वे चेष्टाओं में प्रेरक, मूढ़ को भी प्रोत्साहन से बढाते अग्र निश्चित ही कर्मठ-सचेत, वृहद-दृष्टिकोण, तभी विश्व में नाम कुछ। क्या होती महापुरुष-दिनचर्या, एक दिन में कर लेते काम महद प्रत्येक पल सकारात्मक क्रियान्वित, तभी तो कर जाते अनुप...
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Tag :लोक-व्यव्हार
  December 10, 2017, 8:19 pm
आदर्श व्यवहार --------------------अपने पंथों की मान्यताऐं बनाए रखने हेतु, लोग कैसे-2 उपाय रखते लोभ निश्चित ही मानव में, सत्य जानते भी आनाकानी स्वीकारने में। रूढ़िवादिता - जो लिखा-बोला गया उचित ही, किंचित स्वानुरूप भी  यदि वह भी गुप्त स्वार्थ में ही उवाच, निष्कर्ष ...
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Tag :लोक
  December 3, 2017, 8:50 pm
जीव-कर्त्तव्य -----------------हर दिवस एक नवीन उद्भाव, कुछ प्रगति कुछ अवसाद प्रतिपल एक परीक्षा लेता, चोर-सिपाही का खेल निरंतर। जीवन-चक्र अति विचित्र, खूब खेल खिलाए, डाँटे-फटकारे क्षीणता, अल्पज्ञता, त्रुटियाँ ला समक्ष, यथार्थ पृष्ठ पर पटके। प्रहर्ष अधिक न पनपने देता, विश...
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Tag :काव्य
  November 18, 2017, 11:30 pm
Journey: श्रीकालिदासप्रणीत मेघ-सन्देश : पूर्व-संदेश: मेघ - सन्देश    ---------------- श्रीकालिदासप्रणीत ( पूर्व - संदेश ) ------------ निज कर्तव्यों से चिंता - मुक्त   एवं अ......
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  August 5, 2017, 6:16 pm

रक्त-रिश्ते---------------रिश्तें प्राण-वाहक, हम निकसित उनसे, एक योग रक्त-सम्पर्क से  कह सकते सीधे जुड़े, किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं। कुछ जुड़ाव तो अति-निकट जैसे अभिभावक, दादा-दादी, नाना-नानी भाई-बहन, मामा-मौसी, चाचा-बुआ, चचेरा-फुफेरा, ममेरा-मौसेरा आदि। रक्त-माध्यम स...
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  July 31, 2017, 1:52 pm
रक्त-रिश्ते---------------रिश्तें प्राण-वाहक, हम निकसित उनसे, एक योग रक्त-सम्पर्क से  कह सकते सीधे जुड़े, किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं। कुछ जुड़ाव तो अति-निकट जैसे अभिभावक, दादा-दादी, नाना-नानी भाई-बहन, मामा-मौसी, चाचा-बुआ, चचेरा-फुफेरा, ममेरा-मौसेरा आदि। रक्त-माध्यम स...
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Tag :लोक-व्यव्हार
  July 31, 2017, 1:52 pm
प्रोत्साहन-मनन-------------------मनन यह क्या मनन हो, निर्मल-चित्त तो वृहत-आत्मसात कहते हम सब उसीके ही भिन्न अवयव, पूर्णता से जुड़ पूर्ण ही बनेंगे। लेखन भी है अद्भुत विधा, कुछ न भी दिखे तथापि पथ ढूँढ़ लेती  कलमवाहक को मात्र माध्यम बना लेती, उकेरेगा जो यह चाहती। माना लेखक की सो...
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Tag :काव्य
  February 5, 2017, 11:31 pm
दर्शन-यथार्थता--------------------कैसा जहाँ हम बनाना चाहते, सोच का ही है खेल जो भी यहाँ अच्छा-बुरा जैसा है, सब है मानव-कृत। क्या सोचते हम परिवेश हेतु, जो हमारा आवास है कितनों को व क्या सबको, उसमें सम्मिलित करते ? अपने जैसों से सम्पर्क साधते, अन्यों को रखते बाहर...
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Tag :काव्य
  December 25, 2016, 6:40 pm
विश्व-बवाल ---------------क्यों मानव कष्टमय स्व-कृत व्यवधानों में, अविश्वास में विश्व उबल रहा जहाँ देखे वहाँ हिंसा-साम्राज्य, परस्पर मार रहें पता नहीं क्या पा लेंगे ?जब से पैदा हुए युद्ध विषय में सुन-पढ़ रहें, क्या हैं मूल-कारण इसके किंचित यह लोभ-तंत्र है आत्म-समृद्धि को...
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Tag :लोक
  December 17, 2016, 9:57 pm
ज्ञान-सोपान ---------------निरुद्देश्य तिसपर उत्कण्ठा तीक्ष्ण, अध्येय पर प्रखर आंतरिक-ताप जीवन स्पंदन की चेष्टा में रत, मन-संचेतना कराती स्व से वार्तालाप। बहु-विद्याऐं मैं हत्प्रद, अबूझ-अपढ़, खड़ा विशाल पुस्तकालय सम्मुखआभ्यंतर का न साहस होता, डर कहीं प्रवेश न कर दिया ज...
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Tag :काव्य
  November 21, 2016, 10:42 pm
Journey: वीरता:   वीरता  सचमुच ही   वे   कर्म योद्धा हैं, लेखनी जो  उद्देश्यार्थ  चलाते   सतत चलते दुराहों पर अकेले, विवेचन-मंथन करते हुए।   ......
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  October 30, 2016, 6:34 pm
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